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વાણિયો અને હનુમાન (પ્રેમશંકર ભટ્ટ)


સટ્ટાખોર   વાણિયો   મુંબઈમાં   રહેતો,

સાંજ સવાર હનુમાનને હાથ જોડી કહેતો;

“અંતરયામી બાપા તમે જાણો મારી પીડ,

પાંચસો  જો અપાવો તો ભાંગે મારી ભીડ,

અપાવો  તો  રોજ  આવી  પાઠ-પૂજા કરૂં,

શનિવારે  પાઈ પાઈનું  તેલ  આવી ધરૂં.”

એકદાડો  હનુમાનને  એવી  ચડી   ચીડ,

પથ્થરમાંથી પેદા થયા, બોલ્યા નાખી રીડ;

“પૂજારીનો ઓશિયાળો ખાવા દે તો ખાઉં,

કેમ  કરી  ભૂંડા હું તો તારી વહારે  ધાઉં?

પાંચસોને બદલે આપે પાઈ પાઈનું તેલ,

પૂછડું દેખી મૂરખ મને માની લીધો બેલ?

પાંચસો  જો હોય  તો તો  કરાવું ને  હોજ,

ભરાવું  ને તેલ, પછી  ધુબકા મારૂં  રોજ.’

–પ્રેમશંકર ભટ્ટ.

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दूसरों के कष्ट पर सच्चे मन से शोक करना चाहिए


Devrishi – Facebook

“दूसरों के कष्ट पर सच्चे मन से शोक करना चाहिए”

एक ब्राह्मण को विवाह के बहुत सालों बाद पुत्र हुआ लेकिन कुछ वर्षों बाद बालक की असमय मृत्यु हो गई।

ब्राह्मण शव लेकर श्मशान पहुँचा। वह मोहवश उसे दफना नहीं पा रहा था। उसे पुत्र प्राप्ति के लिए किए जप-तप और पुत्र का जन्मोत्सव याद आ रहा था। श्मशान में एक गिद्ध और एक सियार रहते थे। दोनों शव देखकर बड़े खुश हुए। दोनों ने प्रचलित व्यवस्था बना रखी थी – दिन में सियार माँस नहीं खाएगा और रात में गिद्ध।

सियार ने सोचा – यदि ब्राह्मण दिन में ही शव रखकर चला गया तो उस पर गिद्ध का अधिकार होगा। इसलिए क्यों न अंधेरा होने तक ब्राह्मण को बातों में फँसाकर रखा जाए।वहीं गिद्ध ताक में था कि शव के साथ आए कुटुंब के लोग जल्द से जल्द जाएँ और वह उसे खा सके।

गिद्ध ब्राह्मण के पास गया और उससे वैराग्य की बातें शुरू की। गिद्ध ने कहा – मनुष्यों, आपके दुख का कारण यही मोहमाया ही है। संसार में आने से पहले हर प्राणी का आयु तय हो जाती है। संयोग और वियोग प्रकृति के नियम हैं। आप अपने पुत्र को वापस नहीं ला सकते। इसलिए शोक त्यागकर प्रस्थान करें। संध्या होने वाली है। संध्याकाल में श्मशान प्राणियों के लिए भयदायक होता है इसलिए शीघ्र प्रस्थान करना उचित है।

गिद्ध की बातें ब्राह्मण के साथ आए रिश्तेदारों को बहुत प्रिय लगीं। वे ब्राह्मण से बोले – बालक के जीवित होने की आशा नहीं है। इसलिए यहाँ रुकने का क्या लाभ? सियार सब सुन रहा था। उसे गिद्ध की चाल सफल होती दिखी तो भागकर ब्राह्मण के पास आया। सियार कहने लगा – बड़े निर्दयी हो। जिससे प्रेम करते थे, उसके मृत-देह के साथ थोड़ा वक्त नहीं बिता सकते!! फिर कभी इसका मुख नहीं देख पाओगे। कम से कम संध्या तक रुककर जी भर के देख लो!

उन्हें रोके रखने के लिए सियार ने नीति की बातें छेड़ दीं – जो रोगी हो, जिस पर अभियोग लगा हो और जो श्मशान की ओर जा रहा हो उसे बंधु-बांधवों के सहारे की ज़रूरत होती है।सियार की बातों से परिजनों को कुछ तसल्ली हुई और उन्होंने तुरंत वापस लौटने का विचार छोड़ा।
अब गिद्ध को परेशानी होने लगी। उसने कहना शुरू किया – तुम ज्ञानी होने के बावजूद एक कपटी सियार की बातों में आ गए। एक दिन हर प्राणी की यही दशा होनी है। शोक त्यागकर अपने-अपने घर को जाओ। जो बना है वह नष्ट होकर रहता है। तुम्हारा शोक मृतक को दूसरे लोक में कष्ट देगा। जो मृत्यु के अधीन हो चुका क्यों रोकर उसे व्यर्थ कष्ट देते हो

लोग चलने को हुए तो सियार फिर शुरू हो गया – यह बालक जीवित होता तो क्या तुम्हारा वंश न बढ़ाता? कुल का सूर्य अस्त हुआ है कम से कम सूर्यास्त तक तो रुको!

अब गिद्ध को चिंता हुई। गिद्ध ने कहा – मेरी आयु सौ वर्ष की है। मैंने आज तक किसी को जीवित होते नहीं देखा। तुम्हें शीघ्र जाकर इसके मोक्ष का कार्य आरंभ करना चाहिए। सियार ने कहना शुरू किया – जब तक सूर्य आकाश में विराजमान हैं, दैवीय चमत्कार हो सकते हैं। रात्रि में आसुरी शक्तियाँ प्रबल होती हैं। मेरा सुझाव है थोड़ी प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए।

सियार और गिद्ध की चालाकी में फँसा ब्राह्मण परिवार तय नहीं कर पा रहा था कि क्या करना चाहिए। अंततः पिता ने बेटे का सिर में गोद में रखा और ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगा। उसके विलाप से श्मशान काँपने लगा। तभी संध्या-भ्रमण पर निकले महादेव-पार्वती वहाँ पहुँचे। पार्वती जी ने बिलखते परिजनों को देखा तो दुखी हो गईं। उन्होंने महादेव से बालक को जीवित करने का अनुरोध किया।

महादेव प्रकट हुए और उन्होंने बालक को सौ वर्ष की आयु दे दी। गिद्ध और सियार दोनों ठगे रह गए। गिद्ध और सियार के लिए आकाशवाणी हुई – तुमने प्राणियों को उपदेश तो दिया उसमें सांत्वना की बजाय तुम्हारा स्वार्थ निहीत था। इसलिए तुम्हें इस निकृष्ट योनि से शीघ्र मुक्ति नहीं मिलेगी।

दूसरों के कष्ट पर सच्चे मन से शोक करना चाहिए। शोक का आडंबर करके प्रकट की गई संवेदना से गिद्ध और सियार की गति प्राप्त होती है।

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भारत में कुल 6 स्थान ऐसे है जहा रावण को जलाया नहीं बल्कि पूजा जाता है।


भारत में कुल 6 स्थान ऐसे है जहा रावण को जलाया नहीं बल्कि पूजा जाता है।
आइए समझते है क्यों।

राजस्थान (जोधपुर)

राजस्थान के जोधपुर में रावण का मंदिर है। यहां एक खास समाज के लोग रावण की पूजा करते हैं और खुद को उसका वंशज मानते हैं। ये लोग दशहरे के लदिन रावण का पुतला जलाने की बजाय उसकी पूजा करते हैं।

मध्यप्रदेश (मंदसौर)

मध्यप्रदेश के मंदसौर में रावण को पूजा जाता है। दरअसल, ऐसी मान्यता है कि मंदसौर का असली नाम दशपुर था और रावण की पत्नी मंदोदरी यहीं की थी यानी यह रावण का ससुराल हुआ। इसलिए यहां के लोग रावण को दामाद की तरह इज्ज़त देते हैं और उसकी पूजा करते हैं।

कनार्टक (कोलार)

कनार्टक के कोलार जिले में भी रावण को पूजा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि रावण भगवान शिव का भक्त था, यही वजह है कि लोग रावण की पूजा करते हैं। कर्नाटक के मंडया जिले के मालवली नामक स्थान पर रावण का मंदिर भी है जहां महान शिव भक्त के रूप में उसकी पूजा की जाती है।

आंध्रप्रदेश (काकिनाड)

आंध्रप्रदेश के काकिनाड में रावण का मंदिर बना हुआ है। यहां आने वाले लोग भगवान राम की शक्तियों को मानने से इनकार नहीं करते, लेकिन वे रावण को ही शक्ति सम्राट मानते हैं। इस मंदिर में भगवान शिव के साथ रावण की भी पूजा की जाती है।

हिमाचल_प्रदेश (बैजनाथ)

हिमाचल के कांगड़ा जिले के बैजनाथ नामक कस्बे में भी रावण की पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि इसी जगह पर रावण ने भगवान शिव की तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे मोक्ष का वरदान दिया था। इसके अलावा यहां के लोगों का यह भी मानना है कि रावण का पुतला जलाने पर उनकी मौत हो सकती है, इस डर से भी यहां रावण दहन नहीं होता है।

उत्तर_प्रदेश (बिसरख)

उत्तर प्रदेश के बिसरख गांव में भी रावण का एक मंदिर बना हुआ है और यहां उसकी पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि बिसरख गांव रावण का ननिहाल है।

 वैसे भी आपको एक ज्ञान की बात बताऊं कि आप उस समय ही रावण दहन देखे जब आप मद, मोह, अहंकार, लालच आदि दुर्गुणों से मुक्त हो। जानते हो रावण प्रखंड विद्वान था। सारे ग्रह उसकी मुट्ठी में थे। 

  लेकिन हम उससे भी बढ़े रावण होकर हर वर्ष दहन करते। यदि करना ही है तो हम अपनी बुराई का दहन करे। हर वर्ष एक बुराई त्याग करे।

 ये मेरे अपने मत है। कृपया अन्यथा न ले।

हंस जैन रामनगर खंडवा
9827214427

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महात्मा-बिच्छू की कहानी और सुंदरी की एंट्री


एक बार एक महात्मा नदी के घाट पर नहाने के लिए पहुंचे। नहाने के लिए जैसे ही नदी में उतरने वाले थे कि उन्होंने देखा कि एक बिच्छू नदी में डूब रहा है। उन्होंने आव देखा ना ताव, तत्काल उसे अपने हाथ से उठाकर किनारे रखने की कोशिश करने लगे। बिच्छू ने उन्हें डंक मार दिया। 

हाथ कांपा तो बिच्छू फिर से पानी में गिर पड़ा। उन्होंने फिर उसे हाथ से ही उठाकर किनारे रखने की कोशिश की, फिर बिच्छू ने डंक मारा, हाथ कांपा बिच्छू पानी में गिर पड़ा। ऐसा तीन बार हुआ। तभी पास में नहा रही एक सुंदरी से रहा नहीं गया। उसने पास आकर पूछा- क्यों जी, वो बार-बार आपको डंक मार रहा है, आप उसे बार-बार हाथ से ही पानी में से निकालने में लगे हैं?

महात्मा बोले – जब वो बिच्छू होकर अपनी आदत नहीं छोड़ रहा तो मैं तो महात्मा हूं, भलाई की अपनी आदत कैसे छोड़ दूं। इससे आगे की कहानी: उस रूपसी ने रीझकर महात्मा जी से शादी कर ली। महात्मा जी ने घर में ही बाल्टी भरकर नहाना शुरू कर दिया। बिच्छू को स्वर्ग मिला न मिला, भगवान जाने, महात्मा जी को जीते जागते स्वर्ग मिल गया। 

मॉरल ऑफ द स्टोरी – फल पाने के लिए भयंकर घोर तपस्या की जरूरत नहीं। कई बार फल केवल भयंकर प्रैक्टिकल एप्रोच के दम पर ही मिल सकते हैं।

Sep 29, 2018 dainik Bhaskar

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मैं वही मेंढक हूं


नमस्ते इंसानों, 
मैं वही मेंढक हूं, जिसकी तुम लोगों ने अपने फायदे के लिए जबरन शादी करा दी थी। मैं बस ये पूछना चाहता हूं कि जब अपने फायदे के लिए अपने बच्चों की जबरन शादी कराने का ऑप्शन तुम्हारे पास था, तो मुझे बलि का मेंढक क्यों बनाया? इंसानों ने मेरी शादी कराई क्योंकि उन्हें लगा इससे काले बादल आएंगे और पानी बरसा जाएंगे। इंसानों तुम बिल्कुल भी नहीं बदले हो, तुम वही हो जो एक नेता हटाकर दूसरा नेता ले आते हो और ये सोचते हो कि इससे कालाधन आ जाएगा। 


यकीन मानो अगर हमारी शादी से पानी बरसता तो हमारे घर वाले इतनी ‘अरेंज मैरिजें’ करवाते कि साल भर पानी बरसता, बाढ़ आती और दुनिया में सिर्फ मेंढक बच पाते। पर गलती तुम्हारी नहीं है, तुमने इंसान होकर बस यही सीखा है। कोई भी समस्या हो तुम्हारे पास दो ही उपाय होते हैं, ‘सुबह जल्दी उठो’ या ‘शादी कर लो’। लोग कहते हैं मेंढक टर्र-टर्र करते हैं, जबकि हमने तो टर्र-टर्र करना भी तुम्हारे ‘शादी कर लो-शादी कर लो’ वाली टेर को सुनकर सीखा है। 


इंसानों मुझे शिकायत है तुमसे, इसलिए कि तुम मतलबी हो, इसलिए कि तुम अंधविश्वासी हो, इसलिए कि तुमने एक मेंढक की मर्ज़ी पूछे बिना उसकी शादी करा दी और सबसे बड़ी बात इसलिए कि तुमने कभी मेंढकों को मेंढकोचित सम्मान नहीं दिया। वो क्या कहते हो तुम? ‘घोड़े की नाल ठुकी तो मेंढक ने भी पैर उठा दिए।’ ये सोच है तुम्हारी हम मेंढकों के बारे में और उम्मीद ये रखते हो कि हमारे पाणिग्रहण से तुम्हारे पानी का ग्रहण खत्म होगा? जब हम अपना काम कर रहे थे, जब हम खुश थे, जब पानी बरस रहा था तब तो तुमने हमारी परवाह नहीं की। जब पानी बरसता और हम बोलते तो हमारी आवाज तुमसे नहीं सही जाती थी। हमारी आदतों को तुम दूसरे को नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल करते थे, कहते थे ‘बरसाती मेंढक बोलने लगे।’ अब जाओ, न हम बोलेंगे न बरसात होगी। 


याद रखना, संघर्ष करना भी तुमने हमसे ही सीखा है, याद करो वो कहानी जिसमें दो मेंढक दूध में गिर गए थे, लेकिन एक मेंढक हाथ-पैर चलाता रहा और मक्खन जमने पर बाहर आ गया था, लेकिन अब क्या ही कहूं तुम्हारे लालच को, आजकल तो दूध में भी इतना पानी मिलाने लगे हो तुम इंसान कि भलाई और मलाई का जमाना ही नहीं रह गया। 


2018 लग चुका है, इंसान मंगल तक पहुंचने की कोशिश में लगा है। मैं मंगल ग्रह नहीं, मंगलवार की बात कर रहा हूं, जैसे-तैसे सोमवार का ऑफिस झेलने के बाद मंगल को ऑफिस पहुंचने की कोशिश में लगा है। और तुम इतने अंधविश्वासी हो कि हमारी शादी से पानी बरसाना चाहते हो। हमें कूप मंडूक कहने वालों तुम क्या जानो 2बीएचके कुआं आजकल कितना महंगा आता है, गृहस्थी जमाने के लिए कुआं चाहिए होता है। जब से शादी करके लौटा हूं, घर वाले ‘गेट वेल (कुआं) सून’ कहने लगे हैं। 

तुमसे प्रताड़ित, 
नवविवाहत मेंढक।  

Sep 14, 2018 DainikBhaskar

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चिंता नहीं, चिंतन कीजिए


चिंता नहीं, चिंतन कीजिए 🔆

🔷 गृहस्थ जीवन में अनेकों जिम्मेदारियाँ कंधे पर आती हैं, कईं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पर इनसे घबराने से लाभ क्या? कभी-कभी जीवन-साथी से भी इसका समाधान मिल जाता है।
👉 एक सेठजी थे। सेठजी जब भी घर में आते तो तिल का ताड़ बनाते। घर के सभी लोगों को विशेषतया पत्नी को असमंजस में डाल देते। यह एक प्रकार से उनकी आदत बन गई थी।
🔶 पत्नी ने उनका चिंतन सुधारने लिए एक नाटक रचा। चारपाई पर रोनी सूरत बनाकर सो गई । घर का कोई काम न किया। दुकान पर से सेठजी आये, वे भी चिन्तित हुए और कारण पूछा। पत्नी ने कहा- “आज एक पहुंचे हुए ज्योतिषी आये थे, हाथ देखकर बता गये है कि तू साठ वर्ष तक जियेगी और आठ बच्चे होंगे। मैं सोच रही हूं कि साठ साल में कितना अनाज खा जाऊंगी। बच्चों के प्रसव की कितनी पीड़ा निकल जाएगा।”
🔷 सेठजी ने झिड़का और कहा- “इतना सब एक दिन में थोड़े ही होगा। समय के साथ आने और खर्च होने का काम चलता रहेगा। तू व्यर्थ चिन्ता करती है।
अब स्त्री की बन आई। उनके कहा- “तुम भी तो रोज भविष्य की चिन्ता ही मुझसे कहते हो। इतनी जिम्मेदारियां निभाने को पड़ी, उन्हें पूरा करना तो दूर तुम प्रयास ही नहीं करते। यह क्यों नहीं कहते कि समयानुसार समस्याओं के हल भी निकलते रहेंगे।

👉 हम सभी जीवन में किसी न किसी समस्या से जूझ रहे होते हैं। हर किसी के पास अपने-अपने स्तर की समस्याएं होती हैं। लेकिन यदि हम भविष्य में आने वाली हर समस्या के लिए आज ही चिंता करने लगेंगे तो उनका हल कैसे ढूंढ पाएंगे? चिंता किसी भी समस्या का हल नहीं है।
👉 इसलिए चिंता छोड़ कर चिंतन की ओर बढ़ें और अपने वर्तमान को सुधारें, भविष्य अपने आप सुधर जायेगा। भविष्य की समस्याओं को समय पर छोड़ दें, समयानुसार समस्याओं के हल भी निकलते रहेंगे।

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विद्वत्ता का घमंड


विद्वत्ता का घमंड
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महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था. शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था. अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया.
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उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा. उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं. एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए.
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गर्मी का मौसम था. धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग आई. थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी. पानी की आशा में वह उस ओर बढ चले. झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था.
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कालिदास ने सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए. उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली. बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी.
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कालिदास उसके पास जाकर बोले- बालिके ! बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे. बच्ची ने पूछा- आप कौन हैं ? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए. कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता ?
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फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले- बालिके अभी तुम छोटी हो. इसलिए मुझे नहीं जानती. घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो. वह मुझे देखते ही पहचान लेगा. मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर-दूर तक. मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूं.
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कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली-आप असत्य कह रहे हैं. संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं. अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं ?
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थोङा सोचकर कालिदास बोले- मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो. मेरा गला सूख रहा है. बालिका बोली- दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल’. भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें. देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है.
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कलिदास चकित रह गए. लड़की का तर्क अकाट्य था. बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे. बालिका ने पुनः पूछा- सत्य बताएं, कौन हैं आप ? वह चलने की तैयारी में थी.
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कालिदास थोड़ा नम्र होकर बोले-बालिके ! मैं बटोही हूं. मुस्कुराते हुए बच्ची बोली- आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं. संसार में दो ही बटोही हैं. उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं ? तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी.
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बच्ची बोली- आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते ? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है. बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं. आप तो थक गए हैं. भूख प्यास से बेदम हैं. आप कैसे बटोही हो सकते हैं ?
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इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई. अब तो कालिदास और भी दुखी हो गए. इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए. प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी. दिमाग़ चकरा रहा था. उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा. तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली.
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उसके हाथ में खाली मटका था. वह कुएं से पानी भरने लगी. अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास बोले- माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा.
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स्त्री बोली- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो. मैं अवश्य पानी पिला दूंगी. कालिदास ने कहा- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें. स्त्री बोली- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं. पहला धन और दूसरा यौवन. इन्हें जाने में समय नहीं लगता. सत्य बताओ कौन हो तुम ?
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अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश कालिदास बोले- मैं सहनशील हूं. अब आप पानी पिला दें. स्त्री ने कहा- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं. पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है. उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है.
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दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं. तुम सहनशील नहीं. सच बताओ तुम कौन हो ? कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले- मैं हठी हूं.
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स्त्री बोली- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं. सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास ने कहा- फिर तो मैं मूर्ख ही हूं.
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नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो. मूर्ख दो ही हैं. पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है.
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कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे. वृद्धा ने कहा- उठो वत्स ! आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी. कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए.
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माता ने कहा- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार. तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा.
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कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े.