Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

ओम प्रकाश त्रेहन

आदिशंकराचार्यकेअनमोलकथन :-

आदि शंकराचार्य जयंती के उपलक्ष्य में

आदि शंकराचार्य जी ने 7 वर्ष की आयु में जब मां से सन्यास के लिए विदा ली थी तब मां को आश्वस्त किया था कि तुम्हारे देहावसान पर अग्नि देने मै अवश्य आऊंगा ।
कलाड़ी गांव में जब वह पुनः आये तब उनकी माताजी का देहांत हुआ । लेकिन तब यह विवाद पैदा हुआ कि एक सन्यासी द्वारा मां का क्रियाकर्म कैसे किया जा सकता है ? इतना ही नही , सभी ने आदि शंकराचार्य का बहिष्कार किया । फलस्वरूप आदि शंकराचार्य को स्वयं ही अत्यंत ही कठिन परिस्थितियों के बीच मां का अंतिम संस्कार करना पड़ा ।

विगत पोस्ट से अब आगे
आदि शंकराचार्य जी ने कलयुग के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से समाप्त किया ।
उनका कहना था कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं। हमें अज्ञानता के कारण ही ये दोनों अलग-अलग प्रतीत होते हैं।

आदि शंकराचार्य के अनमोल कथन :-

1 : मंदिर वही पहुंचता है जो धन्यवाद देने जाता हैं, मांगने नहीं।

2 : मोह से भरा हुआ इंसान एक स्वप्न की भांति हैं,तभी तक रहता है जब तक आप अज्ञान की नींद में सोते है। जब नींद खुलती है तो इसकी कोई सत्ता नही रह जाती है ।

3 : जिस तरह एक प्रज्वलित दीपक कॉ चमकने के लिए दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है। उसी तरह आत्मा स्वयं ही ज्ञान स्वरूप है उसे और क़िसी ज्ञान की आवश्यकता नही होती है, अपने स्वयं के ज्ञान के लिए।

4 : तीर्थ करने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है। सबसे अच्छा और बड़ा तीर्थ आपका अपना मन है, जिसे विशेष रूप से शुद्ध किया गया हो।

5 : जब मन में सच जानने की जिज्ञासा पैदा हो जाए तो दुनियावी चीज़े अर्थहीन लगती हैं।

6 : हर व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि आत्मा एक राज़ा की समान होती है जो शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि से बिल्कुल अलग होती है। आत्मा इन सबका साक्षी स्वरुप है।

7 : अज्ञान के कारण आत्मा सीमित लगती है, लेकिन जब अज्ञान का अंधेरा मिट जाता है, तब आत्मा के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान हो जाता है, जैसे बादलों के हट जाने पर सूर्य दिखाई देने लगता है।

8 : धर्म की पुस्तके पढ़ने का उस समय तक कोई मतलब नहीं, जब तक आप सच का पता न लगा पाए। उसी तरह से अगर आप सच जानते है तो धर्मग्रंथ पढ़ने कि कोइ जरूरत नहीं हैं। सत्य की राह पर चले।

9 : आनंद हमे तभी मिलता जब आनंद की तालाश नही कर रहे होते है।

10 : एक सच यह भी है की लोग आपको उसी समय तक स्मरण करते है जब तक सांसें चलती हैं। सांसों के रुकते ही सबसे क़रीबी रिश्तेदार, दोस्त, यहां तक की पत्नी भी दूर चली जाती है।

11: आत्मसंयम क्या है ? आंखो को दुनियावी चीज़ों कि ओर आकर्षित न होने देना और बाहरी ताकतों को खुद से दूर रखना।

12 : सत्य की कोई भाषा नहीं है। केवल खोजना पड़ता है।

13 : सत्य की परिभाषा क्या है ? सत्य की इतनी ही परिभाषा है की जो सदा था, जो सदा है और जो सदा रहेगा।

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