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खण्डवा में एक चर्चित दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर


खण्डवा में एक चर्चित दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब दोस्त-यार आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की बुजुर्ग स्त्री पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई।

उनकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी। नेत्र भीतर को धंसे हुए किन्तु सजल थे। उनको देखकर मन मे न जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया,

“दादी लस्सी पियोगी ?”

मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक। क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 25 रुपए की एक है। इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी दादी के द्वारा मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी।

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए। मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा,

“ये किस लिए?”

“इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी !”

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था… रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी।

एकाएक मेरी आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा… उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गई।

अब मुझे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका।

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे…..कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये… लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी…..

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम सब मित्रों और बूढ़ी दादी के हाथों मे आते ही मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पास ही जमीन पर बैठ गया क्योंकि ऐसा करने के लिए तो मैं स्वतंत्र था…इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती थी… हां! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा… लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा,

“ऊपर बैठ जाइए साहब! मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं किन्तु इंसान कभी-कभार ही आता है।”

अब सबके हाथों मे लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर सहज मुस्कुराहट थी, बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आंखों मे तृप्ति के आंसू, होंठों पर मलाई के कुछ अंश और दिल में सैकड़ों दुआएं थीं।

न जानें क्यों जब कभी हमें 10-20 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उसपर खर्च करने होते हैं तो वो हमें बहुत ज्यादा लगते हैं लेकिन सोचिए कि क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं?

क्या कभी भी उन रुपयों को बीयर , सिगरेट ,पर खर्च कर ऐसी दुआएं खरीदी जा सकती हैं?

जब कभी अवसर मिले ऐसे दयापूर्ण और करुणामय काम करते रहें भले ही कोई अभी आपका साथ दे या ना दे, समर्थन करे ना करें। सच मानिए इससे आपको जो आत्मिक सुख मिलेगा वह अमूल्य है।

क्या आप सहमत हैं मेरी बातों से

हँस जैन खण्डवा
9827214427

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मुट्ठी भर लोग!


मुट्ठी भर लोग! :
साहस पर कहानी

हर साल गर्मी की छुट्टियों में नितिन अपने दोस्तों के साथ किसी पहाड़ी इलाके में माउंटेनियरिंग के लिए जाता था. इस साल भी वे इसी मकसद से ऋषिकेश पहुंचे.

गाइड उन्हें एक फेमस माउंटेनियरिंग स्पॉट पर ले गया. नितिन और उसके दोस्तों ने सोचा नहीं था कि यहाँ इतनी भीड़ होगी. हर तरफ लोग ही लोग नज़र आ रहे थे.

एक दोस्त बोला, ” यार यहाँ तो शहर जैसी भीड़ है…यहाँ चढ़ाई करने में क्या मजा??”

“क्या कर सकते हैं… अब आ ही गए हैं तो अफ़सोस करने से क्या फायदा…चलो इसी का मजा उठाते हैं…”, नितिन ने जवाब दिया.

सभी दोस्त पर्वतारोहण करने लगे और कुछ ही समय में पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गए.

वहां पर पहले से ही लोगों का तांता लगा हुआ था. दोस्तों ने सोचा चलो अब इसी भीड़ में दो-चार घंटे कैम्पिंग करते हैं और फिर वापस चलते हैं. तभी नितिन ने सामने की एक चोटी की तरफ इशारा करते हुए कहा, “रुको-रुको… ज़रा उस चोटी की तरफ भी तो देखो… वहां तो बस मुट्ठी भर लोग ही दिख रहे हैं… कितना मजा आ रहा होगा… क्यों न हम वहां चलें.”

“वहां!”, एक दोस्त बोला, “अरे वहां जाना सबके बस की बात नहीं है… उस पहाड़ी के बारे में मैंने सुना है, वहां का रास्ता बड़ा मुश्किल है और कुछ लकी लोग ही वहां तक पहुँच पाते हैं.”

बगल में खड़े कुछ लोगों ने भी नितिन का मजाक उड़ाते हुए कहा,” भाई अगर वहां जाना इतना ही आसान होता तो हम सब यहाँ झक नहीं मार रहे होते!”

लेकिन नितिन ने किसी की बात नहीं सुनी और अकेला ही चोटी की तरफ बढ़ चला. और तीन घंटे बाद वह उस पहाड़ी के शिखर पर था.

वहां पहुँचने पर पहले से मौजूद लोगों ने उसका स्वागत किया और उसे एंकरेज किया.

नितिन भी वहां पहुँच कर बहुत खुश था अब वह शांति से प्रकृति की ख़ूबसूरती का आनंद ले सकता था.

जाते-जाते नितिन ने बाकी लोगों से पूछा,”एक बात बताइये… यहाँ पहुंचना इतना मुश्किल तो नहीं था, मेरे ख़याल से तो जो उस भीड़-भाड़ वाली चोटी तक पहुँच सकता है वह अगर थोड़ी सी और मेहनत करे तो इस चोटी को भी छू सकता है…फिर ऐसा क्यों है कि वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ है और यहाँ बस मुट्ठी भर लोग?”

वहां मौजूद एक वेटरन माउंटेनियर बोला, “क्योंकि ज्यादातर लोग बस उसी में खुश हो जाते हैं जो उन्हें आसानी से मिल जाता…वे सोचते ही नहीं कि उनके अन्दर इससे कहीं ज्यादा पाने का पोटेंशियल है… और जो थोड़ा पाकर खुश नहीं भी होते वे कुछ अधिक पाने के लिए रिस्क नहीं उठाना चाहते… वे डरते हैं कि कहीं ज्यादा के चक्कर में जो हाथ में है वो भी ना चला जाए… जबकि हकीकत ये है कि अगली चोटी या अगली मंजिल पाने के लिए बस जरा से और एफर्ट की ज़रुरत पड़ती है! पर साहस ना दिखा पाने के कारण अधिकतर लोग पूरी लाइफ बस भीड़ का हिस्सा ही बन कर रह जाते हैं… और साहस दिखाने वाली उन मुट्ठी भर लोगों को लकी बता कर खुद को तसल्ली देते रहते हैं.”

Friends, अगर आप आज तक वो अगला साहसी कदम उठाने से खुद को रोके हुए हैं तो ऐसा मत करिए क्योंकि-

अगली चोटी या अगली मंजिल पाने के लिए बस जरा से और एफर्ट की ज़रुरत पड़ती है!

खुद को उस effort को करने से रोकिये मत … थोडा सा साहस… थोड़ी सी हिम्मत आपको भीड़ से निकाल कर उन मुट्ठी भर लोगों में शामिल कर सकती है जिन्हें दुनिया lucky कहती है.

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एक पुरानी कथा इस समय के लिए आज भी बिल्कुल प्रसांगिक है


मोहनलाल जैन

एक पुरानी कथा इस समय के लिए आज भी बिल्कुल प्रसांगिक है

एक राजा को राज भोगते काफी समय हो गया था। बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया । उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया ।
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राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें । सारी रात नृत्य चलता रहा । ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी । नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है और तबले वाले को सावधान करना ज़रूरी है, वरना राजा का क्या भरोसा दंड दे दे । तो उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा –
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“बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताई ।
एक पल के कारने, ना कलंक लग जाए ।”
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अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरूप अर्थ निकाला । तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा ।
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जब यह दोहा गुरु जी ने सुना तो गुरु जी ने सारी मोहरें उस नर्तकी को अर्पण कर दीं ।
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दोहा सुनते ही राजा की लड़की ने भी अपना नौलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया ।
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दोहा सुनते ही राजा के पुत्र युवराज ने भी अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया ।

राजा बहुत ही अचिम्भित हो गया ।
सोचने लगा रात भर से नृत्य चल रहा है पर यह क्या! अचानक एक दोहे से सब अपनी मूल्यवान वस्तु बहुत ही ख़ुश हो कर नर्तिकी को समर्पित कर रहें हैं।

राजा सिंहासन से उठा और नर्तकी को बोला “एक दोहे द्वारा एक सामान्य नर्तिका होकर तुमने सबको लूट लिया ।”
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जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे – “राजा ! इसको नीच नर्तिकी मत कहो, क्योंकि इसने दोहे से सभी की आँखें खोल दी हैं । दोहे से यह कह रही है कि मैं सारी उम्र जंगलों में भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई ! मैं तो चला ।” यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े ।
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राजा की लड़की ने कहा – “पिता जी ! मैं जवान हो गयी हूँ । आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । लेकिन इस नर्तकी के दोहे ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही । क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है ?”
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युवराज ने कहा – “पिता जी ! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देना था । लेकिन इस नर्तकी के दोहे ने समझाया कि पगले ! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है । धैर्य रख ।”
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जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया । राजा के मन में वैराग्य आ गया । राजा ने तुरन्त फैंसला लिया – “क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ ।” फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा – “पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं । तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रूप में चुन सकती हो ।” राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया ।
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यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा -“मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी ?”
उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया । उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा नृत्य बन्द करती हूँ और कहा कि “हे प्रभु ! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना । बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करूँगी ।”

Same implements on us at this lockdown
“बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताई ।
एक पल के कारने, ना कलंक लग जाए ।”*
आज इस दोहे को यदि हम #कोरोना को लेकर अपनी समीक्षा करके देखे तो हमने पिछले 22 तारीख से जो संयम बरता, परेशानियां झेली ऐसा न हो कि हमारी अंतिम क्षण में एक छोटी सी भूल, हमारी लापरवाही, हमारे साथ पूरे समाज को न ले बैठे।
आओ हम सब मिलकर कोरोना से संघर्ष करे , घर पर रह सुरक्षित रहें व सावधानियों का विशेष ध्यान रखें।👍🙏🙏🙏🙏

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आखिर कौन थी वीरमदेव की प्रेयसी फिरोजा…!!!


आखिर कौन थी वीरमदेव की प्रेयसी फिरोजा…!!!

जालौर की धरती, इस पर बना हुआ स्वर्णगिरी का दुर्ग, इस पर स्थित वीरमदेव की चौकी, जिसका एक अनूठा ही इतिहास है। वीरमदेव का नाम भारत के इतिहास में महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी के साथ लिखा जाना चाहिए था। परन्तु काल की विडम्बना देखिए कि जिस समय हिन्दू राजा डोले मुजरे के लिए तथा विवाह सम्बन्धों के लिए दिल्ली जाते रहे, वीरमदेव ने दिल्ली का डोला अस्वीकार किया और एक इतिहास रच डाला।

आपने “फिरोजा” नाम सुना होगा..?? शायद नही सुना होगा, क्योंकि हमारे वामपंथी इतिहासकार ये सब चीजे आपके समक्ष नही रखते है, क्योंकि उनका एजेंडा फिर पूरा नही होगा। चाहे वो अलाउद्दीन खिलजी हो या हो औरंगजेब, इन सभी की पुत्रियों को हिन्दू राजकुमारों से ही प्रेम था और कई मुस्लिम राजकुमारियों ने तो इसी कारण आत्महत्या भी की थी। फिरोजा का भी एकतरफा प्यार था, वो वीरमदेव से शादी करना चाहती थी। वीरमदेव की ख्याति उन दिनों चारो ओर फैली थी।

“सोनगरा वंको क्षत्रिय अणरो जोश अपार
झेले कुण अण जगत में वीरम री तलवार”

1298 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति अलगू खां और नसरत खां ने गुजरात विजय अभियान किया। उन्होंने जालौर के राजा कान्हड़ देव से जालौर राज्य से होकर गुजरात जाने का रास्ता मांगा, परन्तु कान्हड़ देव ने यह कहकर मना कर दिया कि आप विदेशी और विधर्मी हैं। इस उत्तर से अलाउद्दीन खिलजी नाराज हो गया। परन्तु उसके लिए पहले गुजरात जीतना अनिवार्य था। अत: उसकी तुर्की मुस्लिम सेना गुजरात की तरफ़ बढ़ गई। उसकी सेना ने सोमनाथ के मंदिर को तोड़कर वँहा बहुत कत्लेआम मचाया। सोमनाथ मन्दिर को खंडित कर गुजरात से लौटती अलाउद्दीन खिलजी की सेना पर जालौर के शासक कान्हड़ देव चौहान ने पवित्र शिवलिंग शाही सेना से छीनकर जोकि गाय की खाल में भरकर लाया जा रहा था, जालौर की भूमि पर स्थापित करने के उदेश्य से सरना गांव में डेरा डाले शाही सेना पर भीषण हमला कर पवित्र शिवलिंग प्राप्त कर लिया और शास्त्रोक्त रीति से सरना गांव में ही प्राण प्रतिष्ठित कर दिया।

वीरमदेव के मल्लयुद्ध की शोहरत और व्यक्तित्व के बारे में सुनकर दिल्ली के तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी की पुत्री शहजादी फिरोजा का दिल वीरमदेव पर आ गया और शहजादी ने किसी भी कीमत पर उससे शादी करने की जिद पकड़ ली और मन ही मन उसे अपना पति भी मान लिया था।

“वर वरूं वीरमदेव ना तो रहूंगी अकन कुंवारी”

अर्थात, विवाह करूंगी तो वीरमदेव से नहीं तो अक्षत कुंवारी रहूंगी।

बेटी की जिद को देखकर, अपनी हार का बदला लेने और राजनैतिक फायदा उठाने का विचार कर अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी बेटी के लिए जालौर के राजकुमार को प्रणय प्रस्ताव भेजा। कहते हैं कि वीरमदेव ने यह कहकर प्रस्ताव ठुकरा दिया…

“मामो लाजे भाटियां, कुल लाजे चौहान,
जे मैं परणु तुरकणी, तो पश्चिम उगे भान”

अर्थात, अगर मैं तुरकणी से शादी करूं तो मामा (भाटी) कुल और स्वयं का चौहान कुल लज्जित हो जाएंगे और ऐसा तभी हो सकता है जब सूरज पश्चिम से उगे।

इस जवाब से आगबबूला होकर अलाउद्दीन ने युद्ध का ऐलान कर दिया। कहते हैं कि एक वर्ष तक तुर्कों की सेना जालौर पर घेरा डालकर बैठी रही फिर युद्ध हुआ और किले की हजारों राजपूतानियों ने जौहर किया। स्वयं वीरमदेव ने 22 वर्ष की अल्पायु में ही युद्ध में वीरगति पाई।

शाही सेना पर गुजरात से लौटते समय हमला और अब वीरमदेव द्वारा शहजादी फिरोजा के साथ विवाह का प्रस्ताव ठुकराने के कारण खिलजी ने जालौर रोंदने का निश्चय कर एक बड़ी सेना जालौर रवाना की। जिसे सिवाना के पास जालौर के कान्हड़ देव और सिवाना के शासक सातलदेव ने मिलकर एक साथ आक्रमण कर परास्त कर दिया। इस हार के बाद भी खिलजी ने सेना की कई टुकडियाँ जालौर पर हमले के लिए रवाना की और यह क्रम पाँच वर्ष तक चलता रहा। लेकिन खिलजी की सेना जालौर के राजपूत शासक को नही दबा पाई। आख़िर जून 1308 में ख़ुद खिलजी एक बड़ी सेना के साथ जालौर के लिए रवाना हुआ। पहले उसने सिवाना पर हमला किया और एक विश्वासघाती के जरिये सिवाना दुर्ग के सुरक्षित जल भंडार में गौ-रक्त डलवा दिया। जिससे वहां पीने के पानी की समस्या खड़ी हो गई। अतः सिवाना के शासक सातलदेव ने अन्तिम युद्ध का ऐलान कर दिया। जिसके तहत उनकी रानियों ने अन्य क्षत्रिय स्त्रियों के साथ जौहर किया व सातलदेव आदि वीरों ने शाका कर अन्तिम युद्ध में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।

इस युद्ध के बाद खिलजी अपनी सेना को जालौर दुर्ग रोंदने का हुक्म दे खुद दिल्ली आ गया। उसकी सेना ने मारवाड़ में कई जगह लूटपाट व अत्याचार किये। सांचोर के प्रसिद्ध जय मन्दिर के अलावा कई मंदिरों को खंडित किया। इस अत्याचार के बदले कान्हड़ देव ने कई जगह शाही सेना पर आक्रमण कर उसे शिकस्त दी और दोनों सेनाओ के मध्य कई दिनों तक मुठभेड़ चलती रही। आखिर खिलजी ने जालौर जीतने के लिए अपने बेहतरीन सेनानायक कमालुद्दीन को एक विशाल सेना के साथ 1310 ई. में जालौर भेजा जिसने जालौर दुर्ग के चारों और सुद्रढ़ घेरा डाल युद्ध किया लेकिन अथक प्रयासों के बाद भी कमालुद्दीन जालौर दुर्ग नही जीत सका और अपनी सेना वापस लेकर लौटने लगा। तभी कान्हड़ देव का अपने एक सरदार विका से कुछ मतभेद हो गया और विका ने जालौर से लौटती खिलजी की सेना को जालौर दुर्ग के असुरक्षित और बिना किलेबंदी वाले हिस्से का गुप्त भेद दे दिया। विका के इस विश्वासघात का पता जब उसकी पत्नी को लगा तो उसने अपने पति को जहर देकर मार डाला। इस तरह जो काम खिलजी की सेना कई वर्षो तक नही कर सकी, वह एक विश्वासघाती की वजह से चुटकियों में हो गया और जालौर पर खिलजी की सेना का कब्जा हो गया।

खिलजी की सेना को भारी पड़ते देख 1311 ई. में कान्हड़ देव ने अपने पुत्र वीरमदेव को गद्दी पर बैठा स्वयं अन्तिम युद्ध करने का निश्चय किया। जालौर दुर्ग में उसकी रानियों के अलावा अन्य समाज की औरतों ने जौहर की ज्वाला प्रज्वलित कर जौहर किया। तत्पश्चात कान्हड़ देव ने शाका कर अन्तिम दम तक युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की। कान्हड़ देव के वीरगति प्राप्त करने के बाद वीरमदेव ने युद्ध की बागडोर संभाली। वीरमदेव का शासक के रूप में साढ़े तीन वर्ष का कार्यकाल युद्ध में ही बिता। आख़िर वीरमदेव की रानियाँ भी जालौर दुर्ग को अन्तिम प्रणाम कर जौहर की ज्वाला में कूद पड़ी और वीरमदेव ने भी शाका करने हेतु दुर्ग के दरवाजे खुलवा शत्रु सेना पर टूट पड़ा और भीषण युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। वीरमदेव के वीरगति को प्राप्त होने के बाद शाहजादी फिरोजा की धाय सनावर जो इस युद्ध में सेना के साथ आई थी, वीरमदेव का मस्तक काट कर सुगन्धित पदार्थों में रख कर फिरोजा के पास ले गई। कहते हैं कि जब वीरमदेव का मस्तक स्वर्ण थाल में रखकर फिरोजा के सम्मुख लाया गया तो मस्तक दूसरी ओर घूम गया, तब फिरोजा ये कहते हुए वीरमदेव का कटा सिर गोद में लेकर, हिन्दू सुहागिन का भेष धारण कर वीरमदेव की चिता पर सती हो गई।

“तज तुरकाणी चाल हिंदूआणी हुई हमें,
भो-भो रा भरतार, शीश न धूण सोनीगरा”

अथार्त, सोनगरे के सरदार तू अपना सिर मत घुमा, तू मेरे जन्म-जन्मांतर का भरतार है। आज मैं तुरकणी से हिन्दू बन गई और अब अपना मिलन अग्नि की ज्वाला में होगा।

आज भी जालौर की सोनगरा की पहाड़ियों पर स्थित पुराने किले में फिरोजा का समाधि स्थल है, जिसे फिरोजा की छतरी के नाम से जाना जाता है।

संदर्भ श्रोत : कान्हड़ देव प्रबंध

Contributed by Sachin Tyagi.

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अब्दुल हमीद


🥺अब्दुल हमीद भी फर्जी निकला🥺

कोंग्रेस की घटिया करतूत का एक और हसीन पल 🤔
पढ़िये पूरा आंखे खोल देने वाला सच

1965 के युद्ध का झूठा इतिहास
ध्यान से और लगन से पढें. .
मुस्लिम सैनिकों की गहरी साजिश का खुलासा???

हमें इतिहास में पढाया गया कि अब्दुल हमीद ने पैटन टैंक उड़ाए थे, जबकि ये सरासर झूठ है, और कांग्रेस का हिन्दुओं से एक और विश्वासघात है…!

हरियाणा निवासी भारतीय फौज के बहादुर सिपाही चंद्रभान साहू ने पैटन टैंक को उड़ाया था, ना कि किसी अब्दुल हमीद ने…!
परमवीर चक्र भी उसी हिंदू सैनिक चंद्रभान साहू ने जीता था ना कि किसी अब्दुल हमीद ने…!

बात सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध की है…
जब अमेरिका द्वारा प्राप्त अत्याधुनिक पैटन टैंकों के बूते पाकिस्तान अपनी जीत को पक्का मान रहा था, और भारतीय सेना इन टैंकों से निपटने के लिये चिंतित थी…
भारतीय सेना के सामने, भारतीय सेना ने ही एक मुसिबत खडी कर दी।
युद्ध के वक़्त भारतीय सेना की मुस्लिम बटालियन के अधिकांश मुस्लिम सैनिकों द्वारा पाकिस्तान के खेमे में चले जाने व बाकी मुस्लिम सैनिकों द्वारा उसके समर्थन में हथियार डाले जाने से भारतीय खेमे में आत्मविश्वास की बेहद कमी व घोर निराशा थी…
.
उस घोर निराशा व बेहद चिंताजनक स्थिति के वक़्त आशा की किरण व पूरे युध्द का महानायक बनकर आया था, भारतीय सेना का एक बीस वर्षीय नौजवान, सैनिक चंद्रभान साहू…(पूरा पता– चंद्रभान साहू सुपुत्र श्री मौजीराम साहू, गांव रानीला, जिला भिवानी, वर्तमान जिला चरखी दादरी, हरियाणा).
..
रानीला गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि सैनिक चंद्रभान साहू का शव बेहद क्षत-विक्षत व टुकड़ों में था। शव के साथ आये सैनिक व अधिकारी अश्रुपूर्ण आंखों से उसकी अमर शौर्यगाथा सुना रहे थे कि किस तरह एक के बाद एक उसने अकेले पांच पैटन टैंक नष्ट कर दिये थे। इसमें बुरी तरह घायल हो चुके थे, और उन्हें जबरन एक तरफ लिटा दिया गया था कि आप पहले ही बहुत बड़ा कार्य कर चुके हैं, अब आपको ट्रक आते ही अन्य घायलों के साथ अस्पताल भेजा जायेगा। लेकिन सैनिक चंद्रभान साहू ये कहते हुए उठ खड़े हुए कि मैं एक तरफ लेटकर युद्ध का तमाशा नहीं देख सकता, घर पर माता-पिता की बुढ़ापे में सेवा के लिये और भाई हैं, मैं अन्तिम सांस तक लडूंगा, और दुश्मन को अधिकतम हानि पहुँचाऊँगा…
कोई हथियार न दिये जाने पर साक्षात महाकाल का रूप धारण कर सबके मना करते करते भी अभूतपूर्व वीरता व साहस दिखाते हुए एंटी टैंक माइन लेकर पास से गुजरते टैंक के नीचे लेटकर छठा टैंक ध्वस्त कर युद्ध में प्राणों का सर्वोच्च बलिदान कर दिया…
उनके इस सर्वोच्च व अदभुत बलिदान ने भारतीय सेना में अपूर्व जोश व आक्रोश भर दिया था व उसके बाद हर जगह पैटन टैंकों की कब्र खोद दी गई। ग्रामीणों ने नई पीढ़ी को प्रेरणा देने के लिये दशकों तक उसका फोटो व शौर्यगाथा रानीला गांव के बड़े स्कूल में टांग कर रखी और आज भी स्कूल में उनका नाम लिखा हुआ बताते हैं…
बार्डर फिल्म में जो घायल अवस्था में सुनील शेट्टी वाला एंटी-टैंक माइन लेकर टैंक के नीचे लेटकर टैंक उड़ाने का दृश्य है, वो सैनिक चंद्रभान साहू ने वास्तव में किया था। ऐसे रोम रोम से राष्ट्रभक्त महायोद्धा सिर्फ भारतभूमि पर जन्म ले सकते हैं…
मुस्लिम रेजिमेंट द्वारा पाकिस्तान का समर्थन करने से मुस्लिमों की हो रही भयानक किरकिरी को रोकने व मुस्लिमों की छवि ठीक रखने के लिये इंदिरा गाँधी की कांग्रेस सरकार ने परमवीर चंद्रभान साहू की अनुपम वीरगाथा को पूरे युद्ध के एकमात्र मुस्लिम मृतक अब्दुल हमीद के नाम से अखबारों में छपवा दिया व रेडियो पर चलवा दिया, और अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र दे दिया व इसका असली अधिकारी सैनिक चंद्रभान साहू गुमनामी के अंधेरे में खो गया…!!!
ऐसे ही अनेक काम कांग्रेस ने पिछले 75 सालों में हर क्षेत्र में किये, जिनका खुलासा होना बाकी है।

शेयर करते रहिए पता नही राष्ट्र से जुड़े कितने रहस्य अभी उजागर होने बाकी है।

जय श्री राम
जय हिंद
वन्देमातरम