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सत्संग बड़ा है या तप


(((( सत्संग बड़ा है या तप ))))
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एक बार दो ऋषियों की आपस में बहस हो गयी की सत्संग बड़ा है या तप बड़ा है..
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वे इस समस्या का समाधान करने के लिए शेषनाग जी के पास गए|
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उन्होंने शेषनाग जी से विनय की कि आप ही बताये कि सत्संग या तप में क्या बड़ा है.?
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शेषनाग जी ने कहा कि मैंने जो धरती का बोझ अपने ऊपर उठा रखा है अगर तुम अपने-2 बल से इसे उठा के दिखाओगे तो पता चल जायेगा|
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पहले ऋषि ने कहा कि मैंने कई वर्षो तक कठोर साधना की है उस तपस्या का फल देता हूँ कि धरती तुम्हारे बिना टिक जाये|
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शेष नाग जी ने जैसे ही धरती को अपने ऊपर से हटाया तो वह धरती ऋषि के फल से टिकने की जगह हिलने लग गयी…
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तब दूसरे ऋषि ने कहा कि मैं अपने एक घड़ी के सत्संग का फल देता हूँ कि ये धरती टिक जाये…
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धरती उसी समय टिक गई…
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तब शेषनाग जी ने फ़रमाया कि अब आप दोनों खुद ही जान ले कि किसमें ज्यादा बल है सत्संग में या तप में|
साभार :- shrianandras blogspot
Bhakti Kathayen भक्ति कथायें..
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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jrd tata


1978 की हकीकत
एक बार jrd tata flight मे बैठे थे। उनकै बगल मे दीलीप कुमार बैठे थे। दिलीप कुमार से रहा नही गया उनहोंने अपना परिचय दिया मै नामी filmstar हूँ आपने मेरी film देखी होगी।
JRDtataने जबाब दिया ,,?नही,,,कोन दीलीप कुमार???
उस वक्त दिलीप कुमार की insult हो गई सभी news paper मे खबर आई थी।

आज देश के अनमोल रतन रतन जी country is proud on.
इनके जीवन की तीन घटनाएं जो मैने पढ़ी है ,आपको बताता हूँ।

1, एकबार अमिताभ इनके बगल की सीट पर फ्लाइट में सफर कर रहे थे।अमिताभ ने पूछा आप फ़िल्म देखते है,इन्होंने कहा समय नहीं मिलता,अमिताभ ने बताया कि वो फ़िल्म स्टार है।इन्होंने कहा बहुत खुशी हुई आपसे मिलकर।अमिताभ बहुत प्रसन्न थे ,अपना फिल्मस्टार वाला एटीट्यूड दिखा रहे थे।जब एयरपोर्ट पर उतरे तो अमिताभ ने पूछा कि आपने अपना परिचय नहीं दिया तो इन्होंने कहा कि टाटा ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज का चेयर मैन हूँ।रतन टाटा नाम है। अमिताभ को काटो तो खून नहीं।
2, दूसरी घटना मुम्बई हमलों के बाद की है।पाकिस्तान से टाटा सूमो का हजारो गाड़ियों का आर्डर था जो मुम्बई हमले के बाद टाटा ने डिलीवरी कैंसिल कर दी व यह कहकर गाड़ियां देने से मना कर दिया कि मैं उस देश को गाड़ियां नहीं दे सकता जो मेरे देश के खिलाफ इन गाड़ियों को इस्तेमाल करे।
3,तीसरी घटना मुम्बई हमले के बाद कि है,मुम्बई ताज होटल का मॉडिफिकेशन होना था।पाकिस्तान की एक पार्टी इस काम के लिए इनसे मिलने आई, इन्होंने मिलने से ही मना कर दिया।पार्टी ने दिल्ली जाकर आनन्द शर्मा से सिफारिश करवाई।शर्मा जी ने पार्टी की तारीफ करते हुए कहा कि इन्हें काम दे दीजिए ये अच्छा काम करेंगे। रतन टाटा का जवाब था “you may be shameless,I am not”
प्रधानमंत्री के आग्रह पर वो व्यक्ति दिया लिए खड़ा है।यही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने कोरोना फण्ड में 1500 करोड़ रुपये दान किये है।
ऐसे देश भक्त महान पुरुष व कर्मयोद्धा को सादर करबद्ध नमन।ये है हमारे देश के असली हीरो। आज के युवा को इन्हें अपना आदर्श मानना चाहिए और इन पर गौरव करना चाहिए,न कि टुच्चहे नेताओ को हीरो मानकर उनके आगे पीछे चक्कर लगाना चाहिए।
मेरी नजर में भारत रत्न का हकदार ये असली रत्न,ये कर्मयोद्धा है जिसने भारत की औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व किया और उत्पादों की गुणवत्ता के सदैव मानक स्थापित किये ।

Posted in आओ संस्कृत सीखे.

संस्कृत

संस्कृत में 1700 धातुएं, 70 प्रत्यय और 80 उपसर्ग हैं, इनके योग से जो शब्द बनते हैं, उनकी संख्या 27 लाख 20 हजार होती है। यदि दो शब्दों से बने सामासिक शब्दों को जोड़ते हैं तो उनकी संख्या लगभग 769 करोड़ हो जाती है।
संस्कृत इंडो-यूरोपियन लैंग्वेज की सबसे #प्राचीनभाषा है और सबसे वैज्ञानिकभाषा भी है। इसके सकारात्मक तरंगों के कारण ही ज्यादातर श्लोक संस्कृत में हैं। #भारत में संस्कृत से लोगों का जुड़ाव खत्म हो रहा है लेकिन विदेशों में इसके प्रति रुझाान बढ़ रहा है।

ब्रह्मांड में सर्वत्र गति है। गति के होने से ध्वनि प्रकट होती है । ध्वनि से शब्द परिलक्षित होते हैं और शब्दों से भाषा का निर्माण होता है। आज अनेकों भाषायें प्रचलित हैं । किन्तु इनका काल निश्चित है कोई सौ वर्ष, कोई पाँच सौ तो कोई हजार वर्ष पहले जन्मी। साथ ही इन भिन्न भिन्न भाषाओं का जब भी जन्म हुआ, उस समय अन्य भाषाओं का अस्तित्व था। अतः पूर्व से ही भाषा का ज्ञान होने के कारण एक नयी भाषा को जन्म देना अधिक कठिन कार्य नहीं है। किन्तु फिर भी साधारण मनुष्यों द्वारा साधारण रीति से बिना किसी वैज्ञानिक आधार के निर्माण की गयी सभी भाषाओं मे भाषागत दोष दिखते हैं । ये सभी भाषाए पूर्ण शुद्धता,स्पष्टता एवं वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। क्योंकि ये सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे की बातों को समझने के साधन मात्र के उद्देश्य से बिना किसी सूक्ष्म वैज्ञानिकीय चिंतन के बनाई गयी। किन्तु मनुष्य उत्पत्ति के आरंभिक काल में, धरती पर किसी भी भाषा का अस्तित्व न था।

तो सोचिए किस प्रकार भाषा का निर्माण संभव हुआ होगा?
शब्दों का आधार #ध्वनि है, तब ध्वनि थी तो स्वाभाविक है #शब्द भी थे। किन्तु व्यक्त नहीं हुये थे, अर्थात उनका ज्ञान नहीं था।
प्राचीन ऋषियों ने मनुष्य जीवन की आत्मिक एवं लौकिक उन्नति व विकास में शब्दो के महत्व और शब्दों की अमरता का गंभीर आकलन किया । उन्होने एकाग्रचित्त हो ध्वानपूर्वक, बार बार मुख से अलग प्रकार की ध्वनियाँ उच्चारित की और ये जानने में प्रयासरत रहे कि मुख-विवर के किस सूक्ष्म अंग से ,कैसे और कहाँ से ध्वनि जन्म ले रही है। तत्पश्चात निरंतर अथक प्रयासों के फलस्वरूप उन्होने परिपूर्ण, पूर्ण शुद्ध,स्पष्ट एवं अनुनाद क्षमता से युक्त ध्वनियों को ही भाषा के रूप में चुना । सूर्य के एक ओर से 9 रश्मिया निकलती हैं और सूर्य के चारो ओर से 9 भिन्न भिन्न रश्मियों के निकलने से कुल निकली 36 रश्मियों की ध्वनियों पर संस्कृत के 36 #स्वर बने और इन 36 रश्मियो के पृथ्वी के आठ वसुओ से टकराने से 72 प्रकार की #ध्वनि उत्पन्न होती हैं । जिनसे संस्कृत के 72 व्यंजन बने। इस प्रकार ब्रह्माण्ड से निकलने वाली कुल 108 ध्वनियों पर संस्कृत की #वर्णमाला आधारित है। ब्रह्मांड की इन ध्वनियों के रहस्य का ज्ञान वेदों से मिलता है। इन ध्वनियों को नासा ने भी स्वीकार किया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन ऋषि मुनियों को उन ध्वनियों का ज्ञान था और उन्ही ध्वनियों के आधार पर उन्होने पूर्णशुद्ध भाषा को अभिव्यक्त किया। अतः प्राचीनतम #आर्यभाषा जो #ब्रह्मांडीय_संगीत थी उसका नाम “संस्कृत” पड़ा। संस्कृत – संस् + कृत् अर्थात

श्वासोंसेनिर्मित अथवा साँसो से बनी एवं स्वयं से कृत , जो कि ऋषियों के ध्यान लगाने व परस्पर संपर्क से अभिव्यक्त हुयी*।

कालांतर में #पाणिनी ने नियमित #व्याकरण के द्वारा संस्कृत को परिष्कृत एवं सर्वम्य प्रयोग में आने योग्य रूप प्रदान किया। #पाणिनीय_व्याकरण ही संस्कृत का प्राचीनतम व सर्वश्रेष्ठ व्याकरण है*। दिव्य व दैवीय गुणों से युक्त, अतिपरिष्कृत, परमार्जित, सर्वाधिक व्यवस्थित, अलंकृत सौन्दर्य से युक्त , पूर्ण समृद्ध व सम्पन्न , पूर्णवैज्ञानिक #देववाणी *संस्कृत – मनुष्य की आत्मचेतना को जागृत करने वाली, सात्विकता में वृद्धि , बुद्धि व आत्मबलप्रदान करने वाली सम्पूर्ण विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है*। अन्य सभी भाषाओ में त्रुटि होती है पर इस भाषा में कोई त्रुटि नहीं है। इसके उच्चारण की शुद्धता को इतना सुरक्षित रखा गया कि सहस्त्रों वर्षो से लेकर आज तक वैदिक मन्त्रों की ध्वनियों व मात्राओं में कोई पाठभेद नहीं हुआ और ऐसा सिर्फ हम ही नहीं कह रहे बल्कि विश्व के आधुनिक विद्वानों और भाषाविदों ने भी एक स्वर में संस्कृत को पूर्णवैज्ञानिक एवं सर्वश्रेष्ठ माना है।

संस्कृत की सर्वोत्तम शब्द-विन्यास युक्ति के, गणित के, कंप्यूटर आदि के स्तर पर नासा व अन्य वैज्ञानिक व भाषाविद संस्थाओं ने भी इस भाषा को एकमात्र वैज्ञानिक भाषा मानते हुये इसका अध्ययन आरंभ कराया है और भविष्य में भाषा-क्रांति के माध्यम से आने वाला समय संस्कृत का बताया है। अतः अंग्रेजी बोलने में बड़ा गौरव अनुभव करने वाले, अंग्रेजी में गिटपिट करके गुब्बारे की तरह फूल जाने वाले कुछ महाशय जो संस्कृत में दोष गिनाते हैं उन्हें कुँए से निकलकर संस्कृत की वैज्ञानिकता का एवं संस्कृत के विषय में विश्व के सभी विद्वानों का मत जानना चाहिए।
नासा की वेबसाईट पर जाकर संस्कृत का महत्व पढ़ें।

काफी शर्म की बात है कि भारत की भूमि पर ऐसे लोग हैं जिन्हें अमृतमयी वाणी संस्कृत में दोष और विदेशी भाषाओं में गुण ही गुण नजर आते हैं वो भी तब जब विदेशी भाषा वाले संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ मान रहे हैं

अतः जब हम अपने बच्चों को कई विषय पढ़ा सकते हैं तो संस्कृत पढ़ाने में संकोच नहीं करना चाहिए। देश विदेश में हुये कई शोधो के अनुसार संस्कृत मस्तिष्क को काफी तीव्र करती है जिससे अन्य भाषाओं व विषयों को समझने में काफी सरलता होती है , साथ ही यह सत्वगुण में वृद्धि करते हुये नैतिक बल व चरित्र को भी सात्विक बनाती है। अतः सभी को यथायोग्य संस्कृत का अध्ययन करना चाहिए।

आज दुनिया भर में लगभग 6900 भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन भाषाओं की जननी कौन है?

नहीं?

कोई बात नहीं आज हम आपको दुनिया की सबसे पुरानी भाषा के बारे में विस्तृत जानकारी देने जा रहे हैं।
दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है :- संस्कृत भाषा

आइये जाने संस्कृत भाषा का महत्व :
संस्कृत भाषा के विभिन्न स्वरों एवं व्यंजनों के विशिष्ट उच्चारण स्थान होने के साथ प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के सात ऊर्जा चक्रों में से एक या एक से अधिक चक्रों को निम्न प्रकार से प्रभावित करके उन्हें क्रियाशील – उर्जीकृत करता है :-

मूलाधार चक्र – स्वर ‘अ’ एवं क वर्ग का उच्चारण मूलाधार चक्र पर प्रभाव डाल कर उसे क्रियाशील एवं सक्रिय करता है।
स्वर ‘इ’ तथा च वर्ग का उच्चारण स्वाधिष्ठान चक्र को उर्जीकृत करता है।
स्वर ‘ऋ’ तथा ट वर्ग का उच्चारण मणिपूरक चक्र को सक्रिय एवं उर्जीकृत करता है।
स्वर ‘लृ’ तथा त वर्ग का उच्चारण अनाहत चक्र को प्रभावित करके उसे उर्जीकृत एवं सक्रिय करता है।
स्वर ‘उ’ तथा प वर्ग का उच्चारण विशुद्धि चक्र को प्रभावित करके उसे सक्रिय करता है।
ईषत् स्पृष्ट वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से आज्ञा चक्र एवं अन्य चक्रों को सक्रियता प्रदान करता है।
ईषत् विवृत वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से

सहस्त्राधार चक्र एवं अन्य चक्रों को सक्रिय करता है।
इस प्रकार देवनागरी लिपि के प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के किसी न किसी उर्जा चक्र को सक्रिय करके व्यक्ति की चेतना के स्तर में अभिवृद्धि करता है। वस्तुतः संस्कृत भाषा का प्रत्येक शब्द इस प्रकार से संरचित (design) किया गया है कि उसके स्वर एवं व्यंजनों के मिश्रण (combination) का उच्चारण करने पर वह हमारे विशिष्ट ऊर्जा चक्रों को प्रभावित करे। प्रत्येक शब्द स्वर एवं व्यंजनों की विशिष्ट संरचना है जिसका प्रभाव व्यक्ति की चेतना पर स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसीलिये कहा गया है कि व्यक्ति को शुद्ध उच्चारण के साथ-साथ बहुत सोच-समझ कर बोलना चाहिए। शब्दों में शक्ति होती है जिसका दुरूपयोग एवं सदुपयोग स्वयं पर एवं दूसरे पर प्रभाव डालता है। शब्दों के प्रयोग से ही व्यक्ति का स्वभाव, आचरण, व्यवहार एवं व्यक्तित्व निर्धारित होता है।

उदाहरणार्थ जब ‘राम’ शब्द का उच्चारण किया जाता है है तो हमारा अनाहत चक्र जिसे ह्रदय चक्र भी कहते है सक्रिय होकर उर्जीकृत होता है। ‘कृष्ण’ का उच्चारण मणिपूरक चक्र – नाभि चक्र को सक्रिय करता है। ‘सोह्म’ का उच्चारण दोनों ‘अनाहत’ एवं ‘मणिपूरक’ चक्रों को सक्रिय करता है।

वैदिक मंत्रो को हमारे मनीषियों ने इसी आधार पर विकसित किया है। प्रत्येक मन्त्र स्वर एवं व्यंजनों की एक विशिष्ट संरचना है। इनका निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार शुद्ध उच्चारण ऊर्जा चक्रों को सक्रिय करने के साथ साथ मष्तिष्क की चेतना को उच्चीकृत करता है। उच्चीकृत चेतना के साथ व्यक्ति विशिष्टता प्राप्त कर लेता है और उसका कहा हुआ अटल होने के साथ-साथ अवश्यम्भावी होता है। शायद आशीर्वाद एवं श्राप देने का आधार भी यही है। संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता एवं सार्थकता इस तरह स्वयं सिद्ध है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सातों स्वर हमारे शरीर के सातों उर्जा चक्रों से जुड़े हुए हैं । प्रत्येक का उच्चारण सम्बंधित उर्जा चक्र को क्रियाशील करता है। शास्त्रीय राग इस प्रकार से विकसित किये गए हैं जिससे उनका उच्चारण / गायन विशिष्ट उर्जा चक्रों को सक्रिय करके चेतना के स्तर को उच्चीकृत करे। प्रत्येक राग मनुष्य की चेतना को विशिष्ट प्रकार से उच्चीकृत करने का सूत्र (formula) है। इनका सही अभ्यास व्यक्ति को असीमित ऊर्जावान बना देता है।

संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि #महर्षिपाणिनि; #महर्षिकात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि #पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है । जिस प्रकार साधारण पकी हुई दाल को शुध्द घी में जीरा; मैथी; लहसुन; और हींग का तड़का लगाया जाता है;तो उसे संस्कारित दाल कहते हैं। घी ; जीरा; लहसुन, मैथी ; हींग आदि सभी महत्वपूर्ण औषधियाँ हैं। ये शरीर के तमाम विकारों को दूर करके पाचन संस्थान को दुरुस्त करती है।दाल खाने वाले व्यक्ति को यह पता ही नहीं चलता कि वह कोई कटु औषधि भी खा रहा है; और अनायास ही आनन्द के साथ दाल खाते-खाते इन औषधियों का लाभ ले लेता है। ठीक यही बात संस्कारित भाषा संस्कृत के साथ सटीक बैठती है। जो भेद साधारण दाल और संस्कारित दाल में होता है ;वैसा ही भेद अन्य भाषाओं और संस्कृत भाषा के बीच है।

संस्कृत भाषा में वे औषधीय तत्व क्या है ?
यह विश्व की तमाम भाषाओं से संस्कृत भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है। चार महत्वपूर्ण विशेषताएँ:- 1. अनुस्वार (अं ) और विसर्ग (अ:): संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग। पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं -यथा- राम: बालक: हरि: भानु: आदि। नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं-यथा- जलं वनं फलं पुष्पं आदि।

विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है। जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भवरे की तरह गुंजन करना होता है और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जायेगा । जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- ” राम फल खाता है”इसको संस्कृत में बोला जायेगा- ” राम: फलं खादति”=राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा ,किन्तु राम: फलं खादति कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है। संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना होता है ।

2.शब्द-रूप:-संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है,जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार 25 रूप बनते हैं- यथा:- रम् (मूल धातु)-राम: रामौ रामा:;रामं रामौ रामान् ;रामेण रामाभ्यां रामै:; रामाय रामाभ्यां रामेभ्य: ;रामात् रामाभ्यां रामेभ्य:; रामस्य रामयो: रामाणां; रामे रामयो: रामेषु ;हे राम ! हे रामौ ! हे रामा : ।ये 25 रूप सांख्य दर्शन के 25 तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है और इन 25 तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है। सांख्य दर्शन के 25 तत्व निम्नानुसार हैं -आत्मा (पुरुष), (अंत:करण 4 ) मन बुद्धि चित्त अहंकार, (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका जिह्वा नेत्र त्वचा कर्ण, (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद हस्त उपस्थ पायु वाक्, (तन्मात्रायें 5) गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द,( महाभूत 5) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश।

3.द्विवचन:- संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। सभी भाषाओं में एक वचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है। जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।

  1. सन्धि:- संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।”इति अहं जानामि” इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।

यथा:- 1 इत्यहं जानामि। 2 अहमिति जानामि। 3 जानाम्यहमिति । 4 जानामीत्यहम्। इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं निरोग हो जाता है। इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे #देवभाषा और अमृतवाणी कहते हैं। संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है।

संस्कृत के एक वैज्ञानिक भाषा होने का पता उसके किसी वस्तु को संबोधन करने वाले शब्दों से भी पता चलता है। इसका हर शब्द उस वस्तु के बारे में, जिसका नाम रखा गया है, के सामान्य लक्षण और गुण को प्रकट करता है। ऐसा अन्य भाषाओं में बहुत कम है। पदार्थों के नामकरण ऋषियों ने वेदों से किया है और वेदों में यौगिक शब्द हैं और हर शब्द गुण आधारित हैं ।
इस कारण संस्कृत में वस्तुओं के नाम उसका गुण आदि प्रकट करते हैं। जैसे हृदय शब्द। हृदय को अंगेजी में हार्ट कहते हैं और संस्कृत में हृदय कहते हैं।

अंग्रेजी वाला शब्द इसके लक्षण प्रकट नहीं कर रहा, लेकिन संस्कृत शब्द इसके लक्षण को प्रकट कर इसे परिभाषित करता है। बृहदारण्यकोपनिषद 5.3.1 में हृदय शब्द का अक्षरार्थ इस प्रकार किया है- तदेतत् र्त्यक्षर हृदयमिति, हृ इत्येकमक्षरमभिहरित, द इत्येकमक्षर ददाति, य इत्येकमक्षरमिति।
अर्थात हृदय शब्द हृ, हरणे द दाने तथा इण् गतौ इन तीन धातुओं से निष्पन्न होता है। हृ से हरित अर्थात शिराओं से अशुद्ध रक्त लेता है, द से ददाति अर्थात शुद्ध करने के लिए फेफड़ों को देता है और य से याति अर्थात सारे शरीर में रक्त को गति प्रदान करता है। इस सिद्धांत की खोज हार्वे ने 1922 में की थी, जिसे हृदय शब्द स्वयं लाखों वर्षों से उजागर कर रहा था ।

संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के कई तरह से शब्द रूप बनाए जाते, जो उन्हें व्याकरणीय अर्थ प्रदान करते हैं। अधिकांश शब्द-रूप मूल शब्द के अंत में प्रत्यय लगाकर बनाए जाते हैं। इस तरह यह कहा जा सकता है कि संस्कृत एक बहिर्मुखी-अंतःश्लिष्टयोगात्मक भाषा है। संस्कृत के व्याकरण को महापुरुषों ने वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया है। संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन आधुनिक युग में देवनागरी लिपि के साथ इसका विशेष संबंध है। #देवनागरी_लिपि वास्तव में संस्कृत के लिए ही बनी है! इसलिए इसमें हरेक चिन्ह के लिए एक और केवल एक ही ध्वनि है।

देवनागरी में 13 स्वर और 34 व्यंजन हैं। *संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं, बल्कि संस्कारित भाषा भी है, अतः इसका नाम संस्कृत है। केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है, जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद नहीं, बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं।

विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का प्रायः एक ही रूप होता है, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं। सभी भाषाओं में एकवचन और बहुवचन होते हैं, जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। संस्कृत भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है संधि। संस्कृत में जब दो अक्षर निकट आते हैं, तो वहां संधि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। इसे शोध में कम्प्यूटर अर्थात कृत्रिम बुद्धि के लिए सबसे उपयुक्त भाषा सिद्ध हुई है और यह भी पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

संस्कृत ही एक मात्र साधन है, जो क्रमशः अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाती है। इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएं ग्रहण करने में सहायता मिलती है। वैदिक ग्रंथों की बात छोड़ भी दी जाए, तो भी संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरंतर होती आ रही है। संस्कृत केवल एक भाषा मात्र नहीं है, अपितु एक विचार भी है। संस्कृत एक भाषा मात्र नहीं, बल्कि एक संस्कृति है और संस्कार भी है। संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना भी ! 🙏🕉

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Mohan Lal Jain

एक राजा के दरबार मे एक अजनबी इंसान नौकरी मांगने के लिए आया।

उससे उसकी क़ाबलियत पूछी गई,
तो वो बोला, “मैं आदमी हो चाहे जानवर, शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ।
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राजा ने उसे अपने खास “घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज” बना दिया। चंद दिनों बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा, उसने कहा, “नस्ली नही हैं ।”

राजा को हैरानी हुई, उसने जंगल से घोड़े वाले को बुला कर पूछा..
उसने बताया, घोड़ा नस्ली तो हैं, पर इसकी पैदायश पर इसकी मां मर गई थी, ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला बडा है।
राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं ?”

“उसने कहा “जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता हैं।☺

राजा उसकी काबलियत से बहुत खुश हुआ, उसने नौकर के घर अनाज ,घी, मुर्गे, और बकरीया बतौर इनाम भिजवा दिए।
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राजा ने अब उसे रानी के महल में तैनात कर दिया।

चंद दिनो बाद , राजा ने उस से रानी के बारे में राय मांगी, उसने कहा, “तौर तरीके तो रानी जैसे हैं लेकिन पैदाइशी नहीं हैं।”

राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, उसने अपनी सास को बुलाया, मामला उसको बताया, सास ने कहा “हक़ीक़त ये हैं, कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था, लेकिन हमारी बेटी 6 माह में ही मर गई थी, लिहाज़ा हम ने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।”

राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा “तुम को कैसे पता चला ?”

उसने कहा, ” रानी साहिबा का नौकरो के साथ सुलूक गंवारों से भी बुरा हैं । एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता हैं, जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही।

राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ और बहुत से अनाज , भेड़ बकरियां बतौर इनाम दीं ।
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अब उसे अपने दरबार मे तैनात कर लिया।

कुछ वक्त गुज़रा, राजा ने फिर नौकर को बुलाया,और अपने बारे में पूछा।

नौकर ने कहा “जान की सलामती हो तो कहूँ।”

राजा ने वादा किया।

उसने कहा, “न तो आप राजा के बेटे हो और न ही आपका चलन राजाओं वाला है।”

राजा को बहुत गुस्सा आया, मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था, राजा सीधा अपनी मां के महल पहुंचा।

मां ने कहा,
“ये सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हे गोद लेकर हम ने पाला।”

राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा , बता, “तुझे कैसे पता चला ?”

उसने कहा ” जब राजा किसी को इनाम दिया करते हैं, तो हीरे मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं….लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं…ये रवैया किसी राजा का नही, किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।”
___________________
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किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी दिखावा हैं ।
इंसान की असलियत की पहचान उसके व्यवहार और उसकी नियत से होती हैं…

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मेघनाद
मेघनाद’ अथवा इंद्रजीत रावण के पुत्र का नाम है। अपने पिता की तरह यह भी स्वर्ग विजयी था। इंद्र को परास्त करने के कारण ही ब्रह्मा जी ने इसका नाम इंद्रजीत रखा था। आदिकाल से अब तक यही एक मात्र ऐसा योद्धा है जिसे अतिमहारथी की उपाधि दी गई है। इसका नाम रामायण में इसलिए लिया जाता है क्योंकि इसने राम- रावण युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसका नाम उन योद्धाओं में लिया जाता है जो की ब्रह्माण्ड अस्त्र, वैष्णव अस्त्र तथा पाशुपात अस्त्र के धारक कहे जाते हैं। इसने अपने गुरु शुक्राचार्य के सान्निध्य में रहकर तथा त्रिदेवों द्वारा कई अस्त्र- शस्त्र एकत्र किए। स्वर्ग में देवताओं को हरा कर उनके अस्त्र-शस्त्र पर भी अधिकार कर लिया।

मेघनाद पितृभक्त पुत्र था। उसे यह पता चलने पर की राम स्वयं भगवान है फिर भी उसने पिता का साथ नही छोड़ा। मेघनाद की भी पितृभक्ति प्रभु राम के समान अतुलनीय है।

जब उसकी माँ मन्दोदरी ने उसे यह कहा कि मनुष्य मुक्ति की ओर अकेले जाता है तब उसने कहा कि पिता को ठुकरा कर अगर मुझे स्वर्ग भी मिले तो मैं ठुकरा दूँगा।

मेघनाद रावण और मंदोदरी का सबसे ज्येष्ठ पुत्र था । क्योंकि रावण एक बहुत बड़ा ज्योतिषी भी था जिसे एक ऐसा पुत्र चाहिए था जो कि अजर,अमर और अजेय हो,इसलिए उसने सभी ग्रहों को अपने पुत्र कि जन्म-कुंडली के 11-वें (लाभ स्थान) स्थान पर रख दिया ,परंतु रावण कि प्रवृत्ति से परिचित शनिदेव 11- वें स्थान से 12- वें स्थान (व्यय/हानी स्थान) पर आ गए जिससे रावण को मनवांछित पुत्र प्राप्त नहीं हो सका। इस बात से क्रोधित रावण ने शनिदेव के पैर पर प्रहार किया था ।

मेघनाद का विवाह नागराज वासुकी की पुत्री देवी सुलोचना जी के साथ हुआ था।

हनुमान जी के विरुद्ध युद्ध संपादित करें

जब भगवान श्री राम ने हनुमान जी को माता सीता की खोज में भेजा और हनुमान जी जब लंका में अशोक वाटिका में माता सीता से मिले, उसके उपरांत हनुमान जी ने अशोक वाटिका को तहस-नहस करना आरंभ कर दिया। रावण के सारे सैनिक एक एक करके या तो वीरगति को प्राप्त हो गए या तो पराजित होकर भागने लगे। जब रावण को इसी सूचना मिली तो उसने पहले सेनापति जांबुमालि और उसके उपरांत अपने पुत्र राजकुमार अक्षय कुमार को भेजा परंतु दोनों ही वीरगति को प्राप्त हो गए। अंत में रावण ने अपने पुत्र युवराज इंद्रजीत को अशोक वाटिका भेजा। जब इंद्रजीत और हनुमान जी के बीच युद्ध आरंभ हुआ तब इंद्रजीत ने अपनी सारी शक्ति अपनी सारी माया, अपनी सारी तांत्रिक विद्या, अपने सारे अस्त्र-शस्त्र सब प्रयोग करके देख लिए परंतु वह सब के सब निष्फल हो गए। अंत में इंद्रजीत ने हनुमान जी पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। हनुमान जी ने ब्रह्मास्त्र का मान रखने के लिए उसमें बंध जाना स्वीकार कर लिया और उसके उपरांत वे दोनों रावण के दरबार की ओर चल पड़े।

पहला दिन

कुंभकर्ण के अंत के बाद रावण के पास अब केवल एक उसका पुत्र इंद्रजीत ही रह गया था। उसने इंद्रजीत को आदेश दिया कि वह युद्ध की ओर कूच करे ।

इंद्रजीत के नागपाश में बंधे हुए भगवान श्री राम और लक्ष्मण जी

इंद्रजीत ने अपने पिता के आदेश पर सबसे पहले कुलदेवी माता निकुंभला का आशीर्वाद लिया और उसके उपरांत हुआ रणभूमि की ओर चल पड़ा। जैसे ही युद्ध आरंभ हुआ एक-एक करके सारे योद्धा इंद्रजीत के हाथों या तो वीरगति को प्राप्त हो गए, या तो भागने लगे, या तो पराजित हो गए । अंत में लक्ष्मण जी और इंद्रजीत के बीच द्वंद होने लगा । जब इंद्रजीत के सारे अस्त्र विफल हो गए तो उसने अदृश्य होकर पीछे से सारी वानर सेना, भगवान श्री राम और लक्ष्मण जी पर नागपाश का प्रयोग किया। इस पर भगवान श्री राम ने हनुमान जी को यह आदेश दिया कि वे तुरंत ही गरुड़ जी को ले आए। हनुमान जी तुरंत ही गरुड़ जी को ले जाए और गरुड़ जी ने सभी को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया।

दूसरा दिन

जब रावण को यह पता चला की सभी वानर सैनिक, भगवान श्री राम और लक्ष्मण जी नागपाश से मुक्त हो गए हैं तो क्रोध में आकर उसने दूसरे दिन एक बार फिर इंद्रजीत को आदेश दिया कि वह एक बार फिर युद्ध-भूमि की ओर कूच करे ।

एक बार फिर अपने पिता की आज्ञा को शिरोधार्य करके माता निकुंभला का आशीर्वाद लेकर इंद्रजीत रणभूमि की ओर निकल पड़ा । इस बार उसने रणभूमि में घोषणा कि आज वह एक भी वानर सैनिक को जीवित नहीं छोड़ेगा और कम से कम दोनों भाइयों में से (अर्थात राम जी और लक्ष्मण जी में से) किसी एक को तो मार ही देगा । इसी उद्घोषणा के साथ वह पहले दिन से भी कहीं अधिक भयंकरता के साथ युद्ध करने लगा । उसकी इस ललकार को सुनकर लक्ष्मण जी भगवान श्रीराम की आज्ञा लेकर उसका सामना करने चल पड़े । दोनों के बीच भयंकर द्वंद छिड़ गया, परंतु दोनों ही टस से मस होने के लिए तैयार नहीं थे । जब लक्ष्मण जी मेघनाद पर भारी पड़ने लगे, तब मेघनाद को एक युक्ति सूची और वह अदृश्य होकर माया युद्ध करने लगा । इस पर लक्ष्मण जी उस पर ब्रह्मास्त्र चलाने की आज्ञा भगवान श्रीराम से लेने लगे । परंतु भगवान श्रीराम ने इसे निति-विरुद्ध कहकर रोक दिया और फिर एक बार लक्ष्मण जी भगवान श्रीराम की आज्ञा लेकर दोबारा से मेघनाद के साथ युद्ध करने लगे ।

माया युद्ध में भी जब लक्ष्मण जी इंद्रजीत पर भारी पड़ने लगे और दूसरी ओर वानर-सेना राक्षस-सेना पर भारी पड़ने लगी, तो क्रोध में आकर उसने लक्ष्मण जी पर पीछे से शक्ति अस्त्र का प्रयोग किया और सारी वानर सेना पर ब्रह्मशिरा अस्त्र का प्रयोग किया, जिससे कि लगभग 67 करोड़ वानर सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए, जो कि लगभग पूरा का पूरा वानर वंश था (स्रोत श्रीमद् वाल्मीकि रामायण)। जब हनुमान जी वानर सेना को बचाने दौड़े तो इंद्रजीत ने उन पर भी वैष्णव अस्त्र का प्रयोग किया, परंतु उन्हें भगवान श्रीब्रह्मा जी का वरदान होने के कारण कुछ नहीं हुआ और वे तुरंत ही सारे वानर सैनिकों और लक्ष्मण जी को बचाने निकल पड़े । इधर दूसरी ओर मेघनाद घायल लक्ष्मण जी उठाने का प्रयत्न करने लगा, परंतु उन्हें हिला भी नहीं सका । इस पर हनुमान जी ने यह कहा कि वह उन्हें उठाने का प्रयत्न कर रहा है जो साक्षात भगवान शेषनाग अनन्त के अवतार हैं, उस जैसे पापी से नहीं उठेंगे। इतना कहकर उन्होंने मेघनाद पर प्रहार किया और लक्ष्मण जी को बचा कर ले आए । उसके बाद सुषेण वैद्य के कहने पर हनुमान जी संजीवनी बूटी ले आए जिससे लक्ष्मण जी का उपचार हुआ और वे बच गए ।

तीसरा दिन

जब रावण को यह पता चला के लक्ष्मण जी सकुशल है तो इस बार उसने फिर से इंद्रजीत को यह आदेश दिया कि वह तुरंत ही माता निकुंभला का तांत्रिक यज्ञ करे और उनसे वह दिव्य रथ प्राप्त करें ।

जब गुप्तचरों से इस बात का विभीषण जी को पता चला तो उन्होंने तुरंत ही भगवान श्री राम को सारी सूचना दी । भगवान श्री राम ने विभीषण जी को आदेश दिया कि वह तुरंत ही उसका यज्ञ भंग कर दें ।

विभीषण जी की सहायता से, एक गुप्त मार्ग से सभी वानर सैनिक उस गुफा में पहुंच गए जहां पर इंद्रजीत यज्ञ कर रहा था । उस गुफा में घुस कर वानर सैनिकों ने उसका यज्ञ भंग कर दिया और उसे बाहर निकलने पर विवश कर दिया ।

क्रोधित इंद्रजीत ने जब देखा विभीषण जी वानर सेना को लेकर के आए हैं तो क्रोध में आकर उसने विभीषण जी पर यम-अस्त्र का प्रयोग किया । परंतु यक्षराज कुबेर ने पहले ही लक्ष्मण जी को उसकी काट बता दी थी । लक्ष्मण जी ने उसी का प्रयोग करके यम- अस्त्र को निस्तेज कर दिया । इस पर इंद्रजीत को बहुत क्रोध आया और उसने एक बहुत ही भयानक युद्ध लक्ष्मण जी से आरंभ कर दिया, परंतु उसमें भी जब लक्ष्मण जी इंद्रजीत पर भारी हो गए तो उसने अंतिम तीन महा अस्त्रों का प्रयोग किया जिन से बढ़कर कोई दूसरा अस्त्र इस सृष्टि में नहीं है ।

सबसे पहले उसने ब्रह्मांड अस्त्र का प्रयोग किया । इस पर भगवान ब्रह्मा जी ने उसे सावधान किया की यह नीति विरुद्ध है, परंतु उसने ब्रह्मा जी की बात ना मानकर उसका प्रयोग लक्ष्मण जी पर किया । परिणाम स्वरूप ब्रह्मांड अस्त्र लक्ष्मण जी को प्रणाम करके निस्तेज होकर लौट आया । फिर उसने लक्ष्मण जी पर भगवान शिव का पाशुपतास्त्र प्रयोग किया परंतु वह भी लक्ष्मण जी को प्रणाम करके लुप्त हो गया । फिर उसने भगवान विष्णु का वैष्णव अस्त्र लक्ष्मण जी पर प्रयोग किया परंतु वह भी उनकी परिक्रमा करके लौट आया ।

इंद्रजीत का वध

अब इंद्रजीत समझ गया लक्ष्मण जी एक साधारण नर नहीं स्वयं भगवान का अवतार है और वह तुरंत ही अपने पिता के पास पहुंचा और उसने सारी कथा का व्याख्यान दिया । परंतु रावण तब भी नहीं माना और उसने फिर से इंद्रजीत का युद्ध भूमि में भेज दिया । इंद्रजीत ने यह निश्चय किया यदि पराजय ही होनी है भगवान के हाथों वीरगति को प्राप्त होना तो सौभाग्य की बात है । और उसने फिर एक बार फिर एक महासंग्राम आरंभ किया । बड़ा भयंकर युद्ध हुआ । भगवान श्रीराम जी ने लक्ष्मण जी को पहले ही समझा दिया था की इंद्रजीत एकल पत्नी व्रत धर्म का कठोर पालन कर रहा है । इस कारण से उन्हें उसका वध करते समय इस बात का ध्यान रखना होगा की इंद्रजीत का शीश कटकर भूमि पर ना गिरे अन्यथा उसके गिरते ही ऐसा विस्फोट होगा की सारी सेना उस विस्फोट में समा कर नष्ट हो जाएगी । इसीलिए अंत में लक्ष्मण जी ने भगवान श्रीराम जी का नाम लेकर एक ऐसा बाण छोड़ा जिससे इंद्रजीत के हाथ और शीश कट गए और उसका शीश कटकर भगवान श्रीराम जी के चरणों में पहुंच गया ।

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संजय कुमार

रामायण_के कुछ रहस्य
रावण का वध करने के बाद राम और सीता पुष्पक विमान से अयोध्या वापस लौटे थे।
यह विमान रावण का सौतेले भाई कुबेर का था। जिसे रावण ने बल पूर्वक छिना लिया था।
इसे रावण के एयरपोर्ट हैंगर से उड़ाया जाता था। रावण के बाद भगवान राम ने उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया था।
कई शोध में मिली जानकारी के मुताबिक, रावण के पास पुष्पक विमान के अलावा भी कई तरह के एयरक्राफ्ट थे।
इन विमानों का इस्तेमाल लंका के अलग-अलग हिस्सों में जाने के अलावा राज्य के बाहर भी किया जाता था।
इस बात की पुष्टि वाल्मिकी रामायण का यह श्लोक भी करता है। लंका जीतने के बाद राम ने पुष्पक विमान में उड़ते हुए लक्ष्मण से यह बात कही थी…
– कई विमानों के साथ, धरती पर लंका चमक रही है.
– यदि यह विष्णु जी का वैकुंठधाम होता तो यह पूरी तरह से सफेद बादलों से घिरा होता।
महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित विमाननिर्माण शास्त्र के अनुसार रावण ने अलग-अलग विमानों का निर्माण किया था ।
ऐसा कहा जाता है कि रावण के पास
मयूर विमान,
पुष्पक विमान आदि १८ प्रकार के विमान थे ।
इन विमानों के लिए रावण के पास
वेरगन्तोटा,
थोडूपोल कान्डा,
उस्सन्गोडा,
वरियपोला,
वातरियपाला तथा
गुरुलूपोथा, ऐसे ६ हवाई अड्डे थे ।
इनमें से गुरुलूपोथा में रावण की पत्नी मंदोदरी का विशाल महल था।
रावण की लंका में छह एयरपोर्ट
👉 वेरांगटोक (श्रीलंका के महीयांगना में):
वेरांगटोक जो महियांगना से 10 किलोमीटर दूर है वहीं पर रावण ने माता सीता का हरण कर पुष्पक विमान को उतारा था।
महियांगना मध्य श्रीलंका स्थित नुवारा एलिया का एक पर्वतीय क्षेत्र है। इसके बाद सीता माता को जहाँ ले जाया गया था, उस स्थान का नाम गुरुलपोटा है जिसे अब सीतोकोटुवा नाम से जाना जाता है। यह स्थान भी महियांगना के पास है। वेरांगटोक में था रावण का वायुसेना मुख्यालय।
👉 थोटूपोला कांडा (होटोन प्लेन्स):
थोटूपोला का अर्थ पोर्ट से है। ऐसा स्थान जहां से कोई भी व्यक्ति अपनी यात्रा शुरू करता हो। कांडा का मतलब है पहाड़।
थोटूपोला कांडा समुद्र तल से 6 हजार फीट की ऊंचाई पर एक समतल जमीन थी। माना जाता है कि यहां से सिर्फ ट्रांसपोर्ट जहाज ही हवा में उड़ाए जाते थे।
👉 वारियापोला (मेतेले):
वारियापोला के कई शब्दों में तोड़ने पर वथा-रि-या-पोला बनता है। इसका अर्थ है, ऐसा स्थान जहां से एयरक्राफ्ट को टेकऑफ और लैंडिंग दोनों की सुविधा हो। वर्तमान में यहां मेतेले राजपक्षा इंटरनेशनल एयरपोर्ट मौजूद है।
👉 गुरुलुपोथा (महीयानगाना):
सिंहली भाषा के इस शब्द को पक्षियों के हिस्से कहा जाता है। इस एयरपोर्ट एयरक्राफ्ट हैंगर या फिर रिपेयर सेंटर हुआ करता था।
👉 – दक्षिणी तटरेखा पर उसानगोडा–लंका दहन में रावण का उसानगोड़ा हवाई अड्डा नष्ट हो गया था। उसानगोड़ा हवाई अड्डे को स्वयं रावण निजी तौर पर इस्तेमाल करता था। यहाँ रनवे लाल रंग का है। इसके आसपास की जमीन कहीं काली तो कहीं हरी घास वाली है। यह लड़ाकू जहाजों के लिए इस्तेमाल होता था।
विमान शास्त्र से संबंधित कहानियां रामायण और कई पौराणिक दस्तावेजों में मिलती हैं, लेकिन महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखी गई वैमानिकी शास्त्र सबसे ज्यादा प्रमाणिक किताब मानी जाती है।
यह पूरी किताब निबंध के तौर पर लिखी गई। इसमें रामायण काल के दौर के करीब 120 विमानों का उल्लेख किया गया। साथ ही इन्हें अलग-अलग समय और जमीन से उड़ाने के बारे में भी बताया गया। इसके अलावा इसमें इस्तेमाल होने वाले फ्यूल, एयरोनॉटिक्स, हवाई जहाज, धातु-विज्ञान, परिचालन का भी जिक्र किया गया।
इसी के आधार पर तलपड़े जी ने वैदिक बिमान बनाया और उड़ाया भी था जो मर्करी यानी पारे के ईधन से चलित था
रण्य काण्ड ३५.३ में वाल्मिकी बताते है कि रावण के पास एक “यानशाला” थी। इसका मतलब उसके पास और भी विमान रहे होंगे। पिशाचों की तरह शक्ल वाले खच्चर इस यान को चलते थे और एक सारथी कि आवश्यकता पड़ती थी। पुष्पक को सारथी की आवश्यकता नहीं है। वो वहीं जाता है जहा उसे जाने के लिए कहां जाता है।
अरण्य काण्ड ५१.१५ और ५१.१६ में बताया गया है कैसे जटायू ने उन खच्चरों को मारा और रावण का वो महा-रथ तोड़ दिया।
🙏जयश्रीराम🙏
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લોકડાઉન દરમ્યાન ઘરમાં જ રહેવાનું બહુ આકરું લાગતું હોય તો નેલશન મંડેલાને યાદ કરજો.

દક્ષિણ આફ્રિકાની સ્વતંત્રતા માટે લડત આપતા નેલશન મંડેલાની ધડપકડ કરીને એને રુબેન ટાપુ પર બંધીવાન બનાવેલા. આ ટાપુ પર એક સાવ નાનકડી રૂમમાં એમને રાખવામાં આવેલા જેમાં સુવા માટે પથારીની પણ વ્યવસ્થા નહોતી.

નેલશન મંડેલાને આ કેદ દરમ્યાન દર 6 મહિને માત્ર એકવખત એક પત્ર લખવા દેવામાં આવતો અને બહારની વ્યક્તિએ મોકલેલો એક પત્ર એને વાંચવા આપવામાં આવતો. 6 મહિનામાં માત્ર એક જ પત્ર લખી શકતા અને એક જ પત્ર વાંચી શકતા.

કોઈ નેલશન મંડેલાને મળવા માટે આવે તો મળવાની મનાઈ હતી. વર્ષમાં માત્ર એક વખત અને એ પણ ફક્ત 30 મિનિટ માટે મળવા દેવાની છૂટ મળતી. આવી પરિસ્થિતિમાં નેલશન મંડેલા એ રુબેન ટાપુ પર કેટલો સમય જેલવાસ ભોગવ્યો છે એ જાણો છો ? પૂરા 18 વર્ષ. ત્યાર બાદ બીજા 9 વર્ષ એને એક ઘરમાં કેદ કરીને રાખવામાં આવ્યા હતા.

આમ નેલશન મંડેલા પોતાના દેશની સ્વતંત્રતા માટે 27 વર્ષ કેદ રહ્યા.

નેલશન મંડેલાને કોઈ સુવિધા નહોતી મળતી અને એકલા રહેવાનું હતું છતાં દેશ માટે 9800 દિવસ કરતા વધુ સમય કાઢ્યો. આપણી પાસે તો ટીવી, ઈન્ટરનેટ, મોબાઈલ અને એ બધાથી વિશેષ આપણો પરિવાર આપણી સાથે છે તો શું આપણે આપણી જાત માટે, આપણા પરિવાર માટે અને આપણા દેશ માટે જરૂર પડે તો થોડા વધુ દિવસો ઘરમાં ના રહી શકીએ ?

લોકડાઉન આકરું લાગે ત્યારે નેલશન મંડેલાનો આ ફોટો જોજો અને એના લોકડાઉનને યાદ કરજો.

તકલીફ પોતાની સાથે સ્મિત લઈને પણ આવતી હોય છે.

🙏🙏🙏

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😀😃😄😂😄😃😀
एक बार एक बंदर को उदासी के कारण मरने की इच्छा हुई, तो उसने एक सोते हुए शेर के कान खींच लिये।

शेर उठा और
गुस्से से दहाड़ा-
“किसने किया ये..? किसने अपनी मौत बुलायी है..?”

बंदर: “मैं हूँ महाराज। दोस्तो के अभाव में अत्याधिक उदास हूँ,
मरना चाहता हूँ,
आप मुझे खा लीजिये।”

शेर ने हँसते हुए पूछा-
“ मेरे कान खीँचते हुए तुम्हें किसी ने देखा क्या..?”
🤔

बंदर: “नहीं महाराज…”

शेर: “ठीक है, एक दो बार और खीँचो, बहुत ही अच्छा लगता है…. !!”

इस कहानी का सार :

अकेले रह-रह कर जंगल का राजा भी बोर हो जाता है।

इसलिए अपने दोस्तों के संपर्क में रहें, कान खीँचते- खिचाते रहे, पंगा लेते रहे…।

सुस्त न रहे,
मस्ती 👇👆🤪करते रहें..!

आप सभी भी अपने मित्रों से संपर्क बनाकर रखिए
विश्वास कीजिए आपका मन सदा ही प्रफुल्लित और आप सदैव स्वस्थ रहेंगे
😊😊😊😊😊
ये वो चिकित्सक हैं
जो शब्दों से ही आपका उपचार कर दिया करते हैं।
🥰🥰🥰😍🥰🥰🥰

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एक पंडित एक होटल में गया और मैनेजर के पास जाकर बोला :- क्या रूम नंबर 39 खाली है?

मैनेजर:- हां, खाली है, आप वो रूम ले सकते हैं.. ,,

पंडित:- ठीक है, मुझे एक चाकू, एक 3 इंच का काला धागा और एक 79 ग्राम का संतरा कमरे में भिजवा दो।

मैनेजर:- जी, ठीक है, और हां, मेरा कमरा आपके कमरे के ठीक सामने है,अगर आपको कोई दिक्कत होती है तो तुम मुझे आवाज दे देना,,,

पंडित:- ठीक है,,,

रात को……………….

पंडित के कमरे से तेजी से चीखने चिल्लाने की और प्लेटो के टूटने की आवाज आने लगती है

इन आवाजों के कारण मैनेजर सो भी नही पाता और वो रात भर इस ख्याल से बैचेन होने लगता है कि आखिर उस कमरे में हो क्या रहा है?

अगली सुबह………….
जैसे ही मैनेजर पंडित के कमरे में गया वहाँ पर उसे पता चला कि पंडित होटल से चला गया है और कमरे में सब कुछ वैसे का वैसा ही है और टेबल पर चाकू रखा हुआ है,,
मैनेजर ने सोचा कि जो उसने रात में सुना कहीं उसका मात्र वहम तो नही था,,
और ऐसे ही एक साल बीत गया….
एक साल बाद……..

वही पंडित फिर से उसी होटल में आया और रूम नंबर 39 के बारे में पूछा?

मैनेजर:- हां, रूम 39 खाली है आप उसे ले सकते हो,,,

पंडित:- ठीक है, मुझे एक चाकू, एक 3 इंच का धागा और एक 79 ग्राम का संतरा भी चाहिए होगा,,,

मैनेजर:- जी, ठीक है,,,

उस रात में मैनेजर सोया नही, वो जानना चाहता था कि आखिर रात में उस कमरे में होता क्या है?

तभी वही आवाजें फिर से आनी चालू हो गई और मैनेजर तेजी से पंडित के कमरे के पास गया, चूंकि उसका और पंडित का कमरा आमने-सामने था, इस लिए वहाँ पहुचने में उसे ज्यादा समय नही लगा

लेकिन दरवाजा लॉक था, यहाँ तक कि मैनेजर की वो मास्टर चाभी जिससे हर रूम खुल जाता था, वो भी उस रूम 39 में काम नही करी

आवाजो से उसका सिर फटा जा रहा था, आखिर दरवाजा खुलने के इंतजार में वो दरवाजे के पास ही सो गया…..

अगली सुबहा………..

जब मैनेजर उठा तो उसने देखा कि कमरा खुला पड़ा है लेकिन पंडित उसमें नही है।

वो जल्दी से मेन गेट की तरफ भागा, लेकिन दरबान ने बताया कि उसके आने से चंद मिनट पहले ही पंडित जा चुका था,,,

उसने वेटर से पूछा तो वेटर ने बताया कि कुछ समय पहले ही पंडित यहाँ से चला गया और जाते वक्त उनसे होटल के सभी वेटरों को अच्छी खासी टिप भी दी…..

मैनेजर बिलबिला के रह गया, उसने निश्चय कर लिया कि मार्च में वो पता करके रहेगा…. कि आखिर ये पंडित और रूम 39 का राज क्या है…

मार्च वही महीना था, जिस महीने में हर साल पंडित एक दिन के लिए उस होटल आता था,,

अगले साल……..

अगले साल फिर वही पंडित आया और रूमनंबर 39 मांगा?
मैनेजर:- हां, आपको वो रूम मिल जाएगा

पंडित:- मुझे एक 3 इंच का धा गाएक 79 ग्राम का संतरा और एक धार दार चाकू भी चाहिए,,,

मैनेजर:- जी ठीक है,,,

रात को…..

इस बार मैनेजर रात में बिल्कुल नही सोया और वो लगातार उस कमरे से आती हुई आवाजो को सुनता रहा

जैसी ही सुबह हुई और पंडित ने कमरा खोला, मैनेजर कमरे में घुस गया और पंडित से बोला:-

आखिर तुम रात को इन सब चीजों के साथ इस कमरे में क्या करते हो..? ये आवाजें कहां से आती हैंं…

जल्दी बताओ..?

पंडित ने कहा:- मैं तुम्हे ये राज तो बता दूंगा लेकिन एक शर्त है कि तुम ये राज किसी को नही बताओगे,,,

चूंकि मैनेजर ईमानदार आदमी था इसलिए उसने वो राज आज तक किसी को नही बताया

और अगर ये राज वो किसी को बताएगा औऱ मुझे पता चलेगा तो मैं आपको मेसेज कर दुँगा…ध्यान से पढ़ने के लिए धन्यवाद 🙏🏻😆😆
खाली समय में क्या करू
दिमाग तो मेरा भी खराब हुआ था ये मैसेज पढ़ कर लेकिन आगे भेज कर कलेजे को ठंडक पढ गयी

😅😷

🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Posted in संस्कृत साहित्य

🌞
11 बातें, हर हिंदु को ज्ञात होनी चाहिए…

  1. क्या भगवान राम या भगवान कृष्ण कभी इंग्लैंड के House of Lord के सदस्य रहे थे ? नहीं ना ? फिर ये क्या Lord Rama, Lord Krishna लगा रखा है ? सीधे भगवान राम, भगवान कृष्ण कहिये ।
  2. किसी की मृत्यु होने पर RIP मत कहिये। RIP यानी Rest in Peace जो दफ़नाने वालों के लिए कहा जाता है। आप कहिये- ॐ शांति, सद्गति मिले अथवा मोक्ष प्राप्ति हो ! आत्मा कभी एक स्थान पर आराम या विश्राम नहीं करती ! आत्मा का पुनर्जन्म होता है अथवा मोक्ष मिलता है !
  3. अपने रामायण एवं महाभारत जैसे ग्रंथों को Mythological मत कहिये ! ये हमारा गौरवशाली इतिहास है और राम एवं कृष्ण हमारे ऐतिहासिक देवपुरुष हैं, कोई Mythological (काल्पनिक) कलाकार नहीं !
  4. अपने इष्ट देवों का नाम आदर सहित लें, उनका मज़ाक न बनने दें !
  5. हमारें मंदिरों को टेम्पल या प्रार्थनागृह न कहें ! मंदिर🐠या देवालय कहोैं, भगवान के निवासगृह हैं ! वह प्रार्थनागृह नहीं होते ! मंदिर में केवल प्रार्थना नहीं होती ! अन्य पूजा पद्धति में साप्ताहिक प्रार्थना होती है, जबकि हिंदू धर्म में ये नित्य कर्म है।
  6. अपने बच्चों के जन्मदिन पर दीप बुझा के अपशकुन न करें ! अग्निदेव को न बुझाए ! अपितु बच्चों को दीप की प्रार्थना सिखाएं “तमसो मा ज्योतिर्गमय” “हे अग्नि देवता, मुझे अंधेरे से उजाले की ओर जाने का रास्ता बताएं” ! ये सारे प्रतीक बच्चों के मस्तिष्क में गहरा असर करते हैं !
  7. कृपया Spirituality और Materialistic जैसे शब्दों का उपयोग करने से बचें ! हिंदूओं के लिये सारा विश्व दिव्यत्व से भरा है ! Spirituality और Materialistic जैसे शब्द अनेक वर्ष पहले युरोप से यहां आये, जिन्होंने चर्च और सत्ता मे फरक किया ! विज्ञान और धर्म में ! इसके विपरित भारतवर्ष में ऋषि मुनि हमारे पहले वैज्ञानिक थे और सनातन धर्म का मूल विज्ञान में ही है ! यंत्र, तंत्र एवं मंत्र यह हमारे धर्म का ही हिस्सा है !
  8. “Sin” इस शब्द के स्थान पर “पाप” शब्द का प्रयोग करें ! हम हिंदूओं मे केवल धर्म (कर्तव्य, न्यायपरायणता एवं प्राप्त अधिकार ) और अधर्म (जब धर्म पालन न हो) है ! पाप अधर्म का हिस्सा है !
  9. ध्यान के लिये Meditation एवं प्राणायाम के लिये Breathing Exercise इन संज्ञाओं का प्रयोग न करें ! यह बिलकुल विपरीत अर्थ ध्वनित करते हैं !
  10. क्या आप भगवान से डरते है ? नहीं ना ? क्यों क्योंकि भगवान तो चराचर मे विद्यमान हैं, अजन्मा, निराकार, परोपकारी, न्यायकारी और सर्वशक्तिमान है ! इतना ही नहीं हम स्वयं भगवान का ही रूप हैं ! भगवान कोई हमसे पृथक नहीं, जो हम उनसे डरें ! तो फिर अपने आप को God Fearing अर्थात भगवान से डरने वाला मत कहिये !
    ध्यान रहे, विश्व मे केवल उनका सम्मान होता है जो स्वयं का सम्मान करते है !
    🙏🏼जय श्री राम 🙏🏼