Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

હું જ્યારે રાજકોટ જિલ્લા પંચાયતમાં નોકરી કરતો હતો ત્યારે મને એક તપાસ સોંપવામાં આવેલી. ઉપલેટા તાલુકાના ઢાંક ગામે તપાસ અર્થે ગયો હતો. તપાસનું કામ પૂર્ણ કરીને છેલ્લે ગ્રામ પંચાયતના સરપંચનું એક નિવેદન લેવાનું હતું.

સરપંચ તરીકે 70-75 વર્ષની ઉંમરના એક માજી હતા. મેં એમને વાત કરી અને એમને કહ્યા મુજબનું નિવેદન લખ્યું. માજીએ લખાવેલા આ નિવેદન પર એની સહી લેવાની હતી. માજીની ઉમર જોતા મને એવું લાગ્યું કે માજી ભણેલા નહીં હોય એટલે સાથેની વ્યક્તિને મેં સ્ટેમ્પ પેડ કાઢવા કહ્યું જેથી માજી નિવેદન પર અંગુઠો મારી શકે.

માજીએ મારી સામે જોઇને પૂછ્યું, ‘સાહેબ, સ્ટેમ્પ પેડને તમારે શુ કરવું છે ?’ મેં કહ્યું, ‘બા, તમે લખાવેલા આ નિવેદન પર તમારા અંગુઠાની છાપ લેવાની છે.’ માજી હસવા લાગ્યા મને કહે, ‘ભાઈ, હું અંગુઠા છાપ નથી. તમને ખબર નથી હું ભગાબાપુના રાજની દીકરી છું. તમારું લખેલું આ નિવેદન વાંચીશ અને પછી સહી કરીશ.’

ગામડા ગામના માજીની ખુમારીનું રહસ્ય હતું ગોંડલના મહારાજા સર ભગવતસિંહજી. આજે પ્રજાવત્સલ મહારાજા સર ભગવતસિંહજીનો જન્મદિવસ છે. મહારાજાએ આઝાદી પહેલના સમયે પોતાના રાજ્યની દીકરીઓના સર્વાંગી વિકાસ માટે સ્ત્રીશિક્ષણ પર ખૂબ ભાર મુક્યો હતો. ગોંડલ રાજ્યમાં એમણે સ્ત્રી શિક્ષણ ફરજિયાત કર્યું હતું. દીકરીની એક દિવસની શાળા પણ પડે તો દીકરીના પિતા કે વાલીને દંડ કરવામાં આવતો.

દીકરીઓ શાળાએ આવવા પ્રેરાય એટલે રાજકુમારીને પણ સામાન્ય દીકરીઓની સાથે જ ભણવા માટે બેસાડેલા. ગોંડલ રાજયના સામાન્ય પરિવારની દીકરી જે વર્ગખંડમાં ભણતી હોય એ જ વર્ગખંડમાં રાજકુમારી પણ ભણતા હોય.

ગોંડલ રાજ્યમાં તમને એક એવી પેઢી પણ જોવા મળશે જ્યાં સાસુ ભણેલી હોય અને વધુ અભણ હોય. કારણકે સાસુનો જન્મ સર ભગવતસિંહજીના રાજમાં થયો હોય અને વહુનો જન્મ આઝાદી બાદ લોકશાહીમાં થયો હોય !

આજે આઠમું નોરતું છે. જેમણે ખરા અર્થમાં જગદંબાઓની શક્તિનો લાભ સમાજને મળે એવા આશયથી કન્યાકેળવણી ફરજિયાત કરેલી એવા મહારાજા ભગવતસિંહજીને એમના જન્મદિવસે કોટિ કોટિ વંદન.

શૈલેષ સાગપરિયા

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उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार भोजन बनाने का मोका मिलता था। लेकिन जब अपनी रूपवती पत्नी पिंगला के पाखंड से व्यथित हो उन्होंने गुरु गोरखनाथ के शिष्यत्व में सन्यास ले लिया था तो भिक्षा मांगकर खाने लगे थे।

एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।‘ शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहां 365 तो रसोइये रहते थे। ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’ गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’ राजा भरथरी नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे। गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के। गुरु जी ने चेलों से क, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत लिया है।’

शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’ थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भरथरी को महल दिखा रहे थे। युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे। भरथरी युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए।बिना उनका आतिथ्य स्वीकार किये चलते ही गए।

गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भरथरी ने काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है। शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा, अच्छा भरथरी हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’ भरथरी अपने निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो क्षण भर में जल जाए। एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए। सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो।

‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया? छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।’ गोरखनाथ जी दिल में शिष्य की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी। शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’ गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भरथरी बोले, ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’ गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक नहीं की। भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’।

अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी। एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए। भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोले, ”शाबाश भरथरी, वर मांग लो। अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो। भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गए।’ गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।’ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।’

गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष,कितना निस्पर्ह है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।’ गुरु गोरखनाथ ने उन्हें ह्रदय से लगा लिया। प्राण प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया क्षण मात्र में पूरी हो गयी। अर्पण,समर्पण और विसर्जन पूरा हुआ।।