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अजित दवे

एक पंडित एक होटल में गया और मैनेजर के पास जाकर बोला :- क्या रूम नंबर 39 खाली है?

मैनेजर:- हां, खाली है, आप वो रूम ले सकते हैं.. ,,

पंडित:- ठीक है, मुझे एक चाकू, एक 3 इंच का काला धागा और एक 79 ग्राम का संतरा कमरे में भिजवा दो।

मैनेजर:- जी, ठीक है, और हां, मेरा कमरा आपके कमरे के ठीक सामने है,अगर आपको कोई दिक्कत होती है तो तुम मुझे आवाज दे देना,,,

पंडित:- ठीक है,,,

रात को……………….

पंडित के कमरे से तेजी से चीखने चिल्लाने की और प्लेटो के टूटने की आवाज आने लगती है

इन आवाजों के कारण मैनेजर सो भी नही पाता और वो रात भर इस ख्याल से बैचेन होने लगता है कि आखिर उस कमरे में हो क्या रहा है?

अगली सुबह………….
जैसे ही मैनेजर पंडित के कमरे में गया वहाँ पर उसे पता चला कि पंडित होटल से चला गया है और कमरे में सब कुछ वैसे का वैसा ही है और टेबल पर चाकू रखा हुआ है,,
मैनेजर ने सोचा कि जो उसने रात में सुना कहीं उसका मात्र वहम तो नही था,,
और ऐसे ही एक साल बीत गया….
एक साल बाद……..

वही पंडित फिर से उसी होटल में आया और रूम नंबर 39 के बारे में पूछा?

मैनेजर:- हां, रूम 39 खाली है आप उसे ले सकते हो,,,

पंडित:- ठीक है, मुझे एक चाकू, एक 3 इंच का धागा और एक 79 ग्राम का संतरा भी चाहिए होगा,,,

मैनेजर:- जी, ठीक है,,,

उस रात में मैनेजर सोया नही, वो जानना चाहता था कि आखिर रात में उस कमरे में होता क्या है?

तभी वही आवाजें फिर से आनी चालू हो गई और मैनेजर तेजी से पंडित के कमरे के पास गया, चूंकि उसका और पंडित का कमरा आमने-सामने था, इस लिए वहाँ पहुचने में उसे ज्यादा समय नही लगा

लेकिन दरवाजा लॉक था, यहाँ तक कि मैनेजर की वो मास्टर चाभी जिससे हर रूम खुल जाता था, वो भी उस रूम 39 में काम नही करी

आवाजो से उसका सिर फटा जा रहा था, आखिर दरवाजा खुलने के इंतजार में वो दरवाजे के पास ही सो गया…..

अगली सुबहा………..

जब मैनेजर उठा तो उसने देखा कि कमरा खुला पड़ा है लेकिन पंडित उसमें नही है।

वो जल्दी से मेन गेट की तरफ भागा, लेकिन दरबान ने बताया कि उसके आने से चंद मिनट पहले ही पंडित जा चुका था,,,

उसने वेटर से पूछा तो वेटर ने बताया कि कुछ समय पहले ही पंडित यहाँ से चला गया और जाते वक्त उनसे होटल के सभी वेटरों को अच्छी खासी टिप भी दी…..

मैनेजर बिलबिला के रह गया, उसने निश्चय कर लिया कि मार्च में वो पता करके रहेगा…. कि आखिर ये पंडित और रूम 39 का राज क्या है…

मार्च वही महीना था, जिस महीने में हर साल पंडित एक दिन के लिए उस होटल आता था,,

अगले साल……..

अगले साल फिर वही पंडित आया और रूमनंबर 39 मांगा?
मैनेजर:- हां, आपको वो रूम मिल जाएगा

पंडित:- मुझे एक 3 इंच का धा गाएक 79 ग्राम का संतरा और एक धार दार चाकू भी चाहिए,,,

मैनेजर:- जी ठीक है,,,

रात को…..

इस बार मैनेजर रात में बिल्कुल नही सोया और वो लगातार उस कमरे से आती हुई आवाजो को सुनता रहा

जैसी ही सुबह हुई और पंडित ने कमरा खोला, मैनेजर कमरे में घुस गया और पंडित से बोला:-

आखिर तुम रात को इन सब चीजों के साथ इस कमरे में क्या करते हो..? ये आवाजें कहां से आती हैंं…

जल्दी बताओ..?

पंडित ने कहा:- मैं तुम्हे ये राज तो बता दूंगा लेकिन एक शर्त है कि तुम ये राज किसी को नही बताओगे,,,

चूंकि मैनेजर ईमानदार आदमी था इसलिए उसने वो राज आज तक किसी को नही बताया

और अगर ये राज वो किसी को बताएगा औऱ मुझे पता चलेगा तो मैं आपको मेसेज कर दुँगा…ध्यान से पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏🏻😆😆
खाली समय में क्या करू
दिमाग तो मेरा भी खराब हुआ था ये मैसेज पढ़ कर लेकिन आगे भेज कर कलेजे को ठंडक पढ गयी

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તહેવાર / દક્ષિણ ભારતમાં રામનવમીના દિવસે ભગવાન શ્રીરામ અને સીતાજીના લગ્ન થાય છે

દક્ષિણ ભારતમાં કલ્યાણમ મહોત્સવ તરીકે રામનવમીનો પર્વ ઉજવવામાં આવે છે
દિવ્ય ભાસ્કર
Apr 02, 2020, 09:01 AM IST
ધર્મ દર્શન ડેસ્કઃ. ચૈત્ર મહિનાના સુદ પક્ષની નોમ તિથિએ રામનવમી એટલે શ્રીરામ જન્મોત્સવ ઉજવવામાં આવે છે. દેશભરમાં આ પર્વ ઉજવાય છે. ઉત્તર ભારતમાં આ દિવસને ભગવાન રામના જન્મોત્સવ તરીકે ઉજવવામાં આવે છે, ત્યાં જ, દક્ષિણ ભારતમાં આ દિવસે શ્રીરામ અને સીતાજીના લગ્ન કરાવવામાં આવે છે. અહીં એવી માન્યતા છે કે, ચૈત્ર મહિનાના સુદ પક્ષની નોમ તિથિએ ભગવાન રામ અને માતા સીતાના લગ્ન થયા હતાં.

કલ્યાણમ મહોત્સવઃ-
દક્ષિણ ભારતના મંદિરોમાં આ દિવસે રામ અને સીતાના લગ્નનું આયોજન કરવામાં આવે છે, તેને સીતારામ કલ્યાણમ કહેવામાં આવે છે. દક્ષિણ ભારતમાં આ દિવસે આંધ્રપ્રદેશના ભદ્રાચલમ સ્થિત શ્રીરામ મંદિરમાં કલ્યાણમ મહોત્સવ ઉજવાય છે. જેમાં ભગવાન રામ અને સીતાજીના લગ્ન કરાવવામાં આવે છે.

કલ્યાણમ મહોત્સવ પર વિશેષ પ્રસાદ બને છેઃ-
દક્ષિમ ભારતમાં આ દિવસે ભગવાન રામને પ્રસાદ ચઢાવવામાં આવે છે. આ પારંપરિક પ્રસાદને આ વિશેષ દિવસે વિનમ્રતા સાથે તૈયાર કરવામાં આવે છે. આ પ્રસાદને નેવેદ્યયમ કહેવામાં આવે છે, જે એક પ્રકારનો લાડુ હોય છે.

આ સિવાય પણ દક્ષિણ ભારતમાં અનેક અન્ય પ્રકારના પ્રસાદ જેમ કે, પાનકમ્ (એલચી અને આદુંથી બનેલું પીણું), નીર મોર (એક પ્રકારનું પાતળું તલ) અને વદઈ પરરૂપુ (મગની ભીની દાળમાં નારિયેળ અને મસાલા મિક્સ કરીને બનાવેલું સલાડ)નો ભોગ પણ ભગવાન રામને ધરાવવામાં આવે છે.

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लक्ष्मी का वास ,,,,,,,,,

एक बार एक सेठ से देवी लक्ष्मी ने स्वप्न में कहा- सेठ, अब तुम्हारे पुण्य समाप्त हो गए हैं इसलिए मैं थोड़े दिन बाद तुम्हारे घर से चली जाऊंगी, लेकिन मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं इसलिए जाने से पहले वरदान देना चाहती हूं। जो इच्छा हो, वह वरदान मागं लो। सेठ ने कहा- कल सवेरे अपने कुटुंब के लोगों से परामर्श करके जो मांगना होगा, मांग लूंगा। सुबह सेठ ने सभी से पूछा। किसी ने हीरा-मोती मांगने को कहा, किसी ने स्वर्ण राशि मांगने की सलाह दी, कोई अन्न मांगने के पक्ष में था और कोई वाहन या भवन। सबसे अंत में सेठ की छोटी बहू बोली- पिताजी, जब लक्ष्मी जी को जाना ही है तो ये वस्तुएं मिलने पर भी टिकेंगी कैसे? आप इन्हें मांगेंगे भी तो ये ज्यादा देर तक नहीं टिकेंगी? आप तो मांगिए कि कुटुंब में प्रेम बना रहे। कुटुंब में सब लोगों में परस्पर प्रीति रहेगी, तो विपत्ति के दिन भी सरलता से कट जाएंगे।
सेठ को छोटी बहू की बात पसंद आई। दूसरी रात्री फिर स्वप्न में देवी लक्ष्मी के दर्शन हुए। सेठ ने प्रार्थना की देवी, आप जाना ही चाहती हैं तो प्रसन्नता से जाएं, किंतु यह वरदान दें कि हमारे कुटुंबियों में परस्पर प्रेम बना रहे। देवी लक्ष्मी बोली-सेठ, ऐसा वरदान तुमने मांगा कि मुझे बांध ही लिया। जिस परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रीति है, वहां से मैं कैसे जा सकती हूं?
शिक्षा- जिस घर में गुरुजनों का सत्कार होता है, मातापिता एवं अतिथि का सम्मान होता है , देवताओं की स्तुति गान होता है और परिवार जन प्यार से रहते हैं, लक्ष्मी वहीं निवास करती हैं।( शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी का स्थाई वास ” जहाँ नारायण वहां लक्ष्मी ” — नारायण एक देवता है अतः जहाँ देविक प्रवृति है वही माता लक्ष्मी है , दूसरे शब्दों में माता लक्ष्मी का स्थाई निवास परोपकारी के घर में है ) वही घर खुशियों का स्वर्ग है !
शाकाहार अपनाओं –करुणा को चुनो
देविक प्रवृतियों का निर्माण गाय के दूध , दही , घृत ,शहद , गन्ना , ऋतू फल ,दाल एवं सूखे मेवों से होता है ! अतः मांसाहार , लसन ,प्याज ,बासी भोजन को तिलांजलि दें ! यह तामसिक भोजन है जो आपके जीवन में तामस का उदय कर देगा ! तामस अज्ञान ,जड़ता एवं मूढ़ता को आमंत्रण देता है ऐसे व्यक्तियों के लिए महाशिवरात्रि के व्रत का कोई लाभ नहीं रहता है ! महाशिवरात्रि का व्रत तामस से बचने के लिए किया जाता है !

विशेष ,,,,, ” लक्ष्मी ” व्यवहार में हम धन एवं सम्पदा की देवी मानते है ! लक्ष्मी शब्द पर विचार करे तो निष्कर्ष निकलेगा ” भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मानवों की कार्यकुशलता एवं कार्य की गुणवत्ता ” यानि की अपने अंदर उन गुणों का विकसित होना है जिससे धन की प्राप्ति नेक कर्मो से हो सके ! == १. परिश्रम २. ईमानदारी ३. नेक व्यवसाय ४. परोपकार की भावना को ध्यान में रखते हुए अर्जित धन ५. न्यायपूर्ण तरीके से अर्जित धन को ही “देवी लक्ष्मी ” कहा जा सकता है और ऐसा धन ही दान ,यज्ञ एवं अन्य देविक कार्यों में फलीभूत होता है बाकी सब निष्फल ही रहता है ! इसीलिए देवी लक्ष्मी को शास्त्रों में ” सत्वगुण| संपन्न कहा है ! ऐसा धन हमारे महतत्व में आध्यात्म को उत्पन्न करता है साथ ही आय अर्जित करने के लिए अनेक प्रकार के गुणों को भी उत्पन्न करता है !
बिना परिश्रम एवं ईमानदारी से कमाया धन तो दरिद्रा है जो तामस को उत्पन्न करता है और तामस अज्ञान , जड़ता एवं मूढ़ता को उत्पन्न करता है ! काला धन कमाने वाले लोग आध्यात्म के क्षेत्र में अज्ञानी होते है और उनके जीवन का लक्ष्य विषय भोग एवं भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति होता है ! यह ऐसा इसलिए की उनकी अनुभूति /सोच तामसिक विचारो ( काम , क्रोध, मद ,लोभ ,मोह एवं ईर्ष्या द्वेष ) से भरी होती है ! अतः अपनी सोच को देविक / आध्यात्मिक बनाये !
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आध्यात्मिक जीवन ,,,,,,
आत्मा के कल्याण की अनेक साधनायें हैं। सभी का अपना-अपना महत्त्व है और उनके परिणाम भी अलग-अलग हैं।
‘स्वाध्याय’ से ,,,,सन्मार्ग,,,,,, की जानकारी होती है।
‘सत्संग’ से ,,,,,,स्वभाव और संस्कार,,,,, बनते हैं। कथा सुनने से सद्भावनाएँ जाग्रत होती हैं।
‘तीर्थयात्रा’ से ,,,,,,,भावांकुर,,,,,, पुष्ट होते हैं।
‘कीर्तन’ से ,,,,,,,तन्मयता,,,,,, का अभ्यास होता है।
दान-पुण्य से ,,,,,,सुख-सौभाग्यों,,,,,, की वृद्धि होती है।
‘पूजा-अर्चना से ,,,,,,आस्तिकता,,,,,,, बढ़ती है।
@इस प्रकार यह सभी साधन ऋषियों ने बहुत सोच-समझकर प्रचलित किये हैं। पर ,,,,,,,,,,,,,,,,‘तप’ (परिश्रम ),,,,,,,,,,,,, का महत्त्व इन सबसे अधिक है। तप की अग्नि में पड़कर ही आत्मा के मल विक्षेप और पाप-ताप जलते हैं। तप के द्वारा ही आत्मा में वह प्रचण्ड बल पैदा होता है, जिसके द्वारा सांसारिक तथा आत्मिक जीवन की समस्याएँ हल होती हैं। तप की सामर्थ्य से ही नाना प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ और दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसलिए तप साधन को सबसे शक्तिशाली माना गया है। तप के बिना आत्मा में अन्य किसी भी साधन से तेज प्रकाश बल एवं पराक्रम उत्पन्न नहीं होता।
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” जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !”
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जिस प्रकार मैले दर्पण में सूर्य देव का प्रकाश नहीं पड़ता है उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है अर्थात मलिन अंतःकरण में शैतान अथवा असुरों का राज होता है ! अतः ऐसा मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदत्त अनेक दिव्य सिद्धियों एवं निधियों का अधिकारी नहीं बन सकता है !
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“जब तक मन में खोट और दिल में पाप है, तब तक बेकार सारे मन्त्र और जाप है !”
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,,,,सच्चे संतो की वाणी से अमृत बरसता है , आवश्यकता है ,,,उसे आचरण में उतारने की ….
Note ; कृपया पोस्ट के साथ ही देवलोक गौशाला का page भी लाइक करें और हमेशा के लिए सत्संग का लाभ उठाएं ! देवलोक गौशाला सदैव आपको सन्मार्ग दिखाएगी और उस पर चलने के लिए प्रेरित करती रहेगी! ! सर्वदेवमयी यज्ञेश्वरी गौमाता को नमन
जय गौमाता की 🙏👏🌹🌲🌿🌹
शरीर परमात्मा का दिया हुआ उपहार है ! चाहो तो इससे ” विभूतिया ” (अच्छाइयां / पुण्य इत्यादि ) अर्जित करलो चाहे घोरतम ” दुर्गति ” ( बुराइया / पाप ) इत्यादि !
परोपकारी बनो एवं प्रभु का सानिध्य प्राप्त करो !
प्रभु हर जीव में चेतना रूप में विद्यमान है अतः प्राणियों से प्रेम करो !
शाकाहार अपनाओ , करुणा को चुनो !
choice is yours . 🚩🙏🙏🚩

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जब लंकाधीश रावण पुरोहित बना …”*

(अद्भुत प्रसंग, भावविभोर करने वाला प्रसंग)

बाल्मीकि रामायण और तुलसीकृत रामायण में इस कथा का वर्णन नहीं है, पर तमिल भाषा में लिखी *महर्षि कम्बन की #इरामावतारम्‘* मे यह कथा है।

रावण केवल शिवभक्त, विद्वान एवं वीर ही नहीं, अति-मानववादी भी था..। उसे भविष्य का पता था..। वह जानता था कि श्रीराम से जीत पाना उसके लिए असंभव है..।

जब श्री राम ने खर-दूषण का सहज ही बध कर दिया तब तुलसी कृत मानस में भी रावण के मन भाव लिखे हैं–

खर दूसन मो सम बलवंता ।
तिनहि को मरहि बिनु भगवंता।।

रावण के पास जामवंत जी को #आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा गया..।
जामवन्त जी दीर्घाकार थे, वे आकार में कुम्भकर्ण से तनिक ही छोटे थे। लंका में प्रहरी भी हाथ जोड़कर मार्ग दिखा रहे थे। इस प्रकार जामवन्त को किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ा। स्वयं रावण को उन्हें राजद्वार पर अभिवादन का उपक्रम करते देख जामवन्त ने मुस्कराते हुए कहा कि मैं अभिनंदन का पात्र नहीं हूँ। मैं वनवासी राम का दूत बनकर आया हूँ। उन्होंने तुम्हें सादर प्रणाम कहा है।

रावण ने सविनय कहा– “आप हमारे पितामह के भाई हैं। इस नाते आप हमारे पूज्य हैं। आप कृपया आसन ग्रहण करें। यदि आप मेरा निवेदन स्वीकार कर लेंगे, तभी संभवतः मैं भी आपका संदेश सावधानी से सुन सकूंगा।”

जामवन्त ने कोई आपत्ति नहीं की। उन्होंने आसन ग्रहण किया। रावण ने भी अपना स्थान ग्रहण किया। तदुपरान्त जामवन्त ने पुनः सुनाया कि वनवासी राम ने सागर-सेतु निर्माण उपरांत अब यथाशीघ्र महेश्व-लिंग-विग्रह की स्थापना करना चाहते हैं। इस अनुष्ठान को सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने ब्राह्मण, वेदज्ञ और शैव रावण को आचर्य पद पर वरण करने की इच्छा प्रकट की है।
” मैं उनकी ओर से आपको आमंत्रित करने आया हूँ।”

प्रणाम प्रतिक्रिया, अभिव्यक्ति उपरान्त रावण ने मुस्कान भरे स्वर में पूछ ही लिया

“क्या राम द्वारा महेश्व-लिंग-विग्रह स्थापना लंका-विजय की कामना से किया जा रहा है ?”

“बिल्कुल ठीक। श्रीराम की महेश्वर के चरणों में पूर्ण भक्ति है. I”

जीवन में प्रथम बार किसी ने रावण को ब्राह्मण माना है और आचार्य बनने योग्य जाना है। क्या रावण इतना अधिक मूर्ख कहलाना चाहेगा कि वह भारतवर्ष के प्रथम प्रशंसित महर्षि पुलस्त्य के सगे भाई महर्षि वशिष्ठ के यजमान का आमंत्रण और अपने आराध्य की स्थापना हेतु आचार्य पद अस्वीकार कर दे?

रावण ने अपने आपको संभाल कर कहा –” आप पधारें। यजमान उचित अधिकारी है। उसे अपने दूत को संरक्षण देना आता है। राम से कहिएगा कि मैंने उसका आचार्यत्व स्वीकार किया।”

जामवन्त को विदा करने के तत्काल उपरान्त लंकेश ने सेवकों को आवश्यक सामग्री संग्रह करने हेतु आदेश दिया और स्वयं अशोक वाटिका पहुँचे, जो आवश्यक उपकरण यजमान उपलब्ध न कर सके जुटाना आचार्य का परम कर्त्तव्य होता है। रावण जानता है कि वनवासी राम के पास क्या है और क्या होना चाहिए।

अशोक उद्यान पहुँचते ही रावण ने सीता से कहा कि राम लंका विजय की कामना से समुद्रतट पर महेश्वर लिंग विग्रह की स्थापना करने जा रहे हैं और रावण को आचार्य वरण किया है।

” .यजमान का अनुष्ठान पूर्ण हो यह दायित्व आचार्य का भी होता है। तुम्हें विदित है कि अर्द्धांगिनी के बिना गृहस्थ के सभी अनुष्ठान अपूर्ण रहते हैं। विमान आ रहा है, उस पर बैठ जाना। ध्यान रहे कि तुम वहाँ भी रावण के अधीन ही रहोगी। अनुष्ठान समापन उपरान्त यहाँ आने के लिए विमान पर पुनः बैठ जाना। “

स्वामी का आचार्य अर्थात स्वयं का आचार्य।
यह जान जानकी जी ने दोनों हाथ जोड़कर मस्तक झुका दिया।
. स्वस्थ कण्ठ से “सौभाग्यवती भव” कहते रावण ने दोनों हाथ उठाकर भरपूर आशीर्वाद दिया।

सीता और अन्य आवश्यक उपकरण सहित रावण आकाश मार्ग से समुद्र तट पर उतरे ।

” आदेश मिलने पर आना” कहकर सीता को उन्होंने विमान में ही छोड़ा और स्वयं राम के सम्मुख पहुँचे ।

जामवन्त से संदेश पाकर भाई, मित्र और सेना सहित श्रीराम स्वागत सत्कार हेतु पहले से ही तत्पर थे। सम्मुख होते ही वनवासी राम आचार्य दशग्रीव को हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

” दीर्घायु भव ! लंका विजयी भव ! “

दशग्रीव के आशीर्वचन के शब्द ने सबको चौंका दिया ।

सुग्रीव ही नहीं विभीषण की भी उन्होंने उपेक्षा कर दी। जैसे वे वहाँ हों ही नहीं।

भूमि शोधन के उपरान्त रावणाचार्य ने कहा

” यजमान ! अर्द्धांगिनी कहाँ है ? उन्हें यथास्थान आसन दें।”

श्रीराम ने मस्तक झुकाते हुए हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र स्वर से प्रार्थना की कि यदि यजमान असमर्थ हो तो योग्याचार्य सर्वोत्कृष्ट विकल्प के अभाव में अन्य समकक्ष विकल्प से भी तो अनुष्ठान सम्पादन कर सकते हैं।

” अवश्य-अवश्य, किन्तु अन्य विकल्प के अभाव में ऐसा संभव है, प्रमुख विकल्प के अभाव में नहीं। यदि तुम अविवाहित, विधुर अथवा परित्यक्त होते तो संभव था। इन सबके अतिरिक्त तुम संन्यासी भी नहीं हो और पत्नीहीन वानप्रस्थ का भी तुमने व्रत नहीं लिया है। इन परिस्थितियों में पत्नीरहित अनुष्ठान तुम कैसे कर सकते हो ?”

” कोई उपाय आचार्य ?”

” आचार्य आवश्यक साधन, उपकरण अनुष्ठान उपरान्त वापस ले जाते हैं। स्वीकार हो तो किसी को भेज दो, सागर सन्निकट पुष्पक विमान में यजमान पत्नी विराजमान हैं।”

श्रीराम ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हुए मौन भाव से इस सर्वश्रेष्ठ युक्ति को स्वीकार किया। श्री रामादेश के परिपालन में. विभीषण मंत्रियों सहित पुष्पक विमान तक गए और सीता सहित लौटे।

” अर्द्ध यजमान के पार्श्व में बैठो अर्द्ध यजमान …”

आचार्य के इस आदेश का वैदेही ने पालन किया।
गणपति पूजन, कलश स्थापना और नवग्रह पूजन उपरान्त आचार्य ने पूछा – लिंग विग्रह ?

यजमान ने निवेदन किया कि उसे लेने गत रात्रि के प्रथम प्रहर से पवनपुत्र कैलाश गए हुए हैं। अभी तक लौटे नहीं हैं। आते ही होंगे।

आचार्य ने आदेश दे दिया – ” विलम्ब नहीं किया जा सकता। उत्तम मुहूर्त उपस्थित है। इसलिए अविलम्ब यजमान-पत्नी बालू का लिंग-विग्रह स्वयं बना ले।”

जनक नंदिनी ने स्वयं के कर-कमलों से समुद्र तट की आर्द्र रेणुकाओं से आचार्य के निर्देशानुसार यथेष्ट लिंग-विग्रह निर्मित किया ।

यजमान द्वारा रेणुकाओं का आधार पीठ बनाया गया। श्री सीताराम ने वही महेश्वर लिंग-विग्रह स्थापित किया।

आचार्य ने परिपूर्ण विधि-विधान के साथ अनुष्ठान सम्पन्न कराया।.

अब आती है बारी आचार्य की दक्षिणा की..

श्रीराम ने पूछा – “आपकी दक्षिणा ?”

पुनः एक बार सभी को चौंकाया। … आचार्य के शब्दों ने।

” घबराओ नहीं यजमान। स्वर्णपुरी के स्वामी की दक्षिणा सम्पत्ति नहीं हो सकती। आचार्य जानते हैं कि उनका यजमान वर्तमान में वनवासी है …”

” लेकिन फिर भी राम अपने आचार्य की जो भी माँग हो उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा करता है।”

“आचार्य जब मृत्यु शैय्या ग्रहण करे तब यजमान सम्मुख उपस्थित रहे …..” आचार्य ने अपनी दक्षिणा मांगी।

“ऐसा ही होगा आचार्य।” यजमान ने वचन दिया और समय आने पर निभाया भी–

“रघुकुल रीति सदा चली आई ।
प्राण जाई पर वचन न जाई ।”

यह दृश्य वार्ता देख सुनकर उपस्थित समस्त जन समुदाय के नयनाभिराम प्रेमाश्रुजल से भर गए। सभी ने एक साथ एक स्वर से सच्ची श्रद्धा के साथ इस अद्भुत आचार्य को प्रणाम किया ।

रावण जैसे भविष्यदृष्टा ने जो दक्षिणा माँगी, उससे बड़ी दक्षिणा क्या हो सकती थी? जो रावण यज्ञ-कार्य पूरा करने हेतु राम की बंदी पत्नी को शत्रु के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, वह राम से लौट जाने की दक्षिणा कैसे मांग सकता है ?

(रामेश्वरम् देवस्थान में लिखा हुआ है कि इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना श्रीराम ने रावण द्वारा करवाई थी )

🙏🏼जय श्री राम 🙏