Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

भगवान को भेंट.


भगवान को भेंट…*

पुरानी बात है एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था। जो भी जरुरी काम हो सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था l वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था।एक दिन उस ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- भाई ! *मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।* भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया।कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त भी वहीं रुक कर हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने लगा।फिर उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजन इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके होंठ सूखे हुए हैं वह दिखने में कुछ भूखे भी प्रतीत हो रहे हैं। उसने सोचा क्यों ना सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ।उसने उन सभी को उन सौ रुपए में से भोजन की व्यवस्था कर दी। सबको भोजन कराने में उसे कुल 98 रुपए खर्च करने पड़े। उसके पास दो रुपए बच गए उसने सोचा चलो अच्छा हुआ दो रुपए जगन्नाथ जी के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा lजब सेठ पूछेगा तो मैं कहूंगा पैसे चढ़ा दिए। सेठ यह तो नहीं कहेगा 100 रुपए चढ़ाए। सेठ पूछेगा पैसे चढ़ा दिए मैं बोल दूंगा कि, पैसे चढ़ा दिए। झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा।भक्त ने श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया श्री जगन्नाथ जी की छवि को निहारते हुए अपने हृदय में उनको विराजमान कराया। अंत में उसने सेठ के दो रुपए श्री जगन्नाथ जी के चरणो में चढ़ा दिए। और बोला यह दो रुपए सेठ ने भेजे हैं।उसी रात सेठ के पास स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी आए आशीर्वाद दिया और बोले सेठ तुम्हारे 98 रुपए मुझे मिल गए हैं यह कहकर श्री जगन्नाथ जी अंतर्ध्यान हो गए। सेठ जाग गया सोचने लगा मेरा नौकर तौ बड़ा ईमानदार है,पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी उसने दो रुपए भगवान को कम चढ़ाए ? उसने दो रुपए का क्या खा लिया ? उसे ऐसी क्या जरूरत पड़ी ? ऐसा विचार सेठ करता रहा।काफी दिन बीतने के बाद भक्त वापस आया और सेठ के पास पहुंचा। सेठ ने कहा कि मेरे पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दिए थे ? भक्त बोला हां मैंने पैसे चढ़ा दिए। सेठ ने कहा पर तुमने 98 रुपए क्यों चढ़ाए दो रुपए किस काम में प्रयोग किए।तब भक्त ने सारी बात बताई की उसने 98 रुपए से संतो को भोजन करा दिया था। और ठाकुरजी को सिर्फ दो रुपए चढ़ाये थे। सेठ सारी बात समझ गया व बड़ा खुश हुआ तथा भक्त के चरणों में गिर पड़ा और बोला- “आप धन्य हो आपकी वजह से मुझे श्री जगन्नाथ जी के दर्शन यहीं बैठे-बैठे हो गए lसन्तमत विचार- भगवान को आपके धन की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान को वह 98 रुपए स्वीकार है जो जीव मात्र की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए का कोई महत्व नहीं जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए…Iइस कहानी का सार ये है कि… भगवान को चढ़ावे की जरूरत नही होती है, *सच्चे मन से किसी जरूरतमंद की जरूरत को पूरा कर देना भी ….. भगवान को भेंट चढ़ाने से भी कहीं ज्यादा अच्छा होता है ..!!!*हम उस परमात्मा को क्या दे सकते हैं…..जिसके दर पर हम ही भिखारी हैं…

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक पंडितजी को नदी में तर्पण करते देख


एक पंडितजी को नदी में तर्पण करते देख एक फकीर अपनी बाल्टी से पानी गिराकर जाप करने लगा कि..”मेरी प्यासी गाय को पानी मिले।”पंडितजी के पूछने पर उस फकीर ने कहा कि… जब आपके चढाये जल और भोग आपके पुरखों को मिल जाते हैं तो मेरी गाय को भी मिल जाएगा.इस पर पंडितजी बहुत लज्जित हुए।”यह मनगढंत कहानी सुनाकर एक इंजीनियर मित्र जोर से ठठाकर हँसने लगे और मुझसे बोले कि – “सब पाखण्ड है जी..!”शायद मैं कुछ ज्यादा ही सहिष्णु हूँ… इसीलिए, लोग मुझसे ऐसी बकसोदी करने से पहले ज्यादा सोचते नहीं है क्योंकि, पहले मैं सामने वाली की पूरी बात सुन लेता हूँ… उसके जबाब उसे जबाब देता हूँ.खैर… मैने कुछ कहा नहीं ….बस, सामने मेज पर से ‘कैलकुलेटर’ उठाकर एक नंबर डायल किया… और, अपने कान से लगा लिया. बात न हो सकी… तो, उस इंजीनियर साहब से शिकायत की.इस पर वे इंजीनियर साहब भड़क गए.और, बोले- ” ये क्या मज़ाक है…??? ‘कैलकुलेटर’ में मोबाइल का फंक्शन भला कैसे काम करेगा..???”तब मैंने कहा…. तुमने सही कहा…वही तो मैं भी कह रहा हूँ कि…. स्थूल शरीर छोड़ चुके लोगों के लिए बनी व्यवस्था जीवित प्राणियों पर कैसे काम करेगी ???इस पर इंजीनियर साहब अपनी झेंप मिटाते हुए कहने लगे- “ये सब पाखण्ड है , अगर ये सच है… तो, इसे सिद्ध करके दिखाइए”इस पर मैने कहा…. ये सब छोड़िएऔर, ये बताइए कि न्युक्लीअर पर न्युट्रान के बम्बारमेण्ट करने से क्या ऊर्जा निकलती है ?वो बोले – ” बिल्कुल ! इट्स कॉल्ड एटॉमिक एनर्जी।”फिर, मैने उन्हें एक चॉक और पेपरवेट देकर कहा, अब आपके हाथ में बहुत सारे न्युक्लीयर्स भी हैं और न्युट्रांस भी…!अब आप इसमें से एनर्जी निकाल के दिखाइए…!!साहब समझ गए और तनिक लजा भी गए एवं बोले-“जी , एक काम याद आ गया; बाद में बात करते हैं “कहने का मतलब है कि….. यदि, हम किसी विषय/तथ्य को प्रत्यक्षतः सिद्ध नहीं कर सकते तो इसका अर्थ है कि हमारे पास समुचित ज्ञान, संसाधन वा अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं है ,इसका मतलब ये कतई नहीं कि वह तथ्य ही गलत है.क्योंकि, सिद्धांत रूप से तो हवा में तो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों मौजूद है..फिर , हवा से ही पानी क्यों नहीं बना लेते ???अब आप हवा से पानी नहीं बना रहे हैं तो… इसका मतलब ये थोड़े ना घोषित कर दोगे कि हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन ही नहीं है.हमारे द्वारा श्रद्धा से किए गए सभी कर्म दान आदि आध्यात्मिक ऊर्जा के रूप में हमारे पितरों तक अवश्य पहुँचते हैं.इसीलिए, व्यर्थ के कुतर्को मे फँसकर अपने धर्म व संस्कार के प्रति कुण्ठा न पालें…!और हाँ…जहाँ तक रह गई वैज्ञानिकता की बात तो….क्या आपने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे लगाए हैं…या, किसी को लगाते हुए देखा है?क्या फिर पीपल या बरगद के बीज मिलते हैं ?इसका जवाब है नहीं….ऐसा इसीलिए है क्योंकि… बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु वह नहीं लगेगी.इसका कारण यह है कि प्रकृति ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है.जब कौए इन दोनों वृक्षों के फल को खाते हैं तो उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसिंग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं.उसके पश्चात कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां वहां पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं.और… किसी को भी बताने की आवश्यकता नहीं है कि पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन (O2) देता है और वहीं बरगद के औषधि गुण अपरम्पार है.साथ ही आप में से बहुत लोगों को यह मालूम ही होगा कि मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है.तो, इस नयी पीढ़ी के उपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है…शायद, इसलिए ऋषि मुनियों ने कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राघ्द के रूप मे पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी होगी.जिससे कि कौवों की नई जनरेशन का पालन पोषण हो जाये……इसीलिए…. श्राघ्द का तर्पण करना न सिर्फ हमारी आस्था का विषय है बल्कि यह प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है.साथ ही… जब आप पीपल के पेड़ को देखोगे तो अपने पूर्वज तो याद आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हम देख रहे हैं.अतः…. सनातन धर्म और उसकी परंपराओं पे उंगली उठाने वालों से इतना ही कहना है कि…. जब दुनिया में तुम्हारे ईसा-मूसा-भूसा आदि का नामोनिशान नहीं था…उस समय भी हमारे ऋषि मुनियों को मालूम था कि धरती गोल है और हमारे सौरमंडल में 9 ग्रह हैं.साथ ही… हमें ये भी पता था कि किस बीमारी का इलाज क्या है…कौन सी चीज खाने लायक है और कौन सी नहीं…?इसीलिए… तुम सब हमें ज्ञान न दो वही अच्छा है अन्यथा, भरे बाजार नंगे कर दिए जाओगे.जय महाकाल…!!!

प्रशान्त मणि त्रिपाठी

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

मैं दस वर्ष का था


मैं दस वर्ष का था जब एक बार पिताजी के साथ मुझे उनके एक मित्र के अंतिम संस्कार में जाना पड़ा …. श्मशान में सब लोग शव को घेरकर खड़े थे। मैं सबसे अलग थोड़ी दूर अकेला खड़ा था और समझने की कोशिश कर रहा था। तभी एक व्यक्ति मेरे पास आया और मुझसे बोला ज़िन्दगी का आनंद लो, खेलो कूदो, मजा लो ….मैंने अपनी ज़िंदगी का मज़ा नहीं लिया …. इतना बोलकर वो व्यक्ति मेरे सर पर हाथ फिराकर वहां से चला गया। तभी मेरे पिता ने आवाज देकर मुझे बुलाया और कहा कि मरने वाले के अंतिम दर्शन कर लो। मैंने मरने वाले का चेहरा देखा तो बुरी तरह से चौंक गया … ये तो उसी व्यक्ति का चेहरा था जो कुछ देर पहले मुझसे बात कर रहा था ….मैं बुरी तरह डर गया…उसके बाद बहुत दिनों तक मैं ठीक से सो नही सका …अक्सर रात को सपने में मुझे वो चेहरा दिखता और मैं डरकर जाग जाता …. समय बीतता गया …. कई डॉक्टर्स और मनोचिकित्सकों को दिखाया पर कुछ फायदा नही हुआ …..कई साल बीत गए …..फिर ऐसा कुछ हुआ कि मेरी बीमारी पूरी तरह ठीक हो गई जब मुझे ये पता चला कि उस व्यक्ति का एक जुड़वा भाई भी है और वो ज़िंदा है ….

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जब एक शख्स लगभग पैंतालीस वर्ष के थे


जब एक शख्स लगभग पैंतालीस वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। लोगों ने दूसरी शादी की सलाह दी परन्तु उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि पुत्र के रूप में पत्नी की दी हुई भेंट मेरे पास हैं, इसी के साथ पूरी जिन्दगी अच्छे से कट जाएगी।पुत्र जब वयस्क हुआ तो पूरा कारोबार पुत्र के हवाले कर दिया। स्वयं कभी अपने तो कभी दोस्तों के आॅफिस में बैठकर समय व्यतीत करने लगे।पुत्र की शादी के बाद वह ओर अधिक निश्चित हो गये। पूरा घर बहू को सुपुर्द कर दिया।पुत्र की शादी के लगभग एक वर्ष बाद दोहपर में खाना खा रहे थे, पुत्र भी लंच करने ऑफिस से आ गया था और हाथ–मुँह धोकर खाना खाने की तैयारी कर रहा था।उसने सुना कि पिता जी ने बहू से खाने के साथ दही माँगा और बहू ने जवाब दिया कि आज घर में दही नहीं है। खाना खाकर पिताजी ऑफिस चले गये।थोडी देर बाद पुत्र अपनी पत्नी के साथ खाना खाने बैठा। खाने में प्याला भरा हुआ दही भी था। पुत्र ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और खाना खाकर स्वयं भी ऑफिस चला गया।कुछ दिन बाद पुत्र ने अपने पिताजी से कहा- ‘‘पापा आज आपको कोर्ट चलना है, आज आपका विवाह होने जा रहा है।’’पिता ने आश्चर्य से पुत्र की तरफ देखा और कहा-‘‘बेटा मुझे पत्नी की आवश्यकता नही है और मैं तुझे इतना स्नेह देता हूँ कि शायद तुझे भी माँ की जरूरत नहीं है, फिर दूसरा विवाह क्यों?’’पुत्र ने कहा ‘‘ पिता जी, न तो मै अपने लिए माँ ला रहा हूँ न आपके लिए पत्नी,*मैं तो केवल आपके लिये दही का इन्तजाम कर रहा हूँ।*कल से मै किराए के मकान मे आपकी बहू के साथ रहूँगा तथा आपके ऑफिस मे एक कर्मचारी की तरह वेतन लूँगा ताकि *आपकी बहू को दही की कीमत का पता चले।’’**-#माँ#बाप हमारे लिये**#ATM कार्ड बन सकते है,**तो ,हम उनके लिए**#Aadhar#Card तो बन ही सकते है

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक सेठ जी ने अपने दामाद को तीन लाख रूपये व्यापार के लिये दिये।


रामचंद्र आर्य.

एक सेठ जी ने अपने दामाद को तीन लाख रूपये व्यापार के लिये दिये। उसका व्यापार बहुत अच्छा जम गया, लेकिन उसने रूपये ससुर जी को वापस नहीं लौटाये। आखिर दोनों में झगड़ा हो गया, झगड़ा भी इस सीमा तक बढ़ गया कि दोनों का एक दूसरे के यहाँ आना जाना बिल्कुल बंद हो गया। घृणा व द्वेष का आंतरिक संबंध अत्यंत गहरा हो गया। सेठ जी, हर समय हर संबंधी के सामने अपने दामाद की निंदा-निरादर व आलोचना करने लगे। सेठ जी अच्छे साधक भी थे, लेकिन इस कारण उनकी साधना लड़खड़ाने लगी। भजन पूजन के समय भी उन्हें दामाद का चिंतन होने लगा। मानसिक व्यथा का प्रभाव तन पर भी पड़ने लगा। बेचैनी बढ़ गयी। समाधान नहीं मिल रहा था। आखिर वे एक संत के पास गये और अपनी व्यथा सुनायी। संतश्री ने कहाः- ‘बेटा ! तू चिंता मत कर। ईश्वरकृपा से सब ठीक हो जायेगा। तुम कुछ फल व मिठाइयाँ लेकर दामाद के यहाँ जाना और मिलते ही उससे केवल इतना कहना, ‘बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे “क्षमा” कर दो।’ सेठ जी ने कहाः- “महाराज ! मैंने ही उनकी मदद की है और “क्षमा” भी मैं ही माँगू !” संतश्री ने उत्तर दियाः- “परिवार में ऐसा कोई भी संघर्ष नहीं हो सकता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो। चाहे एक पक्ष की भूल एक प्रतिशत हो दूसरे पक्ष की निन्यानवे प्रतिशत, पर भूल दोनों तरफ से होगी।” सेठ जी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसने कहाः- “महाराज ! मुझसे क्या भूल हुई ?” “बेटा ! तुमने मन ही मन अपने दामाद को बुरा समझा– यही है तुम्हारी पहली भूल। तुमने उसकी निंदा, आलोचना व तिरस्कार किया– यह है तुम्हारी दूसरी भूल। क्रोध पूर्ण आँखों से उसके दोषों को देखा– यह है तुम्हारी तीसरी भूल। अपने कानों से उसकी निंदा सुनी– यह है तुम्हारी चौथी भूल। तुम्हारे हृदय में दामाद के प्रति क्रोध व घृणा है– यह है तुम्हारी आखिरी भूल”। अपनी इन भूलों से तुमने अपने दामाद को दुःख दिया है। तुम्हारा दिया दुःख ही कई गुना हो तुम्हारे पास लौटा है। जाओ, अपनी भूलों के लिए “क्षमा” माँगों। नहीं तो तुम न चैन से जी सकोगे, न चैन से मर सकोगे। क्षमा माँगना बहुत बड़ी साधना है। ओर तुम तो एक बहुत अच्छे साधक हो।” सेठ जी की आँखें खुल गयीं। संतश्री को प्रणाम करके वे दामाद के घर पहुँचे। सब लोग भोजन की तैयारी में थे। उन्होंने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा उनके दोहीते ने खोला। सामने नानाजी को देखकर वह अवाक् सा रह गया और खुशी से झूमकर जोर-जोर से चिल्लाने लगाः “मम्मी ! पापा !! देखो कौन आये ! नानाजी आये हैं, नानाजी आये हैं….।” माता-पिता ने दरवाजे की तरफ देखा। सोचा, ‘कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे !’ बेटी हर्ष से पुलकित हो उठी, ‘अहा ! पन्द्रह वर्ष के बाद आज पिताजी घर पर आये हैं।’ प्रेम से गला रूँध गया, कुछ बोल न सकी। सेठ जी ने फल व मिठाइयाँ टेबल पर रखीं और दोनों हाथ जोड़कर दामाद को कहाः- “बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा करो ।” “क्षमा” शब्द निकलते ही उनके हृदय का प्रेम अश्रु बनकर बहने लगा। दामाद उनके चरणों में गिर गये और अपनी भूल के लिए रो-रोकर क्षमा याचना करने लगे। ससुरजी के प्रेमाश्रु दामाद की पीठ पर और दामाद के पश्चाताप व प्रेममिश्रित अश्रु ससुरजी के चरणों में गिरने लगे। पिता-पुत्री से और पुत्री अपने वृद्ध पिता से क्षमा माँगने लगी। क्षमा व प्रेम का अथाह सागर फूट पड़ा। सब शांत, चुप, सबकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। दामाद उठे और रूपये लाकर ससुरजी के सामने रख दिये। ससुरजी कहने लगेः “बेटा ! आज मैं इन कौड़ियों को लेने के लिए नहीं आया हूँ। मैं अपनी भूल मिटाने, अपनी साधना को सजीव बनाने और द्वेष का नाश करके प्रेम की गंगा बहाने आया हूँ । मेरा आना सफल हो गया, मेरा दुःख मिट गया। अब मुझे आनंद का एहसास हो रहा है।” दामाद ने कहाः- “पिताजी ! जब तक आप ये रूपये नहीं लेंगे तब तक मेरे हृदय की तपन नहीं मिटेगी। कृपा करके आप ये रूपये ले लें। सेठ जी ने दामाद से रूपये लिये और अपनी इच्छानुसार बेटी व नातियों में बाँट दिये । सब कार में बैठे, घर पहुँचे। पन्द्रह वर्ष बाद उस अर्धरात्रि में जब माँ-बेटी, भाई-बहन, ननद-भाभी व बालकों का मिलन हुआ तो ऐसा लग रहा था कि मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये वहाँ पहुँच गया हो। सारा परिवार प्रेम के अथाह सागर में मस्त हो रहा था। “क्षमा” माँगने के बाद उस सेठ जी के दुःख, चिंता, तनाव, भय, निराशारूपी मानसिक रोग जड़ से ही मिट गये और साधना सजीव हो उठी। हमें भी अपने दिल में “क्षमा” रखनी चाहिए अपने सामने छोटा हो या बडा अपनी गलती हो या ना हो क्षमा मांग लेने से सब झगडे समाप्त हो जाते है।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक दिन, *मेरे पिता ने हलवे के 2 कटोरे बनाये


प्रशान्त मणि त्रिपाठी

एक दिन, *मेरे पिता ने हलवे के 2 कटोरे बनाये और उन्हें मेज़ पर रख दिया।* एक के ऊपर 2 बादाम थे, जबकि दूसरे कटोरे में हलवे के ऊपर कुछ नहीं था। फिर उन्होंने मुझे हलवे का कोई एक कटोरा चुनने के लिए कहा, क्योंकि उन दिनों तक हम गरीबों के घर बादाम आना मुश्किल था…. मैंने 2 बादाम वाले कटोरे को चुना! मैं अपने बुद्धिमान विकल्प / निर्णय पर खुद को बधाई दे रहा था, और जल्दी जल्दी मुझे मिले 2 बादाम हलवा खा रहा था। परंतु मेरे आश्चर्य का ठिकाना नही था, जब मैंने देखा कि की मेरे पिता वाले कटोरे के नीचे *4 बादाम* छिपे थे! बहुत पछतावे के साथ, मैंने अपने निर्णय में जल्दबाजी करने के लिए खुद को डांटा। मेरे पिता मुस्कुराए और मुझे यह याद रखना सिखाया कि, *आपकी आँखें जो देखती हैं वह हरदम सच नहीं हो सकता, उन्होंने कहा कि यदि आप स्वार्थ की आदत की अपनी आदत बना लेते हैं तो आप जीत कर भी हार जाएंगे।* अगले दिन, मेरे पिता ने फिर से हलवे के 2 कटोरे पकाए और टेबल पर रक्खे एक कटोरा के शीर्ष पर 2 बादाम और दूसरा कटोरा जिसके ऊपर कोई बादाम नहीं था। फिर से उन्होंने मुझे अपने लिए कटोरा चुनने को कहा। इस बार मुझे कल का संदेश याद था, इसलिए मैंने शीर्ष पर बिना किसी बादाम कटोरी को चुना। परंतु मेरे आश्चर्य करने के लिए इस बार इस कटोरे के नीचे एक भी बादाम नहीं छिपा था! फिर से, मेरे पिता ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा, *”मेरे बच्चे, आपको हमेशा अनुभवों पर भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी, जीवन आपको धोखा दे सकता है या आप पर चालें खेल सकता है स्थितियों से कभी भी ज्यादा परेशान या दुखी न हों, बस अनुभव को एक सबक अनुभव के रूप में समझें, जो किसी भी पाठ्यपुस्तकों से प्राप्त नहीं किया जा सकता है।* तीसरे दिन, मेरे पिता ने फिर से हलवे के 2 कटोरे पकाए। पहले 2 दिन की ही तरह, एक कटोरे के ऊपर 2 बादाम, और दूसरे के शीर्ष पर कोई बादाम नहीं। मुझे उस कटोरे को चुनने के लिए कहा जो मुझे चाहिए था। लेकिन इस बार, मैंने अपने पिता से कहा, *पिताजी, आप पहले चुनें, आप परिवार के मुखिया हैं और आप परिवार में सबसे ज्यादा योगदान देते हैं । आप मेरे लिए जो अच्छा होगा वही चुनेंगे*। मेरे पिता मेरे लिए खुश थे।उन्होंने शीर्ष पर 2 बादाम के साथ कटोरा चुना, लेकिन जैसा कि मैंने अपने कटोरे का हलवा खाया! कटोरे के हलवे के एकदम नीचे 8 बादाम और थे। मेरे पिता मुस्कुराए और मेरी आँखों में प्यार से देखते हुए, उन्होंने कहा *मेरे बच्चे, तुम्हें याद रखना होगा कि, जब तुम भगवान पर सब कुछ छोड़ देते हो, तो वे हमेशा तुम्हारे लिए सर्वोत्तम का चयन करेंगे।* *और जब तुम दूसरों की भलाई के लिए सोचते हो, अच्छी चीजें स्वाभाविक तौर पर आपके साथ भी हमेशा होती रहेंगी ।**शिक्षा:* बड़ों का सम्मान करते हुए उन्हें पहले मौका व स्थान देवें, बड़ों का आदर-सम्मान करोगे तो कभी भी खाली हाथ नही लौटोगे । *”अनुभव व दृष्टि का ज्ञान व विवेक के साथ सामंजस्य हो जाये बस यही सार्थक जीवन है।”*

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

સાંજે પાંચ વાગ્યે બજારમાં ભીડ જોવા મળી


*સાંજે પાંચ વાગ્યે બજારમાં ભીડ જોવા મળી. આ ભીડ વચ્ચે, પતિ-પત્ની એકબીજા સાથે જાહેરમાં ઝગડતાં હતાં અને લગભગ 200 લોકો રસપૂર્વક જોતાં હતાં! કેટલાંક તેનો વીડિયો બનાવવામાં મશગૂલ હતાં…!**વાત કંઈક એવી હતી કે, પત્ની પતિને જીદ કરી રહી હતી કે, તમે આજે કાર ખરીદો; હું તમારી બાઇક પર બેસીને બેસીને કંટાળી ગઈ છું…**પતિએ કહ્યું: “ગાંડી, આમ, દુનિયા સામે મારો તમાશો ન કર. મને મોટરસાયકલની ચાવી આપી દે…”**પત્ની: “ના, તમારી પાસે આટલા પૈસા પણ છે. આજે તમારી પાસે કાર હશે તો હું ઘેરે આવીશ…!”**પતિ: ” ઓ.કે. હું કાર ખરીદીશ પણ અત્યારે તો મોટરસાયકલની ચાવી આપ.**પત્ની: “હું ચાવી આપીશ નહીં!”**પતિ: “કંઈ નહીં તો હું તાળું તોડું છું.”**પત્ની: “ભલે,તોડી નાખો પણ ન તો તમને ચાવી મળશે કે ન તો હું સાથે આવીશ!”**પતિ: “એ કંઈ વાંધો નહીં, ન આવતી..” કહી તાળું તોડવા લાગ્યો… લોકોએ પણ તાળું તોડવામાં મદદ કરી! લોકોની મદદથી મોટરસાયકલ ખોલીને…**બાઇક પર બેસીને પતિએ કહ્યું: “તું આવે છે કે હું જાઉં…?**ત્યાં ઉભેલા સમજદાર લોકોએ પત્નીને સમજાવ્યું કે જાવ, આવી બાબતમાં તમારો ઘરસંસાર ન બગાડો.**પછી, પતિએ પ્રોમિસ આપ્યું કે, તે બાઇક વેચીને તાત્કાલિક કાર ખરીદશે. બંને વચ્ચે સમાધાન થતાં ચાલ્યાં ગયાં…* *વાત અહીં પુરી થતી નથી…* *અડધા કલાક પછી, તે જ જગ્યાએ પાછી ગિરદી થઈ…* *લોકો ખીચોખીચ ભરાય છે …**એક કાકા ચીસો પાડી રહ્યા હતા કે…**”ડુપ્લીકેટ ચાવીથી કોઈ મોટરસાયકલ લઈ તે સમજ્યા પણ, ઘોળા દિવસે જાહેરમાં આટલા બધાં માણસોની હાજરીમાં તાળું તોડીને કોઈ મારું મોટરસાયકલ ચોરી ગયું તોય કોઈ બોલ્યું નહીં…!!!😜**બજારમાં સન્નાટો છવાઈ ગયો…