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एक पेड़ पर बंदर और बंदरिया बैठे थे,नीचे कुछ दूर एक शेर सोया हुआ था।


एक पेड़ पर बंदर और बंदरिया बैठे थे,नीचे कुछ दूर एक शेर सोया हुआ था।

बंदरिया ने बंदर को उकसाते हुए कहा कि-“अगर बहादुर हो तो उस शेर की पूँछ मरोडकर दिखाओ।

बंदर के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न था।उसने जाकर डरते-डरते धीरे से शेर की पूँछ मरोड दी और भाग चला।शेर की नींद टूटी ,वह एकदम खडा हुआ और बंदर के पीछे तेजी से दौड़ पड़ा।

आगे-आगे बंदर पीछे शेर,बंदर दौडता हुआ पास के गाँव में घुस कर एक नाई की दूकान में छिप गया।

दूकान में उस समय कोई नही था। बंदर हजामत वाली कुर्सी पर आकर बैठ गया और उसने बाहर झाँककर देखा तो दूर उसे शेर आता दिखाई दिया। उसने झट से पास में ही रखा हुआ एक पुराना अखबार उठा लिया और उसकी आड में अपना मुँह ढक लिया।

शेर ने पास आकर उसी से पूछा- ” भाईसाहब…..आपने किसी बंदर को इधर से जाते देखा है ?

अखबार के पीछे से बंदर ने कहा- ” किस बंदर के बारे में पूछ रहे हो, क्या वही जिसने शेर की पूँछ मरोड़कर उसे पटक पटक कर लात घूसों से पीटकर अधमरा कर दिया था।

यह सुनकर शेर शर्म से पानी पानी हो गया और उल्टे पाँव जंगल की ओर तेज़ी से भाग चला।उसके बाद जंगल में शेर लगातार मीडिया वालों को कोस रहा था….”कमीने घटना होती नही कि अखबार मे बढ़ाचढ़ाकर छाप देते हैं,ये साले सुधरेंगे नहीं क़भी,पूरी बिरादरी में मेरी इज्ज़त का कचुम्बर निकाल दिया, अब टीवी चैनल वाले भी मेरी बची खुची आबरू नीलाम करेंगे”……….

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ऑफिस के बिजी शेड्यूल और थकान के उपरांत,


ऑफिस के बिजी शेड्यूल और थकान के उपरांत,
एक महिला मेट्रो में चढ़ी और अपनी सीट ग्रहण कर अपनी आंखें बंद करके , थोड़ा मानसिक आराम कर तनाव दूर कर रही थी…. 😇

जैसे ही ट्रेन स्टेशन से आगे बढ़ी,
जैन साहब जो कि महिला के बगल में बैठे थे,
अपना मोबाइल निकाला और जोर जोर से बातें करने लगे ।

जैन साब का संवाद इस प्रकार था:-
“जानेमन, मैं अनिल बोल रहा हूँ
और मेट्रो पकड़ ली है……
हाँ, मुझे पता है कि अभी सात बजे है, पांच नहीं,
मैं मीटिंग में व्यस्त हो गया था,
इसलिए देर हो गई।
“नहीं जानेमन, मैं एकाउन्टेंट प्रीति के साथ नहीं था, मैं बॉस के साथ मीटिंग में था”,
“नहीं जान, केवल तुम अकेली ही मेरे जीवन मे हो”
“हाँ पक्का कसम से”…. ….

पन्द्रह मिनट बाद भी, जब जैन साहब
जोर जोर से वार्तालाप जारी किए हुए थे,
तब वह महिला जो कि परेशान हो चुकी थी, फोन के पास जाकर जोर से बोली:-
अनिल डार्लिंग, फ़ोन बंद करो , बहुत हो चुका , अब तुम्हारी प्रीती और इंतजार नहीं कर सकती….! 🤪

अब जैन साहब हॉस्पीटल से वापिस आ चुके है, और उन्होंने सार्वजनिक स्थान पर मोबाइल का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद कर दिया है।

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एक चित्ता सिगरेट पिणारच असतो, तेवढ्यात एक उंदीर समोर येतो आणि चित्त्याला म्हणतो …


एक चित्ता सिगरेट पिणारच असतो, तेवढ्यात एक उंदीर समोर येतो आणि चित्त्याला म्हणतो ……..

“मित्रा चित्त्या , माझ्या बांधवा,
सोड हि नशा,
बघ हे जग किती सुंदर आहे,
चल माझ्या सोबत आणि ह्या जंगलाचे सौंदर्य पहा,

चित्ता थोडा वेळ विचार करतो आणि उन्द्रासोबत चालायला लागतो…..

पुढे हत्ती 🐘 डरग्स घेत बसलेला असतो, त्याला सुद्धा पाहून उंदीर 🐀 महणतो,

“मित्रा हत्ती 🐘, माझ्या बांधवा,
सोड हि नशा,
बघ हे जग किती सुंदर आहे,
चल माझ्या सोबत आणि ह्या जंगलाचे सौंदर्य पहा,

हत्ती 🐘 सद्धा थोडा वेळ विचार करतो आणि उन्द्रासोबत चालायला लागतो…..

थोडं पुढे गेल्यावर एक वाघ 🐯 वहीस्की चा पेग 🍷भरत असतो…………

त्यला हि पाहून न घाबरता उंदीर 🐀 तयाला म्हणतो……

“मित्रा वाघा 🐯, माझ्या बांधवा, सोड हि नशा, बघ हे जग किती सुंदर आहे, चल माझ्या सोबत आणि ह्या जंगलाचे सौंदर्य पहा,

वाघ त्याचा ग्लास बाजूला ठेवतो आणि उंदराच्या 🐀 कानाखाली ७-८ वेळा जाळ काढतो……..

हे पाहून हत्ती वाघा ला म्हणतो
“अरे 🐯 वाघोबा उंदीर चांगले सांगतो, का मारतोस त्याला”

वाघ म्हणतो “ह्याच्या सोबत ४ वेळा पूर्ण जंगल फिरून आलोय. हा हरामखोर जेव्हा देशी पितो तेव्हा असाच बोलतो……….😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂हसू नका पुढे फॉरवर्ड करा….🌹🌹 🌹🌹😛😜एक छोटासा विनोद😛😜
एक चित्ता सिगरेट पिणारच असतो, तेवढ्यात एक उंदीर समोर येतो आणि चित्त्याला म्हणतो ……..

“मित्रा चित्त्या , माझ्या बांधवा,
सोड हि नशा,
बघ हे जग किती सुंदर आहे,
चल माझ्या सोबत आणि ह्या जंगलाचे सौंदर्य पहा,

चित्ता थोडा वेळ विचार करतो आणि उन्द्रासोबत चालायला लागतो…..

पुढे हत्ती 🐘 डरग्स घेत बसलेला असतो, त्याला सुद्धा पाहून उंदीर 🐀 महणतो,

“मित्रा हत्ती 🐘, माझ्या बांधवा,
सोड हि नशा,
बघ हे जग किती सुंदर आहे,
चल माझ्या सोबत आणि ह्या जंगलाचे सौंदर्य पहा,

हत्ती 🐘 सद्धा थोडा वेळ विचार करतो आणि उन्द्रासोबत चालायला लागतो…..

थोडं पुढे गेल्यावर एक वाघ 🐯 वहीस्की चा पेग 🍷भरत असतो…………

त्यला हि पाहून न घाबरता उंदीर 🐀 तयाला म्हणतो……

“मित्रा वाघा 🐯, माझ्या बांधवा, सोड हि नशा, बघ हे जग किती सुंदर आहे, चल माझ्या सोबत आणि ह्या जंगलाचे सौंदर्य पहा,

वाघ त्याचा ग्लास बाजूला ठेवतो आणि उंदराच्या 🐀 कानाखाली ७-८ वेळा जाळ काढतो……..

हे पाहून हत्ती वाघा ला म्हणतो
“अरे 🐯 वाघोबा उंदीर चांगले सांगतो, का मारतोस त्याला”

वाघ म्हणतो “ह्याच्या सोबत ४ वेळा पूर्ण जंगल फिरून आलोय. हा हरामखोर जेव्हा देशी पितो तेव्हा असाच बोलतो………

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कौन सा पति खरीदूँ…?


कौन सा पति खरीदूँ…?***
🤔❓🤥❓😳❓😂

शहर के बाज़ार में एक बड़ी दुकान खुली जिस पर लिखा था –

“यहाँ आप पतियों को ख़रीद सकती है |”

देखते ही देखते औरतों का एक हुजूम वहां जमा होने लगा | सभी दुकान में दाख़िल होने के लिए बेचैन थी, लंबी क़तारें लग गयी…

दुकान के मैन गेट पर लिखा था –
“पति ख़रीदने के लिए निम्न शर्ते लागू”
👇👇
✡️ इस दुकान में कोई भी औरत सिर्फ एक बार ही दाख़िल हो सकती है, आधार कार्ड लाना आवश्यक है …

✡️ दुकान की 6 मंज़िले है, और प्रत्येक मंजिल पर पतियों के प्रकार के बारे में लिखा है |
✡️ ख़रीदार औरत किसी भी मंजिल से अपना पति चुन सकती है l
✡️ लेकिन एक बार ऊपर जाने के बाद दोबारा नीचे नहीं आ सकती, सिवाय बाहर जाने के |

👩🏻‍🦰एक खुबसूरत लड़की को दूकान में दाख़िल होने का मौक़ा मिला…

पहली मंजिल के दरवाज़े पर लिखा था – “इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है और नेक है | “
लड़की आगे बढ़ी ..

दूसरी मंजिल पर लिखा था – “इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है, नेक है और बच्चों को पसंद करते है |”
लड़की फिर आगे बढ़ी …*

तीसरी मंजिल के दरवाजे पर लिखा था – “इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है, नेक है और खुबसूरत भी है |”

यह पढ़कर 👩🏻‍🦰लड़की👩🏻‍🦰 कछ देर केलिए रुक गयी मगर यह सोचकर कि चलो ऊपर की मंजिल पर भी जाकर देखते है, वह आगे बढ़ी…

चौथी मंजिल के दरवाज़े पर लिखा था – “इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है, नेक है, खुबसूरत भी है और घर के कामों में मदद भी करते है |”

यह पढ़कर लड़की को चक्कर आने लगे और सोचने लगी “क्या ऐसे पति अब भी इस दुनिया में होते है ?

यहीं से एक पति ख़रीद लेती हूँ… ”

लेकिन दिल ना माना तो एक और मंजिल ऊपर चली गयी…

पांचवीं मंजिल पर लिखा था – “इस मंजिल के पति अच्छे रोज़गार वाले है , नेक है और खुबसूरत है , घर के कामों में मदद करते है और अपनी बीबियों से प्यार करते है |”

अब इसकी अक़ल जवाब देने लगी वो सोचने लगी इससे बेहतर और भला क्या हो सकता है ? मगर फिर भी उसका दिल नहीं माना और आखरी मंजिल की तरफ क़दम बढाने लगी…

आखरी मंजिल के दरवाज़े पर लिखा था -“आप इस मंजिल पर आने वाली 3339 वीं औरत है , इस मंजिल पर कोई भी पति नहीं है , ये मंजिल सिर्फ इसलिए बनाई गयी है ताकि इस बात का सबूत सुप्रीम कोर्ट को दिया जा सके कि महिलाओं को पूर्णत संतुष्ट करना नामुमकिन है |

हमारे स्टोर पर आने का धन्यवाद ! बांयी ओर सीढियाँ है जो बाहर की तरफ जाती है !!

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एका झाडा खाली पोपट वाघ आणि डुक्कर राहत होते..


एका झाडा खाली पोपट वाघ
आणि डुक्कर
राहत होते..

त्यांची खूप मैत्री होती, ते
एक
मेका शिवाय राहू शकत नव्हते..

.
एके दिवशी वादळ आल,
आणि त्या वादळामध्ये झाड
कोसळून
खाली पडले..

.
आणि या प्रसंगा मध्ये पोपट मरण
पावले.

.
आपला मित्र मरण पावल्यामुळे
वाघ
आजारी पडला आणि….
त्याचा मृत्यू झाला. 😞

.
.
आपले दोन्ही मित्र मरण
पावल्यामुळे
डुक्कर
सुद्धा त्या परीस्तीतीत
जिवंत
राहू शकत नव्हता, आणि त्याने
सुद्धा त्या ठिकाणी आपले
प्राण सोडले…

.
.
.
खूप दिवसांनी ज्या ठिकाणी
पोपट वाघ आणि डुक्कर मरण
पावले होते
त्या ठिकाणी एक’मोहाचे’ ( ‘मव्
‘झाड
रुजू लागले…

.
पुढे मव्हाच्या झाडापासून
मानवाने”दारू”🍻🍻 बनवली.
..

..
आणि म्हणूनच.
ज्या वेळी माणूस दारू🍻🍻 पितो
त्यावेळी पहिला त्याचा पोपट
होतो..
आणि पोपटा सारखा बोलू
लागतो…

.
थोड्या वेळाने तो वाघ होतो..
आणि कुणालाही न
घाबरता तो वाट्टेल
ते बोलू लागतो, कुणाचेच ऐकत
नाही..

..
सर्वात शेवटी त्याचा डुक्कर होतो.
आणि मग ज्या प्रमाणे डुक्कर
लोळतो.. त्याच प्रमाणे
तो रस्तावर,
गटारात लोळतो….

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काल.


काल……………………….

एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था. एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को अपना मित्र बना लिया.उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र, तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगो!काल ने कहा- ये मृत्यु लोक है. जो आया है उसे मरना ही है. सृष्टि का यह शाश्वत नियम है इस लिए मैं मजबूर हूं. पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी रियायत कर सकता हूं, करूंगा ही. मुझ से क्या आशा रखते हो साफ-साफ कहो.व्यक्ति ने कहा- मित्र मैं इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल- बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं.काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है, मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा. चिंता मत करो. चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो.मनुष्य बड़ा प्रसन्न हुआ सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया, मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे.दिन बीतते गये आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची. काल अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोला- मित्र अब समय पूरा हुआ. मेरे साथ चलिए. मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोड़ूंगा.मनुष्य के माथे पर बल पड़ गए, भृकुटी तन गयी और कहने लगा- धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर. मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती?तुमने मुझे वचन दिया था कि लेने आने से पहले पत्र लिखूंगा. मुझे बड़ा दुःख है कि तुम बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए. मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया.काल हंसा और बोला- मित्र इतना झूठ तो न बोलो. मेरे सामने ही मुझे झूठा सिद्ध कर रहे हो. मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे. आपने एक भी उत्तर नहीं दिया.मनुष्य ने चौंककर पूछा – कौन से पत्र? कोई प्रमाण है? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है तो दिखाओ.काल ने कहा – मित्र, घबराओ नहीं, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं.मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला, आपके काले सुन्दर बालों को पकड़ कर उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो.नाम, बड़ाई और धन-संग्रह के झंझटो को छोड़कर भजन में लग जाओ पर मेरे पत्र का आपके ऊपर जरा भी असर नहीं हुआ.बनावटी रंग लगा कर आपने अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए. आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं.कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा. नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी.फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे. दो मिनिट भी संसार की ओर से आंखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया.इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा.इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया.आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे.मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बात एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है.अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग- क्लेश तथा पीड़ाओ को भेजा परन्तु आपने अहंकार वश सब अनसुना कर दिया.जब मनुष्य ने काल के भेजे हुए पत्रों को समझा तो फूट-फूट कर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मो पर पश्चाताप करने लगा. उसने स्वीकार किया कि मैंने गफलत में शुभ चेतावनी भरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा.मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा. अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊंगा, पर वह कल नहीं आया.काल ने कहा – आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग-रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए किया. जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़कर जो काम करता है, वह अक्षम्य है.मनुष्य को जब अपनी बातों से काम बनता नज़र नहीं आया तो उसने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया.काल ने हंसकर कहा- मित्र यह मेरे लिए धूल से अधिक कुछ भी नहीं है. धन-दौलत, शोहरत, सत्ता, ये सब लोभ संसारी लोगो को वश में कर सकता है, मुझे नहीं.मनुष्य ने पूछा- क्या कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तुम्हें भी प्रिय हो, जिससे तुम्हें लुभाया जा सके. ऐसा कैसे हो सकता है!काल ने उत्तर दिया- यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मो का धन संग्रह करते. यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था. अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था. पर तुम्हारे पास तो यह धन धेले भर का भी नहीं है.तुम्हारे ये सारे रूपए-पैसे, जमीन-जायदाद, तिजोरी में जमा धन-संपत्ति सब यहीं छूट जाएगा. मेरे साथ तुम भी उसी प्रकार निवस्त्र जाओगे जैसे कोई भिखारी की आत्मा जाती है.काल ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय-हाय करके रोने लगा.सभी सम्बन्धियों को पुकारा परन्तु काल ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर.काल ने कितनी बड़ी बात कही. एक ही सत्य है जो अटल है वह है कि हम एक दिन मरेेंगे जरूर. हम जीवन में कितनी दौलत जमा करेंगे, कितनी शोहरत पाएंगे, कैसी संतान होगी यह सब अनिश्चित होता है, समय के गर्भ में छुपा होता है.परंतु हम मरेगे एक दिन बस यही एक ही बात जन्म के साथ ही तय हो जाती है. ध्रुव सत्य है मृ्त्यु. काल कभी भी दस्तक दे सकता है. प्रतिदिन उसकी तैयारी करनी होगी.समय के साथ उम्र की निशानियों को देख कर तो कम से कम हमें प्रभु की याद में रहने का अभ्यास करना चाहिए और अभी तो कलयुग का अन्तिम समय है इस में तो हर एक को चाहे छोटा हो या बड़ा सब को प्रभु की याद में रहकर ही कर्म करने हैं.।

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एक करोड़पति बहुत अड़चन में था। करोड़ों का घाटा लगा था,


एक करोड़पति बहुत अड़चन में था। करोड़ों का घाटा लगा था, और सारी जीवन की मेहनत डूबने के करीब थी ! नौका डगमगा रही थी। कभी मन्दिर नहीं गया था, कभी प्रार्थना भी न की थी। फुरसत ही न मिली थी ! पूजा के लिए उसने पुजारी रख छोड़े थे, कई मन्दिर भी बनवाये थे, जहाँ वे उसके नाम से नियमित पूजा किया करते थे लेकिन आज इस दुःख की घड़ी में कांपते हाथों वह भी मंदिर गया। सुबह जल्दी गया, ताकि परमात्मा से पहली मुलाकात उसी की हो, पहली प्रार्थना वही कर सके। कोई दूसरा पहले ही मांग कर परमात्मा का मन खराब न कर चुका हो ! बोहनी की आदत जो होती है, कमबख्त यहाँ भी नहीं छूटी, सो अल्ल-सुबह पहुँचा मन्दिर। लेकिन यह देख कर हैरान हुआ कि गाँव का एक भिखारी उससे पहले से ही मन्दिर में मौजूद था। अंधेरा था, वह भी पीछे खड़ा हो गया, कि भिखारी क्या मांग रहा है ? धनी आदमी सोचता है, कि मेरे पास तो मुसीबतें हैं; भिखारी के पास क्या मुसीबतें हो सकती हैं ? और भिखारी सोचता है, कि मुसीबतें मेरे पास हैं। धनी आदमी के पास क्या मुसीबतें होंगी ? एक भिखारी की मुसीबत दूसरे भिखारी के लिए बहुत बड़ी न थी ! उसने सुना, कि भिखारी कह रहा है- हे परमात्मा ! अगर पांच रुपए आज न मिलें तो जीवन नष्ट हो जाएगा। आत्महत्या कर लूँगा। पत्नी बीमार है और दवा के लिए पांच रुपए होना बिलकुल आवश्यक है। मेरा जीवन संकट में है। अमीर आदमी ने यह सुना और वह भिखारी बंद ही नहीं हो रहा है; कहे जा रहा है और प्रार्थना जारी है ! तो उसने झल्लाकर अपने खीसे से पांच रुपए निकाल कर उस भिखारी को दिए और कहा- जा ये ले जा पांच रुपए, तू ले और जा जल्दी यहाँ से ! अब वह परमात्मा से मुखतिब हुआ और बोला- “प्रभु, अब आप ध्यान मेरी तरफ दें, इस भिखारी की तो यही आदत है। दरअसल मुझे पांच करोड़ रुपए की जरूरत है !” भगवान मुस्करा उठे बोले- एक छोटे भिखारी से तो तूने मुझे छुटकारा दिला दिया, लेकिन तुझसे छुटकारा पाने के लिए तो मुझको तुमसे भी बढ़ा भिखारी ढूँढ़ना पड़ेगा ! तुम सब लोग यहाँ केवल कुछ न कुछ माँगने ही आते हो, कभी मेरी जरूरत का भी ख्याल आया है ? धनी आश्चर्यचकित हुआ बोला – प्रभु आपको क्या चाहिए ? भगवान बोले- प्रेम ! मैं भाव का भूखा हूँ। मुझे निस्वार्थ प्रेम व समर्पित भक्त प्रिय है। कभी इस भाव से मुझ तक आओ; फिर तुम्हे कुछ माँगने की आवश्यकता ही नही पड़ेगी

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वेश्या गुरु


“वेश्या गुरु”

एक बहुत प्रसिद्ध सन्त थे। दूर दूर से लोग उनसे मिलने और ज्ञान प्राप्त करने आते थे। उनके गुणों से प्रभावित हो एक वेश्या भी उनसे मिलने आई। उसने उस सन्त से अकेले मे मिलने की विनती की। लेकिन लोकापवाद की खातिर सन्त ने हमेशा उसकी विनती को ठुकराया। अनगिनत बार विनती ठुकराये जाने के बाद भी वो वेश्या उस सन्त के पास अपनी विनती लेकर रोजाना आती रही। यह क्रम लगातार कई दिनों तक चलता रहा। एक दिन उस सन्त ने झल्लाकर उस वेश्या से कहा की तुम हमेशा अधर्म के कार्य में लिप्त रही हो। मैं तुम्हारा गुरु बनना स्वीकार नहीं कर सकता। सन्त की पूरी बात सुनने के बाद वेश्या ने कहा मैं आपको अपने मेहनत से कमाया एक रुपया समर्पित करना चाहती थी। जो मैंने अपने पिता के साथ मजदूरी कर कमाया। ये एक रुपया ही है जो मेरे धर्म की कमाई है। आपके शिष्य आपको लाखों रुपये समर्पित कर रहे उनके सामने मुझे ये एक रुपया देंते हुए शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। इसलिए मैंने आपसे अकेले मिलने की विनती की। वेश्या की बातों को सुन कर सन्त आश्चर्यचकित रह गए। वेश्या का धैर्य और धर्म के प्रति सम्मान देख के सन्त ने उसे अपना गुरु बना लिया। सन्त ने कहा तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ गुण तुम्हारा धैर्य है। जिसने तुम्हे तुम्हारे मार्ग से डिगने नही दिया। ———-:::×:::———– “जय जय श्री राधे”

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वासु भाई और वीणा बेन, दोनों यात्रा की तैयारी कर रहे थे।


Mohan Lal Jain

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वासु भाई और वीणा बेन, दोनों यात्रा की तैयारी कर रहे थे। 3 दिन का अवकाश था ।वे पेशे से चिकित्सक थे ।लंबा अवकाश नहीं ले सकते थे ।परंतु जब भी दो-तीन दिन का अवकाश मिलता ,छोटी यात्रा पर कहीं चले जाते हैं । 🌺🌺आज उनका इंदौर उज्जैन जाने का विचार था ।दोनों साथ-साथ मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे ।वहीं पर प्रेम अंकुरित हुआ ,और बढ़ते बढ़ते वृक्ष बना। । दोनों ने परिवार की स्वीकृति से विवाह किया । 2 साल हो गए ,संतान कोई थी नहीं ,इसलिए यात्रा का आनंद लेते रहते थे । 🌺🌺 विवाह के बाद दोनों ने अपना निजी अस्पताल खोलने का फैसला किया , बैंक से लोन लिया ।वीणा बेन स्त्री रोग विशेषज्ञ और वासु भाई डाक्टर आफ मेडिसिन थे ।इसलिए दोनों की कुशलता के कारण अस्पताल अच्छा चल निकला था । 🌺🌺आज इंदौर जाने का कार्यक्रम बनाया था । जब मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे पप्पू भाई ने इंदौर के बारे में बहुत सुना था रेप नई नई वास्तु है खाने के शौकीन थे इंदौर के सराफा बाजार और 56 दुकान पर मिलने वाली मिठाईयां नमकीन उन्होंने उनके बारे में सुना था साथ ही महाकाली के दर्शन करने की इच्छा थी इसलिए उन्होंने इस बार इंदौर उज्जैन की यात्रा करने का विचार किया था 🌺🌺 यात्रा पर रवाना हुए ,आकाश में बादल घुमड़ रहे थे । मध्य प्रदेश की सीमा लगभग 200 किलोमीटर दूर थी । बारिश होने लगी थी।म, प्र, सीमा से 40 किलोमीटर पहले छोटा शहर पार करने में समय लगा। कीचड़ और भारी यातायात में बड़ी कठिनाई से दोनों ने रास्ता पार किया। 🌺🌺 भोजन तो मध्यप्रदेश में जाकर करने का विचार था परंतु चाय का समय हो गया था ।उस छोटे शहर से चार 5 किलोमीटर आगे निकले ।सड़क के किनारे एक छोटा सा मकान दिखाई दिया ।जिसके आगे वेफर्स के पैकेट लटक रहे थे ।उन्होंने विचार किया कि यह कोई होटल है वासु भाई ने वहां पर गाड़ी रोकी, दुकान पर गए , कोई नहीं था ।आवाज लगाई , अंदर से एक महिला निकल कर के आई। उसने पूछा क्या चाहिए ,भाई । 🌺🌺 वासु भाई ने दो पैकेट वेफर्स के लिए ,और कहा बेन दो कप चाय बना देना ।थोड़ी जल्दी बना देना , हमको दूर जाना है । पैकेट लेकर के गाड़ी में गए ।वीणा बेन और दोनों ने पैकेट के वैफर्स का नाश्ता किया । चाय अभी तक आई नहीं थी । दोनों निकल कर के दुकान में रखी हुई कुर्सियों पर बैठे ।वासु भाई ने फिर आवाज लगाई । 🌺🌺थोड़ी देर में वह महिला अंदर से आई ।बोले भाई बाड़े में तुलसी लेने गई थी , तुलसी के पत्ते लेने में देर हो गई ,अब चाय बन रही है ।थोड़ी देर बाद एक प्लेट में दो मेले से कप। ले करके वह गरमा गरम चाय लाई। 🌺🌺 मेले कप को देखकर वासु भाई एकदम से अपसेट हो गए ,और कुछ बोलना चाहते थे ।परंतु वीणाबेन। ने हाथ पकड़कर उनको रोक दिया । 🌺🌺चाय के कप उठाए ।उसमें से अदरक और तुलसी की सुगंध निकल रही थी ।दोनों ने चाय का एक सिप लिया । ऐसी स्वादिष्ट और सुगंधित चाय जीवन में पहली बार उन्होंने पी ।उनके मन की हिचकिचाहट दूर हो गई ।उन्होंने महिला को चाय पीने के बाद पूछा कितने पैसे महिला ने कहा बीस रुपये वासु भाई ने सो का नोट दिया । 🌺🌺 महिला ने कहा कि भाई छुट्टा नहीं है ।₹20 छुट्टा दे दो ।वासुभाई ने बीस रु का नोट दिया। महिला ने सो का नोट वापस किया। वासु भाई ने कहा कि हमने तो वैफर्स के पैकेट भी लिए हैं 🌺🌺 महिला बोली यह पैसे उसी के हैं ।चाय के पैसे नहीं लिए ।अरे चाय के पैसे क्यों क्यों नहीं लिए ।जवाब मिला ,हम चाय नहीं बेंचते हैं। यह होटल नहीं है ।फिर आपने चाय क्यों बना दी । 🌺🌺 अतिथि आए ,आपने चाय मांगी ,हमारे पास दूध भी नहीं था पर यह बच्चे के लिए दूध रखा था ,परंतु आपको मना कैसे करते । इसलिए इसके दूध की चाय बना दी ।अभी बच्चे को क्या पिलाओगे ।एक दिन दूध नहीं पिएगा तो मर नहीं जाएगा । इसके पापा बीमार हैं वह शहर जा करके दूध ले आते ,पर उनको कल से बुखार है ।आज अगर। ठीक हो जाएगा तो कल सुबह जाकर दूध ले आएंगे। 🌺🌺 वासु भाई उसकी बात सुनकर सन्न रह गये। इस महिला ने होटल ना होते हुए भी अपने बच्चे के दूध से चाय बना दी और वह भी केवल इसलिए कि मैंने कहा था ,अतिथि रूप में आकर के । संस्कार और सभ्यता में महिला मुझसे बहुत आगे हैं । 🌺🌺 उन्होंने कहा कि हम दोनों डॉक्टर हैं ,आपके पति कहां हैं बताएं ।हमको महिला भीतर ले गई । अंदर गरीबी पसरी हुई थी ।एक खटिया पर सज्जन सोए हुए थे बहुत दुबले पतले थे । 🌺🌺वसु भाई ने जाकर उनका मस्तक संभाला ।माथा और हाथ गर्म हो रहे थे ,और कांप रहे थे वासु भाई वापस गाड़ी में , गए दवाई का अपना बैग लेकर के आए । उनको दो-तीन टेबलेट निकालकर के दी , खिलाई ।फिर कहा कि इन। गोलियों से इनका रोग ठीक नहीं होगा । 🌺🌺 मैं पीछे शहर में जा कर के और इंजेक्शन और इनके लिए बोतल ले आता हूं ।वीणा बेन को उन्होंने मरीज के पास बैठने का कहा । गाड़ी लेकर के गए ,आधे घंटे में शहर से बोतल ,इंजेक्शन ,ले कर के आए और साथ में दूध की थैलीयां भी लेकरआययै। 🌺🌺 मरीज को इंजेक्शन लगाया ,बोतल चढ़ाई ,और जब तक बोतल लगी दोनों वहीं ही बैठे रहे ।एक बार और तुलसी और अदरक की चाय बनी ।दोनों ने चाय पी और उसकी तारीफ की। जब मरीज 2 घंटे में थोड़े ठीक हुए, तब वह दोनों वहां से आगे बढ़े। 3 दिन इंदौर उज्जैन में रहकर , जब लौटे तो उनके बच्चे के लिए बहुत सारे खिलौने ,और दूध की थैली लेकर के आए । 🌺🌺 वापस उस दुकान के सामने रुके ,महिला को आवाज लगाई , तो दोनों बाहर निकल कर उनको देख कर बहुत खुश हो गये। उन्होंने कहा कि आप की दवाई से दूसरे दिन ही बिल्कुल स्वस्थ हो गया ।वसु भाई ने बच्चे को खिलोने दिए ।दूध के पैकेट दिए ।फिर से चाय बनी ,बातचीत हुई ,अपनापन स्थापित हुआ ।वसु भाई ने अपना एड्रेस कार्ड दिया ।कहा, जब भी आओ जरूर मिले ,और दोनों वहां से अपने शहर की ओर ,लौट गये 🌺🌺शहर पहुंचकर वसु भाई ने उस महिला की बात याद रखी। फिर एक फैसला लिया। 🌺🌺अपने अस्पताल में रिसेप्शन पर बैठे हुए व्यक्ति से कहा कि ,अब आगे से आप जो भी मरीज आयें, केवल उसका नाम लिखेंगे ,फीस नहीं लेंगे ।फीस मैं खुद लूंगा। 🌺🌺और जब मरीज आते तो अगर वह गरीब मरीज होते तो उन्होंने उनसे फीस लेना बंद कर दिया ।केवल संपन्न मरीज देखते तो ही उनसे फीस लेते । 🌺🌺 धीरे धीरे शहर में उनकी प्रसिद्धि फैल गई । दूसरे डाक्टरों ने सुना ।उन्हें लगा कि इस कारण से हमारी प्रैक्टिस कम पड़ेगी ,और लोग हमारी निंदा करेंगे ,।उन्होंने एसोसिएशन के अध्यक्ष से कहा । एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ बसु भाई से मिलने आए ,उन्होंने कहा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो । 🌺🌺 तब वासु भाई ने जो जवाब दिया उसको सुनकर उनका मन भी उद्वेलित हो गए ।वासु भाई ने कहा मेरे जीवन में हर परीक्षा में मेरिट में पहली पोजीशन पर आता रहा ।एमबीबीएस में भी ,एमडी में भी गोल्ड मेडलिस्ट बना ,परंतु सभ्यता संस्कार और अतिथि सेवा में वह गांव की महिला जो बहुत गरीब है ,वह मुझसे आगे निकल गयी। तो मैं अब पीछे कैसे रहूं ।इसलिए मैं अतिथि सेवा में मानव सेवा में भी गोल्ड मेडलिस्ट बनूंगा । इसलिए मैंने यह सेवा प्रारंभ की । 🌺🌺 और मैं यह कहता हूं कि हमारा व्यवसाय मानव सेवा का है। सारे चिकित्सकों से भी मेरी अपील है कि वह सेवा भावना से काम करें ।गरीबों की निशुल्क सेवा करें ,उपचार करें ।यह् व्यवसाय धन कमाने का नहीं ।परमात्मा ने मानव सेवा का अवसर प्रदान किया है , 🌺🌺एसोसिएशन के अध्यक्ष ने वासु भाई को प्रणाम किया और धन्यवाद देकर उन्होंने कहा कि मैं भी आगे से ऐसी ही भावना रखकर के चिकित्सकिय सेवा करुंगा।

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अपने गुरु स्वामी राम कृष्ण परमहंस के शरीर त्याग


विपत्ति से भागो मत

अपने गुरु स्वामी राम कृष्ण परमहंस के शरीर त्याग के उपरांत स्वामी विवेकानंद तीर्थयात्रा पर निकले। .कई स्थानों के दर्शन करते हुए वे काशी पहुंचे और विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए गए। .दर्शन कर जब वे मंदिर से बाहर आए, तो देखा कि मंदिर के सामने कुछ बंदर इधर-उधर चक्कर लगा रहे हैं।.उन दिनों स्वामी जी लंबा अंगरखा पहनते थे और सर पर साफा बांधते थे। वे विद्याप्रेमी थे, इसलिए उनकी जेबों में पुस्तक और कागज भरे रहते थे। .भरी हुई जेबों को देखकर बंदरों को भ्रम हुआ कि उसमें खाने की वस्तु है और वे उनके पीछे पड़ गए।.अपने पीछे बंदरों को आते देख स्वामी जी भयभीत हो गए और तेज-तेज चलने लगे। .बंदरों ने भी अपनी गति बढ़ा दी, जिससे स्वामी जी का भय बढ़ गया और उन्होंने दौड़ना प्रारंभ कर दिया। .लेकिन बंदर भी उनके पीछे दौड़ने लगे। स्वामी जी को समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें? .बंदर उनका पीछा छोड़ने का नाम नहीं ले रहे थे। भय के कारण वे पसीने से नहा गए। .वहां उपस्थित लोगों में से कोई भी उनकी सहायता के लिए सामने नहीं आया। सब तमाशबीन बन तमाशा देखते रहे।.तभी भीड़ में से ही स्वामी जी को एक आवाज सुनाई पड़ी, “भागो मत।” .ज्यों ही ये शब्द स्वामी जी के कानों में पड़े, वे रूक गए। .उन्हें बोध हुआ कि विपत्ति से डरकर जब हम भागते हैं, तो वह और तेजी से हमारा पीछा करती है। .अगर साहस से उनका मुकाबला किया जाए, तो वह मुंह छुपाकर भाग जाती है।.फिर क्या था? वे मुड़े और निर्भीकता से खड़े हो गए। उन्हें देख बंदर भी खड़े हो गए। .थोड़ी देर खड़े रहने के बाद वे सभी बंदर वापस लौट गए। .उस दिन स्वामी जी के जीवन में एक नया मोड़ आया। उसके बाद समाज की बुराइयों को देख वे कतराए नहीं और हौसले के साथ उनका सामना किया।.साभार :- Kashi PatrikaBhakti Kathayen भक्ति कथायें