Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

रास बिहारी बोस


अरुण सुकला

जय हो आज 25-5-1886 है।
भीषण अंधेरी रात और लताओं से घिरा वन, एक शिला की टेक लेकर अपनी थकान मिटाने के लिए अघोरी रुका। शिला से आवाज आई- “सुनो, ध्यान से मेरी बात सुनो। 8 दशक पूर्व की बात है, दक्षिण पूर्व एशिया और शेष विश्व के छोटे छोटे द्वीपों के लाखों गिरमिटिया मजदूर और उनके बीच कुछ निर्वासित क्रांतिकारी, कवि और विद्वान जीवित होकर भी शव की भांति पड़े थे। उनके निश्चेष्ट, निरुद्देश्य अस्तित्व को किसी अघोरी की प्रतीक्षा थी जो व्योम से जीवात्मा का आह्वान करके उनके भीतर आत्मा का संचार कर दे।”

अघोरी ने पूछा- आप कौन हैं महापुरुष?

उत्तर मिला- “मैं मलय से थाईलैंड और जापान की सीमाओं तक घूमता रहा; पर योजनाओं का क्रियान्वयन नही हो पाया। भीड़ जुटती थी, सभी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए व्यग्र थे पर भीड़ का कोई निर्णय नही होता, भीड़ का कोई एक लक्ष्य नही होता अतः भीड़ ने कोई क्रांति नही की। ऐसे में एक अवतारी मेरे सामने प्रकट हुआ और उसने वह कर दिया जो दुनिया की सबसे शक्तिशाली सरकारें भी नही कर पाई। उस सुभाष चंद्र बोस ने भीड़ के अंदर आत्मा का संचार कर दिया और पलक झपकते ही भीड़ एक अनुशासित सेना बन गई।”

“तुम्हें क्या लगता है अघोरी, क्या संसार के बड़े परिवर्तन किसी भीड़ ने किए? भीड़ कभी कुछ नही करती, संसार के सबसे बड़े कार्य कुछ सिरफिरे अकेले लोगों ने ही किए हैं। संसार के सबसे बड़े भाड़ अकेले चनों ने ही फोड़े हैं। फ्लेमिंग न होता तो चिकित्सा विज्ञान वह नही होता जो आज है। पास्चर नही होते तो जीवन और रोगों को नई दृष्टि से हमने देखा नही होता। मंगल पांडे न होते तो वैसा 1857 नही हुआ होता। रोज रोज योजनाएं बनाकर कुछ नही होता है क्योंकि विश्व की 99% अद्भुत योजनाएं कभी भूमि पर नही उतरती हैं। सबसे अविश्वसनीय कार्य अकेले सिरफिरे पागलों ने ही किया है। वाणभट्ट और चाणक्य जैसे अकेले व्यक्तियों ने ही सम्पूर्ण भारत का एकीकरण किया है।
जीवन के हर क्षेत्र में यह बात सत्य है। गांधी हजारो हो सकते हैं क्योंकि गांधी होने में कोई खतरा नही है, सबकी तुष्टि करो;सबसे संवाद करो और वार्ता तथा गोष्ठियां करो पर देश के लिए बलिदान हो जाने के लिए जो अदम्य साहस चाहिए वह भगत सिंह एक ही हो सकता है। कांग्रेसी भीड़ के बिना गांधी कुछ नही थे, विशाल भीड़ के साथ अनेकों आंदोलन करके भी गांधी सफल नही हुए(स्वयं स्वीकारा है उन्होंने)। 23 वर्ष की वय में लोग रंगीन सपनों से बाहर नही निकलते और भगतसिंह इस उम्र में फांसी चढ़ गए, फांसी चढ़ने के पूर्व देश के सैकड़ों शहर और हजारों गांव की खाक भी छानी, गहन अध्ययन भी किया, बम भी बनाए और बलिदानी परिवारों की जिम्मेदारी भी निभाई।

असेम्बली में बम फेंकना एक सुनियोजित, सुविचारित और अद्भुत प्रक्रिया थी। उन्होंने सरकार को पूरे विश्व में नंगा कर दिया। जो पर्चे फेंके गए उसके एक एक शब्द में देश के लिए संदेश था, अंग्रेजों के लिए सन्देश था। इस अकेले दीवाने ने थर्रा दिया था पूरे देश को, हँसते हँसते बलिदान होने का जो उदाहरण इन्होंने दिया उसने पूरे भारत का वह जागरण किया जिसकी तुलना में पूरी कांग्रेस शून्य हो गई थी।
अकेले मदनलाल की एक गोली ने ब्रिटिश तंत्र को इतना डरा दिया जितना विश्वयुद्ध के भय ने भी उन्हें आतंकित नही किया था, पढ़ो लन्दन के अधिकारियों की पत्नियों की डायरी के अंश जिन्होंने मदनलाल धींगरा की गोलियों की धमक बकिंघम पैलेस के ठीक सामने सुनी थी।

भगतसिंह ने कहा था कि बहरों को सुनाने के लिए धमाके की आवश्यकता होती है, यह उनकी समस्या है जो आज भी उनका योगदान नही समझते। फांसी के पहले जो अपनी माँ से कहता है कि लाश लेने तुम मत आना, छोटे को भेजना। उसके बलिदान को और आत्मबल को गालियां देने वाले आज भी भारत में हैं यही दुःखद है।

सावरकर जब काला पानी जा रहे थे तो एक अंग्रेज अधिकारी ने कहा- दोहरे कालापानी तक तो यह सूखा आदमी जी ही नही पाएगा। सावरकर ने कहा- तबतक तुम्हारी सरकार ही नही बचेगी। इन क्रांतिकारियों के समक्ष खड़ा होने योग्य कौन है, कहो?”

अघोरी ने पूछा- आप कौन हैं प्रभु?

शिला से आवाज आई- “मैं कौन हूँ यह महत्वपूर्ण नहीं है, क्रांति की परंपरा महत्वपूर्ण है क्योंकि क्रांतियाँ अकेले लोगों ने ही की है, सिरफिरे पागलों ने की है, अचानक ही की है। होशियार लोगों जीवनभर योजनाएं बनाकर इन क्रांतियों का राजनैतिक भोग करते रहे हैं।”

अघोरी बोला- “आपको नमन है क्योंकि आपके लिए ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि पूरी आजाद हिंद फौज न होती अगर आप अकेले न होते।”

तभी आकाश में बिजली चमकी और शिला पर अंकित अक्षर चमक उठे- रास बिहारी बोस।
#अघोरी एकला चलो रे

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