Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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लक्ष्मी का वास ,,,,,,,,,

एक बार एक सेठ से देवी लक्ष्मी ने स्वप्न में कहा- सेठ, अब तुम्हारे पुण्य समाप्त हो गए हैं इसलिए मैं थोड़े दिन बाद तुम्हारे घर से चली जाऊंगी, लेकिन मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं इसलिए जाने से पहले वरदान देना चाहती हूं। जो इच्छा हो, वह वरदान मागं लो। सेठ ने कहा- कल सवेरे अपने कुटुंब के लोगों से परामर्श करके जो मांगना होगा, मांग लूंगा। सुबह सेठ ने सभी से पूछा। किसी ने हीरा-मोती मांगने को कहा, किसी ने स्वर्ण राशि मांगने की सलाह दी, कोई अन्न मांगने के पक्ष में था और कोई वाहन या भवन। सबसे अंत में सेठ की छोटी बहू बोली- पिताजी, जब लक्ष्मी जी को जाना ही है तो ये वस्तुएं मिलने पर भी टिकेंगी कैसे? आप इन्हें मांगेंगे भी तो ये ज्यादा देर तक नहीं टिकेंगी? आप तो मांगिए कि कुटुंब में प्रेम बना रहे। कुटुंब में सब लोगों में परस्पर प्रीति रहेगी, तो विपत्ति के दिन भी सरलता से कट जाएंगे।
सेठ को छोटी बहू की बात पसंद आई। दूसरी रात्री फिर स्वप्न में देवी लक्ष्मी के दर्शन हुए। सेठ ने प्रार्थना की देवी, आप जाना ही चाहती हैं तो प्रसन्नता से जाएं, किंतु यह वरदान दें कि हमारे कुटुंबियों में परस्पर प्रेम बना रहे। देवी लक्ष्मी बोली-सेठ, ऐसा वरदान तुमने मांगा कि मुझे बांध ही लिया। जिस परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रीति है, वहां से मैं कैसे जा सकती हूं?
शिक्षा- जिस घर में गुरुजनों का सत्कार होता है, मातापिता एवं अतिथि का सम्मान होता है , देवताओं की स्तुति गान होता है और परिवार जन प्यार से रहते हैं, लक्ष्मी वहीं निवास करती हैं।( शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी का स्थाई वास ” जहाँ नारायण वहां लक्ष्मी ” — नारायण एक देवता है अतः जहाँ देविक प्रवृति है वही माता लक्ष्मी है , दूसरे शब्दों में माता लक्ष्मी का स्थाई निवास परोपकारी के घर में है ) वही घर खुशियों का स्वर्ग है !
शाकाहार अपनाओं –करुणा को चुनो
देविक प्रवृतियों का निर्माण गाय के दूध , दही , घृत ,शहद , गन्ना , ऋतू फल ,दाल एवं सूखे मेवों से होता है ! अतः मांसाहार , लसन ,प्याज ,बासी भोजन को तिलांजलि दें ! यह तामसिक भोजन है जो आपके जीवन में तामस का उदय कर देगा ! तामस अज्ञान ,जड़ता एवं मूढ़ता को आमंत्रण देता है ऐसे व्यक्तियों के लिए महाशिवरात्रि के व्रत का कोई लाभ नहीं रहता है ! महाशिवरात्रि का व्रत तामस से बचने के लिए किया जाता है !

विशेष ,,,,, ” लक्ष्मी ” व्यवहार में हम धन एवं सम्पदा की देवी मानते है ! लक्ष्मी शब्द पर विचार करे तो निष्कर्ष निकलेगा ” भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मानवों की कार्यकुशलता एवं कार्य की गुणवत्ता ” यानि की अपने अंदर उन गुणों का विकसित होना है जिससे धन की प्राप्ति नेक कर्मो से हो सके ! == १. परिश्रम २. ईमानदारी ३. नेक व्यवसाय ४. परोपकार की भावना को ध्यान में रखते हुए अर्जित धन ५. न्यायपूर्ण तरीके से अर्जित धन को ही “देवी लक्ष्मी ” कहा जा सकता है और ऐसा धन ही दान ,यज्ञ एवं अन्य देविक कार्यों में फलीभूत होता है बाकी सब निष्फल ही रहता है ! इसीलिए देवी लक्ष्मी को शास्त्रों में ” सत्वगुण| संपन्न कहा है ! ऐसा धन हमारे महतत्व में आध्यात्म को उत्पन्न करता है साथ ही आय अर्जित करने के लिए अनेक प्रकार के गुणों को भी उत्पन्न करता है !
बिना परिश्रम एवं ईमानदारी से कमाया धन तो दरिद्रा है जो तामस को उत्पन्न करता है और तामस अज्ञान , जड़ता एवं मूढ़ता को उत्पन्न करता है ! काला धन कमाने वाले लोग आध्यात्म के क्षेत्र में अज्ञानी होते है और उनके जीवन का लक्ष्य विषय भोग एवं भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति होता है ! यह ऐसा इसलिए की उनकी अनुभूति /सोच तामसिक विचारो ( काम , क्रोध, मद ,लोभ ,मोह एवं ईर्ष्या द्वेष ) से भरी होती है ! अतः अपनी सोच को देविक / आध्यात्मिक बनाये !
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आध्यात्मिक जीवन ,,,,,,
आत्मा के कल्याण की अनेक साधनायें हैं। सभी का अपना-अपना महत्त्व है और उनके परिणाम भी अलग-अलग हैं।
‘स्वाध्याय’ से ,,,,सन्मार्ग,,,,,, की जानकारी होती है।
‘सत्संग’ से ,,,,,,स्वभाव और संस्कार,,,,, बनते हैं। कथा सुनने से सद्भावनाएँ जाग्रत होती हैं।
‘तीर्थयात्रा’ से ,,,,,,,भावांकुर,,,,,, पुष्ट होते हैं।
‘कीर्तन’ से ,,,,,,,तन्मयता,,,,,, का अभ्यास होता है।
दान-पुण्य से ,,,,,,सुख-सौभाग्यों,,,,,, की वृद्धि होती है।
‘पूजा-अर्चना से ,,,,,,आस्तिकता,,,,,,, बढ़ती है।
@इस प्रकार यह सभी साधन ऋषियों ने बहुत सोच-समझकर प्रचलित किये हैं। पर ,,,,,,,,,,,,,,,,‘तप’ (परिश्रम ),,,,,,,,,,,,, का महत्त्व इन सबसे अधिक है। तप की अग्नि में पड़कर ही आत्मा के मल विक्षेप और पाप-ताप जलते हैं। तप के द्वारा ही आत्मा में वह प्रचण्ड बल पैदा होता है, जिसके द्वारा सांसारिक तथा आत्मिक जीवन की समस्याएँ हल होती हैं। तप की सामर्थ्य से ही नाना प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ और दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसलिए तप साधन को सबसे शक्तिशाली माना गया है। तप के बिना आत्मा में अन्य किसी भी साधन से तेज प्रकाश बल एवं पराक्रम उत्पन्न नहीं होता।
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” जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !”
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जिस प्रकार मैले दर्पण में सूर्य देव का प्रकाश नहीं पड़ता है उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है अर्थात मलिन अंतःकरण में शैतान अथवा असुरों का राज होता है ! अतः ऐसा मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदत्त अनेक दिव्य सिद्धियों एवं निधियों का अधिकारी नहीं बन सकता है !
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“जब तक मन में खोट और दिल में पाप है, तब तक बेकार सारे मन्त्र और जाप है !”
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,,,,सच्चे संतो की वाणी से अमृत बरसता है , आवश्यकता है ,,,उसे आचरण में उतारने की ….
Note ; कृपया पोस्ट के साथ ही देवलोक गौशाला का page भी लाइक करें और हमेशा के लिए सत्संग का लाभ उठाएं ! देवलोक गौशाला सदैव आपको सन्मार्ग दिखाएगी और उस पर चलने के लिए प्रेरित करती रहेगी! ! सर्वदेवमयी यज्ञेश्वरी गौमाता को नमन
जय गौमाता की 🙏👏🌹🌲🌿🌹
शरीर परमात्मा का दिया हुआ उपहार है ! चाहो तो इससे ” विभूतिया ” (अच्छाइयां / पुण्य इत्यादि ) अर्जित करलो चाहे घोरतम ” दुर्गति ” ( बुराइया / पाप ) इत्यादि !
परोपकारी बनो एवं प्रभु का सानिध्य प्राप्त करो !
प्रभु हर जीव में चेतना रूप में विद्यमान है अतः प्राणियों से प्रेम करो !
शाकाहार अपनाओ , करुणा को चुनो !
choice is yours . 🚩🙏🙏🚩

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जब लंकाधीश रावण पुरोहित बना …”*

(अद्भुत प्रसंग, भावविभोर करने वाला प्रसंग)

बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी *महर्षि कम्बन की #इरामावतारम्‘* मे यह कथा है।

रावण केवल शिवभक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था..। उसे भविष्य का पता था..। वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव है..।

जब श्री राम ने खर-दूषण का सहज ही बध कर दिया तब तुलसी कृत मानस में भी रावण के मन भाव लिखे हैं–

खर दूसन मो सम बलवंता ।
तिनहि को मरहि बिनु भगवंता।।

रावण के पास जामवंत जी को #आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया..।
जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे। लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे। इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा। स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ। मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ। उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है।

रावण ने सविनय कहा– “आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। आप कृपया आसन ग्रहण करें। यदि आप मेरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे, तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा।”

जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की। उन्होंने आसन ग्रहण किया। रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया। तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है।
” मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।”

प्रणाम प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया

“क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है ?”

“बिल्कुल ठीक। श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है. I”

जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है। क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दे?

रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा –” आप पधारें। यजमान उचित अधिकारी है। उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है। राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।”

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए।

अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना से समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है।

” .यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं। विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी। अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना। “

स्वामी का आचार्य अर्थात स्वयं का आचार्य।
यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया।
. स्वस्थ कण्ठ से “सौभाग्यवती भव” कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया।

सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरे ।

” आदेश मिलने पर आना” कहकर सीता को उन्होंने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचे ।

जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे। सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

” दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! “

दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया ।

सुग्रीव ही नहीं विभीषण की भी उन्होंने उपेक्षा कर दी। जैसे वे वहाँ हों ही नहीं।

भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा

” यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें।”

श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं।

” अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं। यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था। इन सबके अतिरिक्त तुम संन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है। इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ?”

” कोई उपाय आचार्य ?”

” आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।”

श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया। श्री रामादेश के परिपालन में. विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे।

” अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान …”

आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया।
गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा – लिंग विग्रह ?

यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं। अभी तक लौटे नहीं हैं। आते ही होंगे।

आचार्य ने आदेश दे दिया – ” विलम्ब नहीं किया जा सकता। उत्तम मुहूर्त उपस्थित है। इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालू का लिंग-विग्रह स्वयं बना ले।”

जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित किया ।

यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया। श्री सीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया।

आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया।.

अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की..

श्रीराम ने पूछा – “आपकी दक्षिणा ?”

पुनः एक बार सभी को चौंकाया। … आचार्य के शब्दों ने।

” घबराओ नहीं यजमान। स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती। आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है …”

” लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य की जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है।”

“आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे …..” आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी।

“ऐसा ही होगा आचार्य।” यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी–

“रघुकुल रीति सदा चली आई ।
प्राण जाई पर वचन न जाई ।”

यह दृश्य वार्ता देख सुनकर उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए। सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।

रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, वह राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है ?

(रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी )

🙏🏼जय श्री राम 🙏

Posted in रामायण - Ramayan

. “हनुमद रामायण” शास्त्रों के अनुसार सर्वप्रथम रामकथा हनुमानजी ने लिखी थी और वह भी एक शिला (चट्टान) पर अपने नाखूनों से लिखी थी। यह रामकथा वाल्मीकिजी की रामायण से भी पहले लिखी गई थी और यह ‘हनुमद रामायण’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह घटना तब की है जबकि भगवान श्रीराम रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या में राज करने लगते हैं और श्री हनुमानजी हिमालय पर चले जाते हैं। वहाँ वे अपनी शिव तपस्या के दौरान एक शिला पर प्रतिदिन अपने नाखून से रामायण की कथा लिखते थे। इस तरह उन्होंने प्रभु श्रीराम की महिमा का उल्लेख करते हुए ‘हनुमद रामायण’ की रचना की। कुछ समय बाद महर्षि वाल्मीकि ने भी ‘वाल्मीकि रामायण’ लिखी और लिखने के बाद उनके मन में इसे भगवान शंकर को दिखाकर उनको समर्पित करने की इच्छा हुई। वे अपनी रामायण लेकर शिव के धाम कैलाश पर्वत पहुँच गए। वहाँ उन्होंने हनुमानजी को और उनके द्वारा लिखी गई ‘हनुमद रामायण’ को देखा। हनुमद रामायण के दर्शन कर वाल्मीकिजी निराश हो गए। वाल्मीकिजी को निराश देखकर हनुमानजी ने उनसे उनकी निराशा का कारण पूछा तो महर्षि बोले कि उन्होंने बड़े ही कठिन परिश्रम के बाद रामायण लिखी थी लेकिन आपकी रामायण देखकर लगता है कि अब मेरी रामायण उपेक्षित हो जाएगी, क्योंकि आपने जो लिखा है उसके समक्ष मेरी रामायण तो कुछ भी नहीं है। तब वाल्मीकिजी की चिंता का शमन करते हुए श्री हनुमानजी ने हनुमद रामायण पर्वत शिला को एक कंधे पर उठाया और दूसरे कंधे पर महर्षि वाल्मीकि को बिठाकर समुद्र के पास गए और स्वयं द्वारा की गई रचना को श्रीराम को समर्पित करते हुए समुद्र में समा दिया। तभी से हनुमान द्वारा रची गई हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है। हनुमानजी द्वारा लिखी रामायण को हनुमानजी द्वारा समुद्र में फेंक दिए जाने के बाद महर्षि वाल्मीकि बोले कि हे रामभक्त श्री हनुमान, आप धन्य हैं ! आप जैसा कोई दूसरा ज्ञानी और दयावान नहीं है। हे हनुमान, आपकी महिमा का गुणगान करने के लिए मुझे एक जन्म और लेना होगा और मैं वचन देता हूँ कि कलयुग में मैं एक और रामायण लिखने के लिए जन्म लूँगा। तब मैं यह रामायण आम लोगों की भाषा में लिखूँगा। माना जाता है कि रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास कोई और नहीं बल्कि महर्षि वाल्मीकि का ही दूसरा जन्म था। तुलसीदासजी अपनी ‘रामचरित मानस’ लिखने के पूर्व हनुमान चालीसा लिखकर हनुमानजी का गुणगान करते हैं और हनुमानजी की प्रेरणा से ही वे फिर रामचरित मानस लिखते हैं। माना जाता है महाकवि कालिदास के समय में एक पटलिका को समुद्र के किनारे पाया गया जिसे कि एक सार्वजनिक स्थल पर टांग दिया गया था ताकि विद्यार्थी उस गूढ़लिपि को पढ़कर उसका अर्थ निकाल सकें। ऐसा माना जाता है कि कालीदास ने उसका अर्थ निकाल लिया था और वो ये भी जान गये थे कि ये पटलिका कोई और नहीं अपितु हनुमानजी द्वारा रचित हनुमद रामायण का ही एक अंश है जो कि पर्वत शिला से निकल कर जल के साथ प्रवाहित होकर यहाँ तक आ गया है। ----------:::×:::---------- "जय श्री राम"


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देवी सिंह तोमर

जिन महाराणा प्रताप ने बेरहमी से मुस्लिमों का वध किया उन्हीं महाराणा प्रताप के विषय में एक विरोधाभासी घटना बताई जाती है।
बात उन दिनों की है जब महाराणा अपने घोर संघर्ष के दिनों से गुजर रहे थे और उन्हें मुगलों की घेराबंदी के कारण कई बार परोसी गई पत्तल को छोड़कर उठ जाना पड़ता था और एक बार तो उन्हें एक ही दिन में छः बार पत्तलों को छोड़ पलायन करना पड़ा। बाद के समय में तो उनकी रसद भी खत्म हो गई और उन्हें भीलों द्वारा भेजे गए भोजन या स्वयं जुटाये गये जंगली घासों के बीजों के आटे पर निर्भर रहना पड़ा।
ऐसी विपन्न अवस्था में कहते हैं कि एक बार उनके पास एक अतिथि आया। महाराणा का खुद दो दिन से उपवास चल रहा था तो वे बड़े संकोच में थे कि घर आया अतिथि भूखा चला जाये। उनकी दुविधा को देख उनकी पुत्री ने घास की दो रोटियाँ पिता को दे दीं जो उन्होंने स्वयं न खाकर कुंवर के लिये सुरक्षित रख छोड़ीं थीं।
अतिथि रोटियाँ ग्रहण कर चला गया।
आख्यानों के अनुसार वह अतिथि और कोई नहीं स्वयं अकबर था जो महाराणा की जिजीविषा को परखना चाहता था।
ये महाराणा प्रताप ही थे जिन्होंने कहा जाता है कि दो दिन के उपवास के बाद उन्हें घास की रोटियों को परीक्षा लेने आये अकबर के फैले हाथों पर बिना धर्म पूछे रख दिया था क्योंकि महाराणा की निगाह में वो सिर्फ एक भूखा इंसान और अतिथि था।
आज महाराणा के वंशधर आलीशान महलों में हैं और अकबर के वंशज टायर ट्यूब के पंचर जोड़ते हुए मलिन बस्तियों में क्योंकि महाराणा ने धर्म की रक्षा की अतः धर्म ने सदैव महाराणा की रक्षा की।
सिर्फ नाम लेने से पुरखों पर अधिकार साबित नही होता, वैसे कर्म भी करने पड़ते हैं और संघ उन्हीं आदर्शों पर चलकर हिंदुत्व की रक्षा कर रहा है। संघ का स्वयंसेवक पंक्ति में लगे भूखे मुस्लिम को बिना धर्म पूछे अगर खाना दे सकता है तो उनकी उद्दंडता पर दूसरे हाथ में थमे दंड से उनके सिर भी फोड़ सकता है।
तो आगे निवेदन यह है कि कुछ वामपंथी मारीच राजपूतों के बीच घुसे हुये हैं और निरंतर राजपूतों को संघ के विरुद्ध भड़का रहे हैं। ऐसा ही एक व्यक्ति आगरे का है जो जेएनयू का उत्पाद है, खुद को प्रोफेसर बताता है और राजपूतों की हिंदुत्व से इतर पृथक पहचान रखने का आंदोलन फेसबुक पर चला रहा है। जातीय प्रशंसा के सदैव के भूखे मेरे कुछ बंधु इसके जाल में फंस भी चुके हैं और उसके प्रभाव में आकर पूज्य डॉ हेडगेवार, पूज्य गुरूजी, संघ व मोदीजी के विषय में अनर्गल विषैला प्रचार कर रहे हैं।
हिंदुत्व व इस्लाम के बीच संघर्ष में हमारी एकमात्र ढाल संघ है और आपकी हिंदुत्व में निष्ठा आपकी तलवार है।
संघ के विषय में वामपंथियों ने नए ढंग से विषैला प्रचार शुरू कर दिया है ताकि हिंदुओं में फूट डाली जा सके। उनके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा संघ ही है जिसे वे अच्छी तरह जानते हैं बस आप ही उन्हें नहीं जानते।
अगर ऐसा नहीं होता तो वे हर राष्ट्रवादी हिंदुत्ववादी को ‘संघी’ क्यों कहते हैं?
वर्णित घटना बचपन में पढ़ी पुस्तक पर आधारित है जो अब स्मृति में नहीं है अतः स्रोत के संदर्भ में क्षमाप्रार्थी हूँ।
घास की रोटी पर कुतर्क न करें, घास की रोटी का मतलब घास के बीजों की रोटी। घासों के बीज का आटा वनवासी समुदाय में आज भी खाया जाता है।
जय श्री राम
जय राजपुताना
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भक्ति कथाए

(((( सूली का सूल))))
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हरिया मोहन को समझा रहा था कि देख भाई, तू हर रोज शाम को मदिरा पीने जाता है बुरे काम करता है। तुझे इसका क्या लाभ?
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मोहन ने कहा भाई तू हर रोज अपने गुरू के पास जाता है, सेवा करता है, तुझे क्या लाभ ?
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दोनो ने फैसला किया कि परिणाम एक माह के बाद पता करेंगे।
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एक माह बाद.. हरिया एक पेड़ के नीचे बैठ रो रहा था हाय हाय कर रहा था।
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मोहन के चेहरे पर खुशी थी, वह बोला हरिया यह देख आज मुझे क्या मिला ?
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एक संदूक, इस संदूक में कोयले थे जब मैने नीचे देखा तो एक हीरा मिला।
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हरिया ने रोते हुए बताया कि मैं सत्संग जा रहा था तभी रास्ते में मेरे पांव में एक बहुत बड़ा सूल (कांटा) चुभ गया,
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जो कि मेरे पांव के आर पार हो गया है, दर्द के मारे जान निकल रही है।
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मोहन ने बहुत कोशिश के बाद वह कांटा निकाल दिया.. और हंसते हुए बोला..
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देख ले भाई मैं बुरे काम करता था, और आज मुझे एक हीरा मिला, तू बड़ा धार्मिक बनता था तुझे तेरे भगवान ने क्या दिया?
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एक हाथ लंबा सूल.. हहहहह मोहन खिल खिला कर हँसने लगा।
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हरिया भी सोच में पड़ गया। दोनो ही हरिया के गुरू के पास गये, और सारा वृतांत सुनाया।
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गुरू जी ने अंतर ध्यान होकर देखा, और बोले कि मोहन पिछले जन्म में बहुत दानी सज्जन था..
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हर जरूरत मंद कि मदद करता था। इस जन्म में इसको हीरों का संदूक मिला.. लेकिन हर रोज गलत काम करने के स्थान इसके हीरे कोयले बन गये।
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लेकिन आज यह गलत काम करने नही गया। सो इसको यह सिर्फ एक हीरा ही मिला

इस संदूक में इतने हीरे थे कि इसकी 25 पीढ़ियों को कमाने की जरूरत नही पड़ती।
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लेकिन हरिया तू पिछले जन्म में जललाद था। चोरों और डाकूओं को फांसी देता था।
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पर फांसी से पहले उन सभी से माफी भी मांगता था कि मैं अपना काम कर रहा हूँ मुझे माफ करना।
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तेरी माफी के सदके मालिक ने तुझे गुरू बकशा.. लेकिन इस जन्म तुझे भी फांसी होनी थी।
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लेकिन एक गुरू अपने प्यारे को यमराज के हाथ नही सोंपता, सो तेरी सूली के बदले तुझे एक बड़ा सूल चुभाकर उसे माफी में तब्दील कर दिया।
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गुरू को किजै दंडवत,
कोटि कोटि परनाम ।
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गुर सेवा ते भगति कमाई।
तब इह मानस देहि पाई।
इस देही कउ सिमरहि देव।
सो देही भज हरि का सेव।
साभार :- bhagwankibatte9810
Bhakti Kathayen भक्ति कथायें.. ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

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दीपक गोस्वामी

ब्रिटेन के स्कॉटलैंड में फ्लेमिंग नाम का एक गरीब किसान था!
एक दिन वह अपने खेत पर काम कर रहा था। अचानक पास में से किसी के चीखने की आवाज सुनाई पड़ी ! किसान ने अपना साजो सामान व औजार फेंका और तेजी से आवाज की तरफ लपका!
आवाज की दिशा में जाने पर उसने देखा कि एक बच्चा दलदल में डूब रहा था ! वह बालक कमर तक कीचड़ में फंसा हुआ बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहा था! वह डर के मारे बुरी तरह कांप पर रहा था और चिल्ला रहा था!
किसान ने आनन-फानन में लंबी टहनी ढूंढी! अपनी जान पर खेलकर उस टहनी के सहारे बच्चे को बाहर निकाला !
अगले दिन उस किसान की छोटी सी झोपड़ी के सामने एक शानदार गाड़ी आकर खड़ी हुई!
उसमें से कीमती वस्त्र पहने हुए एक सज्जन उतरे ! उन्होंने किसान को अपना परिचय देते हुए कहा- मैं उस बालक का पिता हूं और मेरा नाम राँडॉल्फ चर्चिल है।
फिर उस अमीर राँडाल्फ चर्चिल ने कहा कि वह इस एहसान का बदला चुकाने आए हैं ।
फ्लेमिंग किसान ने उन सज्जन के ऑफर को ठुकरा दिया । उसने कहा, मैंने जो कुछ किया उसके बदले में कोई पैसा नहीं लूंगा।
किसी को बचाना मेरा कर्तव्य है, मानवता है , इंसानियत है और उस मानवता इंसानियत का कोई पैसा नहीं होता ।
इसी बीच फ्लेमिंग का बेटा झोपड़ी के दरवाजे पर आया ।
उस अमीर सज्जन की नजर अचानक उस पर गई तो एक विचार सूझा । उसने पूछा – क्या यह आपका बेटा है !
किसान ने गर्व से कहा- हां ! उस व्यक्ति ने अब नए सिरे से बात शुरू करते हुए किसान से कहा- ठीक है अगर आपको मेरी कीमत मंजूर नहीं है तो ऐसा करते हैं कि आपके बेटे की शिक्षा का भार मैं अपने ऊपर लेता हूं । मैं उसे उसी स्तर की शिक्षा दिलवाने की व्यवस्था करूंगा जो अपने बेटे को दिलवा रहा हूं! फिर आपका बेटा आगे चलकर एक ऐसा इंसान बनेगा , जिस पर हम दोनों गर्व महसूस करेंगे!
किसान ने सोचा मैं तो उच्च शिक्षा नहीं दिला पाऊंगा और ना ही सारी सुविधाएं जुटा पाऊंगा, जिससे कि यह बड़ा आदमी बन सके ।
बच्चे के भविष्य की खातिर फ्लेमिंग तैयार हो गया !
अब फ्लेमिंग के बेटे को सर्वश्रेष्ठ स्कूल में पढ़ने का मौका मिला।
आगे बढ़ते हुए उसने लंदन के प्रतिष्ठित सेंट मेरीज मेडिकल स्कूल से स्नातक डिग्री हासिल की! आगे चलकर किसान का यही बेटा पूरी दुनिया में पेनिसिलिन का आविष्कारक महान वैज्ञानिक सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग के नाम से विख्यात हुआ।
यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती! कुछ वर्षों बाद, उस अमीर के बेटे को निमोनिया हो गया ।
और उसकी जान पेनिसिलीन के इंजेक्शन से ही बची! उस अमीर राँडाल्फ चर्चिल के बेटे का नाम था- विंस्टन चर्चिल , जो दो बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे !
इसलिए व्यक्ति को हमेशा अच्छे काम करते रहना चाहिए , क्योंकि आपका किया हुआ काम आखिरकार लौटकर आपके ही पास आता है ! यानी अच्छाई पलट – पलट कर आती रहती है!
अतः यकीन मानिए कि मानवता की दिशा में उठाया गया प्रत्येक कदम आपकी स्वयं की चिंताओं को कम करने में मील का पत्थर साबित होगा

Posted in रामायण - Ramayan

आजकल आप लोग ‘रामायण’ में एक दृश्य देख रहे होंगे जिसमे हनुमान जी लक्ष्मण जी को अपने कंधे पर बैठाकर ब्रम्हास्त्र का प्रयोग करके अतिकाय का वध करते है।
1000 वर्षों पहले ठीक वैसे ही मूर्ति कला कांचीपुरम में बनी हुई है ‘रामायण’ का एक-एक पात्र काल्पनिक नही अपितु सत्य है।
जय श्री राम!🚩🕉️🔱
Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

सुपात्र को पहचाने-
कहते है दान सुपात्रों को करना चाहिए।

राजस्थान के जैसलमेर मेंसेठ जयचन्द जैन रहते थे, एक बार गाँव में अकाल पड़ा।जब 2 महीनो बाद लोगो के पास खाने को अन्न नहीं रहा।

तबराजा ने मुनादी करवाई की जो सेठ साहूकार सक्षम है वो अन्न, धन दान करे और राजकोष में धन- अन्न जमा करवाये।

सेठ जय चंद ने 1000 क्विटल गेहूं, 500 किविंटल दाल, 1000 किलो घी, 2000 किलो तेल और 5000 स्वर्ण मुद्राएं राजकोष में दान दी।

5 माह बाद अकाल पूर्ण हुआ।और सेठ को पता चला कि उनके पास जैन मंदिर जहाँ वो दर्शन के लिए जाते थे, उसके पुजारी के 2 बेटे भूख से मर गए।_

उसके कोठी के पास का लगदुमल जो सेठ के बचपन का दोस्त था उसने भुखमरी से दम तोड़ दिया।

यह सुनकर उसे राज तंत्र पर बहुत रौष आया।
वह राजा के पास गया और राजा से कहा,
कि मैंने इतना दान दिया पर दान की चीज़े मेरे आस पास तक ही नहीं पहुँची।

राजा बोले:- “हे दानवीर आप के दान की मैं प्रशंसा करता हूँ किन्तु राज्य का विस्तार इतना बड़ा है कि जो हम तक और हम जिन तक पहुंच पाये हमने मदद कि कितुं आपके आस पास के लोग भुखमरी से मरे उसका कारण शायद यह हो सकता है।

आपके रिश्तेदार, नौकर-चाकर, मंदिर का माली, पुजारी और मित्र और समाज के लोग आर्थिक रूप से सक्षम नहीं थे और शायद वो आपसे कहने में हिचकिचा रहे हो ?

अतः आपको राजकोष में दान तो देना चाहिए था किंतु अगर आप उसका 20% अपने आस पास के लोगों को करते तो आपको ज़्यादा संतुष्टि मिलती।

मित्रो यही स्थिति हमारी है।
दानवीरो,
वर्तमान समय में इस वैश्विक महामारी के समय देखने में आ रहा है कि कुछ लोगों के पास जरूरत से अधिक सहायता सामग्री पहुँच रहीं हैं जो वे वापस बाजार में बेचने के लिए पहुँच रहे हैं तो कुछ तैयार खाना सड़कों के किनारे फैंका हुआ मिल रहा है, दानदाता अपना कर्म कर रहा है परन्तु दान सुपात्र तक नहीं पहुंच रहा है।
अतः
कृपया अन्यथा नहीं लेवे, दान करना एक अच्छी परम्परा है, परन्तु बड़ा दान करने,भण्डारे चलाने, ग्राम-शहर में घूम घूम कर दान देने से पहले अपने आसपास, अपने मित्र, सहयोगी छोटे कारोबारियों एवं मध्यम वर्ग के लोगों का भी ध्यान दें।
जिनके पास न तो सरकारी सहायता पहुंचती है, न राजनेता पहुंचते है,
और लाज शर्म के मारे वो किसी को कह नही पाते हैं। ऐसे लोगों से सम्पर्क करे, उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर सहायता का अनुरोध करें, अगर फिर भी वो शर्म करते हैं तो उन्हें कुछ रकम व्यक्तिगत उधार दे कर सहायता करेे।

हमें पहले घर-परिवार
हमारे कर्मचारी
फिर पड़ोस
फिर मोहल्ला
फिर मंदिर के लोग
फिर हमारे रिश्तेदार
फिर शहर
फिर प्रदेश
फिर देश
फिर विश्व

अपनी प्राथमिकता निर्धारित करे
औरसेठ जयचन्द जैसी गलती करने से बचे।
प्राथमिकता आपको आपके दान की आत्मसंतुष्टि देगा और
यही मानवता और देश के प्रति आपकी संजीवनी सच्ची ज़िम्मेदारी होगी।

💕धन्यवाद💕
नर सेवा ही नारायण सेवा है।
😷🙏