Posted in जीवन चरित्र

आदि शकराचार्य


ओम प्रकाश त्रेहन

आदि शंकराचार्य जी के पिता शिव गुरु जी तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे । उनके विवाह के कई वर्ष बाद भी उनकी से सन्तान नहीं हुई । उन्होंने अपनी पत्नी के साथ से संतान प्राप्ति के लिए कठोर साधना की। अंततः भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए और कहा , ” वर मांगो “
शिव गुरु ने एक दीघ्र आयु वाला सर्वज्ञ पुत्र मांगा ।

भगवान शंकर ने कहा, दीघ्र आयु वाला सर्वज्ञ नही होगा और सर्वज्ञ दीघ्र आयु का नही होगा ।
तब धर्म प्रेमी शिव गुरु ने सर्वज्ञ पुत्र की प्रार्थना की ।
भगवान शिवने पुनः कहा कि मैं स्वयं पुत्र रूप में तुम्हारे यहां अवतीर्ण होऊंगा ।
वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी के दिन मध्यकाल में दिव्य प्रकाश रूप , अति सुंदर , दिव्य , कान्तियुक्त बालक ने जन्म लिया आदि शकराचार्य जी ने 3 वर्ष की आयु में संस्कृत का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया । पिता के असमय निधन होने पर भी मां ने अपने उत्तरदायित्व के निर्वाह में कोई कमी नही आने दी । 5 वर्ष की आयु में यज्ञोपावित के बाद गुरुकुल भेज दिया गया । 2 वर्ष के कम समय मे कई शास्त्र कंठस्त कर लिए ।
गुरु घर मे एक बार वह परंपरानुसार भिक्षा मांगने एक ब्राह्मण के घर गए , वहां खाने के लिए एक दाना भी नहीं था ब्राह्मण की पत्नी ने शंकर के हाथ मे एक आंवला रख कर अपनी गरीबी के बारे में बताया । इसकी ऐसी स्थिति देख कर शंकर का मन द्रवित हो उठा , तब द्रवित मन से उन्हों ने मां लक्ष्मी का स्तोत्र रच निर्धन ब्राह्मण की निर्धनता दूर कर ने की प्रार्थना की । उसकी प्रार्थना से घर सोने के आंवलो की वर्षा हुई
इनके बारे में एक विस्मयपूर्ण कथा आती है कि इनकी मां स्नान के लिए दूर पूर्णा नदी जाना पड़ता था लेकिन वह मार्ग बदल कर इनके घर के पास बहने लगी ।
बालक शंकर वैदिक ज्ञान की संपदा से कंठस्थ हो अब 7 वर्ष के हो गए , उन्होंने मां से सन्यास के लिए आज्ञा मांगी । मां द्वारा मना करने पर उदास हो गए । एक दिन वह गांव के तालाब में नहा रहे थे कि एक मगरमच्छ की पकड़ में आ गए। बालक शंकर चिल्लाए और कहने लगे मां मेरा जीवन समाप्त होने वाला है, में बच सकता हूँ अगर शेष जीवन के लिए सन्यास में जाने की मुझे अनुमति दे दो ।
अब मां के पास कोई भी अन्य विकल्प था। मां ने कहा कि तुम्हारे पिता जी नहीं रहे , मेरी मृत्य पर मुझे अग्नि कौन देगा । बालक शंकर ने मां को आश्वस्त किया कि मां में जहां भी हूंगा लेकिन ऐसे समय तुम्हारे पास ही होगा ।
मां की अनुमति मिलने पर बालक शंकर ने 7 वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहण कर घर छोड़ दिया ।
सात वर्षीय सन्यासी बालक शंकर ने अपने भारत के सदूर दक्षिण के केरल गांव कलाड़ी से भारत की विलुप्त होती सनातन धर्म की बहती धारा को पुनः प्रवाह देने के लिए अपनी आध्यात्मिक यात्रा के लिए पैदल निकल पड़े और नर्मदा नदी के तट पर ओंकारनाथ पहुंचे। वहां तीन वर्ष गुरु गोविंद पाद से योग शिक्षा और अद्वेत ज्ञान प्राप्त करने लगे । तत्पश्चात वह गुरु आज्ञा से वह कांशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए निकल पड़े ।
जब वह कांशी जा रहे थे कि एक चांडाल मार्ग में आ गया, उन्होंने चंडाल को मार्ग से हटने को कहा। चांडाल ने उत्तर दिया कि मेरे अंदर भी वही परमात्मा है जो तुम्हारे अंदर है , फिर तुम किसे हटने को कह रहे हो ?
शंकर पीछे हटे और साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और कहा कि आपने जो मुझे ज्ञान दिया है, उससे आप मेरे गुरु हुए । शंकर की आध्यत्मिक चेतना से उन्हें शिव और चार देवो के दर्शन हुए ।
ब्रह्म और जीव मूल् में एक ही है इसमें जो अन्तर दिखाई देता है वह हमारा अज्ञान है । ज्ञान का यह अनुभव और उसकी अनुभूति शंकर को एक चांडाल से मिली ।
आदि शंकराचार्य के जीवन के एक महत्वपूर्ण घटना मंडन मिश्र से शास्त्रर्थ है । मंडन मिश्र की विद्वता की चर्चा सर्वत्र थी , यहां तक पिंजरे मे बन्द पालतू मैना भी संस्कृत बोलती थी । शास्त्रार्थ आरम्भ हुआ , आदि शंकराचार्य ने अपने तर्कों से पराजित कर ही दिया था तभी उनकी पत्नी भारती देवी बोली कि अभी आप की आधी विजय है , क्योंकि अभी आप ने आधे ही अंग को ही जीता है , मुझे हरा कर दिखाओ।
मंडन मिश्र की पत्नी ने ब्रह्मचारी आदिशंकराचार्य से कामशास्त्र पर प्रश्न पूछने आरम्भ कर दिए । वह भला कैसे उत्तर देते । आचार्य शंकर ने उत्तर देने की लिए समय मांगा ।
आचार्य ने तब एक मृत काया में प्रवेश किया और सारी अपेक्षित जानकारी के साथ अपने शरीर मे पुनः प्रवेश किया और मंडन मिश्र की पत्नी को उत्तर दिया और उन्हें पराजित किया । आचार्य शंकर ने सनातन धर्म की पुनः स्थापना के लिए अनेक शास्त्रार्थ और सम्पूर्ण भारत मे सनातन धर्म को शास्त्र सम्मत स्वरूप दिया ।
महर्षि वेदव्यास जानते थे कि कलयुग में लोगों के लिए स्मृति (स्मरण रखना) और श्रुति ( सुनना ) बहुत कठिन होगा इसीलिए सभी धर्म ग्रंथों को लिपिबद्ध किया ।
कलयुग के 2500 वर्ष बाद बुद्ध मत और जैन मत के प्रादुर्भाव से सनातन धर्म और उसके ग्रंथ लुप्त हो गए ।
तब आदि शंकराचार्य जी ने सम्पूर्ण भारत के बौद्धमत और जैन मत के धर्मचारियों को सनातन धर्म के तर्कों और तथ्यों से परास्त कर पुनः सनातन धर्म को स्थापित किया ।
भारत को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार कोनों में चार वेदों के लिए चार मठ स्थापित किया । हर मठ को एक वेद वाक्य के उदघोष से जोड़ा गया ।
भारत की आध्यात्मिक एकता का आधार है चार वेदों पर चार मठ।
आगे का विवरण अगली बार

Author:

Buy, sell, exchange books

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s