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रानी लक्ष्मीबाई


1926 से लेकर 2014 तक के 88 सालों में कांग्रेस ये अखबार नहीं ढूंढ पाई और वर्तमान मोदी सरकार ने ये सच दुनियां को बता दिया कि 1857 की क्रांति कोई विद्रोह नहीं था बल्कि रानी लक्ष्मीबाई को अमेरिका के उस अखबार ने मई 1926 में….Heroine of the war of independence of 1857. बताया है जो एक fact है।……….आजादी की लड़ाई के महारथी..

https://starsunfolded.com/rani-lakshmibai/
https://www.wikiwand.com/en/Rani_of_Jhansi
https://www.saada.org/item/20111129-508
http://bundelkhand2bali.blogspot.com/2015/09/jhansi-rani-laxmi-bai-original-picture.html
https://topyaps.com/this-photo-of-rani-lakshmibai-is-suddenly-going-viral-and-you-will-love-it-too/
https://www.indiatoday.in/education-today/gk-current-affairs/story/know-all-about-rani-lakshmibai-of-jhansi-born-as-manikarnika-tambe-1316804-2018-08-17
https://wikibio.in/rani-lakshmibai/
https://headtopics.com/us/overlooked-no-more-rani-of-jhansi-india-s-warrior-queen-who-fought-the-british-7594389

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कुतुबुद्दीन ऐबक और ध्रुवस्तंभ


करण सोलंकी

कुतुबुद्दीन ऐबक और ध्रुवस्तंभ

विदेशी आक्रमणकारियों की भारत विजय अभियान के दौरान दिल्ली सल्तनत पर जब गुलाम वंश का शासन हुआ तो भारत में इस्लामी प्रचार और प्रसार का दौर शुरू हुआ जिसमें मुख्यतः वैदिक हिंदू संरचनाओं और मंदिरो को नष्ट-भ्रष्ट कर उनके ध्वंसावशेषों से मस्जिदों और मकबरों का निर्माण कर उनका इस्लामिकरण करना था और यह दौर मुगल काल के अंतिम शासक तक अनवरत रुप से जारी रहा।

इसी क्रम में ध्रुव स्तंभ जिसे आज कुतुबमीनार कहा जाता है, का भी इस्लामिकरण होना स्वाभाविक था। कुतुबुद्दीन ऐबक एक अभिलेख छोड़ कर गया है जिसमें उसके द्वारा उन सभी 27 नक्षत्रिय मंदिरों जो कि ध्रुव स्तंभ के साथ और उसके आसपास चारों तरफ थे, को तोड़कर कुव्वत उल इस्लाम नामक एक मस्जिद बनवाने का उल्लेख है किंतु उस अभिलेख में उसके द्वारा कुछ भी नया बनवाने का उल्लेख नही है।

आधुनिककाल में ध्रुव स्तंभ को कुतुबमीनार नाम से जानने का मुख्य कारण भाषा का अंतर और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा विदेशी आक्रमणकारियों को निर्माता होने का झूठा श्रेय देना है। फारसी में ध्रुव को “कुतुब” और स्तंभ को “मीनार” कहा जाता है। इस वजह से विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा भारत विजयोपरांत फारसी में इसका संयुक्त नामकरण “कुतुबमीनार” हुआ। कालांतर में कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम से समानता पाये जाने पर वामपंथी इतिहासकारों ने यह दुष्प्रचार किया कि ध्रुव स्तंभ का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक और तत्पश्चात इलतुत्तमिश ने करवाया था।

इसी तरह के कई भ्रम आज हमारी आधुनिक इतिहास की किताबों में भर दिये गये है और तोता रटंत की तरह सभी युनिवर्सिटीज़ में इस भ्रामक तथ्य का प्रचार किया जा रहा है।

वस्तुतः ध्रुव स्तंभ “एक नक्षत्रिय वेधशाला” और 27 नक्षत्रिय मंदिरो सहित संपूर्ण परिसर जो कि भगवान विष्णु को समर्पित एक मंदिर था, की रचना सम्राट विक्रमादित्य द्वारा आक्रमणकारी शकों और नेपाल पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में की थी। इस महान विजय और विक्रम संवत की स्थापना के उपलक्ष्य में सम्राट विक्रमादित्य एक ऐसे स्मारक का निर्माण करवाना चाहते थे जो कि उनकी कीर्ति का यशोगान चारो दिशाओं में करें। सुप्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री वाराहमिहिर के अनुमोदन पर सम्राट विक्रमादित्य ने एक ऐसे स्मारक को बनवाने का प्रण किया जो उनकी महाविजय के स्मृति चिन्ह के साथ साथ खगोलशास्त्र का भी अपूर्व उदाहरण हो।

सम्राट विक्रमादित्य द्वारा अधर्म पर धर्म की विजय होने के उपलक्ष्य में महाभारत काल के चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर की राजधानी इंद्रप्रस्थ को ध्रुव स्तंभ की स्थापना के लिये चुना गया था।

ग्रहों, नक्षत्रों और तारों का अध्ययन करने के लिये यहाँ पर 27 छोटे छोटे भवन (मंदिर) बनवाये गये थे जो 27 नक्षत्रों के प्रतीक थे और मध्य में विष्णुस्तम्भ था, जिसे ध्रुव स्तम्भ भी कहा जाता था। इसी ध्रुवस्तंभ संकुल में कुछ दूरी पर एक लौहस्तंभ है जिसपर ब्राह्मी लिपी में चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की महाविजय अंकित है। इस लौह स्तंभ को चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (चन्द्रगुप्त द्वितीय) ने भगवान विष्णु के सम्मान में विष्णुपद के रुप में स्थापित करवाया था।

प्राचीन भारत में गया स्थित “विष्णुपद मंदिर” और उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर काल गणना, समय मापन और तिथि निर्धारण के दो महत्वपूर्ण स्थान थे जहां से इंद्रप्रस्थ और शेष भारत का शून्य समय मापन निर्धारित किया जाता था और इंद्रप्रस्थ से गया की सीधी दूरी जो लगभग 800 कि.मी. है, का ध्रुवस्तंभ के निर्माण में वैज्ञानिक और गणितीय कारण था।

ध्रुव स्तम्भ द्वारा पृथ्वी की परिधि की गणना भी इसी जटिल वैदिक खगोलशास्त्र का एक भाग मात्र है। ध्रुव स्तम्भ की ऊंचाई की गणना इस तरह से की गई है कि दिन के एक विशेष प्रहर में इसकी परछाई से ऊंचाई का अनुपात 1:8 होता है।

अब यदि चित्रानुसार ध्रुव स्तम्भ की ऊंचाई b और परछाई a और विकर्ण c मानते है और पृथ्वी की त्रिज्या C और B मानते है और A इंद्रप्रस्थ से गया की सीधी भौगोलिक दूरी लगभग 800 कि.मी..मानते है तो अंतर समानांतर के नियमानुसार –

a/b = A/B,

चूंकि b=8a

इस प्रकार B = 8A

अब चूकिं हमारे पास A का मान 800 कि.मी. है तो पृथ्वी की त्रिज्या का माप 8×800 कि.मी. = 6400 कि.मी. आता है। इस तरह से पृथ्वी की परिधि की गणना 2xPIxR = (2×3.14×6400) सूत्र से करने पर परिणाम 40,192 कि.मी. आता है जो कि आधुनिक गणना के परिणाम 40,075 कि.मी. से काफी समानता रखता है।

इसी प्रकार प्राचीन वैदिक भारत में अन्य खगोलीय गणनाएं जैसे कि सूर्य-चंद्र और अन्य नक्षत्रों के व्यास, पृथ्वी से अन्य ग्रहों और खगोलीय पिंडो की दूरी, पृथ्वी की दैनिक और वार्षिक गति, चन्द्रमा की कलाओं आदि की गणना ध्रुव स्तंभ की सहायता से की जाती थी।

गणित, खगोल, और अन्यान्य वैदिक शास्त्रों की सिद्धता और उन पर एकाधिकार प्राप्त करने के लिये कई हजारों वर्षों के वैज्ञानिक अनुसंधान, वैचारिक मंथन, विश्वकल्याण की भावना और कड़ी तपस्या की आवश्यकता होती है जो केवल वैदिक सनातन संस्कृति द्वारा ही संभव है।

क्या आप अब भी एक निरक्षर दास और विदेशी आक्रमणकारी को इस जटिल गणितीय और खगोलीय संरचना का वास्तविक निर्माता मानते है??

स्त्रोत:-

https://www.myindiamyglory.com/…/kutub-minar-a-mahabharath…/

https://www.google.com/…/qutub-minar-115031900044_1.html%3f…

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Iron_pillar_of_Delhi

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Vishnupad_Mandir

https://threadreaderapp.com/thread/1184218904165380096.html

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जम्बुकेश्वर मंदिर, तमिलनाडु


जम्बुकेश्वर मंदिर, तमिलनाडु 🙏

क्या कोई इससे खूबसूरत भी कुछ दिखा सकता है?

इसका निर्माण आज से 1800 साल पहले चोल राजाओं ने करवाया था। इस मंदिर में एक रहस्यमयी भूमिगत जलस्त्रोत है जिसकी वजह से मंदिर में कभी पानी की कमी नहीं पड़ती। अगर आधुनिक उपकरणों के अभाव में भी हमारे पूर्वजों ने इसे निर्मित किया तो फिर उन्नत कौन हुआ? ✨

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महाराजा छत्रसाल


।।सनातनी साम्राज्य।।

—बुन्देल केसरी,मुग़लो के काल महाराजा छत्रसाल —

दिनांक 04 मई 1649 ईस्वी को महाराजा छत्रसाल का जन्म हुआ था।

कम आयु में ही अनाथ हो गए वीर बालक छत्रसाल ने छत्रपति शिवाजी से प्रभावित होकर अपनी छोटी सी सेना बनाई और मुगल बादशाह औरंगजेब से जमकर लोहा लिया और मुग़लो के सबसे ताकतवर काल में उनकी नाक के नीचे एक बड़े भूभाग को जीतकर एक विशाल स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।

बुन्देलखंड की भूमि प्राकृतिक सुषमा और शौर्य पराक्रम की भूमि है, जो विंध्याचल पर्वत की पहाड़ियों से घिरी है। चंपतराय जिन्होंने बुन्देलखंड में बुन्देला राज्य की आधार शिला रखी थी, महाराज छत्रसाल ने उस बुन्देला राज्य को ना केवल पुनर्स्थापित किया बल्कि उसका विस्तार कर के उसे समृद्धि प्रदान की।

====जीवन परिचय====

महाराजा छत्रसाल का जन्म गहरवार (गहड़वाल) वंश की बुंदेला शाखा के राजपूतो में हुआ था,काशी के गहरवार राजा वीरभद्र के पुत्र हेमकरण जिनका दूसरा नाम पंचम सिंह गहरवार भी था,वो विंध्यवासिनी देवी के अनन्य भक्त थे,जिस कारण उन्हें विन्ध्य्वाला भी कहा जाता था,इस कारण राजा हेमकरण के वंशज विन्ध्य्वाला या बुंदेला कहलाए,हेमकर्ण की वंश परंपरा में सन 1501 में ओरछा में रुद्रप्रताप सिंह राज्यारूढ़ हुए, जिनके पुत्रों में ज्येष्ठ भारतीचंद्र 1539 में ओरछा के राजा बने तब बंटवारे में राव उदयजीत सिंह को महेबा (महोबा नहीं) का जागीरदार बनाया गया, इन्ही की वंश परंपरा में चंपतराय महेबा गद्दी पर आसीन हुए।

चम्पतराय बहुत ही वीर व बहादुर थे। उन्होंने मुग़लो के खिलाफ बगावत करी हुई थी और लगातार युद्धों में व्यस्त रहते थे। चम्पतराय के साथ युद्ध क्षेत्र में रानी लालकुँवरि भी साथ ही रहती थीं और अपने पति को उत्साहित करती रहती थीं। छत्रसाल का जन्म दिनांक 04 मई 1649 ईस्वी को पहाड़ी नामक गाँव में हुआ था। गर्भस्थ शिशु छत्रसाल तलवारों की खनक और युद्ध की भयंकर मारकाट के बीच बड़े हुए। यही युद्ध के प्रभाव उनके जीवन पर असर डालते रहे और माता लालकुँवरि की धर्म व संस्कृति से संबंधित कहानियाँ बालक छत्रसाल को बहादुर बनाती रहीं।

छत्रसाल के पिता चंपतराय जब मुग़ल सेना से घिर गये तो उन्होंने अपनी पत्नी ‘रानी लाल कुंवरि’ के साथ अपनी ही कटार से प्राण त्याग दिये, किंतु मुग़लों के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।

छत्रसाल उस समय चौदह वर्ष की आयु के थे। क्षेत्र में ही उनके पिता के अनेक दुश्मन थे जो उनके खून के प्यासे थे। इनसे बचते हुए और युद्ध की कला सीखते हुए उन्होंने अपना बचपन बिताया। अपने बड़े भाई ‘अंगद राय’ के साथ वह कुछ दिनों मामा के घर रहे, किंतु उनके मन में सदैव मुग़लों से बदला लेकर पितृ ऋण से मुक्त होने की अभिलाषा थी। बालक छत्रसाल मामा के यहाँ रहता हुआ अस्त्र-शस्त्रों का संचालन और युद्ध कला में पारंगत होता रहा। अपने पिता के वचन को ही पूरा करने के लिए छत्रसाल ने पंवार वंश की कन्या ‘देवकुंवरि’ से विवाह किया। महारानी देवकुंवरि पंवार के अलावा महाराजा छत्रसाल ने कई विवाह और किये और उनकी अनेक विजातीय दासी रखतें भी थी। उनकी एक मुस्लिम दासी रखत से पुत्री की प्राप्ति हुई जिसका नाम मस्तानी था।

====छत्रपति शिवाजी से सम्पर्क और ओरंगजेब से संघर्ष=====

दस वर्ष की अवस्था तक छत्रसाल कुशल सैनिक बन गए थे। अंगद राय ने जब सैनिक बनकर राजा जयसिंह के यहाँ कार्य करना चाहा तो छोटे भाई छत्रसाल को यह सहन नहीं हुआ। छत्रसाल ने अपनी माता के कुछ गहने बेचकर एक छोटी सा सैनिक दल तैयार करने का विचार किया। छोटी सी पूंजी से उन्होंने 30 घुड़सवार और 347 पैदल सैनिकों का एक दल बनाया और मुग़लों पर आक्रमण करने की तैयारी की। 22 वर्ष की आयु में छत्रसाल युद्ध भूमि में कूद पड़े। छत्रसाल बहुत दूरदर्शी थे। उन्होंने पहले ऐसे लोगों को हटाया जो मुग़लों की मदद कर रहे थे।

सन 1668 ईस्वी में उन्होंने दक्षिण में छत्रपति शिवाजी से भेट की,शिवाजी ने उनका हौसला बढ़ाते हुए उन्हें वापस बुंदेलखंड जाकर मुगलों से अपनी मात्रभूमि स्वतंत्र कराने का निर्देश दिया,

शिवाजी ने छत्रसाल को उनके उद्देश्यों, गुणों और परिस्थितियों का आभास कराते हुए स्वतंत्र राज्य स्थापना की मंत्रणा दी एवं समर्थ गुरु रामदास के आशीषों सहित ‘भवानी’ तलवार भेंट की-

करो देस के राज छतारे

हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।

दौर देस मुग़लन को मारो

दपटि दिली के दल संहारो।

तुम हो महावीर मरदाने

करि हो भूमि भोग हम जाने।

जो इतही तुमको हम राखें

तो सब सुयस हमारे भाषें।

छत्रसाल ने वापिस अपने गृह क्षेत्र आकर मुग़लो के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत कर दी। इसमें उनको गुरु प्राणनाथ का बहुत साथ मिला। दक्षिण भारत में जो स्थान समर्थगुरु रामदास का है वही स्थान बुन्देलखंड में ‘प्राणनाथ’ का रहा है, प्राणनाथ छत्रसाल के मार्ग दर्शक, अध्यात्मिक गुरु और विचारक थे.. जिस प्रकार समर्थ गुरु रामदास के कुशल निर्देशन में छत्रपति शिवाजी ने अपने पौरुष, पराक्रम और चातुर्य से मुग़लों के छक्के छुड़ा दिए थे, ठीक उसी प्रकार गुरु प्राणनाथ के मार्गदर्शन में छत्रसाल ने अपनी वीरता से, चातुर्यपूर्ण रणनीति से और कौशल से विदेशियों को परास्त किया। .

छत्रसाल ने पहला युद्ध अपने माता-पिता के साथ विश्वासघात करने वाले सेहरा के धंधेरों से किया हाशिम खां को मार डाला और सिरोंज एवं तिबरा लूट डाले गये लूट की सारी संपत्ति छत्रसाल ने अपने सैनिकों में बाँटकर पूरे क्षेत्र के लोगों को उनकी सेना में सम्मिलित होने के लिए आकर्षित किया। कुछ ही समय में छत्रसाल की सेना में भारी वृद्धि होने लगी और उन्हेांने धमोनी, मेहर, बाँसा और पवाया आदि जीतकर कब्जे में कर लिए। ग्वालियर-खजाना लूटकर सूबेदार मुनव्वर खां की सेना को पराजित किया, बाद में नरवर भी जीता।

ग्वालियर की लूट से छत्रसाल को सवा करोड़ रुपये प्राप्त हुए पर औरंगजेब इससे छत्रसाल पर टूट-सा पड़ा। उसने सेनपति रुहल्ला खां के नेतृत्व में आठ सवारों सहित तीस हजारी सेना भेजकर गढ़ाकोटा के पास छत्रसाल पर धावा बोल दिया। घमासान युद्ध हुआ पर दणदूल्हा (रुहल्ला खां) न केवल पराजित हुआ वरन भरपूर युद्ध सामग्री छोड़कर जन बचाकर उसे भागना पड़ा।

बार बार युद्ध करने के बाद भी औरंगज़ेब छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो पाया। छत्रसाल को मालूम था कि मुग़ल छलपूर्ण घेराबंदी में सिद्धहस्त है। उनके पिता चंपतराय मुग़लों से धोखा खा चुके थे। छत्रसाल ने मुग़ल सेना से इटावा, खिमलासा, गढ़ाकोटा, धामौनी, रामगढ़, कंजिया, मडियादो, रहली, रानगिरि, शाहगढ़, वांसाकला सहित अनेक स्थानों पर लड़ाई लड़ी और मुग़लों को धूल चटाई। छत्रसाल की शक्ति निरंतर बढ़ती गयी। बन्दी बनाये गये मुग़ल सरदारों से छत्रसाल ने दंड वसूला और उन्हें मुक्त कर दिया। धीरे धीरे बुन्देलखंड से मुग़लों का एकछत्र शासन छत्रसाल ने समाप्त कर दिया।

छत्रसाल के शौर्य और पराक्रम से आहत होकर मुग़ल सरदार तहवर ख़ाँ, अनवर ख़ाँ, सहरूदीन, हमीद बुन्देलखंड से दिल्ली का रुख़ कर चुके थे। बहलोद ख़ाँ छत्रसाल के साथ लड़ाई में मारा गया और मुराद ख़ाँ, दलेह ख़ाँ, सैयद अफगन जैसे सिपहसलार बुन्देला वीरों से पराजित होकर भाग गये थे।

====राज्याभिषेक और राज्य विस्तार====

छत्रसाल के राष्ट्र प्रेम, वीरता और हिन्दूत्व के कारण छत्रसाल को भारी जन समर्थन प्राप्त था। छत्रसाल ने एक विशाल सेना तैयार कर ली जिसमे क्षेत्र के सभी राजपूत वंशो के योद्धा शामिल थे। इसमें 72 प्रमुख सरदार थे। वसिया के युद्ध के बाद मुग़लों ने भी छत्रसाल को ‘राजा’ की मान्यता प्रदान कर दी थी। उसके बाद महाराजा छत्रसाल ने ‘कालिंजर का क़िला’ भी जीता और मांधाता चौबे को क़िलेदार घोषित किया। छत्रसाल ने 1678 में पन्ना में अपनी राजधानी स्थापित की और विक्रम संवत 1744 मे योगीराज प्राणनाथ के निर्देशन में छत्रसाल का राज्याभिषेक किया गया।

छत्रसाल के गुरु प्राणनाथ आजीवन हिन्दू मुस्लिम एकता के संदेश देते रहे। उनके द्वारा दिये गये उपदेश ‘कुलजम स्वरूप’ में एकत्र किये गये। पन्ना में प्राणनाथ का समाधि स्थल है जो अनुयायियों का तीर्थ स्थल है। प्राणनाथ ने इस अंचल को रत्नगर्भा होने का वरदान दिया था। किंवदन्ती है कि जहाँ तक छत्रसाल के घोड़े की टापों के पदचाप बनी वह धरा धनधान्य, रत्न संपन्न हो गयी। छत्रसाल के विशाल राज्य के विस्तार के बारे में यह पंक्तियाँ गौरव के साथ दोहरायी जाती है-

‘इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोस छत्रसाल सों लरन की रही न काहू हौस।’

बुंदेलखंड की शीर्ष उन्नति इन्हीं के काल में हुई। छत्रसाल के समय में बुंदेलखंड की सीमायें अत्यंत व्यापक हो गई। इस प्रदेश में उत्तर प्रदेश के झाँसी, हमीरपुर, जालौन, बाँदा, मध्य प्रदेश के सागर, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, मण्डला, मालवा संघ के शिवपुरी, कटेरा, पिछोर, कोलारस, भिण्ड और मोण्डेर के ज़िले और परगने शामिल थे। छत्रसाल ने लगातार युद्धों और आपस में लूट मार से त्रस्त इस पिछड़े क्षेत्र को एक क्षत्र के निचे लाकर वहॉ शांति स्थापित की जिससे बुंदेलखंड का पहली बार इतना विकास संभव हो सका।

छत्रसाल का राज्य प्रसिद्ध चंदेल महाराजा कीर्तिवर्धन से भी बड़ा था। कई शहर भी इन्होंने ही बसाए जिनमे छतरपुर शामिल है। छत्रसाल तलवार के धनी थे और कुशल शस्त्र संचालक थे। वह शस्त्रों का आदर करते थे। लेकिन साथ ही वह विद्वानों का बहुत सम्मान करते थे और स्वयं भी बहुत विद्वान थे। वह उच्च कोटि के कवि भी थे, जिनकी भक्ति तथा नीति संबंधी कविताएँ ब्रजभाषा में प्राप्त होती हैं। इनके आश्रित दरबारी कवियों में भूषण, लालकवि, हरिकेश, निवाज, ब्रजभूषण आदि मुख्य हैं। भूषण ने आपकी प्रशंसा में जो कविताएँ लिखीं वे ‘छत्रसाल दशक’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। ‘छत्रप्रकाश’ जैसे चरितकाव्य के प्रणेता गोरेलाल उपनाम ‘लाल कवि’ आपके ही दरबार में थे। यह ग्रंथ तत्कालीन ऐतिहासिक सूचनाओं से भरा है, साथ ही छत्रसाल की जीवनी के लिए उपयोगी है। उन्होंने कला और संगीत को भी बढ़ावा दिया, बुंदेलखंड में अनेको निर्माण उन्होंने करवाए। छत्रसाल धार्मिक स्वभाव के थे। युद्धभूमि में व शांतिकाल में दैनिक पूजा अर्चना करना छत्रसाल का कार्य रहा।

====कवि भूषण द्वारा छत्रसाल की प्रशंसा====

कविराज भूषण ने शिवाजी के दरबार में रहते हुए छत्रसाल की वीरता और बहादुरी की प्रशंसा में अनेक कविताएँ लिखीं। ‘छत्रसाल दशक’ में इस वीर बुंदेले के शौर्य और पराक्रम की गाथा गाई गई है।

छत्रसाल की प्रशंसा करते हुए कवि भूषण दुविधा में पड़ गये और लिखा कि—–

“और राव राजा एक,मन में लायुं अब ,

शिवा को सराहूँ या सराहूँ छत्रसाल को”

====मुगल सेनापति बंगश का हमला और पेशवा बाजीराव का सहयोग====

महाराज छत्रसाल अपने समय के महान शूरवीर, संगठक, कुशल और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल को अपने जीवन की संध्या में भी आक्रमणों से जूझना पडा।सन 1729 में सम्राट मुहम्मद शाह के शासन काल में प्रयाग के सूबेदार बंगस ने छत्रसाल पर आक्रमण किया। उसकी इच्छा एरच, कौच, सेहुड़ा, सोपरी, जालोन पर अधिकार कर लेने की थी। छत्रसाल को मुग़लों से लड़ने में दतिया, सेहुड़ा के राजाओं ने सहयोग नहीं दिया। उनका पुत्र हृदयशाह भी उदासीन होकर अपनी जागीर में बैठा रहा। तब छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को संदेश भेजा –

‘जो गति मई गजेन्द्र की सोगति पहुंची आय

बाजी जात बुन्देल की राखो बाजीराव’

बाजीराव सेना सहित सहायता के लिये पहुंचा और उसने बंगस को 30 मार्च 1729 को पराजित कर दिया। बंगस हार कर वापिस लौट गया।

4 अप्रैल 1729 को छत्रसाल ने विजय उत्सव मनाया। इस विजयोत्सव में बाजीराव का अभिनन्दन किया गया और बाजीराव को अपना तीसरा पुत्र स्वीकार कर मदद के बदले अपने राज्य का तीसरा भाग बाजीराव पेशवा को सौंप दिया, जिस पर पेशवा ने अपनी ब्राह्मण जाति के लोगो को सामन्त नियुक्त किया।

प्रथम पुत्र हृदयशाह पन्ना, मऊ, गढ़कोटा, कालिंजर, एरिछ, धामोनी इलाका के जमींदार हो गये जिसकी आमदनी 42 लाख रू. थी।

दूसरे पुत्र जगतराय को जैतपुर, अजयगढ़, चरखारी, नांदा, सरिला, इलाका सौपा गया जिसकी आय 36 लाख थी।

बाजीराव पेशवा को काल्पी, जालौन, गुरसराय, गुना, हटा, सागर, हृदय नगर मिलाकर 33 लाख आय की जागीर सौपी गयी।

=====निधन====

छत्रसाल ने अपने दोनों पुत्रों ज्येष्ठ जगतराज और कनिष्ठ हिरदेशाह को बराबरी का हिस्सा, जनता को समृद्धि और शांति से राज्य-संचालन हेतु बांटकर अपनी विदा वेला का दायित्व निभाया।

इस वीर बहादुर छत्रसाल का 83 वर्ष की अवस्था में 13 मई 1731 ईस्वी को मृत्यु हो गयी। छत्रसाल के लिए कहावत है –

‘छत्ता तेरे राज में,

धक-धक धरती होय।

जित-जित घोड़ा मुख करे,

तित-तित फत्ते होय।’

मध्यकालीन भारत में विदेशी आतताइयों से सतत संघर्ष करने वालों में छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप और बुंदेल केसरी छत्रसाल के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, परंतु जिन्हें उत्तराधिकार में सत्ता नहीं वरन ‘शत्रु और संघर्ष’ ही विरासत में मिले हों, ऐसे बुंदेल केसरी छत्रसाल ने वस्तुतः अपने पूरे जीवनभर स्वतंत्रता और सृजन के लिए ही सतत संघर्ष किया। शून्य से अपनी यात्रा प्रारंभ कर आकाश-सी ऊंचाई का स्पर्श किया। उन्होंने विस्तृत बुंदेलखंड राज्य की गरिमामय स्थापना ही नहीं की थी, वरन साहित्य सृजन कर जीवंत काव्य भी रचे। छत्रसाल ने अपने 82 वर्ष के जीवन और 44 वर्षीय राज्यकाल में 52 युद्ध किये थे। शौर्य और सृजन की ऐसी उपलब्धि बेमिसाल है-

‘‘इत जमना उत नर्मदा इत चंबल उत टोंस।छत्रसाल से लरन की रही न काह होंस।’’

#आर्यवर्त

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लालची सेठ


 “लालची सेठ”

एक गरीब ब्राह्मण था। उसको अपनी कन्या का विवाह करना था। उसने विचार किया कि कथा करने से कुछ पैसा आ जायेगा तो काम चल जायेगा। ऐसा विचार करके उसने भगवान् राम के एक मंदिर में बैठ कर कथा आरम्भ कर दी। उसका भाव यह था कि कोई श्रोता आये, चाहे न आये पर भगवान् तो मेरी कथा सुनेंगे ! पंडित जी की कथा में थोड़े से श्रोता आने लगे।
एक बहुत कंजूस सेठ था। एक दिन वह मंदिर में आया। जब वह मंदिर कि परिक्रमा कर रहा था, तब भीतर से कुछ आवाज आई। ऐसा लगा कि दो व्यक्ति आपस में बात कर रहे हैं। सेठ ने कान लगा कर सुना, भगवान् राम हनुमान जी से कह रहे थे कि इस गरीब ब्राह्मण के लिए सौ रूपए का प्रबंध कर देना, जिससे कन्यादान ठीक हो जाये। हनुमान जी ने कहा ठीक है महाराज ! इसके सौ रूपए कल हो जायेंगे।
सेठ ने यह सुना तो वह कथा समाप्ति के बाद पंडित जी से मिले और उनसे कहा कि महाराज ! कथा में रूपए आ रहें कि नहीं ? पंडित जी बोले श्रोता बहुत कम आते हैं तो रूपए कैसे आयेंगे। सेठ ने कहा कि मेरी एक शर्त है- कथा में जितना पैसा आये वह मेरे को दे देना और मैं आप को पचास रूपए दे दूँगा। पंडित जी ने सोचा कि उसके पास कौन से इतने पैसे आते हैं पचास रूपए तो मिलेंगे, पंडित जी ने सेठ कि बात मान ली। उन दिनों पचास रूपए बहुत सा धन होता था। इधर सेठ कि नीयत थी कि भगवान् कि आज्ञा का पालन करने हेतु हनुमान जी सौ रूपए पंडित जी को जरूर देंगे। मुझे सीधे-सीधे पचास रूपए का फायदा हो रहा है। जो लोभी आदमी होते हैं वे पैसे के बारे में ही सोचते हैं। सेठ ने भगवान् जी कि बातें सुनकर भी भक्ति कि और ध्यान नहीं दिया बल्कि पैसे कि और आकर्षित हो गए।
अब सेठ जी कथा के उपरांत पंडित जी के पास गए और उनसे कहने लगे कि कितना रुपया आया है। सेठ के मन विचार था कि हनुमान जी सौ रूपए तो भेंट में जरूर दिलवाएंगे। मगर पंडित जी ने कहा कि पांच सात रूपए ही आये हैं। अब सेठ को शर्त के मुताबिक पचास रूपए पंडित जी को देने पड़े।
सेठ को हनुमान जी पर बहुत ही गुस्सा आ रहा था कि उन्हों ने पंडित जी को सौ रूपए नहीं दिए। वह मंदिर में गया और हनुमान जी कि मूर्ति पर घूँसा मारा। घूँसा मारते ही सेठ का हाथ मूर्ति पर चिपक गया। अब सेठ जोर लगाये अपना हाथ छुड़ाने के लिए पर नाकाम रहा हाथ हनुमान जी कि पकड़ में ही रहा। हनुमान जी किसी को पकड़ लें तो वह कैसे छूट सकता है। सेठ को फिर आवाज सुनाई दी। उसने ध्यान से सुना, भगवान् हनुमान जी से पूछ रहे थे कि तुमने ब्राह्मण को सौ रूपए दिलाये कि नहीं ? हनुमान जी ने कहा ‘महाराज पचास रूपए तो दिला दिए हैं, बाकी पचास रुपयों के लिए सेठ को पकड़ रखा है। ये पचास रूपए दे देगा तो छोड़ देंगे’। सेठ ने सुना तो विचार किया कि मंदिर में लोग आकर मेरे को देखेंगे तो बड़ी बेईज्जती होगी, वह चिल्लाकर बोला- ‘हनुमान जी महाराज ! मेरे को छोड़ दो, मैं पचास रूपय दे दूँगा।’ हनुमान जी ने सेठ को छोड़ दिया। सेठ ने जाकर पंडित जी को पचास रूपए दे दिए।
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“जय श्री राम”
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Posted in હાસ્ય કવિતા

लाचार प्रिये


” लाचार प्रिये “
करूँ मेहनत पर लाचार प्रिये,
पुरा लुटता तुझपे पगार प्रिये,
एक छोटा रखता कार प्रिये,
क्यूँ कहती मुझे बेकार प्रिये,

दिखे शक्ति की अवतार प्रिये,
तेरे दर्शन को लाचार प्रिये,
क्यूँ मारे नजर से वार प्रिये,
कभी ‘प्यारे’ कह एकबार प्रिये,

तेरे नैन नशीलेदार प्रिये,
दुश्मन भी जाए हार प्राये,
कहूँ मृगनयनी हुँकार प्रिये,
भले रोके मुझे सरकार प्रिये,

अब मिलके चले घर – बार प्रिये,
घर बन जाए गुलजार प्रिये,
मुझे धन की नहीं दरकार प्रिये,
बस ! मिल जाए तेरा प्यार प्रिये,

अब प्रिये क्या कहती है…..।

तुम ठग, फरेब, फनकार प्रिये,
मेरे क्रोध को न ललकार प्रिये,
तुम झुठों का सरदार प्रिये,
तभी लड़ती मैं हरबार प्रिये,

क्यूँ बच्चे खाते मार प्रिये,
मिलता हरपल फटकार प्रिये,
पड़े रहते लिए डकार प्रिये,
सिर्फ मेरा है परिवार प्रिये !

चलो माफ किया इसबार प्रिये,
करूँ प्रेम का अब इजहार प्रिये,

खड़ी रहती किये श्रृँगार प्रिये,
नाम तेरा जपूँ सौ बार प्रिये,
कहे चूड़ियों की खनकार प्रिये,
कब आओगे घर – द्वार प्रिये,

जुड़े मन से मन की तार प्रिये,
तेरे बिन सूना संसार प्रिये,
क्यूँ मारे जुबाँ से वार प्रिये,
जरा प्यार से देख एकबार प्रिये,

बस प्रेम में है संसार प्रिये,
बस प्रेम में है संसार प्रिये,…..

ब्रज बिहारी सिंह
हिनू, राँची, झारखण्ड

Posted in प्रेरणात्मक - Inspiration

ભગવાન નો ભાગ


નાનપણમાં બોરાં વીણવા જતા.
કાતરા પણ વીણતા.
કો’કની વાડીમાં ઘૂસી ચીભડાં ચોરતા.
ટેટા પાડતા.
બધા ભાઇબંધોપોતાનાં ખિસ્સામાંથી
ઢગલી કરતા ને ભાગ પાડતા-
-આ ભાગ ટીંકુનો.
-આ ભાગ દીપુનો.
-આ ભાગ ભનિયાનો, કનિયાનો…
છેવટે એક વધારાની ઢગલી કરી કહેતા-
‘આ ભાગ ભગવાનનો !’

સૌ પોતપોતાની ઢગલી
ખિસ્સામાં ભરતા,
ને ભગવાનની ઢગલી ત્યાં જ મૂકી
રમવા દોડી જતા.

ભગવાન રાતે આવે, છાનામાના
ને પોતાનો ભાગ ખાઇ જાય-એમ અમે કહેતા.

પછી મોટા થયા.
બે હાથે ઘણું ય ભેગું કર્યું ;
ભાગ પાડ્યા-ઘરના, ઘરવખરીના,
ગાય, ભેંસ, બકરીના.
અને ભગવાનનો ભાગ જુદો કાઢ્યો ?

રબીશ ! ભગવાનનો ભાગ ?
ભગવાન તે વળી કઇ ચીજ છે ?

સુખ, ઉમંગ, સપનાં, સગાઇ, પ્રેમ-
હાથમાં ઘણું ઘણું આવ્યું…

અચાનક ગઇ કાલે ભગવાન આવ્યા;
કહે : લાવ, મારો ભાગ…

મેં પાનખરની ડાળી જેવા
મારા બે હાથ જોયા- ઉજ્જ્ડ.
એકાદ સુકું તરણું યે નહીં.
શેના ભાગ પાડું ભગવાન સાથે ?
આંખમાં ઝળઝળિયાં આવ્યાં,
તે અડધાં ઝળઝળિયાં આપ્યાં ભગવાનને.

વાહ !- કહી ભગવાન મને અડ્યા,
ખભે હાથ મૂક્યો,
મારી ઉજ્જ્ડતાને પંપાળી,
મારા ખાલીપાને ભરી દીધો અજાણ્યા મંત્રથી.

તેણે પૂછ્યું : ‘કેટલા વરસનો થયો તું’
‘પચાસનો’ હું બોલ્યો
’અચ્છા…’ ભગવાન બોલ્યા : ‘૧૦૦ માંથી
અડધાં તો તેં ખરચી નાખ્યાં…
હવે લાવ મારો ભાગ !’
ને મેં બાકીનાં પચાસ વરસ
ટપ્પ દઇને મૂકી દીધાં ભગવાનના હાથમાં !
ભગવાન છાનામાના રાતે એનો ભાગ ખાય.

હું હવે તો ભગવાનનો ભાગ બની પડ્યો છું અહીં.
જોઉં છું રાહ-
કે ક્યારે રાત પડે
ને ક્યારે આવે છાનામાના ભગવાન
ને ક્યારે આરોગે ભાગ બનેલા મને
ને ક્યારે હું ભગવાનનાં મોંમાં ઓગળતો ઓગળતો…

– રમેશ પારેખ