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चंदामामा


जिसे पढ़-पढ़कर हम बड़े हुए हैं उस चंदामामा पत्रिका के बुरे दिन आ गए

अनिरुद्धlallantopaniruddha@gmail.com 

जिसे पढ़-पढ़कर हम बड़े हुए हैं उस चंदामामा पत्रिका के बुरे दिन आ गए

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि बाल मैगजीन चंदामामा के बौद्धिक संपदा अधिकार बेच दिए जाएं. (तस्वीर साभार- फेसबुक.)

बचपन. कंचे, गिल्ली-डंडा, खो-खो, कबड्डी और साइकिल रेस वाला बचपन. पूरे मोहल्ले में हो-हल्ला और धमाचौकड़ी. साइकिल के टायर को लकड़ी से चलाना. अपनी पसंद की कॉमिक्स में खो जाना. नंदन, पराग और चंपक जैसी मैगजीन तमाम घरों की शान थीं. कुछ बच्चे लोटपोट और इंद्रजाल कॉमिक्स लेते थे. हर बच्चा उछल-कूद के बीच छुट्टी के दिनों में इन कॉमिक्स और किस्से कहानियों की दुनिया में डूबा रहता था. ऐसी ही एक और बाल पत्रिका थी चंदामामा. 90 के दशक में इसके सुपरहीरो विक्रम-बेताल की कहानियों का तो बच्चों में जबरदस्त क्रेज था. चंदामामा का बच्चों को हर वक्त इंतजार रहता था. इसमें लोककथाओं, पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित कहानियां आती थीं. मगर अब ये पत्रिका इतिहास बनती दिख रही है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मैगजीन के बौद्धिक संपदा अधिकार बेचने का आदेश दिया है. क्या है ये पूरा मामला आइए समझते हैं.

कब से छप रही थी मैगजीन?

चंदामामा का पहला अंक जुलाई, 1947 में तेलुगू और तमिल में प्रकाशित हुआ था. (तस्वीर साभार- फेसबुक.)
चंदामामा का पहला अंक जुलाई, 1947 में तेलुगू और तमिल में आया था. (तस्वीर साभार- चंदामामा फेसबुक पेज)

आजादी के वक्त यानी साल 1947 में इस मैगजीन का प्रकाशन शुरू हुआ था. इस पत्रिका की स्थापना दक्षिण भारत के फैमस फिल्म प्रोड्यूसर बी नागी रेड्डी ने की थी. रेड्डी ने अपने करीबी दोस्त चक्रपाणि को इसका संपादन सौंपा. चंदामामा का पहला अंक जुलाई, 1947 में तेलुगू और तमिल में प्रकाशित हुआ. 1975 में इसके संपादक नागीरेड्डी के बेटे बी विश्वनाथ बनाए गए. उन्होंने कई साल तक इस पत्रिका का संपादन और प्रकाशन किया. साल 1990 तक ये पत्रिका हिंदी, इंग्लिश, मराठी, तमिल, तेलुगू, सिंधी, सिंहली और संस्कृत जैसी 13 भाषाओं में आने लगी. लेकिन कुछ वक्त के बाद इस पत्रिका के बुरे दिन भी शुरू हो गए. साल 2006 आते-आते पत्रिका की आर्थिक हालत बिगड़ गई. इसका सर्कुलेशन गिरने लगा. और विज्ञापन आने कम हो गए. विज्ञापन किसी भी पत्रिका की जान होते हैं. चंदामामा इसमें पिछड़ रही थी.

इसके बाद क्या हुआ?

चंदामामा पत्रिका को फिर से चलाने की सारी कोशिशें बेकार गईं. (फोटो साभार- चंदामामा फेसबुक पेज)
चंदामामा पत्रिका को फिर से चलाने की सारी कोशिशें बेकार गईं. (फोटो साभार- चंदामामा फेसबुक पेज)

मार्च 2007 में मुंबई की एक सॉफ्टवेयर कंपनी जियोडेसिक लिमिटेड ने इस मैगजीन को करीब 10 करोड़ रुपए में खरीद लिया. चंदामामा के संस्थापक नागीरेड्डी के बेटे विश्वनाथ और मॉर्गन स्टेनली इनवेस्टमेंट मैनेजमेंट के एमडी विनोद सेठी ने 94 फीसदी हिस्सा जियोडेसिक को बेच दिया. इसके बाद जियोडेसिक ने भी इस पत्रिका को नए सिरे से चलाने की कोशिश की. जियोडेसिक लिमिडेट ने चंदामामा का नवीनीकरण और डिजिटलाइजेशन कराया. इस काम में अमेरिका की कारनेगी-मेलोन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राज रेड्डी और उनकी टीम की मदद ली. इसके बाद जुलाई 2008 से जियोडेसिक ने अपनी वेबसाइट पर हिंदी, तमिल और तेलुगू में छपे मैजगीन के पुराने अंक मुहैया कराने शुरू कर दिए. साथ ही मैगजीन को आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर जीवी श्रीकुमार से रिडिजाइन करवाकर रीलांच किया. साल 2008 में अमिताभ बच्चन ने मुंबई में पत्रिका की 60वीं वर्षगांठ पर चंदामामा का नया संस्करण लॉन्च किया. मगर ये सारे दांव बेकार गए. मैगजीन नहीं चली तो नहीं चली.

नया मैनेजमेंट मुसीबत में आ गया
साल, 2014 में जियोडेसिक लिमिटेड का नया मैनेजमेंट एक नई मुसीबत में फंस गया. अप्रैल 2014 में कंपनी अपने 15 एफसीसीबी यानी फॉरेन करेंसी कनवर्टिबल बॉन्ड्स का भुगतान नहीं कर पाया. फॉरेन करेंसी कनवर्टिबल बॉन्ड्स एक खास तरह के बॉन्ड होते हैं, जिनको जारी करके देशी कंपनियां विदेशों से पैसा इकट्ठा करती है. जियोडेसिक लिमिटेड विदेशी निवेशकों का करीब 1000 करोड़ रुपया नहीं चुका पाई. इस पर निवेशकों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में केस कर दिया. हाईकोर्ट ने जून 2014 में जियोडेसिक लिमिटेड की संपत्तियों को कब्जे में लेने का आदेश दे दिया. साथ ही कंपनी को लिक्विडेटर यानी कर्ज निपटान अधिकारी के सुपुर्द कर दिया. उसी वक्त से चंदामामा की 10 हजार स्क्वायर फुट की प्रॉपर्टी बंद पड़ी है. और जियोडेसिक लिमिटेड और उसके वरिष्ठ अधिकारी मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग की निगरानी में हैं. बाद में जियोडेसिक पर 812 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप भी लगे. अवैध कमाई को वैध करना मनी लॉन्ड्रिंग कहलाता है. इस आरोप के बाद जियोडेसिक के तीन डायरेक्टर किरन प्रकाश कुलकर्णी, प्रशांत मुलेकर, पंकज श्रीवास्तव और फर्म के सीए दिनेश जाजोडिया को गिरफ्तार कर लिया गया था.

क्या होता है बौद्धिक संपदा अधिकार?

विक्रम बेताल जैसे चंदामामा के पात्र अब शायद इतिहास हो सकते हैं. (तस्वीर साभार- चंदामामा फेसबुक पेज)
विक्रम बेताल जैसे चंदामामा के पात्र अब शायद इतिहास हो सकते हैं. (तस्वीर साभार- चंदामामा फेसबुक पेज)

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 11, जनवरी, 2018 को एक नया आदेश जारी किया है. इसमें कहा गया है कि चंदामामा के इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स यानी बौद्धिक संपदा अधिकार बेच दिए जाएं. किसी शख्स या फिर संस्था का अपने प्रोडक्ट पर एक हक होता है. इसे ही बौद्धिक संपदा अधिकार कहा जाता है. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एस जे कठावाला ने इसी बौद्धिक संपदा अधिकार और बाकी प्रॉपर्टी को बेचने का आदेश दिया है. उन्होंने कहा है कि जियोडेसिक के सभी निदेशक इस बारे में फौरन अपनी सहमित दें. इनफोर्समेंट डायरेक्टरेट यानी ईडी इनको अपने कब्जे में लेकर बेचे. ईडी कंपनी के डायरेक्टर्स की कोई 16 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी पहले ही अटैच कर चुका है. चंदामामा के अलावा जियोडेसिक के पास करीब 25 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी है. इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी के नाम पर जियोडेसिक के पास चंदामामा की कहानियां आदि ही हैं. एक अनुमान के मुताबिक कंपनी के पास चंदामामा की हस्तलिखित और डिजिटल फॉर्मेट में करीब 6,000 कहानियां हैं. इसके अलावा 36 फिक्शनल कैरेक्टर हैं. विक्रम-बेताल सीरियल के 640 एपिसोड हैं. इनका पेटेंट और मैगजीन का कॉपीराइट अधिकार जियोडेसिक के पास है.

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