Posted in राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

अरुण सुक्ला

दैनिक भास्कर में एक खबर पढ़ी जो यह बताती है एक जमाने में कांग्रेस के अंदर कितना दंभ कितना अहंकार था

1984 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी यह चाहते थे विपक्ष का कोई भी नेता चुनाव ना जीतने पाएं….. अटल बिहारी वाजपेई जी ने ग्वालियर से नामांकन किया और राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेई के सामने ग्वालियर के महाराजा माधवराव सिंधिया को उतार दिया जबकि उस समय माधवराव सिंधिया राजनीति में थे ही नहीं

अटल बिहारी बाजपाई भौचक्के रह गए क्योंकि जाहिर सी बात है एक तो इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर उठी थी ऊपर से ग्वालियर में महाराजा सिंधिया का ग्वालियर में काफी प्रभाव है और राजीव गांधी ने यह चक्रव्यूह ऐसे समय में रचा जब अटल बिहारी वाजपेई जी को दूसरे सीट से नामांकन करने का समय तक नहीं मिला

अंतिम समय तक वह भिंड से नामांकन करना चाह रहे थे लेकिन भिंड कलेक्टर ऑफिस तक जाते जाते नामांकन का समय निकल चुका था

1984 में बीजेपी की मात्र 2 सीट आई थी एक गुजरात के मेहसाणा से और दूसरा आंध्र प्रदेश के गुंटूर से और भव्य विजय के बाद राजीव गांधी ने बड़े घमंड से कहा था आज मेरी मां का दिया नारा साकार हो गया क्योंकि मेरी मां ने एक नारा दिया था “हम दो हमारे दो” और बीजेपी को मात्र 2 सीटें मिली है

और राजीव गांधी के इतना कहने पर मंच पर बैठे सभी कांग्रेसी नेता खिलखिला कर ठहाके मारकर घमंड से हंस पड़े

अटल जी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मेरे जीवन का सबसे बड़ा दर्द वही था जब राजीव गांधी ने बीजेपी के 2 सीट आने पर यह कहा था कि आज मेरे मां का नारा सफल हो गया हम दो हमारे दो ।

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