Posted in संस्कृत साहित्य

मृत्यु भय


देवी सिंग तोमर

।।श्रीगणेशाय नमः।।

शरीर को वस्त्र मानने से मृत्यु के भय का विनाश ?

मैनें अपने क्षेत्र
में वृद्ध लोगों के मुँह से नाग और नागिन के कामदेव के वश में होने की एक किवदन्ती सुनी है।
बुजुर्गों का कहना है कि जब नाग और नागिन काम वश होकर आपस में एक दूसरे से प्रेम करते हैं उस अवस्था में उन्हें यदि कोई देख ले तो सर्प उस व्यक्ति के पीछे उसे डसने के लिए भागता है सर्प को 84 लाख योनियों में सबसे ज्यादा क्रोधी स्वभाव का माना गया है।ऐसी अवस्था में तो और भी उसका क्रोध बढ़ जाता है उस समय उससे बचने का केवल एक ही उपाय है भागता हुआ व्यक्ति अपने उत्तरीय वस्त्र अर्थात् शरीर से कोई कपड़ा उतार कर फेंक दे तो सर्प उस वस्त्र को व्यक्ति समझकर उससे लिपटकर बार-बार काटता है, तबतक मनुष्य भाग जाता है। ये बात उन लोगों ने मुझे बताई जिनके साथ ऐसा हुआ। अब ये भले ही मिथ्या क्यों न हो परन्तु इस दृष्टांत से वेदान्त-दर्शन का सिद्धान्त बहुत ज्यादा सिद्ध होता है क्योंकि काल की हमारे ग्रन्थों ने सर्प से तुलना की है।
रामचरितमानस में–

काल व्याल कर भक्षक जोई

श्रीमद्भागवत महापुराण में–

काल व्याल मुख ग्रास त्रास निर्णास हेतवे

इस प्रकार अन्य शास्त्रों में भी काल को भयंकर ब्याल बताया है। अब असली सिद्धान्त पर विचार करें। काल रूपी सर्प हर प्राणी के पीछे भाग रहा है। उससे बचने का क्या उपाय किया जाये बस यही उपाय सर्वश्रेष्ठ है जैसे भागते हुए व्यक्ति ने वस्त्र उतार के पीछे फेंक दिया उसी प्रकार आप भी अपने शरीर रूपी वस्त्र को अनित्य, असत्य, मरणधर्मा समझकर काल को समर्पित कर दो तो आपका आत्मा जो कभी मरता नहीं बेदाग बच जायेगा। जो हमें मरने का भय लगा है वह सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।
यही वेदान्त का अटल सिद्धान्त है।

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