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देवी सिंग तोमर

भारत के राष्ट्रीय जीवन मे राजपूत शब्द एक परंपरा के रूप में परिणित हो गया है .. जहां इस जाति ने बसकर एक बंजर ओर मरु भूमि में , अपनी चेतना और चरित्र से ही अपना राग, ओर रक्त से अपना इतिहास रचा।

मध्ययुग में जहां जौहर की चिंताएं जली, ओर जिन वीरांगना क्षत्राणियो ने , अग्नि की भयावह लपटों का प्रेम से आलिंगन किया, वहीं पुरुष प्रवीरो ने केशरिया बाना पहनकर शत्रु को यही सिखाया की सिंहःव्रत क्या होता है ………..

राजपूतो के बारे में आज अनेक तरह की अटकलें लगाई जाती है, आरोप लगाए जाते है, उनके इतिहास को चोरी किया जाता है, ओर राजपूतो के बारे में अनर्गल प्रलाप किया जाता है, उसने इतिहास का मख़ौल बनाकर छोड़ दिया है ।

इस देश के लोगो को … इस देश के इतिहासकारो को …. अपनी अटकलों के बीच इतिहास के चिंतकों ओर दो कौड़ी के दार्शनिको ने तत्कालीन सामाजिक और राष्ट्रक्रांति के उद्घोष को नही सुना !

अंग्रेजी के ग्रन्थो को पढ़कर , इतिहासकार बनने वालो के कानों में राजपूतो के राष्ट्रप्रेम की ” राष्ट्रवाणी कभी पहुंच ही नही सकी । यौद्धेय स्वतंत्रता , सौहार्द ओर समता के आदर्शों पर चलकर, भूमि से लेकर पशुओं तक कि पूजा करने वाले राजपूतो को विदेशी कहने में इतिहासकारो को ज़रा भी लज्जा नही आयी । राजपूतो पर आरोप- प्रत्यारोप लगाने वाले अति-ज्ञानीजन एक बार रोम-मकदूनिया आदि देशों का इतिहास भी पढ़े, गरीब लोगों को आजीवन दास बनाकर रखा जाता था जबकि दूसरी ओर आप ओर हम भारत मे दूध की नदियां बहा रहे थे । मनुष्य को पीड़ा देने की बात तो दूर है … राजपूतो में तो ऐसे राजा हुए है, जो भूलवश हुए जानवरो के वध के शोक में भी संन्यास ले लेते थे …. राजा भृतहरि उदारहण है ।
ऐसे दयालु राजपूत कभी स्वार्थी शाशक हो सकते थे ??

जब से इस आर्यवत का इतिहास लिखा गया है , तब से लेकर आज तक अगर देश के लिए सबसे ज़्यादा खुन किसी ने बहाया है, तो वह राजपूत ही है । भगवान श्री राम से लेकर अंतिम वीर दुर्गादास राठौड़ …… यह सभी राजपूत ही थे ।
देवासुर – संग्राम में जिसने दैत्यों के वध करने वाले वीर ” राजपूत ” ही थे।

मनुस्मृति में रामायण में , एवम गीता में इन्ही रक्षको को क्षत्रिय कहा जाता है। ओर क्षत्रिय राजकुमार को — महात्माराजपुत्रोयं कहा गया है । युद्ध करना ही उनका स्वधर्म ओर स्वकर्म था । किसी भी कारण से काम, लोभ, क्रोध या द्रोह से — उसे स्वधर्म का त्याग करना उचित न था ।
राजपूतो को बचपन से एक ही शिक्षा दी जाती थी —-

” नैव नित्यं जयस्तात , नैव नित्यं पराजय: ”

ना तो सदा किसी की जय होती है, ओर ना पराजय ….

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