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आश्रम-व्यवस्था

वेद ने मनुष्य-जीवन को चार भागों में व्यक्त किया है।
वे भाग हैं-ब्रह्मचर्य आश्रम,गृहस्थ आश्रम,वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम।

आश्रम को आश्रम इसलिए कहा जाता है कि उसमें व्यक्ति पूर्णतया श्रम करता है और अपने जीवन को सफल बनाता है।मनुष्य जीवन की सफलता इसी बात पर आधारित है कि वह चारों आश्रमों में परिश्रम करे।

वेद ने मनुष्य-जीवन को गणित के मूलभूत आधार के समान माना है।

ब्रह्मचर्य-आश्रम:- ब्रह्मचर्य आश्रम में ब्रह्मचारी अपने शारीरिक,मानसिक,बौद्धिक व आत्मिक बल का संग्रह करता है।यह संग्रह काल होता है। यह काल मनुष्य जीवन का आधार होता है।जितना आधार पुष्ट होगा,उतना ही जीवन-रुपी भवन सुदृढ होगा।ब्रह्मचारी सब प्रकार का ज्ञान प्राप्त करता है और वेद-विद्या के प्रचार से आचार्य की इष्ट सिद्धि करता है।

ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ।
आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते ।।- (अथर्व० ११/५/१७)

ब्रह्मचर्यरुपी तप से राजा राज्य को विशेष करके पालता है। आचार्य ब्रह्मचर्य से ब्रह्मचारी है।
मन्त्र का आशय यह है कि राजा यदि इन्द्रिय-निग्रही है,तो ही वह प्रजा का पालन कर सकता है।आचार्य ब्रह्मचारी के द्वारा ब्रह्मचर्य-पालन के कारण ही विद्या-प्राप्ति के लिए उससे प्रेम करता है।
महर्षि धन्वन्तरि से शिष्यों ने एक बार पूछा कि जीवन में सब प्रकार के रोगों को नष्ट करने का क्या उपाय है?इस पर आचार्य धन्वन्तरि जी ने कहा-

मृत्युव्यापी जरानाशी पीयूषं परमौषधम् ।
ब्रह्मचर्यं महद्रत्नं,सत्यमेव वदाम्यहम् ।।

अर्थात्-मैं सत्य कहता हूँ कि मृत्यु,रोग और वृद्धपन का नाश करने वाला अमृतरूप सबसे बडा उपचार ब्रह्मचर्य ही है।

🌷गृहस्थ-आश्रम:-आश्रम-व्यवस्था में गृहस्थाश्रम को दूसरा स्थान दिया गया है।
गृहस्थाश्रम में पति-पत्नि एक-दूसरे के लिए और मां-बाप सन्तान के लिए त्याग करते हैं।गृहस्थाश्रम तपश्चर्या का आश्रम है।

दु:ख,हानि,पराजय,अपमान और मृत्यु को सहन करने से गृहस्थ की तपस्या का परिचय मिलता है।इसी के कारण सम्बन्धों की स्थापना होती है।
मातृकुल,पितृकुल,माता-पिता,श्वसृकुल से जो रिश्ते मनुष्य को प्राप्त होते हैं ,वे सभी गृहस्थाश्रम से प्राप्त होते हैं।इससे उत्तम व्यवहारों की सहज सिद्धि होती है।यह नैतिकता का अच्छा प्रशिक्षण केन्द्र होता है।इसमें काम,क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार और मानसिक निकृष्टता की परिक्षा होती रहती है।
गृहस्थाश्रम वात्सल्य की पूर्ति का आश्रम है।इसमें माता-पिता अपनी सन्तान के प्रति प्रेम-प्यार की भावना को पूरी करते हैं।यह आश्रम मनुष्य को शारीरिकता से आत्मिकता की और ले जाता है।इस संस्था में भी कुछ दोष हैं।उन दोषों के निवारण करने की आवश्यकता है,न कि यूरोप के कुछ स्वच्छन्दतावादियों की भाँति गृहस्थाश्रम की व्यवस्था को ही नष्ट करने की सोचनी चाहिए।

वैदिक साहित्य में गृहस्थाश्रम को ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ आश्रम माना गया है।मनु महाराज के दो श्लोक इस सन्दर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं-

यथावायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तव: ।
तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमा: ।।-(मनु० ३/६६)

अर्थ:-जैसे वायु के आश्रय से सब जीवों का जीवन सिद्ध होता है,वैसे ही गृहस्थ के आश्रय से ब्रह्मचर्य,वानप्रस्थ और संन्यास आश्रमों का निर्वाह होता है।
अर्थात् जिस प्रकार वायु के बिना प्राणियों का जीवन चल ही नहीं सकता,वैसे ही गृहस्थाश्रम के बिना उक्त तीनों आश्रम टिक ही नहीं सकते।

गृहस्थाश्रम में प्रवेश के अधिकारी कौन हैं?इस विषय को लेकर मनु महाराज ने कहा है:-

स संधार्य: प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता ।
सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियै: ।।-(मनु० ३/७८)

अर्थ-जो मोक्ष और संसार के सुख की इच्छा करता है,वह गृहस्थाश्रम को धारण करे।वह गृहस्थ निर्बल इन्द्रियवालों के द्वारा धारण करने के योग्य नहीं है।

काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि ।
न चैवेनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ।।-(मनु० ९/८९)

अर्थ-कन्या रजस्वला होने पर भी चाहे मृत्युपर्यन्त घर में अविवाहित बैठी रहे,परन्तु पिता कभी उसे गुणहीन युवक के साथ विवाहित न करे।

उपर्युक्त दोनों श्लोकों से यह परिणाम निकलता है कि विवाह से पहले युवक और युवती का स्वस्थ और सबलेन्द्रिय होना आवश्यक है।इसके साथ-२ आजीविका के साधन से सम्पन्न होने के साथ ही दोनों का सदाचारी होना भी अत्यन्त आवश्यक है।

इसके साथ ही विवाह बाल्यावस्था में नहीं होना चाहिए,युवावस्था में विवाह ठीक रहता है-

(सुश्रुत,शारीरस्थान १०-४६,४८) में लिखा है:-
“सोलह वर्ष से कम आयु वाली स्त्री में पच्चीस वर्ष से न्युन आयु वाला पुरुष जो गर्भ का स्थापन करे तो वह कुक्षिस्थ हुआ गर्भ विपत्ति को प्राप्त होता है,अर्थात् पूर्णकाल तक गर्भाशय में रहकर उत्पन्न नहीं होता,अथवा उत्पन्न हो तो फिर चिरकाल तक नहीं जीता।यदि जिये तो दुर्बलेन्द्रिय होता है।”

🌷वानप्रस्थ आश्रम:-यह विज्ञान बढाने और तपश्चर्या करने के लिए है।यह गृहस्थ का मोह छोडकर बाहर वन में जाकर रहने का आश्रम है।वर्तमान काल में वैदिक राज्य न होने के कारण वानप्रस्थियों को वन जाने की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।

शिर के केश होतं जब श्वेता,आय बुढापा रुप विजेता
पोते का मुख ज्योंहि देखे,छोड देय सब घर के लेखे।
नगर ग्राम के त्याग अहारा,मीठा लोना चरपर खारा
बढिया अम्बर सकल उतारे,केवल सादे वस्त्र धारे।
चाहे तो पत्नि संग ले जाय,अथवा पुत्र पास ठहराये
बस्ती छोड वनों में जाय,सुन्दर पर्णकुटी में छाये।
अग्निहोत्र गहे साङ्ग उपङ्गा,भगवद्भक्ति करे सत्संगा
कन्द मूल फल खाये भोजन,उसे खिलाये आय जो जन।
अग्निहोत्र उन्हीं से कीजे,वन जीवन का आनन्द लीजे
स्वाध्याय में चित्त लगाये,वृथा न अपना समय गँवाय।
विद्यादिक वस्तुन को देता,कभी दान पुण्य नहीं लेता
इन्द्रिय जीत सबका हो प्यारा,मन को वश में राखन हारा।
तन के हित अति जतन अकारी,किन्तु रहे पूर्ण ब्राह्मचारी।
निज पत्नि यदि होवे संगा,तो भी उठे न काम तरंगा
दगावान् भूमि पर सोवे,निज वस्तुन में निर्मम होवे।
वृक्ष मूल में करे निवासा,उत्तम वाणप्रस्थ को वासा ।
शान्त चित्त हो जो विद्वाना,करते वन धर्मानुष्ठाना
भिक्षा मांग उदर को भरते,वे नर भव सागर को तरते।
अविनाशी ईश्वर को पावहिं,प्राण द्वार सों प्रभु पँह जावहिं।।

🌷सन्यास आश्रम:-यह वेदादि शास्त्रों का प्रचार,धर्म व्यवहार का ग्रहण,दुष्ट व्यवहार का त्याग,सत्योपदेश और सबको निस्सन्देह करने के लिए है।

जा छिन मन हो जाय विरागी,वीतराग निर्मोही त्यागी
उसी समय होवे सन्यासी,गृही होवे अथवा बनवासी।
तोड फोड जग के जंजाला,सन्यासी हो रहे निराला।
करता रहे जगत् उपकारा,मोह माया से करे किनारा।
जिससे दुराचार नहीं छूटा,माया का बन्धन नहीं टूटा
नहीं शान्ति जिसके मन में,लगी लालसा जग द्रव्यन में।
जाको अन्त:करण न योगी,नहीं सन्यासी है वह भोगी।
वह सन्यास करे यदि धारण,करता केवल आत्म प्रतारण
हे पारब्रह्म को कबहुँ न पावे,चाहे कितना ढोंग रचावे।
सन्यासी रोके मन वाणी,बिन रोके होवे बहु हानी
आत्म-ज्ञान में इन्हें लगावे,पुन: आत्म परमात्म पावे।
ब्रह्मज्ञान आत्म में लावे,शान्त चित्त में उसे टिकावें।
सकल भोग कर्मों से संचित,फिर भी रहे ज्ञान से वंचित।
अकृत ईश्वर कर्म अगोचर,ज्ञान हेत नर हो गुरु गोचर।
गुरु बिन कबहुँ ज्ञान नहीं आवे,तांते गुरु चरणन में जावे।
गुप्त रहस्य गुरु सब जाने,जीव ब्रह्म के भेद पचाने।
गुरु से प्राप्त करें विज्ञाना,मन के संशय सभी मिटाना।
ऐसे जन का त्यागे संगा,जिसे चित्त वृत्ति हो भंगा।
जग का यश सुत धन की इच्छा,इन्हें त्यागे माँगे जो भिच्छा।
रहे मुक्ति साधन लव लीना,सन्यासी भक्ति रस भीना।
यश रचे प्रभु दर्शन कारण,शिखा सूत्र तहाँ करे निवारण।
पञ्च अग्नि प्राणों में धारे,गृह के बन्धन तोड बिसारे।
पारब्रह्म वित गृह से निकले,ताकी आत्मज्योति विकसे।।

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मोदी की मोमबत्ती और मेरा मन-

एक बार कबीरदास जी का पड़ोसी कबीरदास जी के घर आया।।
दिन का समय था,तेज़ धुप थी। पड़ोसी बैठा बोला- एक बात पुछनी थी गुरू!!

कबीर बोले,पुछ

आप और भाभी जी में कभी झगड़ा नहीं होता और मेरा हर वक़्त अपनी पत्नी से झगड़ा होता रहता है।। ऐसा क्यों ।।मुझे बताएँ

कबीर ने पड़ोसी को जवाब दिये बिना अपनी पत्नी को आवाज़ दी-
अरे सुनना,ज़रा मोमबत्ती जलाकर लाना !!

पत्नी बोली- जी हुकम..और मोमबत्ती जलाकर ले आई ।।

पड़ोसी परेशान,बेचैन…
कबीर से बोला-इतना उजाला, तेज़ धुप आपने मोमबत्ती क्यों जलवाई और क्यों मँगवाई ??

कबीर बोले- मेरी मर्ज़ी,तुझे क्या
अब पड़ोसी ने कबीर की पत्नी से पुछा-भाभी जी आप तो समझदार है आपने इतने उजाले मे तेज़ धुप मे इनकी बात मानकर मोमबत्ती जलाकर क्यों लाई।

कबीर की पत्नी बोली- तुझे क्या ।।

हुकम बोले… जो(वो)आदेश।।

अब कबीर बोले- बेटा- बात मोमबत्ती की नहीं है ।बात मन की है। मैंने कह दिया,उसने मान लिया ।। उसने मुझे मन से मान लिया है।।
इसलिए if,but क्यों,क्या,कैसे ।। हम आपस मे नहीं करते।।
हम दोनों का आपस में समर्पण भाव है । एक दूसरे के लिए।।

फिर कबीर बोलें-अब ये मोमबत्ती अपने घर ले जा ।। और इसे इस रविवार 5 अप्रेल को रात 9 बजे 9 मिनट के लिए घर की सारी लाईटे बंद करके घर के दरवाज़े पर जला लेना।।

लाकडाउन है।। बाहर मोमबत्ती मिले ना मिलें।।

पड़ोसी को जवाब मिल चुका था। वो कबीरदास जी को प्रणाम कर, मोमबत्ती लेकर ख़ुशी ख़ुशी घर लौट गया।।

आपका: राजेश श्रीमाली

मोदी #मोमबत्ती #5April

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पत्नी का लाकडाउन
😬😲😳🙃☹️😣😌😒🙄😮👏👏
🌞सुबह का नौ बज चुका था। पत्नी बिस्तर पर ही थी मैने अंगड़ाई लेते हुए पूछा,’ क्या बात है?आज चाय वाय नहीं मिलेगी क्या?
पत्नी बोली,”सही पकड़े है,आज से सब बन्द”।🤷🏻‍♀
मैं तुम और तुम्हारे इन दोनों बच्चों से तंग आ चुकी हूं,दिन भर में थक जाती हूँ।🤦🏻‍♀️
कमबख्त ये लाकडाउन नहीं हुआ,दिमाग का दही हो गया है।
🤝🏻आवाज़ में दल बदलुओं की तरह परिवर्तन को भांपते हुए मैने गले मे हाथ डालते हुए कहा,’ क्यों नाराज़ हो!हम सब तो तुम्हारे गुलाम है।’
हाथ छिटकते हुए पत्नी बोली रहने दो,मैं आज आप सब से रात आठ बजे बात करूंगी,मैं नारी हूँ,अबला हूं।😣
आप लोगों ने गुलाम बना रखा है।अपना हक मैं लेके रहूंगी।
भूलो मत,भूलो मत।☝️
कहते हुए वह उठकर चली गई और मैं ‘कारवां गुज़र गया,गुबार देखते रहे‘ वाली स्टाइल में चुपचाप चाय बनाने किचन में चल दिया।
दिन भर बड़ा खुटका रहा,पत्नी न जाने क्या क्या कागज़ों में लिखती रही।रात आठ बजे की तैयारी थी, शायद खैर,आठ भी बजे।
हम सब के लिए दरी बिछा दी गई थी,सामने सोफे पर साफ कवर लगा था,टेबल पर पानी की बोतल थी।ज़ाहिर था पत्नी वहां बैठेगी,मैडम ठीक आठ बजे अवतरित हुई।सोफे पर धीर गम्भीर मुद्रा में बैठ गई।☺️इतना गम्भीर मैने शायद उन्हें पहले कभी नहीं देखा था।
फिर बोली,मेरे प्यारों मैं आप सबकी चौबीस घण्टे की चाकरी करते करते थक गई हूं।आप सब लाकडाउन के चलते घर मे बैठे हैं ट्रैन के डिब्बे की भांति आप सब सिर्फ खाए जा रहे है और सो रहे है,थोड़ी थोड़ी देर में टॉयलेट जाते रहते है बस।
मोबाइल लिए बैठे रहते हैं,टी वी के प्रोग्राम और न्यूज देखते रहते हैं।
लेकिन मैं अटेंडर की तरह इधर से उधर दौड़ती रहती हूं,बहुत नाइंसाफी है। इसलिए मैंने बहुत सोच समझकर ये फैसला लिया है कि🤔
आज रात बारह बजे से….
कहते हुए उन्होंने थोड़ा पॉज़ लिया,ध्यान से सुनिएगा।आज रात बारह बजे से…..।
फिर पॉज़….।
🙄हमारी सबकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी। पता नहीं क्या कहेंगी। फिर बोली,
😱आज रात बारह बजे से इस घर में मेरा लॉक डाउन रहेगा।आप सबको अपनी अपनी व्यवस्था स्वयं करनी होगी,यदि आप चाहते है कि सब कुछ सकुशल चलता रहे तो आपको मेरे द्वारा बनाई गई आचार संहिता का पालन करना ही होगा।
पहली धारा के अनुसार किचन इमरजेंसी में ही खुलेगा,वो भी मेरी मर्ज़ी से। इमरजेंसी का मतलब है सिर्फ ब्रेकफास्ट,लंच,डिनर और वो भी सीमित मात्रा में। शाम चार बजे का स्नैक का प्रोग्राम निरस्त किया जाता है,चाय या काफी सिर्फ सुबह और शाम को ही मिलेगी।चाय का चाला दिन भर नहीं चलेगा। खाने के स्वाद,मात्रा और गुणवत्ता पर किसी को कुछ भी बोलने का हक नहीं होगा और सुन लीजिए यदि लॉक डाउन लम्बा चला तो सेवाओं में कटौती भी की जा सकती है।कटौती कितनी होगी,अभी कहा नहीं जा सकता।आप सबको इन बातों को मानना ही होगा। यह सूचना निर्विवाद रूप से आज रात बारह बजे से अस्तित्व में आ जाएगी।
फिर उंगली दिखाते हुए बोली,☝️
यदि घर में सुरक्षित व ठीक ढंग से रहना है तो इन नियमों का पालन करना ही होगा अन्यथा बाहर सड़क पर पुलिस वालों से सुजवाने के लिए तैयार रहना।🤷🏻‍♀
इतने प्रभावी भाषण के सामने हम सब हतप्रभ थे।कोई दूसरा चारा भी न था। जान बचाने के लिए हम सबने एक मत से वन्दे मातरम कहते हुए नियमावली पर हस्ताक्षर कर दिए।✍🏻✍🏻
🙏🏻🙏

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नाव डूबने के बाद नाविक और पांच-सात कुशल तैराक नदी में तैरकर अपनी-अपनी जान बचाये. उधर नाव, सबको नदी में छोड़.. खुद आगे निकल गई.

बचे हुए लोग राजा के दरबार में पेश किये गये – राजा ने नाविक से पूछा-
नाव कैसे डूबी!
नाव में छेद था क्या?

नाविक- नहीं महाराज! नाव बिल्कुल दुरुस्त थी.

महाराज- इसका मतलब, तुमने सवारी अधिक बिठाई!

नाविक- नहीं महाराज! सवारी नाव की क्षमतानुसार ही थे और न जाने कितनी बार मैंने उससे अधिक सवारी बिठाकर नाव पार लगाई है.

राजा- आंधी, तूफान जैसी कोई प्राकृतिक आपदा भी तो नहीं थी!
नाविक- मौसम सुहाना तथा नदी भी बिल्कुल शान्त थी महाराज.

राजा- मदिरा पान तो नहीं न किया था तुमने.

नाविक- नहीं महाराज! आप चाहें तो इन लोगों से पूछ कर संतुष्ट हो सकते हैं यह लोग भी मेरे साथ तैरकर जीवित लौटे हैं.

महाराज- फिर, क्या चूक हुई? कैसे हुई इतनी बड़ी दुर्घटना?

नाविक- महाराज! नाव हौले-हौले, बिना हिलकोरे लिये नदी में चल रही थी. तभी नाव में बैठे एक आदमी ने नाव के भीतर ही थूक दिया. मैंने पतवार रोक के उसका विरोध किया और पूछा कि “तुमने नाव के भीतर क्यों थूका?”
उसने उपहास में कहा कि “क्या मेरे नाव थूकने से नाव डूब जायेगी.”

मैंने कहा- “नाव तो नहीं डूबेगी लेकिन तुम्हारे इस निकृष्ट कार्य से हम शर्म से डूब रहें हैं.. बताओ!जो नाव तुमको अपने सीने पर बिठाकर इस पार से उस पार ले जा रही है तुम उसी में थूक रहे हो.

राजा- फिर?

नाविक- महाराज मेरी इतनी बात पर वो तुनक गया बोला पैसा देते हैं नदी पार करने के. कोई एहसास नहीं कर रहे तुम और तुम्हारी नाव.

राजा (विस्मय के साथ)- पैसा देने का क्या मतलब! नाव में थूकेगा? अच्छा! फिर क्या हुआ?

नाविक- महाराज वो मुझसे बहस करने लगा.

राजा-नाव में बैठे और लोग क्या कर रहे थे? क्या उन लोगों ने उसका विरोध नहीं किया?

नाविक- महाराज ऐसा नहीं था.. नाव के बहुत से लोग मेरे साथ उसका विरोध करने लगे.

राजा- तब तो उसका मनोबल टूटा होगा. उसको अपनी गलती का एहसास हुआ होगा.

नाविक- ऐसा नहीं था महाराज! नाव में कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसके साथ खड़े हो गये तथा नाव के भीतर ही दो खेमे बंट गये. बीच मझधार में ही यात्री आपस में उलझ पड़े.

राजा- चलती नाव में ही मारपीट! तुमने उन्हें समझाया तथा रोका नहीं..

नाविक- रोका महाराज, हाथ जोड़कर विनती भी की. मैने कहा ” नाव इस वक्त अपने नाजुक दौर में है. इस वक्त नाव में तनिक भी हलचल हम-सबकी जान का खतरा बन जायेगी” लेकिन कौन मेरी सुने! सब एक दूसरे पर टूट पड़े. तथा नाव न बीच धारा में ही संतुलन खो दिया महाराज.

रिवेश प्रताप सिंह

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. “सबसे बड़ा धनी” जब केवट प्रभु के चरण धो चुका तो भगवान कहते हैं- "भाई ! अब तो गंगा पार करा दे। इस पर केवट कहता है- "प्रभु ! नियम तो आपको पता ही है कि जो पहले आता है उसे पहले पार उतारा जाता है। इसलिए प्रभु अभी थोड़ा और रुकिये।" भगवान् कहते हैं- "भाई ! यहाँ तो मेरे सिवा और कोई दिखायी नहीं देता। इस घाट पर तो केवल मैं ही हूँ। फिर पहले किसे पार लगाना है ?" केवट बोला- "प्रभु ! अभी मेरे पूर्वज बैठे हुए हैं, जिनको पार लगाना है।" केवट झट गंगा जी में उतरकर प्रभु के चरणामृत से अपने पूर्वजों का तर्पण करता है। धन्य है केवट जिसने अपना, अपने परिवार और सारे कुल का उद्धार करवाया। फिर भगवान् को नाव में बैठाता है, दूसरे किनारे तक ले जाने से पहले फिर घुमाकर वापस ले आता है। जब बार-बार केवट ऐसा करता है तो प्रभु पूछते हैं- "भाई ! बार-बार चक्कर क्यों लगवा रहे हो ? मुझे चक्कर आने लगे हैं।" केवट कहता है- "प्रभु ! यही तो मैं भी कह रहा हूँ। ८४ लाख योनियों के चक्कर लगाते-लगाते मेरी बुद्धि भी चक्कर खाने लगी है, अब और चक्कर मत लगवाईये।" गंगा पार पहुँचकर केवट प्रभु को दंडवत प्रणाम करता है। उसे दंडवत करते देख भगवान् को संकोच हुआ कि मैंने इसे कुछ दिया नहीं। केवट उतरि दंडवत कीन्हा, प्रभुहि सकुच एहि नहि कछु दीन्हा। कितना विचित्र दृश्य है, जहाँ देने वाले को संकोच हो रहा है और लेने वाला केवट उसकी भी विचित्र दशा है कहता है - नाथ आजु मैं काह न पावा, मिटे दोष दुःख दारिद्र दावा। बहुत। काल मैं कीन्ही मजूरी, आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।। लेने वाला कहे बिना लिए ही कह रहा है कि "हे नाथ ! आज मैंने क्या नहीं पाया मेरे दोष दुःख और दरिद्रता सब मिट गये। आज विधाता ने बहुत अच्छी मजदूरी दे दी। आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिये।" भगवान् उसको सोने की अंगूठी देने लगते हैं तो केवट कहता है प्रभु उतराई कैसे ले सकता हूँ। हम दोनों एक ही बिरादरी के हैं और बिरादरी वाले से मजदूरी नहीं लिया करते। दरजी, दरजी सेे न ले सिलाई, धोबी, धोबी से न ले धुलाई। नाई, नाई से न ले बाल कटाई, फिर केवट, केवट से कैसे ले उतराई।। आप भी केवट, मैं भी केवट, अंतर इतना है कि हम नदी में इस पार से उस पार लगाते हैं, आप संसार सागर से पार लगाते हैं, हमने आपको पार लगा दिया, अब जब मेरी बारी आये तो आप मुझे पार लगा देना। प्रभु आज तो सबसे बड़ा धनी मैं ही हूँ। क्योंकि वास्तव में धनी वो होता है, जिसके पास आपका नाम है, आपकी कृपा है। आज मेरे पास दोनों ही हैं। मैं ही सबसे बड़ा धनी हूँ। ----------:::×:::--------- "जय श्री राम"


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🌹सर्व सद्गुण सागर श्रीराम जी :🌹

– पूज्य बापू जी

🌹श्रीरामचन्द्र जी परम ज्ञान में नित्य रमण करते थे। ऐसा ज्ञान जिनको उपलब्ध हो जाता है, वे आदर्श पुरुष हो जाते हैं। मित्र हो तो श्रीराम जैसा हो। उन्होंने सुग्रीव से मैत्री की और उसे किष्किंधा का राज्य दे दिया और लंका का राज्य विभीषण को दे दिया। कष्ट आप सहें और यश और भोग सामने वाले को दें, यह सिद्धान्त श्रीरामचन्द्रजी जानते हैं।
शत्रु हो तो रामजी जैसा हो। रावण जब वीरगति को प्राप्त हुआ तो श्रीराम कहते हैं- ‘हे विभीषण ! जाओ, पंडित, बुद्धिमान व वीर रावण की अग्नि संस्कार विधि सम्पन्न करो।”
विभीषणः “ऐसे पापी और दुराचारी का मैं अग्नि-संस्कार नहीं करता।”

🌹‘रावण का अंतःकरण गया तो बस, मृत्यु हुई तो वैरभाव भूल जाना चाहिए। अभी जैसे बड़े भैया का, श्रेष्ठ राजा का राजोचित अग्नि-संस्कार किया जाता है ऐसे करो।”

🌹बुद्धिमान महिलाएँ चाहती हैं कि ‘पति हो तो राम जी हो’ और प्रजा चाहती है, ‘राजा हो तो राम जी जैसा हो।’ पिता चाहते हैं कि ‘मेरा पुत्र हो तो राम जी के गुणों से सम्पन्न हो’ और भाई चाहते हैं कि ‘मेरा भैया हो तो राम जी जैसा हो।’ रामचन्द्र जी त्याग करने में आगे और भोग भोगने में पीछे। तुमने कभी सुना कि राम, लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न में, भाई-भाई में झगड़ा हुआ ? नहीं सुना।
श्रीराम जी का चित्त सर्वगुणसम्पन्न है। कोई भी परिस्थिति उनको द्वन्द्व या मोह में खींच नहीं सकती। वे द्वन्द्वातीत, गुणातीत, कालातीत स्वरूप में विचरण करते हैं।

🌹भगवान राम जी में धैर्य ऐसा जैसे पृथ्वी का धैर्य और उदारता ऐसी क जैसे कुबेर भंडारी देने बैठे तो फिर लेने वाले को कही माँगना न पड़े, ऐसे राम जी उदार ! पैसा मिलना बड़ी बात नहीं है लेकिन पैसे का सदुपयोग करने की उदारता मिलना किसी-किसी के भाग्य में होती है। जितना-जितना तुम देते हो, उतना-उतना बंधन कम होता है, उन-उन वस्तुओं से, झंझटों से तुम मुक्त होते हो। देने वाला तो कलियुग में छूट जाता है लेकिन लेने वाला बँध जाता है। लेने वाला अगर सदुपयोग करता है तो ठीक है नहीं तो लेने वाले के ऊपर मुसीबतें पड़ती हैं।

🌹मेरे को जो लोग प्रसाद या कुछ और देते हैं तो उस समय मेरे को बोझ लगता है। जब मैं प्रसाद बाँटता हूँ या जो भी कुछ चीज आती है, उसे किसी सत्कर्म में दोनों हाथों से लुटाता हूँ तो मेरे हृदय में आनंद, औदार्य का सुख महसूस होता है।

🌹इस देश ने कृष्ण के उपदेश को अगर माना होता तो इस देश का नक्शा कुछ और होता। राम जी के आचरण की शरण ली होती तो इस देश में कई राम दिखते। श्रीरामचन्द्रजी का श्वासोच्छ्वास समाज के हित में खर्च होता था। उनका उपास्य देव आकाश-पाताल में दूसरा कोई नहीं था, उनका उपास्य देव जनता जनार्दन थी। ‘जनता कैसे सुखी रहे, संयमी रहे, जनता को सच्चरित्रता, सत्शिक्षण और सद्ज्ञान कैसे मिले ?’ ऐसा उनका प्रयत्न होता था।

🌹श्रीरामचन्द्रजी बाल्यकाल में गुरु आश्रम में रहते हैं तो गुरुभाइयों के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं कि हर गुरुभाई महसूस करता है कि ‘राम जी हमारे हैं।’ श्रीराम जी का ऐसा लचीला स्वभाव है कि दूसरे के अनुकूल हो जाने की कला राम जी जानते हैं। कोई रामचन्द्र जी के आगे बात करता है तो वे उसकी बात तब तक सुनते रहेंगे, जब तक किसी की निंदा नहीं होती अथवा बोलने वाले के अहित की बात नहीं है और फिर उसकी बात बंद कराने के लिए रामजी सत्ता या बल का उपयोग नहीं करते हैं, विनम्रता और युक्ति का उपयोग करते हैं, उसकी बात को घुमा देते हैं। निंदा सुनने में रामचन्द्रजी का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाता, वे अपने समय का दुरुपयोग नहीं करते थे।
राम जी जब बोलते हैं तो सारगर्भित, सांत्वनाप्रद, मधुर, सत्य, प्रसंगोचित और सामने वाले को मान देने वाली वाणी बोलते हैं। श्रीराम जी में एक ऐसा अदभुत गुण है कि जिसको पूरे देश को धारण करना चाहिए। वह गुण है कि वे बोलकर मुकरते नहीं थे।

🌹रघुकुल रीति सदा चलि आई।
प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।।(श्रीरामचरित. अयो.कां. 27.2)
वचन के पक्के ! किसी को समय दो या वचन दो तो जरूर पूरा करो।

🌹आज की राजनीति की इतनी दुर्दशा क्यों है ? क्योंकि राजनेता वचन का कोई ध्यान नहीं रखते। परहित का कोई पक्का ध्यान नहीं रखते इसलिए बेचारे राजनेताओं को प्रजा वह मान नहीं दे सकती जो पहले राजाओं को मिलता था। जितना-जितना आदमी धर्म के नियमों को पालता है, उतना-उतना वह राजकाज में, समाज में, कुटुम्ब-परिवार में, लोगों में और लोकेश्वर की दुनिया में उन्नत होता है।

🌹उपदेशक हो तो राम जी जैसा हो और शिष्य हो तो भी राम जी जैसा हो। गुरु वसिष्ठ जी जब बोलते तो राम चन्द्र जी एकतान होकर सुनते हैं और सत्संग सुनते-सुनते सत्संग में समझने जैसे (गहन ज्ञानपूर्ण) जो बिंदु होते, उन्हें लिख लेते थे। रात्रि को शयन करते समय बीच में जागते हैं और मनन करते हैं कि ‘गुरु महाराज ने कहा कि जगत भावनामात्र है। तो भावना कहाँ से आती है ?’ समझ में जो आता है वह तो राम जी अपना बना लेते लेकिन जिसको समझना और जरूरी होता उसके लिए राम जी प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में जागकर उन प्रश्नों का मनन करते थे। और मनन करते-करते उसका रहस्य समझ जाते थे तथा कभी-कभी प्रजाजनों का ज्ञान बढ़ाने के लिए गुरु वसिष्ठ जी से ऐसे सुंदर प्रश्न करते कि दुनिया जानती है कि ‘योगवासिष्ठ महारामायण’ में कितना ज्ञान भर दिया राम जी ने। ऐसे-ऐसे प्रश्न किये राम जी ने कि आज का जिज्ञासु सही मार्गदर्शन पाकर मुक्ति का अनुभव कर सकता है ‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण के सहारे।

कोई आदमी बढ़िया राज्य करता है तो श्री रामचन्द्र जी के राज्य की याद आ जाती है कि ‘अरे !…. अब तो रामराज्य जैसा हो रहा है।’ कोई फक्कड़ संत हैं और विरक्त हैं, बोले, ‘ये महात्मा तो रमते राम हैं।’ वहाँ राम जी का आदर्श रख देना पड़ता है। दुनिया से लेना-देना करके जिसकी चेतना पूरी हो गयी, अंतिम समय उस मुर्दे को भी सुनाया जाता है कि रामनाम संग है, सत्नाम संग है। राम बोलो भाई राम….. इसके राम रम गये।’ चैतन्य राम के सिवाय शरीर की कोई कीमत नहीं। जैसे अवधपति राम के सिवाय इस नव-द्वारवाली अयोध्या में भी तो कुछ नहीं बचता है !

🌹कोई आदमी गलत काम करता है, ठगी करता है, धर्म के पैसे खा जाता है तो बोले, ‘मुख में राम, बगल में छुरी।’ ऐसा करके भी राम जी की स्मृति इस भारतीय संस्कृति ने व्यवहार में रख दी है।
बोलेः ‘धंधे का क्या हाल है ?’
बोलेः राम जी की कृपा है, अर्थात् सब ठीक है, चित्त में कोई अशांति नहीं। भीतर में हलचल नहीं है, द्वन्द्व, मोह नहीं है।
यह सत्संग तुम्हें याद दिलाता है कि मरते समय भी, जो रोम-रोम में रम रहा है उस राम का सुमिरन हो। गुरुमंत्र हो, रामनाम का सुमिरन हो, जिसकी जो आदतें होती है बीमारी के समय या मरते समय भी उसके मुँह से वही निकलता है।

श्री राम चन्द्रजी प्रेम व पवित्रता की मूर्ति थे, प्रसन्नता के पुंज थे ऐसे प्रभु राम का प्राकट्य दिन राम नवमी की आप सब को बधाई हो !

🌹स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2016, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 279

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