Posted in सुभाषित - Subhasit

[31/03, 7:12 pm] Harshad Ashodiya: Mundaka Upanishad (Mundaka 3 Khand 1):
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मण वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं
ध्यायमानः ॥ ८ ॥

उसे न चक्षु ग्रहण कर पाते हैं न वाणी, न अन्य देवता उसे ग्रहण कर पाते हैं; उसे न तपस्या से ग्रहण किया जा सकता है न कर्मों के द्वारा: जब अंतर सत्ता ज्ञान के प्रसाद से विशुद्ध हो जाती है, केवल तभी ध्यान की अवस्था में उस अखंड परमात्मा तत्व को देखा जाता है।
[31/03, 7:26 pm] Harshad Ashodiya: लुब्धस्य नश्यति यशः पिशुनस्य मैत्री नष्टक्रियस्य कुलमर्थपरस्य धर्मः।
विद्याफलं व्यसनिनः कृपणस्य सौख्यं राज्यं प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य।।अर्थात् लोभी व्यक्ति का यश, चुगलखोर की मित्रता, जिसकी क्रिया नष्ट हो गई है उसका वंश, धनपरायण का धर्म, बुरी आदत वाले की विद्या का फल, कंजूस का सुख तथा जिसके सचिव प्रमाद से युक्त हो गये हो, ऐसे राजा का राज्य नष्ट हो जाता है।

पञ्चतंत्र – काकोलुकीय – प्रमत्तसचिव
[31/03, 7:30 pm] Harshad Ashodiya: पीत्वा रसं तु कटुकं मधुरं समानं
माधुर्यमेव जनयेन्मधुमक्षिकासौ |
सन्तस्तथैव समसज्जनदुर्जनानां
श्रुत्वा वचः मधुरसुक्तरसं सृजन्ति ||

भावानुवाद

रस सेवुनि मधुर वा कटु, मधमाशी निर्मिते गोड मधु |
बोल ऐकूनी स्तुती वा निंदेचे , संत सांगती हितोपदेशु ||

जिस तरह मधुमक्खी कड़वा, मीठा रस पीकर (एकत्रित कर) इसे मधुर रस मे बदल देती है उसी प्रकार संत भी सज्जन दुर्जन दोनो के वचन सुनकर मधुर सुन्दर (रस युक्त वाणी) का सृजन करते हैं।
[31/03, 7:37 pm] Harshad Ashodiya: गुणाः गुणज्ञेषु गुणा: भवन्ति
ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः।
आस्व्याद्य तोयाः प्रवहन्ति नद्यः
समुद्रमासाद्य भवत्यपेयाः ॥

(विद्वान और गुणी व्यक्तियों के पास गुण, सद्गुण के ही रूप में सुरक्षित रहते हैं परन्तु वे ही गुण गुणहीन और नीच व्यक्तियों के संसर्ग से दूषित हो कर दोषों में परिणित हो जाते हैं। उदाहरणार्थ नदियों में अच्छे स्वाद वाला पीने योग्य जल प्रवाहित होता है परन्तु वही जल जब समुद्र के जल से मिल जाता है तब वह अशुद्ध हो कर खारा हो जाता है और पीने के योग्य नहीं रहता है।)

सूंदर सत्य

जैसे अर्जुन कृष्ण के संपर्क में आया और सुरक्षित रहा।
कर्ण दूषित सूर्योधन के संपर्क में आया और सत्यानाश हुआ।

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