Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

कुतुबुद्दीन ऐबक और ध्रुवस्तंभ


करण सोलंकी

कुतुबुद्दीन ऐबक और ध्रुवस्तंभ

विदेशी आक्रमणकारियों की भारत विजय अभियान के दौरान दिल्ली सल्तनत पर जब गुलाम वंश का शासन हुआ तो भारत में इस्लामी प्रचार और प्रसार का दौर शुरू हुआ जिसमें मुख्यतः वैदिक हिंदू संरचनाओं और मंदिरो को नष्ट-भ्रष्ट कर उनके ध्वंसावशेषों से मस्जिदों और मकबरों का निर्माण कर उनका इस्लामिकरण करना था और यह दौर मुगल काल के अंतिम शासक तक अनवरत रुप से जारी रहा।

इसी क्रम में ध्रुव स्तंभ जिसे आज कुतुबमीनार कहा जाता है, का भी इस्लामिकरण होना स्वाभाविक था। कुतुबुद्दीन ऐबक एक अभिलेख छोड़ कर गया है जिसमें उसके द्वारा उन सभी 27 नक्षत्रिय मंदिरों जो कि ध्रुव स्तंभ के साथ और उसके आसपास चारों तरफ थे, को तोड़कर कुव्वत उल इस्लाम नामक एक मस्जिद बनवाने का उल्लेख है किंतु उस अभिलेख में उसके द्वारा कुछ भी नया बनवाने का उल्लेख नही है।

आधुनिककाल में ध्रुव स्तंभ को कुतुबमीनार नाम से जानने का मुख्य कारण भाषा का अंतर और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा विदेशी आक्रमणकारियों को निर्माता होने का झूठा श्रेय देना है। फारसी में ध्रुव को “कुतुब” और स्तंभ को “मीनार” कहा जाता है। इस वजह से विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा भारत विजयोपरांत फारसी में इसका संयुक्त नामकरण “कुतुबमीनार” हुआ। कालांतर में कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम से समानता पाये जाने पर वामपंथी इतिहासकारों ने यह दुष्प्रचार किया कि ध्रुव स्तंभ का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक और तत्पश्चात इलतुत्तमिश ने करवाया था।

इसी तरह के कई भ्रम आज हमारी आधुनिक इतिहास की किताबों में भर दिये गये है और तोता रटंत की तरह सभी युनिवर्सिटीज़ में इस भ्रामक तथ्य का प्रचार किया जा रहा है।

वस्तुतः ध्रुव स्तंभ “एक नक्षत्रिय वेधशाला” और 27 नक्षत्रिय मंदिरो सहित संपूर्ण परिसर जो कि भगवान विष्णु को समर्पित एक मंदिर था, की रचना सम्राट विक्रमादित्य द्वारा आक्रमणकारी शकों और नेपाल पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में की थी। इस महान विजय और विक्रम संवत की स्थापना के उपलक्ष्य में सम्राट विक्रमादित्य एक ऐसे स्मारक का निर्माण करवाना चाहते थे जो कि उनकी कीर्ति का यशोगान चारो दिशाओं में करें। सुप्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री वाराहमिहिर के अनुमोदन पर सम्राट विक्रमादित्य ने एक ऐसे स्मारक को बनवाने का प्रण किया जो उनकी महाविजय के स्मृति चिन्ह के साथ साथ खगोलशास्त्र का भी अपूर्व उदाहरण हो।

सम्राट विक्रमादित्य द्वारा अधर्म पर धर्म की विजय होने के उपलक्ष्य में महाभारत काल के चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर की राजधानी इंद्रप्रस्थ को ध्रुव स्तंभ की स्थापना के लिये चुना गया था।

ग्रहों, नक्षत्रों और तारों का अध्ययन करने के लिये यहाँ पर 27 छोटे छोटे भवन (मंदिर) बनवाये गये थे जो 27 नक्षत्रों के प्रतीक थे और मध्य में विष्णुस्तम्भ था, जिसे ध्रुव स्तम्भ भी कहा जाता था। इसी ध्रुवस्तंभ संकुल में कुछ दूरी पर एक लौहस्तंभ है जिसपर ब्राह्मी लिपी में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की महाविजय अंकित है। इस लौह स्तंभ को चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (चन्द्रगुप्त द्वितीय) ने भगवान विष्णु के सम्मान में विष्णुपद के रुप में स्थापित करवाया था।

प्राचीन भारत में गया स्थित “विष्णुपद मंदिर” और उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर काल गणना, समय मापन और तिथि निर्धारण के दो महत्वपूर्ण स्थान थे जहां से इंद्रप्रस्थ और शेष भारत का शून्य समय मापन निर्धारित किया जाता था और इंद्रप्रस्थ से गया की सीधी दूरी जो लगभग 800 कि.मी. है, का ध्रुवस्तंभ के निर्माण में वैज्ञानिक और गणितीय कारण था।

ध्रुव स्तम्भ द्वारा पृथ्वी की परिधि की गणना भी इसी जटिल वैदिक खगोलशास्त्र का एक भाग मात्र है। ध्रुव स्तम्भ की ऊंचाई की गणना इस तरह से की गई है कि दिन के एक विशेष प्रहर में इसकी परछाई से ऊंचाई का अनुपात 1:8 होता है।

अब यदि चित्रानुसार ध्रुव स्तम्भ की ऊंचाई b और परछाई a और विकर्ण c मानते है और पृथ्वी की त्रिज्या C और B मानते है और A इंद्रप्रस्थ से गया की सीधी भौगोलिक दूरी लगभग 800 कि.मी..मानते है तो अंतर समानांतर के नियमानुसार –

a/b = A/B,

चूंकि b=8a

इस प्रकार B = 8A

अब चूकिं हमारे पास A का मान 800 कि.मी. है तो पृथ्वी की त्रिज्या का माप 8×800 कि.मी. = 6400 कि.मी. आता है। इस तरह से पृथ्वी की परिधि की गणना 2xPIxR = (2×3.14×6400) सूत्र से करने पर परिणाम 40,192 कि.मी. आता है जो कि आधुनिक गणना के परिणाम 40,075 कि.मी. से काफी समानता रखता है।

इसी प्रकार प्राचीन वैदिक भारत में अन्य खगोलीय गणनाएं जैसे कि सूर्य-चंद्र और अन्य नक्षत्रों के व्यास, पृथ्वी से अन्य ग्रहों और खगोलीय पिंडो की दूरी, पृथ्वी की दैनिक और वार्षिक गति, चन्द्रमा की कलाओं आदि की गणना ध्रुव स्तंभ की सहायता से की जाती थी।

गणित, खगोल, और अन्यान्य वैदिक शास्त्रों की सिद्धता और उन पर एकाधिकार प्राप्त करने के लिये कई हजारों वर्षों के वैज्ञानिक अनुसंधान, वैचारिक मंथन, विश्वकल्याण की भावना और कड़ी तपस्या की आवश्यकता होती है जो केवल वैदिक सनातन संस्कृति द्वारा ही संभव है।

क्या आप अब भी एक निरक्षर दास और विदेशी आक्रमणकारी को इस जटिल गणितीय और खगोलीय संरचना का वास्तविक निर्माता मानते है??

स्त्रोत:-

https://www.myindiamyglory.com/…/kutub-minar-a-mahabharath…/

https://www.google.com/…/qutub-minar-115031900044_1.html%3f…

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Iron_pillar_of_Delhi

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Vishnupad_Mandir

https://threadreaderapp.com/thread/1184218904165380096.html

Author:

Buy, sell, exchange books

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s