Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

रतलाम का इतिहास


पं. अभिषेक जोशी

रतलाम का इतिहास अपने आप में कई गौरव को समेटे हुए हैं उसकी कीर्ति पताका को महाराजा रतन सिंह के वंशजों ने काफी समय तक फहराया लेकिन नियति की व्यवस्था के आगे सबको झुकना पड़ता है उसी क्रम में महाजन सज्जन सिंह जी के कार्यकाल में ही रतलाम षडयंत्रों के घेरे में आ चुका था। पं.महादेव जी पाठक व पं. गणेश लाल जी जोशी (मेरे पड़ दादाजी) को ज्योतिषीय सलाहकार पद से हटा दिया गया।
इतना ही नहीं अपितु इतिहास को भी गुमराह किया गया महाजन सज्जन सिंह जी की चार नहीं बल्कि पांच संताने थी। सबसे बड़ी राजकुमारी गुलाब कुंवर जी के बाद रतन कुमार बाईसा का जन्म हुआ रतनकुंवर बाई सा को
महाराजा सज्जन सिंह बहुत प्यार करते थे 9 नवंबर 1927 को रतलाम को अपना उत्तराधिकारी लोकेंद्र सिंह जी के रूप में प्राप्त हुआ तब कई धार्मिक आयोजन महाराजा सज्जन सिंह जी ने आरम्भ कर दिये।
यह क्रम 1935 तक चला किन्तु इसी क्रम में षडयंत्रो ज्वार अपने यौवन पर था और कुछ कथित निकटस्थ जनों के द्वारा 1935 में कालिका माता पर एक यज्ञ का आयोजन करवाया गया पंडितों ने यज्ञ का मुहूर्त निकाला और तैयारियां आरंभ कर दी उस समय के राजवैद्य रामविलास जी सज्जन सिंहजी को यज्ञ के मुहूर्त के संबंध में धर्म निष्ट एवं ईश्वर भक्त पं. टीकम दत्त जी शर्मा की भी राय लेने की सलाह दी । पण्डित टीकम दत्त जी शर्मा प्रसिद्धि से दूर दुनियादारी के मोह से मुक्त केवल ईश्वर भजन में मस्त रहते थे। स्मरणीय है कि पं. टिकमदत्त जी शर्मा रतलाम के ख्यात फोटोग्राफर स्व.गजानन जी शर्मा My Dear के दादाजी थे। दिन में एक बार वे नगर भ्रमण को निकलते थे व देव दर्शन कर घर आते थे। उन्हें ज्योतिष के शास्त्र ज्ञान से अधिक आत्म ज्ञान था व भविष्य का साक्षात्कार भी उन्हें होता था।
सज्जन सिंह जी के आदेश पर मेजर शिवजी पं. टिकमदत्त जी शर्मा के निवास पर पँहुचे और यज्ञ के मुहूर्त के सम्बंध में पूछा।
पण्डित जी निर्भय, दृढ़ इच्छा शक्ति सम्पन्न एवं स्पष्ट वक्ता थे, उन्होंने कहा कि यह समय यज्ञ के लिए उपयुक्त नहीं है यदि इस समय यज्ञ किया गया अनिष्ट होगा यह सुनकर मेजर शिवजी निराश होकर लौट गए किंतु षडयंत्रो के रचे कुचक्र ने उसी समय यज्ञ करना तय कर लिया था। पं. टिकमदत्त जी को भी यज्ञ में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया गया किंतु पंडित जी ने फिर चेतावनी दी कि यह यज्ञ सफल नहीं होगा और यज्ञ प्रारम्भ होने पर भी पूर्णाहुति का योग नहीं है।
परन्तु षड्यंत्रकारी सफल हुए कालिका माता मंदिर पर यज्ञ आरम्भ होने के साथ ही रतलाम राज परिवार का दुर्भाग्य का दिन भी आरम्भ हो गये।
पूर्णाहुति के दिन प्रातः महाराज सज्जन सिंह जी की लाडली रतन कुंवर बाई सा तैयार होकर हाथ मे कुछ कागज लिये दौड़ी कि अचानक वह स्तम्भ से टकराई उस पर रखा दीपक नीचे गिरा ऒर कागज सहित बाई सा के वस्त्रों ने भी आग पकड़ ली सारा राजमहल रतन कुंवर बाई सा के चीत्कारों से गूंज उठा भाग दौड़ मच गई किसी ने राजकुमारी पर पानी डाला और उनका शरीर फफोलो से भर गया।
दो घण्टे के अथक चिकित्सकीय प्रयास असफल हो गये। सुंदर अबोध राजकुमारी निष्प्राण हो गयी।
शोक के हाहाकार में पूरा राजमहल व नगर डूब गया।
उधर यज्ञ की पूर्णाहुति दोपहर तीन बजे होना थी सूचना मिलते ही कालिका माता मैदान भीड़ से सन्नाटे में बदल गया।
पंडितो के हाथ की आहुतियां न यज्ञ कुंड में जा रही न आहुति पात्र की ओर। यज्ञ कुंड की लपटों ने अपने तेज को समेट लिया और नत मस्तक होकर विषाद के धुंए में परिवर्तित हो गयी। ऐसा लग रहा था मानो सज्जन सिंह जी की लाडली अबोध रतन कुंवर बाई सा की आहुति के बाद अब किसी पूर्णाहुति की आवश्यकता नही रही।
यज्ञ प्रारम्भ हुआ – किसी का अहंकार तृप्त हो गया – किसी का षड्यंत्र सफल हो गया, किन्तु सज्जन सिंह जी का सब कुछ लूट गया।
सज्जन सिंह जी रतलाम छोड़कर विदेश चले गये। दुख के महासागर की लहरों पर डूबते उतरते एक माह बाद रतलाम लौटे। तब वे न मन से स्वस्थ थे न तन से। फिर उन्होंने पं.महादेव जी पाठक व पं.गणेशलाल जी जोशी के परामर्श पर राजमहल के बाहर घण्टाघर के दाहिनी ओर रतन कुंवर बाई सा की स्मृति में रतन पुरुषोत्तम मन्दिर बनवाया जो अब केवल पुरुषोत्तम मन्दिर के नाम से जाना जाता है। सज्जन सिंह के पूर्वजो द्वारा बनवाया गया राजमहल अब खण्डहर हो चला है। कहते हैं आज भी पायल की खनकती आवाज और बूजी होकम बचाओ – भा भा सा बचाओ की चीखें रात के सन्नाटे को भंग करती है, किन्तु अब उन्हें सुनने वाला कोई नही है।
हाँ एक बात अवश्य है कि उस अबोध सुंदर राजकुमारी का एक छोटा चित्र भगवान पुरुषोत्तम के चरणों मे उस मंदिर में पड़ा है। रात को मंदिर के पट बन्द होने के बाद जब कभी रतन कुंवर सिसकती होगी तो भगवान पुरुषोत्तम का वरद हस्त उसे सहलाता होगा।
रतन सिंह रतलाम और रतन कुंवर को कभी भुलाया नही जा सकता प्रत्येक रतलाम वासी आज भी उनका ऋणी है ।

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