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डिप्रेशनडिप्रेशन ग्रस्त एक सज्जन जब 50+ के हुए थे


Sanjiv Shukla

डिप्रेशनडिप्रेशन ग्रस्त एक सज्जन जब 50+ के हुए थे…तो उनकी पत्नी ने एक काउंसलर का अपॉइंटमेंट लिया जो ज्योतिषी भी थे. कहा कि ये भयंकर डिप्रेशन में हैं, कुंडली भी देखिये इनकी… और बताया कि इन सब के कारण मैं भी ठीक नही हूँ.ज्योतिषी जी ने कुंडली देखी सब सही पाया. अब उन्होनें काउंसलिंग शुरू की. फिर कुछ पर्सनल बातें भी पूछीं और सज्जन की पत्नी को बाहर बैठने को कहा.सज्जन बोलते गए… बहुत परेशान हूँ… चिंताओं से दब गया हूँ… नौकरी का प्रेशर… बच्चों के एजूकेशन और जॉब की टेंशन… घर का लोन… कार का लोन… कुछ मन नही करता….दुनियाँ तोप समझती है… पर मेरे पास कारतूस जितना भी सामान नही.*.मैं डिप्रेशन में हूँ… कहते हुये पूरे जीवन की किताब खोल दी..तब विद्वान काउंसलर ने कुछ सोचा और पूछा…. दसवीं (Class-10) में किस स्कूल में पढ़ते थे?*.सज्जन ने उन्हे स्कूल का नाम बता दिया….काउंसलर ने कहा आपको उस स्कूल में जाना होगा….वहाँ से आपकी दसवीं क्लास के सारे रजिस्टर लेकर आना. .सज्जन स्कूल गए… रजिस्टर लाये. काउंसलर ने कहा कि अपने साथियों के नाम लिखो और उन्हें ढूंढो और उनके वर्तमान हालचाल की जानकारी लाने की कोशिश करो. सारी जानकारी को डायरी में लिखना और एक माह बाद मिलना.*.कुल 4 रजिस्टर… जिसमें 200 नाम थे… और महीना भर दिन रात घूमे… बमुश्किल अपने 120 सहपाठियों के बारे में जानकारी एकत्रित कर पाए..आश्चर्य उसमें से 20% लोग मर चुके थे..7% लड़कियाँ विधवा और 13 तलाकशुदा या सेपरेटेड थीं. 15% नशेडी निकले जो बात करने के भी लायक़ नहीं थे. 20% का पता ही नहीं चला कि अब वो कहाँ हैं. 5% इतने ग़रीब निकले की पूछो मत… 5% इतने अमीर निकले की पूछे नहीं..कुछ केन्सर ग्रस्त, 6-7% लकवा, डायबिटीज़, अस्थमा या दिल के रोगी निकले, 3-4% का एक्सीडेंट्स में हाथ/पाँव या रीढ़ की हड्डी में चोट से बिस्तर पर थे*.2 से 3% के बच्चे पागल… वेगाबॉण्ड… या निकम्मे निकले. 1 जेल में था… और एक 50 की उम्र में सैटल हुआ था इसलिए अब शादी करना चाहता था….1 अभी भी सैटल नहीं था पर दो तलाक़ के बावजूद तीसरी शादी की फ़िराक़ में था….महीने भर में… दसवीं कक्षा के सारे रजिस्टर भाग्य की व्यथा ख़ुद सुना रहे थे….काउंसलर ने पूछा कि अब बताओ डिप्रेशन कैसा है?.इन सज्जन को समझ आ गया कि उसे कोई बीमारी नहीं है… वो भूखा नहीं मर रहा, दिमाग एकदम सही है, कचहरी पुलिस-वकीलों से उसका पाला नही पड़ा… उसके बीवी-बच्चे बहुत अच्छे हैं, स्वस्थ हैं, वो भी स्वस्थ है. डाक्टर अस्पताल से पाला नहीं पड़ा..उन्होंने रियलाइज किया कि दुनियाँ में वाक़ई बहुत दुख: हैं… और मैं बहुत सुखी और भाग्यशाली हूँ….दो बात तय हुईं आज कि… धीरूभाई अम्बानी बनें या न बनें न सही… और भूखा नहीं मरे… बीमार बिस्तर पर न गुजारें… जेल में दिन न गिनना पड़े तो इस सुंदर जीवन के लिए ऊपर वाले को धन्यवाद देना ही सर्वोत्तमः है..क्या आपको भी लगता है कि आप डिप्रेशन में हैं ?अगर जो आप को भी ऐसा लगता है तो आप भी अपने स्कूल जाकर दसवीं कक्षा का रजिस्टर ले आयें..!

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एक बार एक कुम्हार ने एक बहुत खूबसूरत घड़ा


Yogesh Dangayach Namo

एक बार एक कुम्हार ने एक बहुत खूबसूरत घड़ा (सुराही ) बनाने का निर्णय लिया,फावड़ा उठाया और मिट्टी खोदने लगा.जैसे ही फावड़ा मारा तो मिट्टी से आवाज आई,फिर भी वो वहां से मिट्टी निकालकर अपने टोकरी में डालने लगा तभी फिर मिट्टी से आवाज आई कि आप मुझे क्यूँ निकाल रहे हैं..?कुम्हार ने कहा मैं तुम्हें दुनिया की सबसे खूबसूरत मिट्टी(सुराही) बनाना चाहता हूँ, जिसे देखकर लोगों को आश्चर्य हो…कुम्हार मिट्टी को लेकर अपने घर पहुँचा और मिट्टी से सारे कंकड़, पत्थर, ईट के टुकड़े व घास-फूस निकालने लगा,तभी मिट्टी से फिर आवाज आई.. इन्हें क्यूँ निकाल रहे हो ये सब तो मेरे साथी है मैं अकेली पड़ जाउंगी..कुम्हार मुस्कुराया और बोला ये तुम्हारे साथी नहीं बल्कि तुम्हारे दुश्मन है जो तुम्हें कभी खूबसूरत नहीं बनने देंगे।फिर कुम्हार मिट्टी में पानी डालकर अपने पैरो से रौंदने लगा.. तुरंत मिट्टी से आवाज आई आप मुझे क्यूँ रौंद रहे हो मुझे बहुत दर्द हो रहा है..कुम्हार ने कहा तुम्हें एक खूबसूरत मिट्टी बनाना है इसलिए रौंद रहा हूँ..थोड़ी देर बाद जब कुम्हार बाहर निकला तो मिट्टी सोची लगता है मैं खूबसूरत मिट्टी बन गई,और कुम्हार से .. क्या मैं खूबसूरत मिट्टी बन गई..कुम्हार.. नहीं अभी नहीं..और मिट्टी का पोर बनाके चाक पर चढ़ा दिया.. फिर मिट्टी…क्या अब मैं खूबसूरत मिट्टी बन गई..?कुम्हार ..नहीं अभी नही..और चाक को तेजी से घुमा कर सुराही बनाने लगा जिससे मिट्टी को बहुत पीड़ा हुईं..चाक रुकने के बाद रोते हुए मिट्टी ….अब तो मैं खूबसूरत मिट्टी बन गई हूँ ना..?कुम्हार.. .नहीं , अभी नहीं.. कह के मिट्टी को धूप में रख दिया,और दूसरे दिन सुराही के सूख जाने के बाद उसके पास पहुँचा तोमिट्टी अपनी जलन की तकलीफ बताते हुए कुम्हार से….. अब तो मैं खूबसूरत मिट्टी बन गई हूँ ना ?कुम्हार .. नहीं अभी नहीं..और फिर उस मिट्टी(सुराही)को आग में डाल दिया, फिर क्या था मिट्टी जोर जोर से चिल्लाने लगी… पर कुम्हार सब कुछ देखता रहा..फिर जैसे ही आग ठंडी हुई मिट्टी को निकाला मिट्टी बहुत ही गुस्से में थी क्योंकि इतनी तपन उसे पहले कभी नहीं हुई थी..फिर भी उसने कुम्हार से….अब तो मैं खूबसूरत मिट्टी बन गई हूँ ना?कुम्हार…नहीं अभी नही..और रंग लेकर मिट्टी को रंगने लगा …रंगाइ के बाद मिट्टी को पूरा विश्वास हो गया था कि वो अब खूबसूरत मिट्टी बन गई है पर फिर भी कुम्हार का जवाब… नहीं अभी नहींअब तो मिट्टी को इस शब्द से ही चीढ़ हो गयी थी…अब कुम्हार ने फिर से मिट्टी को आग की भट्टी में डाल दिया…इस बार जब कुम्हार ने मिट्टी को बाहर निकाला तो मिट्टी चुप थी फिर थोड़ी देर में साफ सफाई करके कुम्हार मिट्टी को एक आईने के सामने लेकर खड़ा हो गया.. और मिट्टी को बताया….ये हो तुम जिसे मैंने बनाया है और आज से तुम सिर्फ मिट्टी नहीं हो बल्कि तुम्हारा नाम भी है.. सुराहीमिट्टी अपना खूबसूरत रूप देखकर खुशी से झूमने लगी तभी उसकी नज़र कुम्हार के हाथों पर जाती है जिसमें कई छाले पड़े हुए थे, तब मिट्टी को एहसास हुआ कि सिर्फ वो ही नहीं कष्ट सह रही थी बल्कि उसे खूबसूरत बनाने में कुम्हार ने भी न जाने कितनी तकलीफे झेली होगी पर इसका तो उसे एहसास ही नहीं हुआ कभी..ये कहानी हिन्दुस्तान के वर्तमान के परिदृश्य की है दोस्तों ..जिसमें मिट्टी हम और हमारा देश है और कुम्हार … मोदी जी हैंजो अपने निरन्तर प्रयास से हमें और हमारे देश को खूबसूरत बनाने में लगे हैं…वो वक्त जरूर अायेगा पर हमें सब्र करना होगा, और कई तकलीफों से गुजरना भी होगा.. पर पता नहीं कैसे लोग हैं जो मोदी जी पर विश्वास नहीं करते .. ये कोई इत्तेफाक नहीं है कि जिस दिन श्रीष्टी के शिल्पकार विश्वकर्मा जी का दिवस होउसी दिन हमारे राष्ट्र के शिल्पकार मोदी जी का भी जन्म दिन हो…

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एक ग्रामीण को विवाह के बहुत सालों बाद पुत्र हुआ


एक ग्रामीण को विवाह के बहुत सालों बाद पुत्र हुआ. लेकिन कुछ वर्षों बाद बालक की असमय मृत्यु हो गई।ग्रामीण शव लेकर श्मशान पहुंचा. वह मोहवश उसे दफना नहीं पा रहा था. उसे पुत्र प्राप्ति के लिए किए जप-तप और पुत्र का जन्मोत्सव याद आ रहा था।श्मशान में एक गिद्ध और एक सियार रहते थे. दोनों शव देखकर बड़े खुश हुए. दोनों ने प्रचलित व्यवस्था बना रखी थी- दिन में सियार मांस नहीं खाएगा और रात में गिद्ध।सियार ने सोचा यदि ग्रामीण दिन में ही शव रखकर चला गया तो उस पर गिद्ध का अधिकार होगा. इसलिए क्यों न अंधेरा होने तक ब्राह्मण को बातों में फंसाकर रखा जाए।वहीं गिद्ध ताक में था कि शव के साथ आए कुटुंब के लोग जल्द से जल्द जाएं और वह उसे खा सके।गिद्ध ग्रामीण के पास गया और उससे वैराग्य की बातें शुरू की….गिद्ध ने कहा- मनुष्यों, आपके दुख का कारण यही मोहमाया ही है. संसार में आने से पहले हर प्राणी का आयु तय हो जाती है. संयोग और वियोग प्रकृति के नियम हैं।आप अपने पुत्र को वापस नहीं ला सकते. इस लिए शोक त्यागकर प्रस्थान करें. संध्या होने वाली है. संध्याकाल में श्मशान प्राणियों के लिए भयदायक होता है. इसलिए शीघ्र प्रस्थान करना उचित है।गिद्ध की बातें ग्रामीण के साथ आए रिश्तेदारों को बहुत प्रिय लगीं. वे ग्रामीण से बोले- बालक के जीवित होने की आशा नहीं है. इसलिए यहां रूकने का क्या लाभ ?सियार सब सुन रहा था. उसे गिद्ध की चाल सफल होती दिखी तो भागकर ग्रामीण के पास आया…सियार कहने लगा-बड़े निर्दयी हो. जिससे प्रेम करते थे, उसके मृत देह के साथ थोड़ा वक्त नहीं बिता सकते. फिर कभी इसका मुख नहीं देख पाओगे. कम से कम संध्या तक रूक कर जी भर के देख लो…उन्हें रोके रखने के लिए सियार ने नीति की बातें छेड़ दीं- जो रोगी हो, जिस पर अभियोग लगा हो और जो श्मशान की ओर जा रहा हो उसे बंधु-बांधवों के सहारे की जरूरत होती है।सियार की बातों से परिजनों को कुछ तसल्ली हुई और उन्होंने तुरंत वापस लौटने का विचार छोड़ा…अब गिद्ध को परेशानी होने लगी. उसने कहना शुरू किया. तुम ज्ञानी होने के बावजूद एक कपटी सियार की बातों में आ गए. एक दिन हर प्राणी की यही दशा होनी है. शोक त्याग कर अपने-अपने घर को जाओ…जो बना है वह नष्ट होकर रहता है. तुम्हारा शोक मृतक को दूसरे लोक में कष्ट देगा. जो मृत्यु के अधीन हो चुका क्यों रोकर उसे व्यर्थ कष्ट देते हो ?लोग चलने को हुए तो सियार फिर शुरू हो गया- यह बालक जीवित होता तो क्या तुम्हारा वंश न बढाता ? कुल का सूर्य अस्त हुआ है कम से कम सूर्यास्त तक तो रुको.अब गिद्ध को चिंता हुई. गिद्ध ने कहा- मेरी आयु सौ वर्ष की है. मैंने आज तक किसी को जीवित होते नहीं देखा. तुम्हें शीघ्र जाकर इसके मोक्ष का कार्य आरंभ करना चाहिए ।सियार ने कहना शुरू किया. जब तक सूर्य आकाश में विराजमान हैं, दैवीय चमत्कार हो सकते हैं. रात्रि में आसुरी शक्तियां प्रबल होती हैं. मेरा सुझाव है थोड़ी प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए।सियार और गिद्ध की चालाकी में फंसा ग्रामीण परिवार तय नहीं कर पा रहा था कि क्या करना चाहिए. अंततः पिता ने बेटे का सिर में गोद में रखा और जोर-जोर से विलाप करने लगा. उसके विलाप से श्मशान कांपने लगा।तभी संध्या भ्रमण पर निकले महादेव-पार्वती वहां पहुंचे. पार्वती जी ने बिलखते परिजनों को देखा तो दुखी हो गईं. उन्होंने महादेव से बालक को जीवित करने का अनुरोध किया…महादेव प्रकट हुए और उन्होंने बालक को सौ वर्ष की आयु दे दी. गिद्ध और सियार दोनों ठगे रह गए..गिद्ध और सियार के लिए आकाशवाणी हुई… तुमने प्राणियों को उपदेश तो दिया उसमें सांत्वना की बजाय तुम्हारा स्वार्थ निहीत था. इसलिए तुम्हें इस निकृष्ट योनि से शीघ्र मुक्ति नहीं मिलेगी।

प्रशान्त मणि त्रिपाठी

Posted in आओ संस्कृत सीखे.

विश्व की सबसे समृद्ध भाषा कौन सी है!


विश्व की सबसे समृद्ध भाषा कौन सी है!
अंग्रेजी में ‘THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG’ एक प्रसिद्ध वाक्य है। जिसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए, मज़ेदार बात यह है की अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उप्लब्ध हैं जबकि इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया जिसमे चार बार O और A, E, U तथा R अक्षर का प्रयोग क्रमशः 2 बार किया गया है। इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है।

अब ज़रा संस्कृत के इस श्लोक को पढिये-

क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।

तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।

अर्थात: पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर आप पाते हैं की संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस श्लोक में दिखाये दे रहे हैं वो भी क्रमानुसार। यह खूबसूरती केवल और केवल संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा में ही देखने को मिल सकती है!

पूरे विश्व में केवल एक संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें केवल एक अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है, किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है-

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।

नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥

अर्थात: जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम्!

एक और उदहारण है।-

दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः

दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः।।

अर्थात: दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खण्डन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।

है ना खूबसूरत? इतना ही नहीं, क्या किसी भाषा में केवल 2 अक्षर से पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में ये करना असम्भव है। माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये –

भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे

भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।

अर्थात- निर्भय हाथी जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।

एक और उदाहरण-

क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर।

कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक॥

अर्थात- क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत, रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला, रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी [था]।

पुनः क्या किसी भाषा मे केवल तीन अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? यह भी संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में असंभव है!

उदहारण-

देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां

दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।।

अर्थात- वह परमात्मा [विष्णु] जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है, जिस तरह के नाद से उसने दानव [हिरण्यकशिपु] को मारा था।

अब इस छंद को ध्यान से देखें इसमें पहला चरण ही चारों चरणों में चार बार आवृत्त हुआ है, लेकिन अर्थ अलग-अलग हैं, जो यमक अलंकार का लक्षण है। इसीलिए ये महायमक संज्ञा का एक विशिष्ट उदाहरण है –

विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जतीशमार्गणा:।

विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा:॥

अर्थात- पृथ्वीपति अर्जुन के बाण विस्तार को प्राप्त होने लगे, जबकि शिवजी के बाण भंग होने लगे। राक्षसों के हंता प्रथम गण विस्मित होने लगे तथा शिव का ध्यान करने वाले देवता एवं ऋषिगण (इसे देखने के लिए) पक्षियों के मार्गवाले आकाश-मंडल में एकत्र होने लगे।

जब हम कहते हैं की संस्कृत इस पूरी दुनिया की सभी प्राचीन भाषाओं की जननी है तो उसके पीछे इसी तरह के खूबसूरत तर्क होते हैं। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें “अभिधान- सार्थकता” मिलती है अर्थात् अमुक वस्तु की अमुक संज्ञा या नाम क्यों है, यह प्रायः सभी शब्दों में मिलता है। जैसे इस विश्व का नाम संसार है तो इसलिये है क्यूँकि वह चलता रहता है, परिवर्तित होता रहता है-

संसरतीति संसारः गच्छतीति जगत् आकर्षयतीति कृष्णः रमन्ते योगिनो यस्मिन् स रामः इत्यादि।…
निवेदक
विपूलभाई ( सुरत , गुजरात )

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ભગવાનની ભક્તિનો હિસાબ…..!


🙏

ભગવાનની ભક્તિનો હિસાબ…..!

એક કારીગરને મંદિરમાં થોડું બાંધકામ કરવાનું કામ મળ્યું.
ભગવાનના મંદિરમાં કામ કરવાની તક મળી હતી આથી એ ખુબ આનંદમાં હતો.
એમણે ખુબ પુરી નિષ્ઠા સાથે પોતાનું કામ પુરું કર્યુ.

એક દિવસ પોતાના કામનું મહેનતાણું લેવા માટે એ મંદીરમાં આવ્યો.

પુજારીજીએ એ કારીગરનું પ્રેમથી સ્વાગત કર્યુ. પીવા માટે પાણી અને બેસવા માટે આસન આપ્યું.

પુજારીજી અંદરના ઓરડામાં ગયા અને હાથમાં એક બંધ કવર લઇને આવ્યા.
કવર કારીગરના હાથમાં મુકતાં કહ્યું , ”ભાઇ, આ તારા મહેનતાણાના 10800 રૂપિયા છે. આપણે અગાઉ નક્કી કર્યુ હતું તે મુજબનું જ મહેનતાણું છે”.

કારીગરે કવર લઇને ખીસ્સામાં મુક્યું અને પુજારીજીનો આભાર માન્યો.

      *પુજારીજીએ કારીગરને કહ્યું , ”અરે ભાઇ, જરા પૈસા ગણી લે. બરાબર છે કે કેમ એ તપાસી લે.”* 

કારીગર તો ખડખડાટ હસી પડ્યો. પછી બોલ્યો,

”અરે પુજારીજી, મને આપના પર પુરો વિશ્વાસ છે. આપ આ મંદીરમાં વર્ષોથી પુજા કરો છો. જો હું પૈસા ગણવા બેસું તો તે આપનું અપમાન કહેવાય. આપના જેવા સાધુ પુરુષમાં મને પુર્ણ શ્રધ્ધા છે.” આટલું કહીને કારીગર પુજારીજીને વંદન કરીને જતો રહ્યો.

    *કારીગરના ગયા પછી પુજારીજી પોતાના હાથમાં રહેલી માળા સામે જોઈ રહ્યા અને પોતાની જાત પર જ હસવા લાગ્યા.*

પેલા સાવ સામાન્ય અને અભણ કારીગરને મારા જેવા માણસમાં વિશ્વાસ છે અને મારા જેવા કહેવાતા પંડીતને પરમાત્મામાં વિશ્વાસ નથી આથી જ મેં કેટલા મંત્ર જાપ કર્યા તેની ગણતરી રાખું છું.

પુજારીજીએ પોતાના હાથમાં રહેલી માળા ભગવાનના ચરણોમાં મુકીને નક્કી કર્યુ કે, હું તારા માટે જે કંઈ કરીશ તેનો હીસાબ રાખવાનું આજથી બંધ કરીશ.

        *મિત્રો, આપણે પણ અજાણતાં આવું જ કંઇક કરીએ છીએ.*

કેટલા ઉપવાસ કર્યા…..?
કેટલા મંત્ર જાપ કર્યા…..?
કેટલી માળાઓ કરી…..?
કેટલી પ્રદક્ષિણાઓ કરી…..?
ક્યાં ક્યાં કોને કોને કેટલું દાન આપ્યું…..?

આ બધાનો હીસાબ રાખતા હોઈએ તો એનો મતલબ એ થયો કે, મને મારા પ્રભુમાં વિશ્વાસ નથી. કરેલી ભક્તિનો હિસાબ રાખીને શું આપણે આપણા પ્રભુનું અપમાન તો નથી કરતાને.
🙏
.

આપણા જીવનમાં આવા નાના બનાવો બનતાં હોય છે, નાના નુકશાન બચાવવા જતાં મોટું નુકશાન જીરવવુ પડે છે

જરૂરી હોય છે નાની નાની બાબતોમાં
ભુલી જવાની. જેમકે

મને‌ પુછ્યું નહીં….
મને‌ નિમંત્રણ આપ્યું નહીં…
મને બોલાવ્યો નહીં…
મારી શુભેચ્છા સ્વિકારી નહીં…
મને‌ માન આપ્યું નહીં, વગેરે વગેરે….

છોડી દો આ બધું
ને પછી જુઓ મિત્રો,સંબંધીઓ સાથે ના સંબંધ માં નવા પ્રાણ ફુંકાશે નવી ઊર્મિ નો અહેશાસ થશે

સુક્ષ્મ અહંકાર સારા‌ માણસ થી
આપણને દુર કરી દે છે.. જો આ છુટી જાય તો બધા આપણા જ હોય છે.
અહંકાર જલ્દી છુટશે નહીં પણ પ્રયત્ન કરવા થી શક્ય છે.
સમયને ઓળખતા, પ્રસંગને સાચવતા
માણસને સમજાવતા અને તકને
ઝડપતા આવડી ગયું તો સમજ જો કે
જીંદગી જીતી ગયા અને જીવી ગયા.

🙏🙏pranam 🙏🙏