Posted in सुभाषित - Subhasit

आदित्य कुमार गिरी

हिन्दू मनीषा कहती है

“न ही लक्ष्मी कुलक्रमज्जता, न ही भूषणों उल्लेखितोपि।
खड्गेन आक्रम्य भुंजीत: , वीर भोग्या वसुंधरा।।”

अर्थात,

लक्ष्मी कुल(वंश/खानदान) के अधीन नहीं होतीं।जरूरी नहीं कि लक्ष्मी एक ही परिवार तक सीमित रहे या पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसी परिवार के पास रहे।

और किसी आभूषण(गहने) पर किसी का नाम नहीं होता।अर्थात गहने किसी की बपौती नहीं होते।

तलवार के बल पर पुरुषार्थ करने वाले वीर ही इस धरती को भोगते हैं।

हिन्दू मनीषा ने दीनता और रिरियाने को हेय माना है। वीर की तरह जीना चाहिए। पाप,पुण्य, माफी,ग़लती जैसी कोई अवधारणा नहीं है।दीनता छोड़कर आत्मगौरव और प्रसन्न्ता से जीने की आदत विकसित करें।

इस धरती पर कोई ऐसा अनुभव नहीं जिसके लिए रोया या मरा जाए।लात मारिए दुःखों को,परेशानियों को।याद रखिएगा दुनिया को केवल ‘हां’ के साथ जिया जा सकता है।

अवसाद एक ऐसी मनःस्थिति है जो केवल निराशा देती है।व्यक्ति को झूठ बोलती है कि तुम कमज़ोर हो,क्षमताविहीन हो।जबकि आपमें अपार क्षमताएँ हैं।

ऐसी भावना जो आपसे झूठ बोले,उसे त्याग देना चाहिए क्योंकि वह आपके आत्म के विकास में बाधक है।

ऐसे हर बुरे व्यक्ति जो आपके गौरव को नष्ट करे,आपका सम्मान न करे,आपका बुरा करे,स्वकेन्द्रित हो,उन्हें लात मारिए। तुलसी ने इसी बात को यूं कहा था कि जिसके हृदय में राम नहीं वह कितना भी प्रिय व्यक्ति हो,त्याग दीजिए।

शिवोहम्….

Posted in वर्णाश्रमव्यवस्था:

देवी सिंग तोमर

भारत के राष्ट्रीय जीवन मे राजपूत शब्द एक परंपरा के रूप में परिणित हो गया है .. जहां इस जाति ने बसकर एक बंजर ओर मरु भूमि में , अपनी चेतना और चरित्र से ही अपना राग, ओर रक्त से अपना इतिहास रचा।

मध्ययुग में जहां जौहर की चिंताएं जली, ओर जिन वीरांगना क्षत्राणियो ने , अग्नि की भयावह लपटों का प्रेम से आलिंगन किया, वहीं पुरुष प्रवीरो ने केशरिया बाना पहनकर शत्रु को यही सिखाया की सिंहःव्रत क्या होता है ………..

राजपूतो के बारे में आज अनेक तरह की अटकलें लगाई जाती है, आरोप लगाए जाते है, उनके इतिहास को चोरी किया जाता है, ओर राजपूतो के बारे में अनर्गल प्रलाप किया जाता है, उसने इतिहास का मख़ौल बनाकर छोड़ दिया है ।

इस देश के लोगो को … इस देश के इतिहासकारो को …. अपनी अटकलों के बीच इतिहास के चिंतकों ओर दो कौड़ी के दार्शनिको ने तत्कालीन सामाजिक और राष्ट्रक्रांति के उद्घोष को नही सुना !

अंग्रेजी के ग्रन्थो को पढ़कर , इतिहासकार बनने वालो के कानों में राजपूतो के राष्ट्रप्रेम की ” राष्ट्रवाणी कभी पहुंच ही नही सकी । यौद्धेय स्वतंत्रता , सौहार्द ओर समता के आदर्शों पर चलकर, भूमि से लेकर पशुओं तक कि पूजा करने वाले राजपूतो को विदेशी कहने में इतिहासकारो को ज़रा भी लज्जा नही आयी । राजपूतो पर आरोप- प्रत्यारोप लगाने वाले अति-ज्ञानीजन एक बार रोम-मकदूनिया आदि देशों का इतिहास भी पढ़े, गरीब लोगों को आजीवन दास बनाकर रखा जाता था जबकि दूसरी ओर आप ओर हम भारत मे दूध की नदियां बहा रहे थे । मनुष्य को पीड़ा देने की बात तो दूर है … राजपूतो में तो ऐसे राजा हुए है, जो भूलवश हुए जानवरो के वध के शोक में भी संन्यास ले लेते थे …. राजा भृतहरि उदारहण है ।
ऐसे दयालु राजपूत कभी स्वार्थी शाशक हो सकते थे ??

जब से इस आर्यवत का इतिहास लिखा गया है , तब से लेकर आज तक अगर देश के लिए सबसे ज़्यादा खुन किसी ने बहाया है, तो वह राजपूत ही है । भगवान श्री राम से लेकर अंतिम वीर दुर्गादास राठौड़ …… यह सभी राजपूत ही थे ।
देवासुर – संग्राम में जिसने दैत्यों के वध करने वाले वीर ” राजपूत ” ही थे।

मनुस्मृति में रामायण में , एवम गीता में इन्ही रक्षको को क्षत्रिय कहा जाता है। ओर क्षत्रिय राजकुमार को — महात्माराजपुत्रोयं कहा गया है । युद्ध करना ही उनका स्वधर्म ओर स्वकर्म था । किसी भी कारण से काम, लोभ, क्रोध या द्रोह से — उसे स्वधर्म का त्याग करना उचित न था ।
राजपूतो को बचपन से एक ही शिक्षा दी जाती थी —-

” नैव नित्यं जयस्तात , नैव नित्यं पराजय: ”

ना तो सदा किसी की जय होती है, ओर ना पराजय ….

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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A Surprise Lesson from Squeezing an Orange
Dr. Wayne W. Dyer:

I was preparing to speak at an I Can Do Itconference and I decided to bring an orange on stage with me as a prop for my lecture. I opened a conversation with a bright young fellow of about twelve who was sitting in the front row.

“If I were to squeeze this orange as hard as I could, what would come out?” I asked him.

He looked at me like I was a little crazy and said, “Juice, of course.”

“Do you think apple juice could come out of it?”

“No!” he laughed.

“What about grapefruit juice?”

“No!”

“What would come out of it?”

“Orange juice, of course.”

“Why? Why when you squeeze an orange does orange juice come out?”

He may have been getting a little exasperated with me at this point.

“Well, it’s an orange and that’s what’s inside.”

I nodded. “Let’s assume that this orange isn’t an orange, but it’s you. And someone squeezes you, puts pressure on you, says something you don’t like, offends you. And out of you comes anger, hatred, bitterness, fear. Why? The answer, as our young friend has told us, is because that’s what’s inside.”

It’s one of the great lessons of life.

What comes out when life squeezes you?

When someone hurts or offends you?

If anger, pain and fear come out of you, it’s because that’s what’s inside. It doesn’t matter who does the squeezing— your mother, your brother, your children, your boss, the government. If someone says something about you that you don’t like, what comes out of you is what’s inside. And what’s inside is up to you, it’s a choice you have to make.

When someone puts the pressure on you and out of you comes anything other than love, it’s because that’s what you’ve allowed to be inside.

Once you take away all those negative things you don’t want in your life and replace them with love, you’ll find yourself living a highly functioning life.

Thanks, my friends, and here’s an orange for you… Have a great day ahead… 👍

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मनीष कुमार सोलंकी

‘उर्मिला’ संभवतया रामायण की सर्वाधिक उपेक्षित पात्र है.. जब भी रामायण की बात आती है तो हमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम याद आते हैं जो अपने पिता के वचन के लिए १४ वर्षों के वन को चले गए थे.. हमें देवी सीता याद आती हैं जो अपने पति के पीछे-पीछे वन की और चल दी..एक आदर्श भाई महापराक्रमी लक्ष्मण याद आते हैं जिन्होंने श्रीराम के लिए अपने जीवन का हर सुख त्याग दिया.. भ्रातृ प्रेम की मिसाल भरत याद आते हैं जिन्होंने अयोध्या में एक वनवासी सा जीवन बिताया..महाज्ञानी और विश्वविजेता रावण याद आता है जो धर्म कर्म से पंडित होते हुए अनीति कर बैठा.. महावीर हनुमान, कुम्भकर्ण और मेघनाद याद आते हैं..

किन्तु इन सभी मुख्य पात्रों के बीच हम लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला को भूल जाते हैं.. उसके दुःख, त्याग और विरह वेदना को भूल जाते हैं जबकि शायद उसने देवी सीता से भी कहीं अधिक दुःख झेला..वनवास से वापस आने के बाद सीता उर्मिला से रोते हुए गले मिलती है और कहती है कि “हे सखि! तुम्हारे दुःख का ज्ञान भला लक्ष्मण को क्या होगा? मैं समझ सकती हूँ..१४ वर्ष मैंने चाहे वनवास में ही गुजारे किन्तु तब भी मुझे मेरे पति का सानिध्य प्राप्त था किन्तु तुम ने १४ वर्ष अपने पति की विरह में बिताये हैं इसीलिए तुम्हारा त्याग मेरे त्याग से कहीं अधिक बड़ा है..”

उर्मिला जनकपुरी के राजा महाराज जनक और रानी सुनैना की द्वितीय पुत्री और सीता की छोटी बहन थी.. जब श्रीराम ने स्वयंवर जीत कर देवी सीता का वरण किया तो महर्षि विश्वामित्र के सुझाव पर महाराज जनक ने सीता के साथ अपनी दूसरी पुत्री उर्मिला का विवाह लक्ष्मण के साथ तथा अपने छोटे भाई क्षीरध्वज की पुत्रिओं मांडवी और श्रुतकीर्ति का विवाह क्रमशः भरत और शत्रुघ्न के साथ तय किया..चारो बहनें एक साथ ही जनकपुरी से अयोध्या आयीं..लक्ष्मण और उर्मिला के अंगद और चंद्रकेतु नामक दो पुत्र और सोमदा नाम की एक पुत्री हुए…वाल्मीकि रामायण में उन्हें रूप, गुण एवं तेज में सीता के समान ही कहा गया है जिसने अल्प समय में ही अयोध्या में सभी का ह्रदय जीत लिया…
जब श्रीराम को वनवास हुआ तो उनके लाख समझाने के बाद भी देवी सीता उनके साथ चलने को तैयार हुई.. उधर लक्ष्मण तो राम के प्राण ही थे, वे कैसे उनका साथ छोड़ सकते थे.. इसलिए वे भी वन चलने को तैयार हुए..जब उर्मिला को पता चला कि लक्ष्मण भी वन जाने को प्रस्तुत हैं तब वे भी वल्कल वस्त्र धारण कर उनके पास आई और वन चलने का अनुरोध किया.. इस पर लक्ष्मण ने कहा “उर्मिले! तुम मेरी दुविधा को समझने का प्रयास करो… मेरे वन जाने का उद्देश्य केवल इतना है कि मैं वहाँ भैया और भाभी की सेवा कर सकूँ.तुम्हारे सानिध्य से मुझे सुख ही मिलेगा किन्तु तुम्हारे वहाँ होने पर मैं अपने इस कर्तव्य का वहाँ पूरी तरह से नहीं कर सकूँगा.. अतः तुम्हे मेरी सौगंध है कि तुम यहीं रहकर मेरे वृद्ध माँ-बाप की सेवा करो..” इसपर उर्मिला रोते हुए कहती हैं कि “आपने मुझे अपनी सौगंध दे दी है तो अब मैं क्या कर सकती हूँ? किन्तु मैं ये सत्य कहती हूँ कि चौदह वर्षों के पश्चात जब आप वापस आएंगे तो मुझे जीवित नहीं देख पाएंगे.. आपके विरह में इसी प्रकार रो-रो कर मैं अपने प्राण त्याग दूँगी..” तब लक्ष्मण फिर कहते हैं “प्रिये! अगर तुम इस प्रकार विलाप करोगी तो मैं किस प्रकार वन जा पाउँगा.. इसलिए मैं तुम्हे एक और सौगंध देता हूँ कि मेरे लौट के आने तक तुम किसी भी परिस्थिति में रोना मत..” यही कारण था जब लक्ष्मण लौट कर आये तो उर्मिला कई दिनों तक रोती रही.

देवी उर्मिला के भीतर का अंतर्द्वंद समझा जा सकता हैं.. १४ वर्षों तक ना केवल वो अपने पति की विरह में जलती रही वरन अपने आसुंओं को भी रोक कर रखा.. यहाँ तक कि जब महाराज दशरथ का स्वर्गवास हुआ तो भी वे लक्ष्मण को दिए अपने वचन के कारण रो ना सकी..जब भरत अयोध्या वापस आते हैं और उन्हें श्रीराम के वनवास का समाचार मिलता है तो वे अपनी माता कैकेयी की कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हैं और उसके बाद तीनो माताओं, गुरुजनों और मंत्रियों को लेकर श्रीराम को वापस लेने के लिए चल देते हैं.. उस समय उर्मिला उनके पास आती हैं और उन्हें भी अपने साथ ले चलने को कहती हैं.इस पर भरत उन्हें समझाते हुए कहते हैं कि “उर्मिला! तुम इतना व्यथित क्यों होती हो? तुम्हारी व्यथा मैं समझ सकता हूँ किन्तु तुम्हे यात्रा का कष्ट सहन करने की क्या आवश्यकता है? बस कुछ ही दिनों की बात है, मैं तुम्हारे पति को साथ लेकर ही लौटूँगा.मैंने ये निश्चय किया है कि भैया, भाभी और लक्ष्मण को वापस लाने से मुझे विश्व की कोई शक्ति नहीं रोक सकती.. अतः तुम अधीरता त्यागो और अपने पति के स्वागत की तयारी करो..” जब श्रीराम अपने वचन की बाध्यता के कारण भरत के साथ आने में अपनी असमर्थता व्यक्त करते हैं तो भरत अयोध्या वापस आकर उर्मिला से कहते हैं “मैं सबसे अधिक तुम्हारा दोषी हूँ.. मेरे ही हठ के कारण तुम्हारे पास अपने पति के सानिध्य का जो एक अवसर था वो तुम्हे प्राप्त नहीं हुआ अतः तुम मुझे क्षमा कर दो..

उर्मिला के विषय में उसकी निद्रा बड़ी प्रसिद्ध है जिसे “उर्मिला निद्रा” कहा जाता है…अपने १४ वर्ष के वनवास में लक्ष्मण एक रात्रि के लिए भी नहीं सोये.. जब निद्रा देवी ने उनकी आँखों में प्रवेश किया तो उन्होंने निद्रा को अपने बाणों से बींध दिया.. जब निद्रा देवी ने कहा कि उन्हें अपने हिस्से की निद्रा किसी और को देनी होगी तब लक्ष्मण ने अपनी निद्रा उर्मिला को दे दी..इसीलिए कहते हैं कि लक्ष्मण वन में १४ वर्षों तक जागते रहे और उर्मिला अयोध्या में १४ वर्षों तक सोती रही.. दक्षिण भारत में आज भी कुम्भकर्ण निद्रा के साथ-साथ उर्मिला निद्रा का भी जिक्र उन लोगों के लिए किया जाता है जिसे आसानी से जगाया ना सके.. ये इसलिए भी जरुरी था कि रावण के पुत्र मेघनाद को ये वरदान प्राप्त था कि उसे केवल वही मार सकता है जो १४ वर्षों तक सोया ना हो.. यही कारण था जब श्रीराम का राज्याभिषेक हो रहा था तो अपने वचन के अनुसार निद्रा देवी ने लक्ष्मण को घेरा और उनके हाथ से छत्र छूट गया..इसी कारण वे सो गए और राम का राज्याभिषेक नहीं देख पाए..उनके स्थान पर उर्मिला ने राज्याभिषेक देखा..

एक तरह से कहा जाये तो मेघनाद के वध में उर्मिला का भी उतना ही योगदान है जितना कि लक्ष्मण का.. जब लक्ष्मण के हाँथों मेघनाद की मृत्यु हो गयी तो उसकी पत्नी सुलोचना वहाँ आती है और क्रोध पूर्वक लक्ष्मण से कहती है “हे महारथी! तुम इस भुलावे में मत रहना कि मेरे पति का वध तुमने किया है.. ये तो दो सतियों के अपने भाग्य का परिणाम है..यहाँ पर सुलोचना ने दूसरे सती के रूप में उर्मिला का ही सन्दर्भ दिया है.. यहाँ एक प्रश्न और आता है कि अगर उर्मिला १४ वर्षों तक सोती रही तो उसने अपने पति के आदेशानुसार अपने कटुम्ब का ध्यान कब रखा..इसका जवाब हमें रामायण में ही मिलता है कि उर्मिला को ये वरदान था कि वो एक साथ तीन-तीन जगह उपस्थित हो सकती थी और तीन अलग-अलग कार्य कर सकती थी और उनका ही एक रूप १४ वर्षों तक सोता रहा..
वाकई उर्मिला के विरह और त्याग को जितना समझा जाये उतना कम है..शायद इसीलिये सीता ने एक बार कहा था,”हजार सीता मिलकर भी उर्मिला के त्याग की बराबरी नहीं कर सकती’..
धन्य है वो युग..धन्य है वो लोग …जिसने उर्मिला का त्याग देखा..धन्य है वो भारत भूमि जहां उर्मिला जन्मी… 😊👏