Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

गंगा दशहरा


धर्म और संस्कृति ग्रुप
की सादर प्रस्तुति
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हंस जैन रामनगर खंडवा
९८२७२ १४४२७
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आज मनाया जायगा
गंगा दशहरा
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ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को याने आज गंगा दशहरा मनाया जाएगा।

कोरोना महामारी के कारण श्रद्धालुओं से घर में मा गंगा की पूजा कर ले। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अगर इस तरह की परिस्थिति हो तो घर पर बाल्टी या टब में पानी के साथ गंगाजल मिलाकर मां गंगा की आराधना करते हुए स्नान करना गंगा में डुबकी लगाने के समान है।

क्या मान्यता है आज
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गंगा दशहरा पर स्नान-ध्यान करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति को समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है।

लेकिन इस बार कोरोना महामारी संकट की वजह से श्रद्धालु गंगा में आस्था की डुबकी नहीं लगा पाएंगे। ऐसे में श्रद्धालु घर में नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान के साथ विधिवत पूजा अर्चना कर सकते हैं।

स्नान के दौरान ‘भगवते दशपापहराये गंगाये नारायण्ये रेवत्ये शिवाये दक्षाये अमृताये विश्वरुपिण्ये नंदिन्ये ते नमो नम:’ का जप करें।

गंगा जी के स्नान मात्र से
ये पाप दूर हो जाते है
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मान्‍यता है क‍ि गंगा दशहरा के द‍िन गंगा स्‍नान करने से दस तरह के पाप नष्‍ट हो जाते हैं। इसमें पराई स्त्री के साथ समागम, बिना आज्ञा या जबरन किसी की वस्तु लेना, कटुवचन का प्रयोग, हिंसा, किसी की शिकायत करना, असत्य वचन बोलना, असंबद्ध प्रलाप, दूसरे की संपत्ति हड़पना या हड़पने की इच्छा, दूसरें को हानि पहुंचाना या ऐसी इच्छा रखना और बेवजह की बातों पर पर‍िचर्चा शामिल है। इसलिए धर्मशास्‍त्रों में कहा गया है क‍ि अगर अपनी गलतियों का अहसास और प्रभु से माफी मांगनी हो तो गंगा दशहरा के द‍िन गंगा स्‍नान कर दान-पुण्‍य करें। वर्तमान में कोरोना वायरस के चलते गंगा स्‍नान संभव नहीं है तो घर में स्‍नान के जल में गंगाजल डालकर स्‍नान कर लें। इससे भी गंगा में डुबकी लगाने जैसा ही फल म‍िलेगा।गंगा जी की कथा

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कथा: एक बार महाराज सगर ने व्यापक यज्ञ किया। उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला। इंद्र ने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया। यह यज्ञ के लिए विघ्न था। परिणामतः अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर अश्व को खोजना शुरू कर दिया। सारा भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला। फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया। खुदाई पर उन्होंने देखा कि साक्षात्‌ भगवान ‘महर्षि कपिल’ के रूप में तपस्या कर रहे हैं। उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है। प्रजा उन्हें देखकर ‘चोर-चोर’ चिल्लाने लगी।

महर्षि कपिल की समाधि टूट गई। ज्यों ही महर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले, त्यों ही सारी प्रजा भस्म हो गई। इन मृत लोगों के उद्धार के लिए ही महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तप किया था। भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने ‘गंगा’ की मांग की। इस पर ब्रह्मा ने कहा- ‘राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो? परंतु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल पाएगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है। इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए।’

महाराज भगीरथ ने वैसे ही किया। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ा। तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं। इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका। अब महाराज भगीरथ को और भी अधिक चिंता हुई। उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया। तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया। इस प्रकार शिवजी की जटाओं से छूट कर गंगाजी हिमालय की घाटियों में कल-कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ी।

इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण करके बड़े भाग्यशाली हुए। उन्होंने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया। युगों-युगों तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भगीरथ की कष्टमयी साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणीमात्र को जीवनदान ही नहीं देती, मुक्ति भी देती है। इसी कारण भारत तथा विदेशों तक में गंगा की महिमा गाई जाती है।तो बोलो गंगा मैया की जय। कुछ खास प्रयोग

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यदि आप गंगा नदी किनारे नहीं जा सकते तो एक लोटे में गंगा जल भरकर उसके नजदीक घी का दीपक जलाकर गंगा माता की आरती या पूजा करे।

तत्पश्चात घर या व्यापार में उस जल को गंगा माता से प्रार्थना कर छिड़क देवें।
ध्यान रखे की पांव में जल नहीं गिरे।घर के बुजुर्ग ,बच्चे या बीमार को मां गंगा का जल पिलावे और उनका स्वास्थ्य ठीक रहे प्रार्थना करे। जय हो गंगा मां की

हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

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