Posted in હાસ્ય કવિતા

लाचार प्रिये


” लाचार प्रिये “
करूँ मेहनत पर लाचार प्रिये,
पुरा लुटता तुझपे पगार प्रिये,
एक छोटा रखता कार प्रिये,
क्यूँ कहती मुझे बेकार प्रिये,

दिखे शक्ति की अवतार प्रिये,
तेरे दर्शन को लाचार प्रिये,
क्यूँ मारे नजर से वार प्रिये,
कभी ‘प्यारे’ कह एकबार प्रिये,

तेरे नैन नशीलेदार प्रिये,
दुश्मन भी जाए हार प्राये,
कहूँ मृगनयनी हुँकार प्रिये,
भले रोके मुझे सरकार प्रिये,

अब मिलके चले घर – बार प्रिये,
घर बन जाए गुलजार प्रिये,
मुझे धन की नहीं दरकार प्रिये,
बस ! मिल जाए तेरा प्यार प्रिये,

अब प्रिये क्या कहती है…..।

तुम ठग, फरेब, फनकार प्रिये,
मेरे क्रोध को न ललकार प्रिये,
तुम झुठों का सरदार प्रिये,
तभी लड़ती मैं हरबार प्रिये,

क्यूँ बच्चे खाते मार प्रिये,
मिलता हरपल फटकार प्रिये,
पड़े रहते लिए डकार प्रिये,
सिर्फ मेरा है परिवार प्रिये !

चलो माफ किया इसबार प्रिये,
करूँ प्रेम का अब इजहार प्रिये,

खड़ी रहती किये श्रृँगार प्रिये,
नाम तेरा जपूँ सौ बार प्रिये,
कहे चूड़ियों की खनकार प्रिये,
कब आओगे घर – द्वार प्रिये,

जुड़े मन से मन की तार प्रिये,
तेरे बिन सूना संसार प्रिये,
क्यूँ मारे जुबाँ से वार प्रिये,
जरा प्यार से देख एकबार प्रिये,

बस प्रेम में है संसार प्रिये,
बस प्रेम में है संसार प्रिये,…..

ब्रज बिहारी सिंह
हिनू, राँची, झारखण्ड

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