Posted in मंत्र और स्तोत्र

ज्योतिष वास्तु संस्कार ग्रुप की सादर प्रस्तुति
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हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427
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क्या आप जानते हैं सूर्य
पूजा के लाभ
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सूर्य देव हमारे “पितातुल्य” हैं।
सूर्य देव “आत्मा” हैं।

सूर्य को “विश्व सम्राट” कहा जाता है इनके पास “प्रकाश का अधिकार” रहता है। प्रखरतेजोमय एवं अग्नि के समान ज्वालारूप लिए हुए हैं।

हम जानते हैं अग्नि देवता “अलग” हैं परन्तु सूर्यदेव भी प्रखर उत्ताप एवं अत्यधिक तेज के कारण अग्नि जैसे ही प्रदीप्त होते हैं।

वेदों में सूर्य को “आदिदेव” मानकर सूर्यदेव की पूजा वंदना की जाती है। सूर्य देव पर अनेकों श्लोक प्राप्त होते हैं जिसकी स्तुति करके हम दीर्घ जीवन एवं आरोग्य , समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

ज्ञान , विवेक , यश की प्राप्ति , विद्व्ता , सम्मान की प्राप्ति , पारिवारिक – सौख्य एवं श्रीसमृद्धि का प्रदाता “सूर्य देव” ही हैं।

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॥ सूर्याष्टकम् ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥

साम्ब उवाच ॥

आदिदेवं नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर ।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ॥ १॥

सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् ।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ २॥

लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ३॥

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्माविष्णुमहेश्वरम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ४॥

बृंहितं तेजःपुंजं च वायुमाकाशमेव च ।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ५॥

बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुंडलभूषितम् ।
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ६॥

तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजःप्रदीपनम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ७॥

तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥ ८॥

सूर्याष्टकं पठेन्नित्यं ग्रहपीडाप्रणाशनम् ।
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान्भवेत् ॥ ९॥

आमिशं मधुपानं च यः करोति रवेर्दिने ।
सप्तजन्म भवेद्रोगी प्रतिजन्म दरिद्रता ॥ १०॥

स्त्रीतैलमधुमांसानि यस्त्यजेत्तु रवेर्दिने ।
न व्याधिः शोकदारिद्र्यं सूर्यलोकं स गच्छति ॥ ११॥

इति श्री सूर्याष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

हिंदी अनुवाद
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हे ! आदिदेव भास्कर आपको प्रणाम है, आप मुझ पर प्रसन्न हो, हे! दिवाकर आपको नमस्कार है, हे प्रभाकर आपको प्रणाम है ।

सात घोड़ों वाले रथ पर आरुढ़, हाथ में श्वेत कमल धारड़ किये हुए, प्रचंड तेजस्वी, कश्यप कुमार सूर्य को मैं प्रणाम करता हूँ ।

लोहितवर्ण रथारूढ़ सर्वलोक के पिता, महापापहारी सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूँ ।

जो त्रिगुणमय जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव स्वरुप है मैं उन महापापहारी सूर्य देव को प्रणाम करता हूँ ।

जो बडे़ हुए तेज के पुंज है जो वायु तथा आकाश व समस्त लोकों के अधिपति है मैं उन सूर्य देव को प्रणाम करता हूँ ।

जो बन्धु यानि दोपहरीया के पुष्प समान, रक्त वर्ण और हार तथा कुण्डलों से सुशोभित एक चक्रधारीं सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूँ ।

महान तेज के प्रकाशक, जगत के कर्ता मैं उन महापापहारी सूर्य देव को प्रणाम करता हूँ ।

उन सूर्य देव को जगत के नायक है, ज्ञान विज्ञान तथा मोक्ष को भी देते है मैं उन महापापहारी सूर्य देव को प्रणाम करता हूँ ।

सूर्याष्टक पढ़ने से गृहपीडा़ का नाश होता है, पुत्रहीनों को पुत्र की प्राप्ति तथा निर्धनों को धन लाभ होता है ।

जो व्यक्ति रविवार के दिन मांसभक्षण करते है तथा मधुपान करते है वे सात जन्मों तक प्रति क्षण रोग एवं दरिद्रता को प्राप्त करते है ।

जो व्यक्ति रविवार को स्त्री, तेल, मांस और शराब का त्याग करते है उनको कोई रोग, शोक तथा दरिद्रता नहीँ सताती है और ये लोग सीधे सूर्य लोक को प्रस्थान करते है ।।

।। इति श्री सूर्याष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

ज्योतिष वास्तु संस्कार ग्रुप की सादर सप्रेम भेंट

हँस जैन रामनगर खण्डवा
98272 14427

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