Posted in रामायण - Ramayan

राकेश पांडे

।।जय श्री सीता राम।।

रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।
संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥

भावार्थ:-श्री रामजी अपार गुणों के समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतों से मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुना रहा हूँ ॥

भगवान् राम जब रावण को मारकर अयोध्या आयें और रामजी का राजतिलक हो गया, माता जानकीजी की ब्राह्मणों में बड़ी श्रद्धा है, अपने हाथ से ब्राह्मणों के लिये भोजन बनाती है, रामजी से एक दिन उदास होकर बोले- प्रभु क्या बताऊँ? बड़े प्रेम से भोजन प्रसादी हूं लेकिन जो भी ब्राह्मण देवता आते हैं वे थोड़ा सा पाकर ही उठ जाते हैं, कोई ढंग से भोजन पाता ही नहीं, कभी कोई ऐसा ब्राह्मण तो बुलाओ न प्रभु, जिन्हें मैं जिम्हाकर सन्तुष्ट हो सकू।

रामजी बोले- ऐसा मत कहो देवी, कभी कोई ऐसा ब्राह्मण आ गया तो आप भोजन बनाते-बनाते थक जाओगी, अभी आपने असली ब्राह्मण देखे कहां है? ठीक है किसी दिव्य ब्राह्मण को बुलाता हूंँ, मेरे प्रभु रघुवर आज समाधि लगाकर अगस्त्य मुनि के ध्यान में पहुंच गये, अगस्त्य मुनि वहीं है जो तीन अंजली में पूरे समुद्र को पी गये, अगस्त्य मुनि ने कहा- क्या आज्ञा है प्रभु?

रामजी ने कहा- सिताजी बड़ी तंग करती है बाबा, आज अपना असली रूप बता देना, अगस्त्य मुनि आ गयें, सिताजी ने स्वागत किया, चरणों में प्रणाम किया, चरण धोये, रामजी बोले- महाराज आप भोजन आज यहीं पर करें, अगस्त्यजी बोले, इच्छा तो नहीं है फिर भी आप कहते हैं तो थोड़ा बालभोग ले लेंगे, बाल भोग नास्ते को कहते हैं, माता जानकीजी बोली, मेरी इच्छा है कि अपने हाथ से भोजन बनाकर आपको परोसूं, बोले- हाँ, हाँ क्यों नहीं देवी।

माता जानकीजी ने देखा, दुबला-पतला सा संत है कितना खायेगा? रसोई घर के द्वार पर ही महाराज का आसन लगा दिया, सोने की थाली सज्जायी, उसमें पच्चास कटोरियां रखीं है, कई प्रकार के व्यंजन उनमें सज्जे है, थाली के बीच में पूड़ियां रख दी, अगस्त्य मुनि बैठे, अगस्त्य मुनि ने टेढ़ी नजर से रामजी की ओर देखा, रामजी ने इशारा किया हाँ हो जाओ शुरू, अगस्त्यजी ने कहा- जो आज्ञा।

जानकीजी ने कहा- महाराज भोजन करना शुरू कीजिये, अगस्त्यजी थाली की ओर देख रहे हैं और हंस रहे हैं, जानकीजी बोलीं, आप शुरू करिये न महात्मन्, अगस्त्य मुनि बोले- हंसी तो मुझे इसलिये आ रही है देवी कि कटोरी को आंख में डालूं कि नाक में डालूं या कान में डालूं, जानकीजी बोली क्यों महाराज? बोले, भोजन कराना है तो देवी ढंग से कराओ, नहीं तो रहने दो, जानकीजी तो बड़ी प्रसन्न हुई, कोई भोजन करने वाला तो आया, महाराज! आप पाइयें, मैं बनाती हूं।

सज्जनों! ग्यारह बजे भोजन शुरू किया गया और सायं का छः बज गया, उनको तो डकार भी नहीं आयी, जानकीजी ने पच्चीस बार तो आटा गूंथ लिया, जब सायंकाल हो गयी तो अगस्त्यजी से बोलीं और चाहिये? अगस्त्यजी बोले- अभी तो ठीक ढंग से शुरुआत ही नहीं हुई है, अभी से पूछने लगीं आप? जानकीजी ने कहा- नहीं बाबा ऐसी बात नहीं है आप प्रेम से भोजन पाइयें मैं अभी आती हूं।

जानकीजी ने गणेशजी की दोनों पत्नियों ऋद्धि-सिद्धि का आव्हान किया, दोनों देवी हाजिर हो गयीं और बोले आज्ञा माता, जानकीजी बोली- देखौ, महाराज अगस्त्य मुनि भोजन कर रहे हैं, कुछ भी हो जाय, भूखे नहीं उठने चाहिये, सारे भंडार खोल दो, लेकिन महात्मा भूखा नहीं उठे, ऋद्धि-सिद्धि जहां बैठ जाये वहां क्या कमी है? ऋद्धि-सिद्धियाँ पूरीयां बनाकर महाराज को परोसती जा रही है, महाराज बड़े प्रेम से भोजन कर रहे हैं।

तीन दिन और तीन रात्रि हो गये, महात्माजी का अखंड भोजन चल रहा है, ऋद्धि-सिद्धि भी परेशान हो गई तो माता जानकीजी ने गणपतिजी का आव्हान किया, गणेशजी हलवाई बनकर आ गये, बोले मैं देखता हूंँ ऋषि का पेट कैसे नहीं भरता है, मेरे से तो बड़ा पेटू नहीं होगा, पर वहां कहां पार पडने वाली तो फिर नव निधियों को बुलाया गया, ऋद्धि-सिद्धि और नवनिधि सब मिलकर पूड़ी बेल रही है और गणपति महाराज झरिया में पूड़ियां निकालकर अगस्त्यजी को परोसते जा रहे हैं, महाराजजी मुंह में उड़ेलते जा रहे हैं।

पन्द्रह दिन और पन्द्रह रात्रि पूरे हुए, बिना रुके भोजन चल रहा है, सिताजी अगस्त मुनि के पास आई और सोने की थाली हटा कर बड़ी सी परात रख दी, सिताजी सोचीयों मारे घरे आज कोई डाकी आन बेठगो, उठन रो तो नाम ही नहीं लेवे, जब सोलहवां दिन भी पूरा हो गया, अगस्त्य मुनि के चेहरे पर कोई शिकुड़न नहीं है, वो तो अविश्राम गति से भोजन करने में व्यस्त है, सत्रहवां दिन जब भोजन का चल रहा था तो जानकीजी आयीं और महाराज को प्रणाम किया।

अगस्त महाराज ने कहा, सौभाग्यवती रहो देवी, लेकिन बेटी में अभी कोई बात नहीं कर सकता, क्योंकि मैं भोजन में व्यस्त हूं, वार्ता बाद में करूंगा, जानकीजी बोली, मैं कोई बात करने नहीं आयी, महाराज! मैं तो इतना कहने आयी हूं कि आधा भोजन हो जाये तो पानी पीना चाहियें, अगस्त्य मुनि बोले, चिन्ता मत करो देवी, जब आधा भोजन हो जायेगा तो पानी भी पी लेंगे, जानकीजी बोली- हे भगवान्! ये कैसा महात्मा है? अभी आधा भोजन भी नहीं हुआ है।

महाराज का भोग चल रहा है, सत्रहवें दिन सायंकाल के भगवान् राघवेंद्र आये, रामजी ने आकर देखा कि जानकीजी चिन्तित है, गणपति महाराज भी चिंता में है, ऋद्धि-सिद्धि और नवनिधि सब हार चुकीं, रामजी ने जानकीजी से कहा- क्यों देवी? महाराज का भोजन अभी चल रहा है ना, जानकीजी बोली- सुनिये, ऐसा ब्राह्मण मेरे घर पर फिर कभी मत बुलाना, क्यों? ये भी कोई बात है? श्रद्धा की टांग तोड़कर रख दी, अट्ठारह दिन पूरे हो गये, बोलते है अभी आधा भी नहीं हुआ।

रामजी माता सीताजी से कहते हैं- आप रोज बोलतीं थीं न, तो अब कराओ ब्राह्मण देवता को भोजन, सीताजी ने कहा अब आगे तो भूल कर भी नहीं कहुंगी पर ऐसी कृपा करो कि यह ब्राह्मण मेरे द्वार से भूखा न जाये, भगवान् राम रसोईघर के द्वार पर गये, महाराज भोजन कर रहे हैं, अगस्त्यजी ने भोजन करते-करते तिरछी नजर से राम को देखा और इशारे से पूछा- बस, रहने दें कि और चले?

भगवान् ने कहा- बस रहने दो, रामजी के इशारे पर ही तो हो रहा था सारा काम, अट्ठारह दिन शाम को महाराज को डकार आयी, लाओ तो देवी आधा भोजन हो गया, जल पिलावो, रामजी ने कहा- देवी महाराज के लिये जल लाइयें, जानकीजी बोली, हमारे पास इतने जल की कोई व्यवस्था नहीं है, इतना पानी कहां से लायेंगे? दो-पांच घड़े से तो काम चलेगा नहीं।

अगस्त्यजी बोले- पानी भी पीते है तो फिर ढंग से ही पीते है, ऐसे रोज-रोज तो पीते नहीं, दो-चार युग में एक बार पीते है, रामजी ने कहा- तो महाराज पानी की व्यवस्था नहीं हो पा रही, एक काम करिये, आप तो योगी हो कई दिनों तक भूख व प्यास को रोक सकते हो, एक युग में भोजन करें दूसरे युग में पानी पीयें, आगे जो द्वापर युग आ रहा है, द्वापर युग में मैं गिरिराज को उठाऊँगा, क्रोध में आकर इन्द्र जितनी जल की वृष्टि करें आप सारा जल पी जाना।

Author:

Buy, sell, exchange books

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s