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नरसिंह भगवान की कहानी


देवी सिंह तोमर

नरसिंह भगवान की कहानी

पद्म पुराण के अनुसार प्राचीन समय में वैशाख महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर भगवान नरसिंह प्रकट हुए थे।
आज बुधवार, 6 मई यानी आज भगवान विष्णु के चौथे अवतार नरसिंह का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। आइए इस अवसर पर जानते हैं नरसिंह भगवान की कथा के विषय में।

सतयुग में ऋषि कश्यप एक बार सूर्यास्त के समय पर, जब संध्या वंदन कर रहे थे। उसी समय काम से पीड़ित हो महारानी दिति, रती याचना करने लगी।

कश्यप जी ने कहा- सुनो देवी! अभी सूर्य अस्त की बेला है। और सूर्य अस्त के समय पर

आहारं, मैथुनं, सय्याम, स्वाध्याय च विशेषत:।।

भोजन नहीं करना चाहिए,
शयन नहीं करना चाहिए,
स्वाध्याय अर्थात पुस्तकों का अध्ययन
नहीं करना चाहिए, और स्त्री सहवास नहीं करना चाहिए।

देखो देवी! सूर्य अस्त के समय जो सहवास करता है, उसके दुष्ट संतान होती है यह समय तो मात्र भजन करने का होता है। इस प्रकार कश्यप जी ने बहुत समझाया, पर दिति अपने काम ज्वार को रोक न सकी और भगवत इच्छा मान कर कश्यप जी ने उन्हें गर्भधारण कराया। काम ज्वर शांत होने के बाद दिति को पश्चाताप हुआ। महाराज मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया। अब आप ही बताइए ना इसका क्या प्रायश्चित करूं। कश्यप जी ने बताया- देवी तुम्हें यह जो ग्लानि हो रही है, यही तुम्हारा पश्चाताप है; यही प्रायश्चित है।

पाप करने के बाद यदि पश्चाताप हो तो जान लो प्रायश्चित हो गया। कश्यप जी ने कहा- देवी! सूर्यास्त के समय गर्भाधान करने से तुम्हें जो संतान प्राप्त होगी। वह बड़ी दुष्ट होगी, पर तुमने अपने पाप का प्रायश्चित कर लिया है; इसलिए जो तुम्हारा पौत्र होगा वह प्रभु का ऐसा भक्त निकलेगा जो सबको तार देने वाला होगा।

दिति महारानी गर्भवती हुई और उनके यहां दो पत्रों ने जन्म लिया जिनका नाम से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु पड़ा। यह दोनों जन्म लेते ही ऐसे बढ़ने लगे, जैसे जंगल में लगी आग बढ़ती है; इनकी ऊंचाई आकाश को छूने लगी।

हिरण्याक्ष भगवान ब्रह्म से मिले वरदान की वजह से बहुत अहंकारी हो गया था। अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए वो भूदेवी को साथ लेकर पाताल में भगवान विष्णु की खोज में चला गया। भगवान विष्णु ने वराह अवतार में उसके साथ युद्ध किया और उसका विनाश कर दिया। लेकिन संसार के लिए खतरा अभी टला नही था क्योंकि उसका भाई हिरण्यकशिपु अपने भाई के मौत की बदला लेने को आतुर था।

उसने देवताओ से बदला लेने के लिए अपनी असुरो की सेना से देवताओ पर आक्रमण कर दिया। हिरण्यकशिपु देवताओ से लड़ता लेकिन हर बार भगवान विष्णु उनकी मदद कर देते।

हिरण्यकशिपु ने सोचा “अगर मुझे विष्णु को हराना है तो मुझे अपनी रक्षा के लिए एक वरदान की आवश्यकता है। क्योंकि मै जब भी देवताओ और मनुष्यों पर आक्रमण करता हूं , विष्णु मेरी सारी योजना तबाह कर देता है ……उससे लड़ने के लिए मुझे शक्तिशाली बनना पड़ेगा ।

अपने दिमाग में ऐसे विचार लेकर वो वन की तरफ निकल पड़ता है और भगवान ब्रह्मा की तपस्या में लीन हो जाता हो। वो काफी लम्बे समय तक तपस्या में इसलिए रहना चाहता था ताकि वो भगवान ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांग सके। इस दौरान वो अपने ओर अपने साम्राज्य के बारे में भूलकर कठोर तपस्या में लग जाता है।

इस दौरान इंद्रदेव को ये ज्ञात होता है कि हिरण्यकशिपु असुरो का नेतृत्व नही कर रहा है। इंद्रदेव सोचते है कि ” यदि इस समय असुरो को समाप्त कर दिया जाए तो फिर कभी वो आक्रमण नही कर पाएंगे। हिरण्यकशिपु के बिना असुरो की शक्ति आधी है अगर इस समय इनको खत्म कर दिया जाए तो हिरणाकश्यप के लौटने पर उसका आदेश मानने वाला कोई शेष नही रहेगा।

ये सोचते हुए इंद्र अपने दुसरे देवो के साथ असुरो के साम्राज्य पर आक्रमण कर देते है।इंद्रदेव के अपेक्षा के अनुसार हिरण्यकशिपु के बिना असुर मुकाबले में कमजोर पड़ गये और युद्ध में हार गये। इंद्रदेव ने असुरो के कई समूहों को समाप्त कर दिया।

हिरण्यकशिपु की राजधानी को तबाह कर इन्द्रदेव ने हिरण्यकशिपु के महल में प्रवेश किया। जहा पर उनको हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधू नजर आयी। इंददेव ने हिरण्यकशिपु की पत्नी को बंदी बना लिया ताकि भविष्य में हिरण्यकशिपु के लौटने पर उसके बंधक बनाने के उपयोग कर पाए। इंद्रदेव जैसे ही कयाधू को इंद्र लोक लेकर जाने लगे महर्षि नारद प्रकट हुए और उसी समय इंद्र को कहा “इंद्रदेव रुक जाओ आप ये क्या कर रहे हो ” ।

महर्षि नारद इंद्रदेव को कयाधू को अपने रथ में ले जाते देख क्रोधित हो गये। इंददेव ने नतमस्तक होकर महर्षि नारद से कहा महर्षि ,हिरणाकश्यप के नेतृत्व के बिना असुरो पर आक्रमण किया है और मेरा मानना है कि असुरो के आतंक को समाप्त करने का यही समय है।

वहां के विनाश को देखकर महर्षि नारद ने क्रोधित स्वर में कहा “हा ये सत्य है मै देख सकता हूं, लेकिन ये स्त्री इसमें कहां से आयी , क्या इसने तुमसे युद्ध किया , मुझे ऐसा नही लग रहा है कि इसने तुम्हारे विरुद्ध कोई शस्र उठाया है फिर तुम उसको क्यों चोट पंहुचा रहे हो ? “

इंद्रदेव ने महर्षि नारद की तरफ देखते हुए जवाब दिया कि वो उसके शत्रु हिरण्यकशिपु की पत्नी है जिसे वो बंदी बना करले जा रहा है ताकि हिरण्यकशिपु कभी आक्रमण करे तो वो उसका उपयोग कर सके। महर्षि नारद ने गुस्से में इन्द्रदेव को कहा कि केवल युद्ध जीतने के लिए दुसरे की पत्नी का अपहरण करोगे और इस निरपराध स्त्री को ले जाना महापाप होगा।

इंद्रदेव को महर्षि नारद की बाते सुनने के बाद कयाधू को रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नही था। इंद्रदेव ने कयाधू को छोड़ दिया और महर्षि नारद को उसका जीवन बचाने के लिए धन्यवाद दिया।

महर्षि नारद ने पूछा कि असुरो के विनाश के बाद वो अब कहा रहेगी। कयाधू उस समय गर्भवती थी और अपनी संतान की रक्षा के लिए उसने महर्षि नारद को उसकी देखभाल करने की प्रार्थना की। महर्षि नारद उसको अपने घर लेकर चले गये और उसकी देखभाल की।

इस दौरान वो कयाधू को विष्णु भगवान की कथाये भी सुनाया करते थे जिसको सुनकर कयाधू को भगवान विष्णु से लगाव हो गया था। उसके गर्भ मर पल रहे शिशु को भी विष्णु भगवान की कहानियों ने मोहित कर दिया था।

समय गुजरता गया एक दिन स्वर्ग की वायु इतनी गर्म हो गयी थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था। कारण खोजने पर देवो को पता चला कि हिरण्यकशिपु की तपस्या बहुत शक्तिशाली हो गयी थी जिसने स्वर्ग को भी गर्म कर दिय था। इस असहनीय गर्मी को देखते हुए देव भगवान ब्रह्मा के पास गये और मदद के लिए कहा। भगवान ब्रह्मा को हिरण्यकशिपु से मिलने के लिए धरती पर प्रकट होना पड़ा। भगवान ब्रह्मा हिरण्यकशिपु की कठोर तपस्या से बहुत प्रस्सन हुए और उसे वरदान मांगने को कहा।

हिरण्यकशिपु ने नतमस्तक होकर कहा “भगवान मुझे अमर बना दो ”

भगवान ब्रह्मा ने अपना सिर हिलाते हुए कहा “पुत्र , जिनका जन्म हुआ है उनकी मृत्यु निश्चित है मै सृष्टि के नियमो को नही बदल सकता हु कुछ ओर मांग लो ”

हिरण्यकशिपु अब सोच में पड़ गया क्योंकि जिस वरदान के लिए उसने तपस्या की वो प्रभु ने देने से मना कर दिया |हिरण्यकशिपु अब विचार करने लगा कि अगर वो असंभव शर्तो पर म्रत्यु का वरदान मांगे तो उसकी साधना सफल हो सकती है। हिरण्यकशिपु ने कुछ देर ओर सोचते हुए भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा।

“प्रभु मेरी इच्छा है कि मै ना तो मुझे मनुष्य मार सके और ना ही जानवर , ना मुझे कोई दिन में मार सके और ना ही रात्रि में , ना मुझे कोई स्वर्ग में मार सके और ना ही पृथ्वी पर , ना मुझे कोई घर में मार सके और ना ही घर के बाहर , ना कोई मुझे अस्त्र से मार सके और ना कोई शस्त्र से ” ।

हिरण्यकशिपु का ये वरदान सुनकर एक बार तो ब्रह्मा चकित रह गये कि हिरण्यकशिपु का ये वरदान बहुत विनाश कर सकता है लेकिन उनके पास वरदान देने के अलावा ओर कोई विकल्प नही था। भगवान ब्रह्मा ने तथास्तु कहते हुए मांगे हुए वरदान के पूरा होने की बात कही और वरदान देते ही भगवान ब्रह्मा अदृश्य हो गये।

हिरण्यकशिपु खुशी से अपने साम्राज्य लौट गया और इंद्रदेव द्वारा किये विनाश को देखकर बहुत दुःख हुआ। उसने इंद्रदेव से बदला लेने की ठान ली और अपने वरदान के बल पर इंद्रलोक पर आक्रमण कर दिया। इंद्रदेव के पास कोई विकल्प ना होते हुए वो सभी देवो के साथ देवलोक चले गये। हिरण्यकशिपु अब इंद्रलोक का राजा बन गया।

हिरण्यकशिपु अपनी पत्नी कयाधू को खोजकर घर लेकर आ गया। कयाधू के विरोध करने के बावजूद हिरण्यकशिपु मनुष्यों पर यातना ढाने लगा और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाला अब कोई नही था। अब कयाधू ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम प्रहलाद रखा गया।जैसे जैसे प्रहलाद बड़ा होता गया वैसे वैसे हिरण्यकशिपु ओर अधिक शक्तिशाली होता गया।

हालांकि प्रहलाद अपने पिता से बिलकुल अलग था और किसी भी जीव को नुकसान नही पहुचता था। वो भगवान विष्णु का अगाध भक्त था और जनता उसके अच्छे व्यवाहर की वजह से उससे प्यार करती थी।

एक दिन गुरु शुक्राचार्य प्रहलाद की शिकायत लेकर हिरण्यकशिपु के पास पहुचे और कहा “महाराज , आपका पुत्र हम जो पढ़ाते है वो नही पढ़ता है और सारा समय विष्णु के नाम ने लगा रहता है ” हिरण्यकशिपु ने उसी समय गुस्से में प्रहलाद को बुलाया और पूछा कि वो दिन भर विष्णु का नाम क्यों लेता रहता है। प्रहलाद ने जवाब दिया “पिताश्री , भगवान विष्णु ही सारे जगत के पालनहार है इसलिए मै उनकी पूजा करता हु मै दुसरो की तरफ आपके आदेशो को मानकर आपकी पूजा नही कर सकता हुआ “|

हिरण्यकशिपु ने अब शाही पुरोहितो से उसका ध्यान रखने को कहा और विष्णु का जाप बंद कराने को कहा लेकिन कोई फर्क नही पड़ा। इसके विपरीत गुरुकुल में प्रहलाद दुसरे शिष्यों को भी उसकी तरह भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए प्रेरित करने लगा।

हिरण्यकशिपु ने परेशान होकर फिर प्रहलाद को बुलाया और पूछा “पुत्र तुम्हे सबसे प्रिय क्या है ?”

प्रहलाद ने जवाब दिया “मुझे भगवान विष्णु का नाम लेना सबसे प्रिय लगता है ”

अब हिरण्यकशिपु ने पूछा “इस सृष्टि में सबसे शक्तिमान कौन है ?”

प्रहलाद ने फिर उत्तर दिया “तीन लोको के स्वामी और जगत के पालनहार भगवान विष्णु सबसे सर्वशक्तिमान है “
अब हिरण्यकशिपु को अपने गुस्से पर काबू नही रहा और उसने अपने पहरेदारो से प्रहलाद को विष देने को कहा। प्रहलाद ने विष का प्याला पूरा पी लिया लेकिन उसकी मृत्यु नही हुयी। सभी व्यक्ति इस चमत्कार को देखकर अचम्भित रह गये।

अब हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि प्रहलाद को बड़ी चट्टान से बांधकर समुद्र में फेंक दो लेकिन फिर चमत्कार हुआ और रस्सिया अपने आप खुल गयी। भगवान विष्णु का नाम लेकर वो समुद्र जल से बाहर आ गया। इसके बाद एक दिन जब प्रहलाद भगवान विष्णु के ध्यान में मग्न था तब उस पर उन्मत्त हाथियों के झुण्ड को छोड़ दिया लेकिन वो हाथी उसके पास शांति से बैठ गये।

अब हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका और बुलाया और कहा “बहन तुम्हे भगवान से वरदान मिला है कि तुम्हे अग्नि से कोई नुकसान नही होगा , मै तुम्हारे इस वरदान क परखना चाहता हूं , मेरा पुत्र प्रहलाद दिन भर विष्णु का नाम जपता रहता है और मुझसे सामना करता है …मै उसकी सुरत नही देखना चाहता हु …..मै उसे मारना चाहता हु क्योंकि वो मेरा पुत्र नही है …..मै चाहता हु कि तुम प्रहलाद को गोद में बिठाकर अग्नि पर बैठ जाओ ”।

होलिका ने अपने भाई की बात स्वीकार कर ली।

अब होलिका ने ध्यान करते हुए प्रहलाद को अपनी गोद में बिठाया और हिरण्यकशिपु को आग लगाने को कहा। हिरण्यकशिपु प्रहलाद के भक्ति की शक्ति को नही जानता था। फिर भी आग से प्रतिरक्षित होलिका जलने लग गयी और उसके पापो ने उसका नाश कर दिया। जब आग बुझी तो प्रहलाद उस जली हुयी जगह के मध्य अभी भी ध्यान में बैठा हुआ था जबकि होलिका कही भी नजर नही आयी।

अब हिरण्यकशिपु भी घबरा गया और प्रहलाद को ध्यान से खीचते हुए ले गया और चिल्लाते हुए बोला “तुम कहते हो तुम्हारा विष्णु हर जगह पर है , बताओ अभी विष्णु कहा पर है ? वो पेड़ के पीछे है या मेरे महल में है या इस स्तंभ में है बताओ ?

प्रहलाद ने अपने पिता की आँखों में आँखे मिलाकर कहा “हां पिताश्री , भगवान विष्णु हर जगह पर है ”

क्रोधित हिरण्यकशिपु ने अपने गदा से स्तम्भ पर प्रहार किया और गुस्से से कहा “तो बताओ वो कहा है “

हिरण्यकशिपु दंग रह गया और देखा कि वो स्तम्भ चकनाचूर हो गया और उस स्तम्भ से एक क्रूर पशु निकला जिसका मुंह शेर का और शरीर मनुष्य जैसा था | हिरण्यकशिपु उस आधे पशु और आधे मानव को देखकर पीछे हट गया। तभी उस आधे पशु और आधे मानव ने जोर से कहा “मै नारायण का अवतार नरसिंह हूं और मैं तुम्हारा विनाश करने आया हूं “ ।

हिरण्यकशिपु उसे देखकर जैसे ही बच कर भागने लगा तभी नरसिंह ने पंजो से उसे जकड़ दिया। हिरण्यकशिपु ने अपने आप को छुडाने के बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहा।

भगवान नरसिंह अब हिरण्यकशिपु को घसीटते हुए दरवाजे की चौखट तक ले गया जो ना घर में था और ना घर के बाहर और उसे अपनी गोद में बिठा दिया जो ना आकाश में था और ना ही धरती पर और सांझ के समय ना ही दिन और ना ही रात हिरण्यकशिपु को अपने पंजो यानी ना ही अस्त्र ना ही शस्त्र से उसका वध कर दिया।हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद दहाड़ते हुए भगवान नरसिंह सिंहासन पर बैठ गये।

सारे असुर ऐसे क्रूर पशु को देखकर भाग गये और देवताओं की भी भगवान नरसिंह के पास जाने की हिम्मत नही हुयी। अब बिना डरे हुए प्रहलाद आगे बढ़ा और नरसिंह से प्यार से कहा “प्रभु ,मैं जानता हूं कि आप मेरी रक्षा के लिए आये हो ”।

भगवान नरसिंह ने मुस्कुराकर जवाब दिया “हां पुत्र मै तुम्हारे लिए ही आया हुं , तुम चिंता मत करो तुम्हे इस कथा का ज्ञान नही है कि तुम्हारे पिता मेरे द्वारपाल विजय है उन्हें एक श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा और तीन ओर जन्मो के पश्चात उसे फिर वैकुण्ठ में स्थान मिल जाएगा इसलिए तुम्हे चिंता करने की कोई आवश्यकता नही है ”।

प्रहलाद ने अपना सिर हिलाते हुए कहा “प्रभु अब मुझे कुछ नही चाहिए “भगवान नरसिंह ने अपना सिर हिलाया और कहा “नही पुत्र तुम जनता पर राज करने के लिए बने हो और तुम अपने जनता की सेवा करने के पश्चात वैकुण्ठ आना “।

प्रहलाद अब असुरो का उदार शासक बन गया जिसने अपने शासनकाल के दौरान प्रसिद्धि पायी और असुरो के पुराने क्रूर तरीके समाप्त कर दिए।

🚩जय श्री हरि 🚩

Posted in गौ माता - Gau maata

बड़ोदरा के एक गांव में लाक डाउन लगने के बाद


बड़ोदरा के एक गांव में लाक डाउन लगने के बाद से ही हर रोज रात में ये तेंदुआ इस गाय से मिलने आता है और घंटों ऐसे ही बैठा रहता है मानो वो किसी अपने से मिल रहा हो

रोज रोज कुछ देर के लिए गांव के कुत्तों का डरकर भौंकने और रात भर के लिए गांव के बाहर भाग जाने से गांव वालों ने सीसीटीवी कैमरा लगवाया तो ये नजारा दिखा

चूंकि तेंदुआ गांव के किसी जानवर को नुक्सान नहीं पहुंचाता है और दो-तीन घंटे गाय के पास बैठने के बाद चला जाता है इसलिए गांव वालों ने इस बात का पता लगाना शुरू कर दिया कि गाय और तेंदुए की इस अजीब प्रेम के पीछे क्या रहस्य है

इस रहस्य से पर्दा उठाया गाय के पुराने मालिक ने

उसने बताया कि 2010 में जब ये तेंदुआ छोटा था और इस गाय ने पहले बछिया को जन्म दिया था तब इस तेंदुए की मां को शिकारियों ने मार दिया था इसलिए वन विभाग वाले इस तेंदुए को उसकी गाय के पास लाते थे जहां वो उनके सामने ही दुध निकालकर तेंदुए को पिलाता था और इतने समय में तेंदुआ को गाय खुब दुलारती थी

फिर जब तेंदुआ बड़ा हो गया तो इसने दुध पीना बंद कर दिया और ये गाय भी उसने बेच दी

अभी भी तेदुए को लगता है कि ये गाय उसकी मां है और ये बहुत दिनों से इसको खोज रहा था , अब जाकर ये उसको मिली है तो इसीलिए ये उससे मिलने चला आता है।

वैसे कुछ मित्रों का कहना है ये तस्वीर काफी पुरानी है लेकिन मैंने आज प्रथम वार ही इस तस्वीर को देखा है और ये तस्वीर और पोस्ट मेरे दिल को छू गयी है इसलिए मैं इसे पोस्ट कर रहा हूँ!! ….

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हिंदी कहावते


मानो तो देव, नहीं तो पत्थर – विश्वास ही फलदायक
गुड़ खाय गुलगुले से परहेज – बनावटी परहेज
नाम बड़े, पर दर्शन थोड़े – गुण से अधिक बड़ाई
लश्कर में ऊँट बदनाम – दोष किसी का, बदनामी किसी की
उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे – अपराधी ही पकड़नेवाली को डाँट बताये
दुधारु गाय की दो लात भी भली – जिससे लाभ होता हो, उसकी बातें भी सह लेनी चाहिए
बैल का बैल गया नौ हाथ का पगहा भी गया – बहुत बड़ा घाटा
ऊँट के मुँह में जीरा – मरूरत से बहुत कम
न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी – झगड़े के कारण को नष्ट करना
भैंस के आगे बीन बजावे, भैंस रही पगुराय – मूर्ख को गुण सिखाना व्यर्थ है
खेत खाये गदहा, मार खाये जोलहा – अपराध करे कोई, दण्ड मिले किसी और को
आम का आम गुठली का दाम – सब तरह से लाभ-ही-लाभ
बेकार से बेगार भली – चुपचाप बैठे रहने की अपेक्षा कुछ काम करना
खरी मजूरी चोखा काम – अच्छे मुआवजे में ही अच्छा फल प्राप्त होना
नौ की लकड़ी नब्बे खर्च – काम साधारण, खर्च अधिक
बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे​ मिया सुभान अल्लाह – बड़ा तो जैसा है, छोटा उससे बढ़कर है
एक पंथ दो काज – एक नहीं, दो लाभ
दूध का जला मट्ठा भी फूँक-फूँक कर पीता है – एक बार धोखा खा जाने पर सावधान हो जाना
बोये पेड़े बबूल के आम कहाँ से होय – जैसी करनी, वैसी भरनी 
एक तो चोरी दूसरे सीनाजोरी – दोष करके न मानना 
नीम हकीम खतरे जान – अयोग्य से हानि 
भइ गति साँप-छछूँदर केरी – दुविधा में पड़ना 
घर की मुर्गी दाल बराबर – घर की वस्तु का कोई आदर नहीं करना
कबीरदास की उलटी बानी, बरसे कंबल भींगे पानी – प्रकृतिविरुद्ध काम 
नाचे कूदे तोड़े तान, ताको दुनिया राखे मान – आडम्बर दिखानेवाला मान पाता है 
तीन कनौजिया, तेरह चूल्हा – जितने आदमी उतने विचार 
पानी पीकर जात पूछना – कोई काम कर चुकने के बाद उसके औचित्य पर विचार करना 
खोदा पहाड़ निकली चुहिया – कठिन परिश्रम, थोड़ा लाभ 
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं – पराधीनता में सुख नहीं 
घड़ी में घर जले, नौ घड़ी भद्रा – हानि के समय सुअवसर-कुअवसर पर ध्यान न देना 
कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा – इधर-उधर से सामान जुटाकर काम करना 
पराये धन पर लक्ष्मीनारायण – दूसरे का धन पाकर अधिकार जमाना 
थूक कर चाटना ठीक नहीं – देकर लेना ठीक नहीं, बचन-भंग करना, अनुचित 
बिल्ली के भाग्य से छींका ​(सिकहर) टूटा – संयोग अच्छा लग गय
गाछे कटहल, ओठे तेल – काम होने के पहले ही फल पाने की इच्छा 
गोद में छोरा नगर में ढिंढोरा – पास की वस्तु का दूर जाकर ढूँढ़ना 
गरजे सो बरसे नहीं – बकवादी कुछ नहीं करता 
घर का फूस नहीं, नाम धनपत – गुण कुछ नहीं, पर गुणी कहलाना 
घर की भेदी लंका ढाए – आपस की फूट से हानि होती हे 
घी का लड्डू टेढ़ा भला – लाभदायक वस्तु किसी तरह की क्यों न हो 
चोर की दाढ़ी में तिनका – जो दोषी होता है वह खुद डरता रहता है 
पंच परमेश्वर – पाँच पंचों की राय 
तीन लोक से मथुरा न्यारी – निराला ढंग 
तुम डाल-डाल तो हम पात-पात – किसी की चाल को खूब समझते हुए चलना 
ऊँचे चढ़ के देखा, तो घर-घर एकै लेखा – सभी एक समान
धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का – निकम्मा, व्यर्थ इधर-उधर डोलनेवाला 
रोजा बख्शाने गये, नमाज लगे पड़ी – लाभ के बदले हानि
मुँह में राम, बगल में छुरी – कपटी
इस हाथ दे, उस हाथ ले – कर्मों का फल शीघ्र पाना
मोहरों की लूट, कोयले पर छाप – मूल्यवान वस्तुओं को छोड़कर तुच्छ वस्तुओं पर ध्यान देना
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मां की चाहत


🐚💐🐚💐🐚💐🐚 मां की चाहत 🌱🌱🌱🌱🌱

दोस्तों,संसार में भगवान से पहले मां का दर्जा यूं ही नहीं दिया गया। मां जो खुद भूखी रह लेगी, लेकिन बच्चो का पेट जरूर भरेगी। ये हमारी या समाज की बदनसीबी कह ले या कलयुग का खेल की आजकल की औलाद माता पिता का सम्मान भूल गए।

आइए मां की ममता की एक छोटी सी कहानी आपको सुनाकर मां के महत्व को बताता हूं।

एक दंपत्ती दिवाली की खरीदारी करने को हड़बड़ी में था! पति ने पत्नी से कहा- जल्दी करो मेरे पास” टाईम” नहीं है… कह कर रूम से बाहर निकल गया , तभी बाहर लॉन मे बैठी “माँ” पर नजर पड़ी.

कुछ सोचते हुए वापिस रूम में आया।….शालू तुमने माँ से भी पूछा कि उनको दिवाली पर क्या चाहिए….

शालिनी बोली नहीं पूछी। अब उनको इस उम्र मे क्या चाहिए होगी यार, दो वक्त की रोटी और दो जोड़ी कपड़े इसमे पूछने वाली क्या बात है…..
वो बात नहीं है शालू… “माँ पहली बार दिवाली पर हमारे घर में रुकी हुई है” वरना तो हर बार गाँव में ही रहती है तो… औपचारिकता के लिए ही पूछ लेती………

अरे इतना ही माँ पर प्यार उमड़ रहा है तो खुद क्यूँ नही पूछ लेते झल्लाकर चीखी थी शालू, और कंधे पर हेंड बैग लटकाते हुए तेजी से बाहर निकल गयी……

सूरज माँ के पास जाकर बोला माँ हम लोग दिवाली के खरीदारी के लिए बाजार जा रहे हैं आपको कुछ चाहिए तो..

माँ बीच में ही बोल पड़ी मुझे कुछ नही चाहिए बेटा….

सोच लो माँ अगर कुछ चाहिये तो बता दीजिए…..

सूरज के बहुत जोर देने पर माँ बोली ठीक है तुम रुको मै लिख कर देती हूँ, तुम्हें और बहू को बहुत खरीदारी करनी है कहीं भूल ना जाओ कहकर, सूरज की माँ अपने कमरे में चली गई, कुछ देर बाद बाहर आई और लिस्ट सूरज को थमा दी।……

सूरज ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए बोला, देखा शालू माँ को भी कुछ चाहिए था पर बोल नही रही थी मेरे जिद्द करने पर लिस्ट बना कर दी है, “इंसान जब तक जिंदा रहता है, रोटी और कपड़े के अलावा भी बहुत कुछ चाहिये होता है”.

अच्छा बाबा ठीक है पर पहले मैं अपनी जरूरत की सारी सामान लूँगी बाद में आप अपनी माँ का लिस्ट देखते रहना कह कर कार से बाहर निकल गयी….

पूरी खरीदारी करने के बाद शालिनी बोली अब मैं बहुत थक गयी हूँ, मैं कार में A/C चालू करके बैठती हूँ आप माँ जी का सामान देख लो,

अरे शालू तुम भी रुको फिर साथ चलते हैं मुझे भी जल्दी है,…..

देखता हूँ माँ इस दिवाली क्या मंगायी है… कहकर माँ की लिखी पर्ची जेब से निकलता है, बाप रे इतनी लंबी लिस्ट पता नही क्या क्या मंगायी होगी जरूर अपने गाँव वाले छोटे बेटे के परिवार के लिए बहुत सारे सामान मंगायी होगी,…….

और बनो “श्रवण कुमार” कहते हुए गुस्से से सुरज की ओर देखने लगी, पर ये क्या सूरज की आंखों में आंसू…….. और लिस्ट पकड़े हुए हाथ सूखे पत्ते की तरह हिल रहा था….. पूरा शरीर काँप रहा था,

शालिनी बहुत घबरा गयी क्या हुआ येसा क्या मांग ली है तुम्हारी माँ ने कह कर सूरज की हाथ से पर्ची झपट ली….

हैरान थी शालिनी भी इतनी बड़ी पर्ची में बस चंद शब्द ही लिखे थे…..
पर्ची में लिखा था….

“बेटा सूरज मुझे दिवाली पर तो क्या किसी भी अवसर पर कुछ नहीं चाहिए फिर भी तुम जिद्द कर रहे हो तो, और तुम्हारे “शहर की किसी दुकान में अगर मिल जाए तो फुर्सत के कुछ ” पल ” मेरे लिए लेते आना…. ढलती साँझ हुई अब मैं, सूरज मुझे गहराते अँधियारे से डर लगने लगा है, बहुत डर लगता है पल पल मेरी तरफ बढ़ रही मौत को देखकर….जानती हूँ टाला नही जा सकता शाश्वत सत्‍य है,…… पर अकेले पन से बहुत घबराहट होती है सूरज …… तो जब तक तुम्हारे घर पर हूँ कुछ पल बैठा कर मेरे पास कुछ देर के लिए ही सही बाँट लिया कर मेरा बुढ़ापा का अकेलापन…. बिन दीप जलाए ही रौशन हो जाएगी मेरी जीवन की साँझ….कितने साल हो गए बेटा तूझे स्पर्श नही की एक फिर से आ मेरी गोद में सर रख और मै ममता भरी हथेली से सहलाऊँ तेरे सर को एक बार फिर से इतराए मेरा हृदय मेरे अपनों को करीब बहुत करीब पा कर….और मुस्कुरा कर मिलूं मौत के गले क्या पता अगले दिवाली तक रहूँ ना रहूँ…..
पर्ची की आख़री लाइन पढ़ते पढ़ते शालिनी फफक, फफक कर रो पड़ी…..
ऐसी ही होती है माँ…..

दोस्तों अपने घर के उन विशाल हृदय वाले लोगों जिनको आप बूढ़े और बुढ़िया की श्रेणी में रखते है वो आपके जीवन के कल्पतरु है! उनका यथोचित सममान और आदर और सेवा-सुश्रुषा और देखभाल करें, यकीन मानिए आपके भी बूढ़े होने के दिन नजदीक ही है…उसकी तैयारी आज से कर ले! इसमें कोई शक नही आपके अच्छे-बुरे कृत्य देर-सवेर आप ही के पास लौट कर आने हैं!!

हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

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एक वाटिका के चार द्वार थे


एक वाटिका के चार द्वार थे । एक पर दूध देनेवाली गाय बैठी थी । वाटिका के मालिक की आज्ञा थी कि जो इसके चार लात मारे , वही भीतर आये । दूसरे द्वार पर कबाब रक्खे हुए थे । उनके लिए आज्ञा थी कि जो मनुष्य कबाब खाये , वही भीतर जाए । तीसरे द्वार पर एक वेश्या उपस्थित थी । इस द्वार की आज्ञा थी कि जो मनुष्य इससे प्रेम करे वही भीतर जाए । चौथे द्वार पर मदिरा रखी थी । वहाँ प्रवेश के लिए आज्ञा थी कि जो इसको पिये , वहिउ भीतर जाये ।
एक बार एक वैष्णव ने उस वाटिका की प्रशंसा सुनकर जाने का विचार किया । जब वह पहले द्वार पर गया तो गाय और आज्ञा को देखकर कहा कि यह तो बड़ा भारी पाप है कि मैं अपने स्वाद के लिए गाय को , जिसको सारे संसार के लोग मानते हैं , लात मारूँ । यह सोचकर वह वहाँ से चलकर दूसरे द्वार पर गया । वहाँ कबाब देखकर कहा कि बड़े शोक की बात होगी , यदि मैं अपने पेट को पशुओं की समाधि बनाऊँ । क्योंकि जब कोई पशु मर जाता है तो हम उसे निकालकर घर से बाहर फेंक देते हैं और उसके सम्पर्क से भी घृणा करते हैं । मैं अपने स्वाद के कारण माँस जैसी अपवित्र वस्तु को जिसको लोग अपने घर में भी नहीं रखते , शरीर में कैसे रखूँ ? सब बातें सोचकर वह वहाँ से हट गया और तीसरे द्वार पर पहुँचा । वहाँ वेश्या को देखा तो सोचा कि यह तो समाज का नाश करनेवाली है ; मनुष्य की शत्रु है । इससे घृ्णा करना ही हितकर है । आगे चलकर वह चौथे द्वार पर गया तो वहाँ मदिरा को देखा । उसने सोचा कि ‘एक तो इससे किसी की हत्या का डर नहीं है और इसके अतिरिक्त आगे कोई द्वार भी बाकी नहीं है । सब द्वार इसकी अपेक्षा अधिक निकृष्ट हैं , अतः अब इसी द्वार से चलना चाहिए । ‘
सारांश यह कि वैष्णव जी ने मदिरा पी ली । मदिरा पीते ही धर्म और अधर्म जा ज्ञान जाता रहा और वह महाशय वेश्या के पास पहुँचे । वेश्या ने कहा कि मदिरा के साथ कबाब न हो तो जीवन का आनन्द ही क्या ? फिर क्या था ! वैष्णव जी ने कबाब भी खाया । जब कबाब भी खा लिया तो हत्या का विचार बिलकुल ही जाता रहा और गात के लात मारकर झट पहले द्वार से वाटिका के भीतर घुस गये ।

बच्चों ! संसार की सब बुराइयों की जड़ यह मदिरा है । इसे पीकर बुद्धि जाती रहती है और बुद्धि के जाने से मनुष्य कुकर्मी होकर संसार की सारी बुराइयाँ करने लगता है । जो लोग मदिरा पीते हैं , वे लोग बुद्धि-नाश होने पर मूत्र तक पी जाते हैं , नालियों में लोटते हैं , कुत्ते उनके मुँह पर मूतते हैं ।

शिक्षा — सब पापों की जड़ है मदिरा ।

~ स्वामी दर्शनानन्द


( स्वामी दर्शनानन्द जी का यह कथा-संकलन ( कथा पच्चीसी ) उत्प्रेरक है , मर्म-स्पर्शी है । इसमें पौराणिक और लोक-कथाओं का रोचक वर्णन है । प्रत्येक कथा अंत में मार्मिक उपदेश दे जाती है । इसे सभी आयु के पाठक पढ़ें और ज्ञानार्जन करें , यही स्वामी दर्शनानन्द जी का ध्येय था और यही प्रकाशक ( विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द ) का उद्देश्य है । )

कल “मदिरा प्रेमियों” के द्वारा लाॅकडाउन की धज्जियाँ उड़ाते वीडियोज़ व् समाचारों के देख – सुनकर स्वामी जी की इस कथा की याद आ गयी । निःसन्देह मदिरा बुद्धि और विवेक को हर लेती है और मनुष्य अच्छा-बुरा , लाभ-हानि , धर्म-अधर्म सब भूल जाता है ।

प्रस्तुतकर्ता — सुनीत कुमार

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श्री मेहंदीपुर बालाजी मन्दिर


महानुभाव,आज हम धार्मिक यात्रा ग्रुप में यात्रा करते है श्री मेहंदीपुर बालाजी मन्दिर के दर्शन और जानकारी की।

हम हर रोज भारत एवम अन्य देश विदेश के खास धार्मिक स्थल की जानकारी और महत्व आप तक लाने का प्रयास करेगे।यदि आपके नजदीक कोई धार्मिक स्थल है एवम उसका कोई विशेष चमत्कार है तो अवश्य इस ग्रुप में शेयर करे।

पवित्र और चमत्कारिक मेहंदीपुर बालाजीमहराज की सम्पूर्ण कथा!!!!!

राजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की सीमा रेखा पर स्थित मेंहदीपुर कस्बे में बालाजी का एक अतिप्रसिद्ध तथा प्रख्यात मन्दिर है जिसे “श्री मेंहदीपुर बालाजी मन्दिर” के नाम से जाना जाता है।

भूत प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहांँ आने वालों का ताँंता लगा रहता है। तंत्र मंत्रादि ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति भी यहांँ पर बिना दवा और तंत्र मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं । सम्पूर्ण भारत से आने वाले लगभग एक हजार रोगी और उनके स्वजन यहाँं नित्य ही डेरा डाले रहते हैं ।

बालाजी का मन्दिर मेंहदीपुर नामक स्थान पर दो पहाड़ियों के बीच स्थित है, इसलिए इन्हें “घाटे वाले बाबा जी” भी कहा जाता है । इस मन्दिर में स्थित बजरंग बली की बालरूप मूर्ति किसी कलाकार ने नहीं बनाई, बल्कि यह स्वयंभू है । यह मूर्ति पहाड़ के अखण्ड भाग के रूप में मन्दिर की पिछली दीवार का कार्य भी करती है ।

इस मूर्ति को प्रधान मानते हुए बाकी मन्दिर का निर्माण कराया गया है । इस मूर्ति के सीने के बाईं तरफ़ एक अत्यन्त सूक्ष्म छिद्र है जिससे पवित्र जल की धारा निरंतर बह रही है।

यह जल बालाजी के चरणों तले स्थित एक कुण्ड में एकत्रित होता रहता है जिसे भक्तजन चरणामृत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं । यह मूर्ति लगभग 1000 वर्ष प्राचीन है किन्तु मन्दिर का निर्माण इसी सदी में कराया गया है । मुस्लिम शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने की कुचेष्टा की, लेकिन वे असफ़ल रहे ।

वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही गहरी होती चली गई । थक हार कर उन्हें अपना यह कुप्रयास छोड़ना पड़ा । ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910 में बालाजी ने अपना सैकड़ों वर्ष पुराना चोला स्वतः ही त्याग दिया । भक्तजन इस चोले को लेकर समीपवर्ती मंडावर रेलवे स्टेशन पहुंँचे, जहांँ से उन्हें चोले को गंगा में प्रवाहित करने जाना था ।

ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका वजन करने लगा, लेकिन चमत्कारी चोला कभी मन भर ज्यादा हो जाता और कभी दो मन कम हो जाता । असमंजस में पड़े स्टेशन मास्टर को अंततः चोले को बिना लगेज ही जाने देना पड़ा और उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया ।

इसके बाद बालाजी को नया चोला चढाया गया । यज्ञ हवन और ब्राह्मण भोज एवं धर्म ग्रन्थों का पाठ किया गया । एक बार फ़िर से नए चोले से एक नई ज्योति दीप्यमान हुई । यह ज्योति सारे विश्व का अंधकार दूर करने में सक्षम है । बालाजी महाराज के अलावा यहांँ श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान ( भैरव ) की मूर्तियांँ भी हैं ।

प्रेतराज सरकार जहां द्ण्डाधिकारी के पद पर आसीन हैं वहीं भैरव जी कोतवाल के पद पर । यहां आने पर ही सामान्यजन को ज्ञात होता है कि भूत प्रेतादि किस प्रकार मनुष्य को कष्ट पहुंँचाते हैं और किस तरह सहज ही उन्हें कष्ट बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है । दुखी कष्टग्रस्त व्यक्ति को मंदिर पहुँचकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढाना पड़ता है ।

बालाजी को लड्डू प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढाया जाता है । इस प्रसाद में से दो लड्डू रोगी को खिलाए जाते हैं और शेष प्रसाद पशु पक्षियों को डाल दिया जाता है । ऐसा कहा जाता है कि पशु पक्षियों के रूप में देवताओं के दूत ही प्रसाद ग्रहण कर रहे होते हैं । प्रसाद हमेशा थाली या दोने में रखकर दिया जाता है।

लड्डू खाते ही रोगी व्यक्ति झूमने लगता है और भूत प्रेतादि स्वयं ही उसके शरीर में आकर बड़बड़ाने लगते है । स्वतः ही वह हथकडी और बेड़ियों में जकड़ जाता है । कभी वह अपना सिर धुनता है कभी जमीन पर लोट पोट कर हाहाकार करता है । कभी बालाजी के इशारे पर पेड़ पर उल्टा लटक जाता है । कभी आग जलाकर उसमें कूद जाता है ।

कभी फाँसी या सूली पर लटक जाता है । मार से तंग आकर भूत प्रेतादि स्वतः ही बालाजी के चरणों में आत्मसमर्पण कर देते हैं अन्यथा समाप्त कर दिये जाते हैं । बालाजी उन्हें अपना दूत बना लेते हैं। संकट टल जाने पर बालाजी की ओर से एक दूत मिलता है जोकि रोग मुक्त व्यक्ति को भावी घटनाओं के प्रति सचेत करता रहता है।

बालाजी महाराज के मन्दिर में प्रातः और सायं लगभग चार चार घंटे पूजा होती है । पूजा में भजन आरतियों और चालीसों का गायन होता है। इस समय भक्तगण जहांँ पंक्तिबद्ध हो देवताओं को प्रसाद अर्पित करते हैं वहीं भूत प्रेत से ग्रस्त रोगी चीखते चिल्लाते उलट पलट होते अपना दण्ड भुगतते हैं ।

बालाजी मंदिर में प्रेतराज सरकार दण्डाधिकारी पद पर आसीन हैं। प्रेतराज सरकार के विग्रह पर भी चोला चढ़ाया जाता है। प्रेतराज सरकार को दुष्ट आत्माओं को दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है ।

भक्ति-भाव से उनकी आरती, चालीसा, कीर्तन, भजन आदि किए जाते हैं । बालाजी के सहायक देवता के रूप में ही प्रेतराज सरकार की आराधना की जाती है।

पृथक रूप से उनकी आराधना – उपासना कहीं नहीं की जाती, न ही उनका कहीं कोई मंदिर है। वेद, पुराण, धर्म ग्रन्थ आदि में कहीं भी प्रेतराज सरकार का उल्लेख नहीं मिलता। प्रेतराज श्रद्धा और भावना के देवता हैं।

कुछ लोग बालाजी का नाम सुनते ही चाैंक पड़ते हैं। उनका मानना है कि भूत-प्रेतादि बाधाओं से ग्रस्त व्यक्ति को ही वहाँ जाना चाहिए। ऐसा सही नहीं है। कोई भी – जो बालाजी के प्रति भक्ति-भाव रखने वाला है, इन तीनों देवों की आराधना कर सकता है। अनेक भक्त तो देश-विदेश से बालाजी के दरबार में मात्र प्रसाद चढ़ाने नियमित रूप से आते हैं।
किसी ने सच ही कहा है—”नास्तिक भी आस्तिक बन जाते हैं, मेंहदीपुर दरबार में ।”

प्रेतराज सरकार को पके चावल का भोग लगाया जाता है, किन्तु भक्तजन प्रायः तीनों देवताओं को बूंदी के लड्डुओं का ही भोग लगाते हैं और प्रेम-श्रद्धा से चढ़ा हुआ प्रसाद बाबा सहर्ष स्वीकार भी करते हैं।

कोतवाल कप्तान श्री भैरव देव भगवान शिव के अवतार हैं और उनकी ही तरह भक्तों की थोड़ी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न भी हो जाते हैं । भैरव महाराज चतुर्भुजी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, खप्पर तथा प्रजापति ब्रह्मा का पाँचवाँ कटा शीश रहता है । वे कमर में बाघाम्बर नहीं, लाल वस्त्र धारण करते हैं। वे भस्म लपेटते हैं । उनकी मूर्तियों पर चमेली के सुगंध युक्त तिल के तेल में सिन्दूर घोलकर चोला चढ़ाया जाता है ।

शास्त्र और लोककथाओं में भैरव देव के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें एक दर्जन रूप प्रामाणिक हैं। श्री बाल भैरव और श्री बटुक भैरव, भैरव देव के बाल रूप हैं। भक्तजन प्रायः भैरव देव के इन्हीं रूपों की आराधना करते हैं । भैरव देव बालाजी महाराज की सेना के कोतवाल हैं।

इन्हें कोतवाल कप्तान भी कहा जाता है। बालाजी मन्दिर में आपके भजन, कीर्तन, आरती और चालीसा श्रद्धा से गाए जाते हैं । प्रसाद के रूप में आपको उड़द की दाल के बड़े और खीर का भोग लगाया जाता है। किन्तु भक्तजन बूंदी के लड्डू भी चढ़ा दिया करते हैं ।

सामान्य साधक भी बालाजी की सेवा-उपासना कर भूत-प्रेतादि उतारने में समर्थ हो जाते हैं। इस कार्य में बालाजी उसकी सहायता करते हैं। वे अपने उपासक को एक दूत देते हैं, जो नित्य प्रति उसके साथ रहता है।

कलियुग में बालाजी ही एकमात्र ऐसे देवता हैं , जो अपने भक्त को सहज ही अष्टसिद्धि, नवनिधि तदुपरान्त मोक्ष प्रदान कर सकते हैं।

हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

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