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तात्याटोपेजीकोनहींहुईथी_फांसी

आज बहुत लोगो के मन में एक भ्रांति है कि तात्या टोपे जी को १८ अप्रैल १८५९ यानी की आज ही के दिन उनको फांसी हुई थी लेकिन ये एक मिथ्या अवधारणा है । क्योंकि तात्या टोपे जी को फांसी हुई ही नहीं थी । तात्या टोपे जी की मृत्यु तो उसके पहले ही युद्ध में गोली लगने से हो गई थी ।

१ जनवरी १८५९ को मालवा के क्षेत्र में तात्या टोपे जी की लड़ाई जनरल सोमरसेट के साथ हुई थी और ये उनकी अंतिम लड़ाई थी और इसी लड़ाई में उनको गोली लगने से उनकी मृत्यु हो गई थी ।

गोली लगने के दो दिन के अंदर मानसिंह और नाना साहब ने उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया था । इस बात की अंग्रेजो को भनक भी नहीं लगी कि उनकी मृत्यु हो गई है ।

और हमेशा कोई ना कोई सेवक उनके रूप में आगे आ जाता था और वो सेवक आगे आ कर उनके वेश में और उनकी ही तरह आगे आ करके लड़ता था । इसी प्रकार उनके बहुत सेवक उनके जैसा बनके अंग्रेजो के साथ युद्ध लड़ते रहे और अंग्रेजो को पता भी नहीं चला कि उनकी मृत्यु हो गई है ।

और अंत में एक जंगल से जिनको पकड़ा गया वो एक और उनके सेवक थे और १८ अप्रैल १८५९ को उनके सेवक को फांसी हुई थी । ना की तात्या टोपे जी को । क्योंकि तात्या टोपे जी की मृत्यु उसके पहले ही युद्ध के मैदान में गोली लगने से हो गई थी । और उस अंग्रेज को भी नहीं पता चला था कि उनकी मृत्यु हो गई है । अंग्रेजो को लगा था कि वो सिर्फ गोली लगने से घायल हुए है । लेकिन उनकी मृत्यु हो चुकी थी ।

इस रिसर्च का श्रेय तात्या टोपे जी के वंशज पराग टोपे जी को जाता है उन्होंने तात्या तोपे जी पर रिसर्च करके बहुत दस्तावेज इकठ्ठे किए ।

अतः ये मिथ्या अवधारणा ना फैलाए की उनको फांसी पर
चढ़ाया गया था फांसी पर उनके सेवक चढ़े थे ।

अतः हमे तात्या टोपे जी के सेवक का भी योगदान मानना चाहिए देश के लिए बलिदान होने वालों में । अतः आज ही के दिन तात्या तोपे जी के उस सेवक को फांसी पर चढ़ाया गया था ।

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