Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

अरुण सुक्ला

मुल्तान विजय के बाद कासिम के आतंकवादियों ने एक विशेष सम्प्रदाय हिन्दू के ऊपर गांवो शहरों में भीषण रक्तपात मचाया था। हजारों स्त्रियों की छातियाँ नोच डाली गयीं, इस कारण अपनी लाज बचाने के लिए हजारों सनातनी किशोरियां अपनी शील की रक्षा के लिए कुंए तालाब में डूब मरीं।लगभग सभी युवाओं को या तो मार डाला गया या गुलाम बना लिया गया। अरब ने पहली बार भारत को अपना इस्लाम धर्म का रूप दिखाया था।

एक बालक तक्षक के पिता कासिम की सेना के साथ हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। लुटेरी अरब सेना जब तक्षक के गांव में पहुची तो हाहाकार मच गया। स्त्रियों को घरों से खींच खींच कर उनकी देह लूटी जाने लगी।भय से आक्रांत तक्षक के घर में भी सब चिल्ला उठे। तक्षक और उसकी दो बहनें भय से कांप उठी थीं।

तक्षक की माँ पूरी परिस्थिति समझ चुकी थी, उसने कुछ देर तक अपने बच्चों को देखा और जैसे एक निर्णय पर पहुच गयी। माँ ने अपने तीनों बच्चों को खींच कर छाती में चिपका लिया और रो पड़ी। फिर देखते देखते उस क्षत्राणी ने म्यान से तलवार खीचा और अपनी दोनों बेटियों का सर काट डाला।उसके बाद अरबों द्वारा उनकी काटी जा रही गाय की तरफ और बेटे की ओर अंतिम दृष्टि डाली, और तलवार को अपनी छाती में उतार लिया।

आठ वर्ष का बालक तक्षक एकाएक समय को पढ़ना सीख गया था, उसने भूमि पर पड़ी मृत माँ के आँचल से अंतिम बार अपनी आँखे पोंछी, और घर के पिछले द्वार से निकल कर खेतों से होकर जंगल में भाग गया।

पचीस वर्ष बीत गए। अब वह बालक बत्तीस वर्ष का पुरुष हो कर कन्नौज के प्रतापी शासक नागभट्ट द्वितीय का मुख्य अंगरक्षक था। वर्षों से किसी ने उसके चेहरे पर भावना का कोई चिन्ह नही देखा था। वह न कभी खुश होता था न कभी दुखी। उसकी आँखे सदैव प्रतिशोध की वजह से अंगारे की तरह लाल रहती थीं। उसके पराक्रम के किस्से पूरी सेना में सुने सुनाये जाते थे। अपनी तलवार के एक वार से हाथी को मार डालने वाला तक्षक सैनिकों के लिए आदर्श था। कन्नौज नरेश नागभट्ट अपने अतुल्य पराक्रम से अरबों के सफल प्रतिरोध के लिए ख्यात थे। सिंध पर शासन कर रहे अरब कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुके थे,पर हर बार योद्धा राजपूत उन्हें खदेड़ देते। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते नागभट्ट कभी उनका पीछा नहीं करते, जिसके कारण मुस्लिम शासक आदत से मजबूर बार बार मजबूत हो कर पुनः आक्रमण करते थे। ऐसा पंद्रह वर्षों से हो रहा था।

फिर से सभा बैठी थी, अरब के खलीफा से सहयोग ले कर सिंध की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण के लिए प्रस्थान कर चुकी है, और संभवत: दो से तीन दिन के अंदर यह सेना कन्नौज की सीमा पर होगी। इसी सम्बंध में रणनीति बनाने के लिए महाराज नागभट्ट ने यह सभा बैठाई थी। सारे सेनाध्यक्ष अपनी अपनी राय दे रहे थे…

तभी अंगरक्षक तक्षक उठ खड़ा हुआ…

“और बोला- महाराज, हमे इस बार दुश्मन को उसी की शैली में उत्तर देना होगा।”

महाराज ने ध्यान से देखा अपने इस अंगरक्षक की ओर, बोले- “अपनी बात खुल कर कहो तक्षक, हम कुछ समझ नही पा रहे।”

“महाराज, अरब सैनिक महाबर्बर हैं, उनके साथ सनातन नियमों के अनुरूप युद्ध कर के हम अपनी प्रजा के साथ घात ही करेंगे। उनको उन्ही की शैली में हराना होगा।”

महाराज के माथे पर लकीरें उभर आयीं, बोले-
“किन्तु हम धर्म और मर्यादा नही छोड़ सकते सैनिक। “

तक्षक ने कहा-
“मर्यादा का निर्वाह उसके साथ किया जाता है जो मर्यादा का अर्थ समझते हों। ये बर्बर धर्मोन्मत्त राक्षस हैं महाराज। इनके लिए हत्या और बलात्कार ही धर्म है।”

“पर यह हमारा धर्म नही हैं बीर”

“राजा का केवल एक ही धर्म होता है महाराज, और वह है प्रजा की रक्षा। देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें महाराज, जब कासिम की सेना ने दाहिर को पराजित करने के पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया था। ईश्वर न करे, यदि हम पराजित हुए तो बर्बर अत्याचारी अरब हमारी स्त्रियों, बच्चों और निरीह प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह महाराज जानते हैं।”

महाराज ने एक बार पूरी सभा की ओर निहारा, सबका मौन तक्षक के तर्कों से सहमत दिख रहा था। महाराज अपने मुख्य सेनापतियों मंत्रियों और तक्षक के साथ गुप्त सभाकक्ष की ओर बढ़ गए।

अगले दिवस की संध्या तक कन्नौज की पश्चिम सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चूका था, और आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।

आधी रात्रि बीत चुकी थी। अरब सेना अपने शिविर में निश्चिन्त सो रही थी। अचानक तक्षक के संचालन में कन्नौज की एक चौथाई सेना अरब शिविर पर टूट पड़ी। अरबों को किसी हिन्दू शासक से रात्रि युद्ध की आशा न थी। वे उठते,सावधान होते और हथियार सँभालते इसके पुर्व ही आधे अरब गाजर मूली की तरह काट डाले गए।

इस भयावह निशा में तक्षक का सौर्य अपनी पराकाष्ठा पर था।वह घोडा दौड़ाते जिधर निकल पड़ता उधर की भूमि शवों से पट जाती थी। आज माँ और बहनों की आत्मा को ठंडक देने का समय था….

उषा की प्रथम किरण से पुर्व अरबों की दो तिहाई सेना मारी जा चुकी थी। सुबह होते ही बची सेना पीछे भागी, किन्तु आश्चर्य! महाराज नागभट्ट अपनी शेष सेना के साथ उधर तैयार खड़े थे। दोपहर होते होते समूची अरब सेना काट डाली गयी। अपनी बर्बरता के बल पर विश्वविजय का स्वप्न देखने वाले आतंकियों को पहली बार किसी ने ऐसा उत्तर दिया था।

विजय के बाद महाराज ने अपने सभी सेनानायकों की ओर देखा, उनमे तक्षक का कहीं पता नही था।सैनिकों ने युद्धभूमि में तक्षक की खोज प्रारंभ की तो देखा-लगभग हजार अरब सैनिकों के शव के बीच तक्षक की मृत देह दमक रही थी। उसे शीघ्र उठा कर महाराज के पास लाया गया। कुछ क्षण तक इस अद्भुत योद्धा की ओर चुपचाप देखने के पश्चात महाराज नागभट्ट आगे बढ़े और तक्षक के चरणों में अपनी तलवार रख कर उसकी मृत देह को प्रणाम किया। युद्ध के पश्चात युद्धभूमि में पसरी नीरवता में भारत का वह महान सम्राट गरज उठा-

“आप आर्यावर्त की वीरता के शिखर थे तक्षक…. भारत ने अबतक मातृभूमि की रक्षा में प्राण न्योछावर करना सीखा था, आप ने मातृभूमि के लिए प्राण लेना सिखा दिया। भारत युगों युगों तक आपका आभारी रहेगा।”

इतिहास साक्षी है, इस युद्ध के बाद अगले तीन शताब्दियों तक अरबों में भारत की तरफ आँख उठा कर देखने की हिम्मत नही हुई। तक्षक ने सिखाया कि मातृभूमि के लिए प्राण दिए ही नही लिए भी जाते हैं

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मनुवाद की वापसी


संजय गुप्ता

* मनुवाद की वापसी*

आपने अपने शास्त्रों का एवं ब्राह्मणों का खूब मज़ाक उड़ाया था जब वह यह कहते थे कि जिस व्यक्ति का आप चरित्र न जानते हों, उससे जल या भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए ।

*क्योंकि आप नहीं जानते कि अमुक व्यक्ति किस विचार का है , क्या शुद्धता रखता है ,कौन से गुण प्रधान का है , कौन सा कर्म करके वह धन ला रहा है , शौच या शुचिता का कितना ज्ञान है , किस विधा से भोजन बना रहा है , उसके लिए शुचिता या शुद्धता के क्या मापदंड हैं इत्यादि !!!*

जिसका चरित्र नहीं पता हो , उसका स्पर्श करने को भी मना किया गया है । यह बताया जाता था कि हर जगह पानी और भोजन नहीं करना चाहिए , तब English में american और british accent में आपने इसको मूर्खता और discrimination बोला था !!

बड़ी हँसी आती थी तब आपको !!!! बकवास कहकर आपने अपने ही शास्त्र और ब्राह्मणों को दुत्कारा था ।

*और आज ??????*

यही जब लोग विवाह के समय वर वधु की 3 से 4 पीढ़ियों का अवलोकन करते थे कि वह किस विचारधारा के थे ,कोई जेनेटिक बीमारी तो नहीं , किस height के थे , कितनी उम्र तक जीवित रहे , खानदान में कोई वर्ण संकर का इतिहास तो नहीं रहा इत्यादि ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि आने वाली सन्तति विचारों और शरीर से स्वस्थ्य बनी रहे और बीमारियों से बची रहे , जिसे आज के शब्दों में *GENETIC SELECTION* बोला जाता है ।

जैसे आप अपने पशु कुतिया के लिए कुत्ता ढुंढते हैं तो यह ध्यान रखते हैं कि अमुक कुत्ता बीमारी विहीन हो , अच्छे “नस्ल” का हो । ताकि कुतिया के बच्चे बेचकर मोटा पैसा कमा सको।

ऐसा तो नहीं कहते न कि गली में इतने कुत्ते हैं तो दुसरे कुत्ते की क्या जरूरत है। इसको जिससे प्रेम हो उससे गर्भाधान करा लें । तब तो समझ रहे हैं न कि आपकी कुतिया का क्या हश्र होगा और आने वाली generation क्या होगी !!!!!

*पर आप इन सब बातों पर हंसते थे ।।।*

यही शास्त्र जब बोलते थे कि जल ही शरीर को शुद्ध करता है और कोई तत्व नहीं ,बड़ी हँसी आयी थी आपको !!
तब आपने बकवास बोलकर अपना पिछवाड़ा tissue paper से साफ करने लगे ,खाना खाने के बाद जल से हाथ धोने की बजाय tissue पेपर से पोंछ कर इतिश्री कर लेते थे ।

*और अब ????*

जब यही ब्राह्मण और शास्त्र बोलते थे कि भोजन ब्रह्म के समान है और यही आपके शरीर के समस्त अवयव बनाएंगे और विचारों की शुद्धता और परिमार्ज़िता इसी से संभव है इसलिए भोजन को चप्पल या जूते पहनकर न छुवें ।
बड़ी हँसी आयी थी आपको !! Obsolete कहकर आपने खूब मज़ाक उड़ाया !!!
जूते पहनकर खाने का प्रचलन आपने दूसरे देशों के आसुरी समाज से ग्रहण कर लिया । Buffet system बना दिया ।
उन लोगों का मजाक बनाया जो जूते चप्पल निकालकर भोजन करते थे ।

अरे हमारी कोई भी पूजा , यज्ञ, हवन सब पूरी तरह स्वच्छ होकर , हाथ धोकर करने का प्रावधान है ।
पंडित जी आपको हाथ में जल देकर हस्त प्रक्षालन के लिए बोलते हैं । आपके ऊपर जल छिड़ककर मंत्र बोलते हैं :-

*ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा ।।*
*यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्यभ्यन्तरः शुचिः ॥*
*ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु पुण्डरीकाक्षः पुनातु ।।*

*तब भी आपने मजाक उड़ाया ।*

जब सनातन धर्मी के यहाँ किसी के घर शिशु का जन्म होता था तो नातक लगता था । इस अवस्था में नामकरण संस्कार तक सबसे अलग रखा जाता है । उसके घर लोग , जल तक का सेवन नहीं किया जाता था जब तक उसके घर हवन या यज्ञ से शुद्धिकरण न हो जाये । प्रसूति गृह से माँ और बच्चे को निकलने की मनाही होती थी । माँ कोई भी कार्य नहीं कर सकती थी और न ही भोजनालय में प्रवेश करती थी ।
इसका भी आपने बड़ा मजाक उड़ाया ।।
ये नहीं समझा कि यह बीमारियों से बचने या संक्रमण से बचाव के लिए Quarantine किया जाता था या isolate किया जाता था ।
प्रसूति गृह में माँ और बच्चे के पास निरंतर बोरसी सुलगाई रहती थी जिसमें नीम की पत्ती, कपूर, गुग्गल इत्यादि निरंतर धुँवा दिया जाता था ।
उनको इसलिए नहीं निकलने दिया जाता था क्योंकि उनकी immunity इस दौरान कमज़ोर रहती थी और बाहरी वातावरण से संक्रमण का खतरा रहता था ।
लेकिन आपने फिर पुरानी चीज़ें कहकर इसका मज़ाक उड़ाया और आज देखिये 80% महिलाएँ एक delivery के बाद रोगों का भंडार बन जाती हैं कमर दर्द से लेकर , खून की कमी से लेकर अनगिनत समस्याएं ।

ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र के लिए अलग Quarantine या isolation की अवधी इसलिए क्योंकि हर वर्ण का खान पान अलग रहता था , कर्म अलग रहते थे जिससे सभी वर्णों के शरीर की immunity system अलग होता था जो उपरोक्त अवधि में balanced होता था ।

ऐसे ही जब कोई मर जाता था तब भी 12 दिन तक सूतक Isolation period था । क्योंकि मृत्यु या तो किसी बीमारी से होती है या वृद्धावस्था के कारण जिसमें शरीर तमाम रोगों का घर होता है । यह रोग हर जगह न फैले इसलिए 12 दिन का quarantine period बनाया गया ।

अरे जो शव को अग्नि देता था या दाग देता था । उसको घर वाले तक नहीं छू सकते थे 12 दिन तक । उसका खाना पीना , भोजन , बिस्तर , कपड़े सब अलग कर दिए जाते थे । पीपलपानी के दिन शुद्धिकरण के पश्चात , सिर के बाल हटवाकर ही पूरा परिवार शुद्ध होता था ।

तब भी आप बहुत हँसे थे । ब्राहम्णों ने पैसा कमाने के लिए बनाया है कहकर मजाक बनाया था !!!

जब किसी रजस्वला स्त्री को 4 दिन isolation में रखा जाता है ताकि वह भी बीमारियों से बची रहें और आप भी बचे रहें तब भी आपने पानी पी पी कर गालियाँ दी । और दो टके की अरुंधती राय जैसी रांडो को और फिल्मी प्रोड्यूसर को कौन कहे , वो तो दिमागी तौर से अलग होती हैं , उन्होंने जो ज़हर बोया कि उसकी कीमत आज सभी स्त्रियाँ तमाम तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर चुका रही हैं ।

जब किसी के शव यात्रा से लोग आते हैं घर में प्रवेश नहीं मिलता है और बाहर ही हाथ पैर धोकर स्नान करके , कपड़े वहीं निकालकर घर में आया जाता है , इसका भी खूब मजाक उड़ाया आपने ।

आज भी गांवों में एक परंपरा है कि बाहर से कोई भी आता है तो उसके पैर धुलवायें जाते हैं । जब कोई भी बहूं , लड़की या कोई भी दूर से आता है तो वह तब तक प्रवेश नहीं पाता जब तक घर की बड़ी बूढ़ी लोटे में जल लेकर , हल्दी डालकर उस पर छिड़काव करके वही जल बहाती नहीं हों , तब तक । इसे छुआछूत नाम दिया था न? तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूता चार का खूब नारा लगाया था ना?

*खूब मजाक बनाया था न ?*

इन्हीं सवर्णों को और ब्राह्मणों को अपमानित किया था जब ये गलत और गंदे कार्य करने वाले , माँस और चमड़ों का कार्य करने वाले लोगों को तब तक नहीं छूते थे जब तक वह स्नान से शुद्ध न हो जाये । ये वही लोग थे जो जानवर पालते थे जैसे सुअर, भेड़ , बकरी , मुर्गा , कुत्ता इत्यादि जो अनगिनत बीमारियाँ अपने साथ लाते थे ।
ये लोग जल्दी उनके हाथ का छुआ जल या भोजन नहीं ग्रहण करते थे तब बड़ा हो हल्ला आपने मचाया और इन लोगों को इतनी गालियाँ दी कि इन्हें अपने आप से घृणा होने लगी ।

यही वह गंदे कार्य करने वाले लोग थे जो प्लेग , TB , चिकन पॉक्स , छोटी माता , बड़ी माता , जैसी जानलेवा बीमारियों के संवाहक थे ,और जब आपको बोला गया कि बीमारियों से बचने के लिए आप इनसे दूर रहें तो आपने गालियों का मटका इनके सिर पर फोड़ दिया और इनको इतना अपमानित किया कि इन्होंने बोलना छोड़ दिया और समझाना छोड़ दिया ।

आज जब आपको किसी को छूने से मना किया जा रहा है तो आप इसे ही विज्ञान बोलकर अपना रहे हैं । Quarantine किया जा रहा है तो आप खुश होकर इसको अपना रहे हैं ।

जब शास्त्रों ने बोला था तो ब्राह्मणवाद बोलकर आपने गरियाया था और अपमानित किया था ।

आज यह उसी का परिणति है कि आज पूरा विश्व इससे जूझ रहा है ।

*याद करिये पहले जब आप बाहर निकलते थे तो आप की माँ आपको जेब में कपूर या हल्दी की गाँठ इत्यादि देती थी रखने को । यह सब कीटाणु रोधी होते हैं।*
शरीर पर कपूर पानी का लेप करते थे ताकि सुगन्धित भी रहें और रोगाणुओं से भी बचे रहें ।

लेकिन सब आपने भुला दिया ।।

आपको तो अपने शास्त्रों को गाली देने में और ब्राह्मणों को अपमानित करने में , उनको भगाने में जो आनंद आता है शायद वह परमानंद आपको कहीं नहीं मिलता ।

अरे ……!! अपने शास्त्रों के level के जिस दिन तुम हो जाओगे न तो यह देश विश्व गुरु कहलायेगा ।

तुम ऐसे अपने शास्त्रों पर ऊँगली उठाते हो जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति के मूर्ख 7 वर्ष का बेटा ISRO के कार्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाए ।

अब भी कहता हूँ अपने शास्त्रों का सम्मान करना सीखो । उनको मानो । बुद्धि में शास्त्रों की अगर कोई बात नहीं घुस रही है तो समझ जाओ आपकी बुद्धि का स्तर उतना नहीं हुआ है । उस व्यक्ति के पास जाओ जो तुम्हे शास्त्रों की बातों को सही ढंग से समझा सके । शायद मैं ही कुछ मदद कर दूँ । लेकिन गाली मत दो , उसको जलाने का दुष्कृत्य मत करो ।

*आपको बता दूँ कि आज जो जो Precautions बरते जा रहे हैं , मनुस्मृति उठाइये , उसमें सभी कुछ एक एक करके वर्णित है ।*

लेकिन आप पढ़ते कहाँ हैं , दूसरे की बातों में आकर प्रश्नचिन्ह उठायेंगे और उन्हें जलाएंगे ।

यह पोस्ट वैसे ही लम्बी हो गयी है अन्यथा आपको एक एक अवयव से रूबरू करवाता और पूरी तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण लेकर ।
क्योंकि जिसने विज्ञान का गहन अध्ययन किया होगा , वह शास्त्र वेद पुराण इत्यादि की बातों को बड़े ही आराम से समझ सकता है , corelate कर सकता है और समझा भी सकता है ।

*लेकिन मेरी यह बात स्वर्ण अक्षरों में लिख लीजिये कि मनुस्मृति से सर्वश्रेष्ठ विश्व में कोई संविधान नहीं बना है और एक दिन पूरा विश्व इसी मनुस्मृति संविधान को लागू कर इसका पालन करेगा ।*
Note it down !! Mark my words again !!

*मुझे आप गालियाँ दे सकते हैं ।

मुझे नहीं पता कि आप इतनी लंबी पोस्ट पढ़ेंगे या नहीं लेकिन मेरा काम है आप लोगों को जगाना , जिसको जगना है या लाभ लेना है वह पढ़ लेगा ।
यह भी अनुरोध करता हूँ कि सभी *ब्राह्मण* बनिये _( भले आप किसी भी जाति से हों )_ और *ब्राह्मणत्व* का पालन कीजिये इससे इहलोक और परलोक दोनों सुधरेगा…

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माफ़ नहीं कर पाऊंगी


माफ़ नहीं कर पाऊंगी :
********************

रात 10 बजे मुझे व्हाट्सएप्प आता है ।

” सर, बच्ची को बुख़ार है और खांसी भी । “

ओह , कब से ?

सर दो दिन से है ।
Moxclav और Paracetamol दे रही थी लेकिन आज सांसें भी तेज़ चल रही हैं ।

” उम्र कितनी है बच्ची की । “

“सर दो साल ।”

वह स्वयं एक शिशु रोग विशेषज्ञ है और बुद्धिमान है।

लेकिन साथ ही वह मां भी है और मां को ही वह अभी डॉक्टर के रूप से पहले रखना चाहती है , और अपने साथी सीनियर से चिकित्सकीय परामर्श चाहती है।

मैंने पूछा क्या Rhonchi ( फेंफड़ों से आने वाली सीटी सी आवाज़ जो डॉक्टर स्टेथो से सुन पाते हैं ) भी हैं ?

यस सर कुछ हैं ।

Respiratory rate क्या है ।

सर 50 के ऊपर ही है और बुखार 102 तक जा कर कम हो रहा है दवा से।

” सर बहुत चिन्ता हो रही है , कोरोना तो नहीं ?”

यह प्रश्न और इसका उत्तर मेरे लिए आसान नहीं था । खासकर जब मां मेडिक्ल कॉलेज में शिशुरोग विशेषज्ञ हो । ओपीडी , आई सी यू जैसी जगहों पर मरीज़ देख रही हो ? क्या पता कहीं से संक्रमित न हो गयी हो ?

” ऐसा मत सोचो । तुम बीमार हुई थीं ? खांसी , बुख़ार वगैरह ?”

नहीं , सर ।

“घर में कोई और बीमार ?”

नहीं सर ।

“तुम जिस जगह रहती हो वहां से भी कोरोना के केस रिपोर्टेड नहीं हैं ।
इसलिए चिंता मत करो, बेहद ही कम संभावना है कोरोना की । most probably Acute Bronchiolitis या Bacterial pneumonia होगा ।”

एक चेस्ट X ray करवा कर Whatsapp करो । और कुछ ब्लड रिपोर्ट। साथ ही दवाओं में कुछ परिवर्तन और Nebulization मैंने लिख दिया था ।

अगले दिन सुबह सारी जांचें उसने भेजी थीं ।

टी एल सी हल्का बढ़ा था, सी आर पी पॉजिटिव था लेकिन Chest X ray ठीक था ।

बच्ची को बुख़ार अब भी रह रह कर आ रहा था। सांसें पहले की तुलना में ज़रा ठीक थीं । उसने दूध पिया और हल्का कुछ खाया भी था ।

और यूं 5 दिन गुज़र गए। रोज़ व्हाट्सएप्प पर मैं स्थिति पूछता रहा ।

उसने मुझे फोन भी किया तो उसकी बातों में घबराहट को छुपाने की कोशिश थी। कोरोना की संभावना नहीं है मेरे कहने के बावज़ूद , खांसी , बुखार , उसके प्रशिक्षित मस्तिष्क को ऐसा मानने नहीं दे रहे थे कि कोरोना की संभावना नहीं ।

एक बार उसने कहा , “सर मेरी वज़ह से मेरी बच्ची को कोरोना हुआ तो
मैं खुद को माफ नहीं कर पाऊंगी ।”

लेकिन क्योंकि कोरोना की जांच करवाने का कोई भी क्राइटेरिया इस केस में फिट नहीं था । अतः मैंने उसे सांत्वना दी औऱ कहा ज़रूरत लगी तो हम उसे ज़रूर भर्ती करके जांच करवा लेंगे । लेकिन 1 दिन और धैर्य रखो । “

सौभाग्यवश अगले दिन से बच्ची को बुखार आना बंद हो गया औऱ वो ठीक हो गयी । लेकिन ये 5 दिन वो हर पल चिंतित थी । कई बार रोई थी।

बच्ची ठीक हो गई थी,
लेकिन यह पंक्ति अनजाने में व्यक्त, एक डॉक्टर मां की हमेशा याद रहेगी
“कि मेरी वज़ह से मेरी बच्ची को कोरोना हुआ तो मैं ख़ुद को माफ नहीं कर पाऊंगी । ” …,

अस्पतालों में काम करने वाली सभी महिलाएं चाहे वे डॉक्टर हों , नर्स हों , आया हों जिनके बच्चे छोटे हैं इस डर में जीती हैं । उन्हें स्वयं के संक्रमित होने के खतरे से कहीं अधिक
अपने उन बच्चों के लिए भय होता है जिनसे वे अलग भी नहीं रह सकतीं ।

सर्दी , खांसी बुखार अनेकों कारणों से होता है लेकिन इस समय हो तो पहला विचार कोरोना तो नहीं यही आएगा ।

ऐसे में जितना सम्मान इस समय चिकित्सकों , पुलिस इत्यादि का है उससे कहीं अधिक छोटे बच्चों की मायें जो बैंक, पुलिस , अस्पताल में काम कर रही हैं का है ।

सही के हीरो उन आंसुओं की वज़ह से कमज़ोर नहीं होते,
स्थापित होते हैं कि हाँ वे सही के हीरो हैं ।

Avyact agrawal जी की पोस्ट

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सिताला दुबे

धर्म का रहस्य! !

जाजलि नामके एक ऋषि थे। एक बार वे महातपस्वी ऋषि निराहार रहकर केवल वायु-भक्षण करते हुए काष्ठ की भाँति अविचलभाव से खड़े हो घोर तपस्या में प्रवृत्त हुए । उस समय उन्हें कोई ठूँठ समक्षकर एक चिड़िये का जोड़ा उनकी जटाओं में अपने रहने का घोंसला बनाकर कभी-कभी तो पाँच-दस दिन बाद भी लौटता था, पर ऋषि बिना हिले-डुले ही खड़े रहते थे।
एक बार-जब वे पक्षी उड़ने के बाद एक महीने तक वापस नहीं लौटे तब भी जाजलि ऋषि ज्यों- के- त्यों खड़े रहे। अपने मस्तक पर चिड़ियों के पैदा होने और बढ़ने आदि की बातें याद करके वे अपने को महान धर्मात्मा समझ आकाश की ओर देखकर बोल उठे, मैंने धर्म को प्राप्त कर लिया । इतनें में आकाश वाणी हुई- जाजलि तुम धर्म में तुलाधार की बराबरी नहीं कर सकते । काशीपुरी का धर्मात्मा तुलाधार भी ऐसी बात नहीं कहता ।
जाजलि को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे तुलाधार को देखने काशी आये । वहाँ पहुँच कर उन्होंने तुलाधार को सौदा बेचते हुए देखा । तुलाधार भी जाजलि को देखते ही उठकर खड़े हो गये फिर आगे बढ़कर बड़ी प्रसन्नता के साथ उन्होंने जाजलि का स्वागत करते हुए कहा- आप मेरे पास आ रहें हैं यह बात मुझे मालुम हो गयी थी । आपने समुद्रतट पर एक वन में रहकर बड़ी भारी तपस्या की है। उसमें सिद्धि प्राप्त होने के बाद आपने मस्तक पर चिड़ियों के बच्चे पैदा हुए, बड़े हुए और आपने उनकी भलीभाँति रक्षा की। जब वे इधर-उधर चले गये तब अपने को धर्मात्मा समझ कर आपको बड़ा गर्व हो गया। विप्रवर आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करुँ
जाजलि ने तुलाधार की बातों से अत्यन्त प्रभावित होकर उनके धर्म का रहस्य जानने की इच्छा व्यक्त की। रस, गन्ध, वनस्पति, ओषधि, मूल और फल आदि बेचने वाले तुलाधार को धर्म में निष्ठा रखने वाली बुद्धि कैसे प्राप्त हुई- यह जाजलि के लिये आश्चर्य की बात थी।
तुलाधार ने कहा – मैं परम प्राचीन और सबका हित करने वाले सनातन धर्म को उसके गूढ़ रहस्यों सहित जानता हूँ। किसी भी प्राणी से द्रोह न करके जीविका चलाना श्रेष्ठ माना गया हैं। मैं उसी धर्म के अनुसार जीवन-निर्वाह करता हूँ। काठ और घास-फूँस से छाकर मैंने अपने रहने के लिये यह घर बनाया है। छोटी-बड़ी चीजें तो बेचता हूँ, पर मदिरा नहीं बेचता। सब चीजे मैं दूसरों के यहाँ से खरीदकर बेचता हूँ, स्वयं तैयार नहीं करता। माल बेचने में किसी प्रकार की ठगी या छल-कपट से काम नहीं लेता। मैं न किसी से मेल-जोल बढ़ाता हूँ, न विरोध करता हूँ, मेरा न कहीं राग हैं, न द्वेष, सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति मेरे मन में एक-सा भाव है। यही मेरा व्रत है। मेरा तराजू सबके लिये बराबर तौलता है। मैं दूसरों के कार्यो की निन्दा या स्तुति नहीं करता। मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने में भेद नहीं मानता। अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म मानता हूँ। धर्म का तत्व अत्यन्त सूक्ष्म हैं, कोई भी धर्म निष्फल नहीं होता। लोगों की देखा-देखी नहीं करता। जो मुझे मानता हैं तथा जो मेरी प्रशसां करता है, वे दोनों ही मेरे लिये समान हैं, मैं उनमें से किसी को प्रिय और अप्रिय नहीं मानता।

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एक किस्सा बताता हूं, जरा ध्यान से समझिएगा


जय कुमार

एक #किस्सा बताता हूं, जरा #ध्यान से #समझिएगा!

किसी लड़के ने अपने आस पड़ोस के किसी #लड़की को #छेड़ दिया। ये बात लड़की के घर वालों को #पता चल गई।

लड़की के घर वाले #डंडा लेकर उस लड़के को #पीटने के लिए उसके घर पर पहुंचे, लेकिन उन्होंने देखा कि उस लड़के को उसका पिता खूब जोर जोर से लात मुक्कों से #पीटा जा रहा है और साथ ही साथ बोले जा रहा है….

“नालायक! तू मर क्यों नहीं गया? अपने आस पड़ोस कि लड़की को छेड़कर खानदान का नाम बदनाम कर रहा है??? तू नर्की है, तूने खानदान का नाम मिट्टी में मिला दिया।”

लड़की के घर वालों ने देखा कि जब लड़के का पिता खुद अपराध बोध से पीड़ित है, लड़के को लगातार पिटे जा रहा है… ऐसे में हमारा कोई #प्रतिक्रिया करना गलत होगा ।

लड़के की पिटाई होता देख लड़की के रिश्तेदार बिना कुछ बोले चले गए।

लड़की वाले जैसे ही वहां से गए, लड़के के पिता ने अपने बेटे को #पुचकारते हुए बोला… “मेरे बेटे को चोट तो नहीं लग गई???

….क्या करता बेटा??? अगर मैं नहीं तुझे पीटता तो वो लोग तुझे पीट पीट कर मार देते, उन लोगों से बचाने के लिए तुझे पीटा हूं।”

#सलमान_खान ने भी योगी सरकार से अपने #कौम को #बचाने के लिए यही किया है और बेचारे हिंदू लोग बिना कुछ समझे उसकी जय जयकार किए जा रहे हैं।

फिलहाल #कूलडूड को मजे करने के लिए छोड़ दो #भाईजान का #लॉन्च किया हुआ गाना “#प्यारकोरो_ना” को प्यार से सुनकर मजे ले रहे हैं

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