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राजीव उपाध्याय यावर

यात्रा रामायण जी की…….

राजा दशरथ की मृत्यु के बाद गुरु वशिष्ठ के आदेश से भरत-शत्रुघ्न को बुलाने के लिए सिद्धार्थ, विजय, जयंत, अशोक और नंदन नाम के पाँच दूतों को केकय देश भेजा गया।

“एहि सिद्धार्थ विजय जयन्ताशोकनन्दन।
श्रूयतामितिकर्तव्यं सर्वानेव ब्रवीमि वः।।”

इन दूतों ने केकय देश की राजधानी गिरिव्रज जाने के लिए जिस शीघ्रगामी मार्ग का अनुशरण किया गया, उससे तत्कालीन उत्तर भारत, पंजाब और पाकिस्तान के झेलम क्षेत्र तक का भौगोलिक विवरण प्राप्त होता है। यद्यपि उन नगर, ग्रामों के न रहने या नाम परिवर्तन हो जाने, नदियों के मार्ग बदल जाने के कारण आज उन स्थलों की पहचान करना बेहद मुश्किल है। फिर भी कुछ विवरणों के मिलान से परिवर्तनशील भौगोलिक ढाँचा खिंच भी जाता है। आइये आप भी चले उस मार्ग पर जिस मार्ग से अयोध्या से गिरिव्रज तक चले थे अयोध्या के दूत। पाँचों दूत अयोध्या से निकल अपरताल नामक पर्वत के अंतिम छोर अर्थात् दक्षिण भाग और प्रलम्बगिरी के उत्तर भाग में दोनों पर्वतों के बीच से बहने वाली मालिनी नदी से आगे बढ़े। प्रलंब बिजनौर जिले का दक्षिणी भाग था क्योंकि श्लोक में उसे मालिनी नदी के दक्षिण में बताया गया है। एक मतानुसार बिजनौर के 12 किमी उत्तर में स्थित मुंदोरा या मुंदावर पर्वत को प्रलम्ब गिरी पर्वत माना गया है। मालिनी नदी उत्तराखण्ड के गढ़वाल क्षेत्र में चरकाव्य पर्वत से चौकीघाट तक पहाड़ी क्षेत्र में होते हुए बिजनौर के उत्तरी भाग में बहती है।
दूत आगे बढ़ते हैं-

” ते हस्तिनापुरे गंगा तीत्र्वा प्रत्यंगमुखा ययुः।
पांचालदेशमासाद्य मध्येन कुरुजांगलम्।।

इसके बाद दूत हस्तिनापुर पार कर, उत्तर पांचाल और कुरु जांगल देश से होकर आगे बढ़ते हैं। कुरु जांगल क्षेत्र में वर्तमान सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली आदि का सम्मिलित भाग था। यहां से दूत सुंदर सरोवरों-नदियों का दर्शन कर आगे बढ़ते हैं। दिव्य नदी शरदण्डा को पार करते हैं। यहां दिव्य वृक्ष सत्योपाचन की परिक्रमा करते हैं फिर कुलिंगा पुरी में प्रवेश करते हैं। वहां से तेजोभिभवन गाँव को पार करते हुए अभिकाल गाँव पहुंचते हैं। वहां से आगे बढ़ने पर उन्होंने राजा दशरथ के पूर्वजों द्वारा सेवित इक्षुमति नदी को पार किया। कैथल जिले में नगर से 15 किमी दूर इक्षुमति तीर्थ, पोलड़ स्थित है। इसके बाद दूत बाह्लीक देश के मध्यभाग में सुदामा पर्वत के पास पहुंचे। यहां शिखर पर उन्होंने भगवान विष्णु के चरण चिह्नों का दर्शन किया। सुलेमान पर्वत माला को रामायणकालीन सुदामा पर्वत के रूप में चिंहित किया गया है। इसके बाद विपाशा (व्यास) नदी तक पहुँचे। फिर कई नदियां, पोखर, सरोवर पार किए। अंत में दूत केकय की भव्य राजधानी गिरिव्रज पहुँच गए। इतिहासकार कनिंघम ने पाकिस्तान में झेलम नदी के तट पर बसे जलालपुर कस्बे को ही प्राचीन गिरिव्रज नगरी माना है। जलालपुर नाम बादशाह अकबर के शासनकाल में उसके एक सैन्य अधिकारी मलिक दरवेश खान द्वारा रखा गया। इस का प्राचीन नाम स्थानीय लोग गिरजाक या गिरजख कहते हैं। दूतों द्वारा तय यह यात्रा लगभग 1200 किलोमीटर की रही होगी। यदि इन मार्गों को फिर से तलाश कर पुनर्जीवित किया जाए तो यह अत्यंत रोचक होगा। जय श्री राम। यात्रा जारी है…….

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