Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

, :       🙏श्री गणेशाय नम:🙏    : , *जय माता दी*

//रात्रि कथा// *((((लालची आलसी की दुनिया))))*

एक गाँव में तोराली नाम की लड़की रहती थी। गोरा रंग, माथे पर लाल बिंदिया व हाथों में चाँदी की चूडियाँ खनकाती तोराली सबको प्रिय थी। बिहुतली रंगमंच पर उसका नृत्य देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबा लेते।

एक दिन उसके पिता के पास अनंत आया। वह उसी गाँव में रहता था। उसने तोराली के पिता से कहा, ‘मैं आपकी लड़की से विवाह करना चाहता हूँ।’

अनंत के पास धन-दौलत की कमी न थी। तोराली के पिता ने तुरंत हामी भर दी।

सुबाग धान (मंगल धान) कूटा जाने लगा। तोराली, अनंत की पत्नी बन गई। कुछ समय तो सुखपूर्वक बीता किंतु धीरे-धीरे अनंत को व्यवसाय में घाटा होने लगा। देखते ही देखते अनंत के घर में गरीबी छा गई।

तोराली को भी रोजी-रोटी की तलाश में घर से बाहर निकलना पड़ता था।
इस बीच उसने पाँच बेटों को जन्म दिया। एक दिन पेड़ के नीचे दबने से अनंत की आँखें जाती रहीं।
तोराली को पाँचों बेटों से बहुत उम्मीद थी। वह दिन-रात मेहनत-मजदूरी करती। गाँववालों के धान कूटती ताकि सबका पेट भर सके।

तोराली भगवान से प्रार्थना करती कि उसके बेटे योग्य बनें किंतु पाँचों बेटे बहुत अधिक आलसी थे।

उन्हें केवल अपना पेट भरना आता था। माता-पिता के कष्टों से उनका कोई लेना-देना नहीं था।

तोराली ने मंदिर में ईश्वर से प्रार्थना की कि उसे एक मेहनती व समझदार पुत्र पैदा हो। परंतु उसने बालक की जगह एक साँप को जन्म दिया।
जन्म लेते ही साँप जंगल में चला गया। तोराली अपनी फूटी किस्मत पर रोती रही।
तोराली के पाँचों बेटे उसे ताना देते-
‘तुम माँ हो या नागिन, एक साँप को जन्म दिया।’

अनंत के समझाने पर भी लड़कों के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आया।
कोई-कोई दिन ऐसा भी आता जब घर में खाने को कुछ न होता।
पाँचों बेटे तो माँग-मूँगकर खा आते। फुकन और तोराली अपने छठे साँप बेटे को याद करके रोते।

एक रात तोराली को सपने में वही साँप दिखाई दिया। उसने कहा, ‘माँ, मेरी पूँछ सोने की है। मैं रोज घर आऊँगा। तुम मेरी पूँछ से एक इंच हिस्सा काट लिया करना। सोने को बेचकर घर का खर्च आराम से चलेगा।’

तोराली ने मुँह पर हाथ रखकर कहा, ‘ना बेटा, अगर मैं तुम्हारी पूँछ काटूँगी तो तुम्हें पीड़ा होगी।’

“नहीं माँ, मुझे कोई दर्द नहीं होगा।’ साँप ने आश्वासन दिया और लौट गया।

वही सपना तोराली को सात रातों तक आता रहा।
आठवें दिन सचमुच साँप आ पहुँचा। तोराली ने कमरा भीतर से बंद कर लिया। डरते-डरते उसने चाकू से पूँछ पर वार किया। सचमुच उसके हाथ में सोने का टुकड़ा आ गया। साँप की पूँछ पर कोई घाव भी नहीं हुआ। माँ से दूध भरा कटोरा पीकर साँप लौट गया।

तोराली ने वह सोना बेचा और घर का जरूरी सामान ले आई। शाम को खाने में पीठा व लड्डू देखकर लड़के चौंके। तोराली ने झूठ बोल दिया कि उनके नाना ने पैसा दिया था।

इसी तरह साँप आता रहा और तोराली घर चलाती रही। उसका झूठ ज्यादा दिन चल नहीं सका। बेटों ने जोर डाला तो तोराली को पैसों का राज बताना ही पड़ा। बड़ा लड़का दुत्कारते हुए बोला, ‘मूर्ख माँ, यदि हमारे साँप-भाई की पूरी पूँछ सोने की है तो ज्यादा सोना क्‍यों नहीं काटती?’

छोटा बोला, ‘हाँ, इस तरह तो हम कभी अमीर नहीं होंगे। रोज थोड़े-थोड़े सोने से तो घरखर्च ही पूरा पड़ता है।’

तोराली और फुकन चुपचाप बेटों की बातें सुनते रहे। बेटों ने माँ पर दबाव डाला कि वह कम-से-कम तीन इंच सोना अवश्य काटे ताकि बचा हुआ सोना उनके काम आ सके।

तोराली के मना करने पर उन्होंने उसकी जमकर पिटाई की। बेचारा अंधा अनंत चिल्लाता ही रहा। रोते-रोते तोराली ने मान लिया कि वह अगली बार ज्यादा सोना काटेगी। अगले दिन साँप बेटे ने दरवाजे पर हमेशा की तरह आवाज लगाई-

दरवाजा खोलो, मैं हूँ आया
तुम्हारे लिए सोना हूँ लाया
क्या तुमने खाना, भरपेट खाया?

सदा की तरह तोराली ने भीतर से ही उत्तर दिया-

मेरा बेटा जग से न्यारा
माँ के दुख, समझने वाला
क्या हुआ गर इसका है रंग काला

साँप भीतर आया, तोराली ने उसे एक कटोरा दूध पिलाया, बेटों की मार से उसका अंग-अंग दुख रहा था। उसने नजर दौड़ाई, पाँचों बेटे दरारों से भीतर झाँक-झाँककर उसे जल्दी करने को कह रहे थे।

तोराली ने चाकू लिया और पूँछ का तीन इंच लंबा टुकड़ा काट दिया। अचानक चाकू लगते ही पूँछ से खून की धार बह निकली। साँप बेटा तड़पने लगा और कुछ ही देर में दम तोड़ दिया। तोराली, बेटे की मौत का गम मनाती रही और बेटों को अपने लालच का फल मिल गया।

हाँ, वह तीन इंच टुकड़ा भी तीन घंटे बाद केंचुल बन गया। उनके हात कुछ न लगा ,,,,

~~~~~ ऐ कहाणी हमनें नहीं लिखी है,हमने केवल आप तक पहुँचाने का प्रयास किया है, ~~~~•~

  . “卐 ज्योतिषी और हस्तरेखाविद 卐”
   :                      :🙏🙏:                    :
                  पं,संजय आमले
                     (  शास्त्री )
               मो,9860298094
,,, 8790466194,,,

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औरंगजेब की हर चाल को परास्त किया छत्रसाल ने

राकेश कुमार आर्य

छत्रसाल जैसे हिंदू वीरों के प्रयासों को अतार्किक, अयुक्तियुक्त, असमसामयिक और निरर्थक सिद्घ करने के लिए धर्मनिरपेक्षतावादी/ साम्यवादी इतिहास लेखकों ने एड़ी-चोटी का बल लगाया है। इन लोगों ने शाहजहां को ही नही, अपितु औरंगजेब को भी धर्मनिरपेक्ष शासक सिद्घ करने का प्रयास किया है। जबकि वास्तव में ऐसा नही था। डा. वी.ए. स्मिथ ने कहा है कि-”शाहजहां धार्मिक दृष्टि से एक कट्टर मुसलमान तथा धर्मांध शासक था। हिंदुओं पर उसने कठोर नियंत्रण लगाये। नये मंदिर बनाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया। प्रयाग एवं बनारस में उसने 76 हिंदू मंदिरों को गिरवा दिया था।”

हिन्दू राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष करते रहे हिन्दू वीर

(संदर्भ : ‘दा ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ पृष्ठ 397)

इतिहासकारों का कहना है कि उसने हिंदुओं पर पुन: तीर्थ यात्रा कर लगाया। उसने हिंदुओं को बलात मुसलमान बनाने की प्रक्रिया को भी प्रोत्साहन दिया। इतना ही नही वह शिया मुस्लिमों के प्रति भी कठोर था। अनेक शियाओं को उसकी कठोरता का शिकार होना पड़ा था। उसकी दक्षिण नीति उसकी धार्मिक कट्टरता तथा धार्मिक असहिष्णुता की नीति थी।

डा. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव कहते हैं-”यह ठीक है कि उसके शासन काल में प्रतिक्रियावादी भारत के बीज बोये जा चुके थे, जो फलस्वरूप मुगलवंश तथा साम्राज्य के पतन के मूल कारण थे। उसकी धार्मिक कट्टरता तथा असहिष्णुता ने ही औरंगजेबी प्रतिक्रियावादी शासन पद्घति को जन्म दिया।”

(संदर्भ : ‘भारत का इतिहास’ पृष्ठ 703)

शाहजहां के शासन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बनारसीदास सक्सेना ने कहा है कि उसके शासन काल में ”प्रांतीय शासक प्राय: स्वतंत्र हो गये।” कथित स्वर्ण-युग के निर्माता इस शासक के शासनकाल में एक बार अकाल पड़ गया था तो उस समय लोगों की जो स्थिति हुई थी उस पर इतिहासकार मूरलैंड ने लिखा है कि जब लोग भूखे मर रहे थे। उस समय शाहजहां के शिविर में हर प्रकार की रसद पड़ी थी।

मुण्डी ने लिखा है कि- ”जहां तक मैंने देखा दुखी लोगों की सहायतार्थ सरकार द्वारा कुछ भी नही किया गया।”

अब्दुल हमीद लाहौरी ने इस अकाल का आंखों देखा वर्णन करते हुए लिखा है-”एक-एक रोटी के लिए लोग अपना जीवन बेचने को तत्पर थे। पर कोई भी व्यक्ति उन लोगों को खरीदने के लिए उत्सुक नही था बाजारों में बकरे के मांस के स्थान पर कुत्ते का मांस बिकता था और मरे हुए व्यक्तियों की हड्डियों को पीस कर आटे में मिलाकर लोग बेचते थे।”

छत्रसाल इसी अवस्था से भारत की मुक्ति चाहते थे

शाहजहां के कुशासन की प्रतिक्रिया स्वरूप छत्रसाल का जन्म हुआ। जब उस महायोद्घा ने देखा कि लोग एक रोटी के लिए भी अपना जीवन बेच देना चाहते है, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि छत्रसाल जैसे देशभक्तों के हृदयों में आग न लगी हो? आग लगी, और इतनी तेज लगी कि संपूर्ण तंत्र को ही भस्मीभूत करने के लिए प्रचण्ड हो उठी।

इसी तेज पुंज छत्रसाल को राजा सुजानसिंह की मृत्यु के उपरांत उसके भाई इंद्रमणि ने ओरछा की गद्दी संभालने के पश्चात 1674-1676 के मध्य अपनी सहायता देना बंद कर दिया, तो इस शासक के बहुत बड़े क्षेत्र को जीतकर छत्रसाल ने अपने राज्य में मिला लिया। तब इंद्रमणि पर छत्रसाल ने अपना शिकंजा कसना आरंभ किया तो वह भयभीत हो गया और उसने शीघ्र ही छत्रसाल के साथ संधि कर ली। उसने छत्रसाल को मुगलों के विरूद्घ सहायता देने का भी वचन दिया।

तहवर खां को किया परास्त

1679 ई. में औरंगजेब ने अपने चिरशत्रु शत्रुसाल (छत्रसाल) का मान मर्दन करने के लिए अपने बहुत ही विश्वसनीय योद्घा तहवर खां को विशाल सेना के साथ भेजा। छत्रसाल इस समय संडवा बाजने में अपनी स्वयं की वर यात्रा लेकर आये हुए थे। उस समय उनकी भंवरी पड़ रही थी, तो तहवर खां ने उसी समय उन्हें घेर लिया। छत्रसाल के विश्वसनीय साथी बलदीवान ने तहवर खां से टक्कर ली। भंवरी पड़ चुकने पर छत्रसाल ने तहवरखां की सेना के पृष्ठ भाग पर आक्रमण कर दिया और जब तक तहवरखां इस सच से परिचित होता कि उसकी सेना के पृृष्ठ भाग पर मार करने वाला योद्घा ही छत्रसाल है, तब तक छत्रसाल ने तहवरखां को भारी क्षति पहुंचा दी थी।

जब तहवरखां अपनी सेना के पृष्ठ भाग की रक्षार्थ उस ओर चला तो बलदीवान भी उसके पीछे-पीछे चल दिया। रामनगर की सीमा में छत्रसाल की सेना से तहवरखां का सामना हो गया। अब सामने से छत्रसाल की सेना और पीछे से बल दीवान की सेना ने तहवरखां की सेना को मारना आरंभ कर दिया। अंत में तहवरखां वीरगढ़ की मुगल सैनिक चौकी की ओर भाग लिया। पर यह क्या? उसे तो छत्रसाल के सैनिक पहले ही नष्ट कर चुके थे। अब तो वह और भी कठिनाई में फंस गया। वीरगढ़ में उसे ऐसा लगा कि छत्रसाल की सेना मुगलों के भय से भागती फिर रही है तो उसने छत्रसाल का पीछा करना चाहा। उसे सूचना मिली कि छत्रसाल टोकरी की पहाड़ी पर छुपा है। तब वह उसी ओर चल दिया। उधर बलदीवान वीरगढ़ के पास छिपा सारी वस्तुस्थिति पर दृष्टि गढ़ाये बैठा था, उसे जैसे ही ज्ञात हुआ कि तहवरखां टोकरी की ओर बढ़ रहा है तो वह भी तुरंत उसी ओर चल दिया। छत्रसाल और बलदीवान शत्रु को इसी पहाड़ी पर ले आना चाहते थे क्योंकि यहां शत्रु को निर्णायक रूप से परास्त किया जा सकता था।

यहां से बलदीवान ने एक सैनिक टुकड़ी छत्रसाल की सहायतार्थ भेजी। उसने स्वयं ने मुगलों को ऊपर न चढऩे देने के लिए उनसे संघर्ष आरंभ कर दिया। यहां पर छत्रसाल की सेना के हरिकृष्ण मिश्र नंदन छीपी और कृपाराम जैसे कई वीरों ने अपना बलिदान दिया। पर उनका यह बलिदान व्यर्थ नही गया-कुछ ही समयोपरांत मुगल सेना भागने लगी। हमीरपुर के पास उस सेना का सामना छत्रसाल से हुआ तो तहवरखां को निर्णायक रूप से परास्त कर दिया गया। तहवरखां को अपने स्वामी औरंगजेब को मुंह दिखाने का भी साहस नही हुआ।

कालिंजर विजय

मुगल सत्ता व शासकों के पापों का प्रतिशोध लेता छत्रसाल अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ कालिंजर की ओर बढ़ा तो वहां के दुर्ग के मुगल दुर्ग रक्षक करम इलाही के हाथ पांव फूल गये। कालिंजर का दुर्ग बहुत महत्वपूर्ण था। छत्रसाल ने 18 दिन के घेराव और संघर्ष के पश्चात अंत में इसे भी अपने अधिकार में ले ही लिया। दुर्ग पर छत्रसाल का भगवाध्वज फहर गया। इस युद्घ में बहुत से बुंदेले वीरों का बलिदान हुआ, पर उस बात की चिंता किसी को नही थी।

कालिंजर विजय की प्रसन्नता में बलिदान सार्थक हो उठे। सभी ने अपने वीरगति प्राप्त साथियों के बलिदानों को नमन किया और उनके द्वारा दिखाये गये मार्ग पर चलने की प्रतिज्ञा भी की। यहीं से छत्रसाल को लोगों ने ‘महाराजा’ कहना आरंभ किया। ये कालिंजर की महत्ता का ही प्रमाण है कि लोग अब छत्रसाल को ‘महाराजा’ कहने में गौरव अनुभव करने लगे। छत्रसाल महाराजा के इस सफल प्रयास से मुगल सत्ता को उस समय कितनी ठेस पहुंची होगी?-यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

छत्रसाल को घेरने की तैयारी होने लगी

अब छत्रसाल की ख्याति इतनी बढ़ चुकी थी कि उनसे ईष्र्या करने वाले या शत्रुता मानने वाले मुगल शासकों तथा उनके चाटुकार देशद्रोही ‘जयचंदों’ ने उन्हें घेरने का प्रयास करना आरंभ कर दिया। औरंगजेब के लिए यह अत्यंत लज्जाजनक स्थिति थी कि छत्रसाल जैसा एक युवक उसी की सेना से निकलकर उसी के सामने छाती तानकर खड़ा हो जाए और मिट्टी में से रातों रात एक साम्राज्य खड़ा करने में सफल हो जाए। विशेषत: तब जबकि यह साम्राज्य उसी के साम्राज्य को छिन्न-भिन्न करके तैयार किया जा रहा था।

छत्रसाल ने भी स्थिति को समझ लिया था। डा. भगवानदास गुप्त ‘महाराजा छत्रसाल बुंदेला’ में लिखते हैं कि-”छत्रसाल ने ऐसी परिस्थितियों में दूरदृष्टि का परिचय देते हुए औरंगजेब के पास अपने कार्यों की क्षमायाचना का एक पत्र लिखा। वास्तव में यह पत्र उन्होंने मुगलों को धोखे में डालने के लिए नाटकमात्र किया था। जिससे मुगल कुछ समय के लिए भ्रांति में रह जाएं और उन्हें अपनी तैयारियां करने का अवसर मिल जाए। क्योंकि छत्रसाल यह जान गये थे कि अब जो भी युद्घ होगा वह बड़े स्तर पर होगा। बुंदेलखण्ड की मिट्टी में रहकर किसी के लिए यह संभव ही नही था कि वह वहां स्वतंत्रता के विरूद्घ आचरण करे। इस मिट्टी में स्वतंत्रता की गंध आती थी और उस सौंधी सौंधी गंध को पाकर लोग वीरता के रस से भर जाते थे। छत्रसाल के साथ भी ऐसा ही होता था।”

स्वामी प्राणनाथ और छत्रसाल

स्वामी प्राणनाथ छत्रसाल के आध्यात्मिक गुरू थे-उन्होंने अपने प्रिय शिष्य के भीतर व्याप्त स्वतंत्रता और स्वराज्य के अमिट संस्कारों को और भी प्रखर कर दिया और उन्हें गतिशील बनाकर इस प्रकार सक्रिय किया कि संपूर्ण बुंदेलखण्ड ही नही, अपितु तत्कालीन हिंदू समाज भी उनसे प्राण ऊर्जा प्राप्त करने लगा। स्वामी प्राणनाथ और छत्रसाल का संबंध वैसा ही बन गया जैसा कि छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ गुरू रामदास का संबंध था। स्वामी प्राणनाथ का उस समय हिन्दू समाज में अच्छा सम्मान था।

साम्राज्य निर्माता छत्रसाल

इसके पश्चात छत्रसाल ने जलालखां नामक एक सरदार का सामना किया और उसे बेतवा के समीप परास्त कर उससे 100 अरबी घोड़े, 70 ऊंट तथा 13 तोपें प्राप्त कीं। इसी प्रकार जब औरंगजेब द्वारा बारह हजार घुड़सवारों की सेना अनवर खां के नेतृत्व में 1679 ई. में भेजी गयी तो उसे भी छत्रसाल ने परास्त कर दिया।

इस प्रकार की अनेकों विजयों से तत्कालीन भारत के राजनीतिक गगन मंडल पर छत्रसाल ने जिस वीरता और साहस के साथ अपना साम्राज्य खड़ा किया उसने उनके नाम को इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर सदा-सदा के लिए अमर कर दिया। उनका पुरूषार्थ भारत के इतिहास के पृष्ठों को उनकी कान्ति से इस प्रकार महिमामंडित और गौरवान्वित कर गया कि लोग आज तक उन्हें सम्मान के साथ स्मरण करते हैं। उसका प्रयास हिंदू राष्ट्र निर्माण की दिशा में उठाया गया ठोस और महत्वपूर्ण कार्य था। दुर्भाग्य हमारा था कि हम ऐसे प्रयासों को निरंतर पीढ़ी दर पीढ़ी केवल इसीलिए अनवरतता या नैरतंर्य प्रदान नही कर पाये कि छत्रसाल जैसे राष्ट्रनिर्माताओं के चले जाने पर हमारे भीतर से ही कुछ ‘जयचंद’ उठते थे और उनके प्रयासों को धक्का देने के लिए सचेष्ट हो उठते थे।

यह सच है कि अपने काल के बड़े-बड़े शत्रुओं को समाप्त करना और महादुष्ट और निर्मम शासकों की नाक तले साम्राज्य खड़ा कर राष्ट्र निर्माण का कार्य संपन्न करना बहुत बड़ा कार्य था। जिसे शत्रु के अत्याचारों से मुक्त होने की दिशा में उठाया गया वंदनीय कृत्य ही माना जाना चाहिए।

औरंगजेब की नींद उड़ा दी थी छत्रसाल ने

औरंगजेब की रातों की नींद छत्रसाल के कारण उड़ चुकी थी। वह जितने प्रयास करता था कि छत्रसाल का अंत कर दिया जाए-छत्रसाल था कि उतना ही बलशाली होकर उभरता था।

शिवाजी की मृत्यु के उपरांत 14 अप्रैल 1680 ई. में औरंगजेब ने मिर्जा सदरूद्दीन (धमौनी का सूबेदार) को छत्रसाल को बंदी बनाने के लिए भेजा। छत्रसाल इस समय अपने गुरू छत्रपति शिवाजी की मृत्यु (4 अप्रैल 1680 ई.) से आहत थे। पर वह तलवार हाथ में लेकर युद्घ के लिए सूचना मिलते ही चल दिये।

चिल्गा नौरंगाबाद (महोबा राठ के बीच) में दोनों पक्षों का आमना-सामना हो गया। छत्रसाल ने सदरूद्दीन की सेना के अग्रिम भाग पर इतनी तीव्रता से प्रहार किया कि वह जितनी शीघ्रता से आगे बढ़ रही थी उतनी ही शीघ्रता से पीछे भागने लगी। इससे सदरूद्दीन की सेना में खलबली मच गयी। सदरूद्दीन भी छत्रसाल की सेना के आक्रमण से संभल नही पाया और ना ही वह अपने भागते सैनिकों को कुछ समझा पाया कि भागिये मत, रूकिये और शत्रु का सामना वीरता से कीजिए। उसको स्वयं को भी भय लगने लगा।

सदरूद्दीन को भी पराजित होना पड़ा

इस युद्घ में परशुराम सोलंकी जैसे अनेकों हिंदू वीरों ने अपनी अप्रतिम वीरता का प्रदर्शन किया और मुगल सेना को भागने के लिए विवश कर दिया। पर सदरूद्दीन ने अपनी सेना को ललकारा और उसे कुछ समय पश्चात वह रोकने में सफल रहा। फिर युद्घ आरंभ हुआ। इस बार बुंदेले वीर छत्रसाल को मुगल सेना ने घेर लिया। पर वह वीर अपनी तलवार से शत्रु को काटता हुआ धीरे-धीरे पीछे हटता गया। वह बड़ी सावधानी से और योजनाबद्घ ढंग से पीछे हट रहा था और शत्रुसेना को अपने साथी परशुराम सोलंकी की सेना की जद में ले आने में सफल हो गया, जो पहले से ही छिपी बैठी थी। यद्यपि मुगल सैनिक छत्रसाल के पीछे हटने को ये मान बैठे थे कि वह अब हारने ही वाली है।

परशुराम के सैनिक भूखे शेर की भांति मुगलों पर टूट पड़े। युद्घ का परिदृश्य ही बदल गया , सदरूद्दीन को अब हिंदू वीरों की वीरता के साक्षात दर्शन होने लगे। वीर बुंदेले अपना बलिदान दे रहे थे और बड़ी संख्या में शत्रु के शीश उतार-उतार कर मातृभूमि के ऋण से उऋण हो रहे थे। परशुराम सोलंकी, नारायणदास, अजीतराय, बालकृष्ण, गंगाराम चौबे आदि हिंदू योद्घाओं ने मुगल सेना को काट-काटकर धरती पर शवों का ढेर लगा दिया। अपनी पराजय को आसन्न देख सदरूद्दीन मियां ने अपने हाथी से उतरकर एक घोड़े पर सवार होकर भागने का प्रयास किया। जिसे छत्रसाल ने देख लिया। वह तुरंत उस ओर लपके और सदरूद्दीन को आगे जाकर घेर लिया। सदरूद्दीन के बहुत से सैनिकों ने उसका साथ दिया। छत्रसाल की सेना के नायक गरीबदास ने यहां भयंकर रक्तपात किया और अपना बलिदान दिया। पर सिर कटे गरीबदास ने भी कई मुगलों को काटकर वीरगति प्राप्त की। मुगल सेना का फौजदार बागीदास सिर विहीन गरीब दास की तलवार का ही शिकार हुआ था। गरीबदास की स्थिति को देखकर छत्रसाल और उनके साथियों ने और भी अधिक वीरता से युद्घ करना आरंभ कर दिया।

अंत में सदरूद्दीन क्षमायाचना की मुद्रा में खड़ा हो गया। उसने छत्रसाल को चौथ देने का वचन भी दिया। छत्रसाल ने तो उसे छोड़ दिया पर बादशाह औरंगजेब ने उसे भरे दरबार में बुलाकर अपमानित किया और उसके सारे पद एवं अधिकारों से उसे विहीन कर दिया।

हमीद खां को भी किया परास्त

इसी प्रकार कुछ कालोपरांत छत्रसाल को एक हमीदखां नामक मुगल सेनापति के आक्रमण की जानकारी मिली। हमीदखां ने चित्रकूट की ओर से आक्रमण किया था और वह वहां के लोगों पर अत्याचार करने लगा था। तब उस मुगल को समाप्त करने के लिए छत्रसाल ने बलदीवान को 500 सैनिकों के साथ उधर भेजा। बलदीवान ने उस शत्रु पर जाते ही प्रबल प्रहार कर दिया और उसे प्राण बचाकर भागने के लिए विवश कर दिया। बलदीवान ने हमीद खां का पीछा किया और उसके द्वारा महोबा के जागीरदार को छत्रसाल के विरूद्घ उकसाने की सूचना पाकर उस जागीरदार को भी दंडित किया। यहां से बचकर भागा हमीद खां बरहटरा में जाकर लूटमार करने लगा तो वहां छत्रसाल के परमहितैषी कुंवरसेन धंधेरे ने हमीद खां को निर्णायक रूप से परास्त कर भागने के लिए विवश कर दिया।

मुगल साम्राज्य हो गया छिन्न-भिन्न

हम यहां पर स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि औरंगजेब भारतवर्ष में ऐसा अंतिम मुस्लिम बादशाह था-जिसके साम्राज्य की सीमाएं उसके जीवनकाल में भी तेजी से सिमटती चली गयीं। उसकी मृत्यु के पश्चात उसका साम्राज्य बड़ी तेजी से छिन्न-भिन्न हो गया था, और फिर कभी उन सीमाओं तक किसी भी मुगल बादशाह को राज्य करने का अवसर नही मिला। मुगलों के साम्राज्य को इस प्रकार छिन्न-भिन्न करने में छत्रसाल जैसे महायोद्घाओं का अप्रतिम योगदान था। हमें चाहे सन 1857 तक चले मुगल वंश के शासकों के नाम गिनवाने के लिए कितना ही विवश किया जाए पर सत्य तो यही है कि औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के पश्चात ही भारत से मुगल साम्राज्य समाप्त हो गया था। उसकी मृत्यु के पश्चात भारतीय स्वातंत्रय समर की दिशा और दशा में परिवर्तन आ गया था। जिसका उल्लेख हम यथासमय और यथास्थान करेंगे।

यहां इतना स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि औरंगजेब अपने जीवन में बुंदेले वीरों के पराक्रमी स्वभाव से इतना भयभीत रहा कि वह कभी स्वयं बुंदेलखण्ड आने का साहस नही कर सका। वह दूर से ही दिल्ली की रक्षा करता रहा और उसकी योजना मात्र इतनी रही कि चाहे जो कुछ हो जाए और चाहे जितने बलिदान देने पड़ जाएं पर छत्रसाल को दिल्ली से दूर बुंदेलखण्ड में ही युद्घों में उलझाये रखा जाए और उससे ‘दिल्ली दूर’ रखी जाए। औरंगजेब जैसे बादशाह की इस योजना को जितना समझा जाएगा उतना ही हम छत्रसाल की वीरता को समझने में सफल होंगे। इतिहास के अध्ययन का यह नियम है कि अपने चरित नायक को समझने के लिए आप उसके शत्रु पक्ष की चाल को समझें और देखें कि आपके चरितनायक ने उन चालों को किस प्रकार निरर्थक सिद्घ किया या उनका सामना किया या शत्रु पक्ष को दुर्बल किया? निश्चय ही हम ऐसा समझकर छत्रसाल के प्रति कृतज्ञता से भर जाएंगे।

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वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 479वी जयंती पर पढ़िए उनका संक्षिप्त जीवनकाल”

9 मई, 1540 ई. :- कुंभलगढ़ में जन्म
1552 ई. :- कुंभलगढ़ से चित्तौड़गढ़ प्रस्थान
1555 ई. :- 15 वर्ष की उम्र में जैताणा के युद्ध में करण सिंह को मारकर डूंगरपुर रावल आसकरण की फौज को पराजित किया
1556 ई. :- छप्पन के इलाके पर कब्जा किया
1557 ई. :- बिजोलिया की राजकुमारी अजबदे बाई सा से विवाह
1563 ई. :- राठौड़ राजपूतों को पराजित कर भोमठ पर कब्जा किया
1565 ई. :- गोडवाड़ पर आक्रमण व विजय
अक्टूबर, 1567 ई. :- कुंभलगढ़ पर हुसैन कुली खां के आक्रमण को विफल किया
1572 ई. :- मेवाड़ के महाराणा बने व सिरोही पर कब्जा किया | कुछ समय बाद सिरोही राव सुरताण से मित्रता कर ली |
1572 ई. :- महाराणा द्वारा मंदसौर के मुगल थानों पर हमले व विजय
1573 ई. :- गुजरात से आगरा जाती हुई मुगल फौज पर हमला किया व खजाना लूट लिया
1572 ई. से 1573 ई. के बीच अकबर द्वारा भेजे गए 4 सन्धि प्रस्तावों को खारिज किया :- 1) जलाल खां 2) मानसिंह 3) भगवानदास 4) टोडरमल
1574 ई. :- सिन्हा राठौड़ को पराजित कर सलूम्बर पर अधिकार
1576 ई. :- हल्दीघाटी का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ, जो कि अनिर्णित रहा
23 जून, 1576 ई. :- गोगुन्दा की लड़ाई। आमेर के मानसिंह द्वारा गोगुन्दा पर कब्ज़ा।
अगस्त, 1576 ई. :- महाराणा प्रताप द्वारा अजमेर, गोडवाड़, उदयपुर की मुगल छावनियों में लूटमार
सितम्बर, 1576 ई. :- महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा पर हमला किया व कईं मुगलों को मारकर गोगुन्दा पर कब्जा किया
अक्टूबर, 1576 ई. :- मुगल बादशाह अकबर का 60,000 जंगी सवारों समेत मेवाड़ पर हमला
अकबर एक वर्ष तक मेवाड़ में ही रहा व महाराणा प्रताप पर कईं हमले किए, पर हर बार नाकामयाबी मिली
महाराणा प्रताप ने कुतुबुद्दीन, भगवानदास, मानसिंह को पराजित करते हुए गोगुन्दा पर दोबारा अधिकार किया
महाराणा प्रताप के खौफ से हज यात्रियों के जुलूस की हिफाजत में अकबर द्वारा 2 फौजें भेजी गईं
महाराणा प्रताप ने दूदा हाडा को बूंदी जीतने में मदद की
1577 ई. :- महाराणा प्रताप द्वारा दिबल दुर्ग पर अधिकार
23 फरवरी, 1577 ई. :- ईडर के युद्ध में महाराणा प्रताप व ईडर के राय नारायणदास ने मुगलों का सामना किया
1577 ई. :- ईडर के दूसरे युद्ध में मुगलों की रसद व खजाना लूट लिया
मई-सितम्बर, 1577 ई. :- महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा, उदयपुर समेत कईं मुगल थानों पर कब्जा किया
अक्टूबर, 1577 ई. :- महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के सबसे बड़े मुगल थाने मोही पर हमला किया | थानेदार मुजाहिद बेग कत्ल हुआ व मोही पर महाराणा का अधिकार हुआ |
अक्टूबर, 1577 ई. :- अकबर ने शाहबाज खां को फौज समेत मेवाड़ भेजा
नवम्बर, 1577 ई. :- महाराणा प्रताप द्वारा केलवाड़ा मुगल थाने पर लूटमार, 4 मुगल हाथी लूटे
1578 ई. :- कुम्भलगढ़ का युद्ध :- शाहबाज खां ने कुम्भलगढ़ पर अधिकार किया
महाराणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ की पराजय के प्रतिशोध स्वरुप जालौर व सिरोंज के सभी मुगल थाने जलाकर खाक किये

1578 ई. :- महाराणा प्रताप की डूंगरपुर-बांसवाड़ा विजय
15 दिसम्बर, 1578 ई. :- शाहबाज खां का दूसरा असफल मेवाड़ अभियान
1578 ई. :- भामाशाह को फौज देकर मालवा पर हमला करने भेजना
15 नवम्बर, 1579 ई. :- शाहबाज खां का तीसरा असफल मेवाड़ अभियान
1580 ई. :- अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना का असफल मेवाड़ अभियान, महाराणा ने रहीम की बेगमों को मुक्त कर क्षात्र धर्म का पालन किया
1580 ई. :- मालवा में भामाशाह के भाई ताराचंद के ज़ख़्मी होने पर महाराणा प्रताप द्वारा मालवा से ताराचंद को सुरक्षित चावण्ड लाना व रास्ते में आने वाली मुगल चौकियों को तहस-नहस करना, साथ ही मंदसौर के सबसे बड़े मुगल थाने पर हमला व विजय
अक्टूबर, 1582 ई. :- दिवेर का युद्ध :- महाराणा प्रताप द्वारा अकबर के काका सुल्तान खां की पराजय
1583 ई. :- हमीरपाल झील पर तैनात मुगल छावनी हटाई
1583 ई. :- कुम्भलगढ़ का दूसरा युद्ध :- महाराणा प्रताप ने दुर्ग पर अधिकार किया | मुगल सेनापति अब्दुल्ला खां कत्ल हुआ |
1583 ई. :- महाराणा प्रताप ने मांडल के थाने पर हमला किया | इस थाने के मुख्तार राव खंगार कछवाहा व नाथा कछवाहा कत्ल हुए | ये दोनों मानसिंह के काका थे | दोनों ही क्रमश: खंगार राजपूतों व नाथावत राजपूतों के मूलपुरुष थे |
1583 ई. :- बांसवाड़ा में मानसिंह चौहान से युद्ध
1584 ई. :- उदयपुर के राजमहलों में तैनात मुगलों पर महाराणा प्रताप का हमला व विजय | अकबर द्वारा 1576 ई. में उदयपुर का नाम ‘मुहम्मदाबाद’ रखने पर महाराणा द्वारा फिर से नाम बदलकर उदयपुर रखना |
1584 ई. :- अकबर ने जगन्नाथ कछवाहा को फौज समेत मेवाड़ भेजा, पर ये अभियान भी महाराणा प्रताप को पराजित नहीं कर सका
1584 ई. :- अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना का दोबारा असफल मेवाड़ अभियान
1585 ई. :- लूणा चावण्डिया को पराजित कर चावण्ड पर अधिकार व चावण्ड को राजधानी बनाना
1586 ई. :- नवाब अली खां को पराजित करना
1586 ई. :- अकबर द्वारा 1568 ई. में चित्तौड़गढ़ का नाम “अकबराबाद” रखने के कारण महाराणा प्रताप द्वारा चित्तौड़ के एक शाही थाने पर हमला व विजय, गढ़ नहीं जीतने के बावजूद महाराणा ने नाम बदलकर पुनः चित्तौड़गढ़ रखा
1585 – 87 ई. :- महाराणा प्रताप द्वारा मोही, मदारिया समेत कुल 36 मुगल थानों पर हमले व विजय
1588 ई. :- महाराणा प्रताप की जहांजपुर विजय
1589 ई. महाराणा प्रताप द्वारा सूरत के शाही थानों में लूटमार व हाथी पर सवार सूरत के मुगल सूबेदार को भाले से मारना
1591 ई. :- राजनगर के युद्ध में महाराणा की फौज द्वारा दलेल खां की पराजय
1591 ई. :- दिलावर खां से कनेचण का युद्ध
29 जनवरी, 1597 ई. :- वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप—–🙏
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हिटलर को संदेश भेज दो ….

द्वितीय विश्वयुद्ध का समय:-
जर्मनी के बमवर्षकों का खौफ।
लन्दन में दूध की लंबी लाईन।

वितरण कर रहे व्यक्ति ने घोषणा की , केवल एक बोतल और है , बाकी के लोग कल आयें।

आखिरी दूध की बोतल जिस शख्स के हाथ आई उसके ठीक पीछे एक महिला खड़ी थी जिसकी गोद में छोटा बच्चा था। उसके चेहरे पर अचानक चिंता की लकीरें उभर आईं लेकिन अचानक उसने देखा वितरण करने वाला व्यक्ति उसके हाथ में बोतल थमा रहा था।

वह चौंकी !

उसके आगे खड़ा व्यक्ति बिना दूध लिए लिए लाईन से हट गया था ताकि छोटे बच्चे को गोद में लिए वह महिला दूध हासिल कर सके।

अचानक तालियों की आवाज आने लगी।

लाईन में खड़े सभी व्यक्ति उस शख्स का करतलध्वनि से अभिनन्दन कर रहे थे। लेकिन उस शख्स ने उस महिला के पास जाकर कहा आपका बच्चा बहुत ही प्यारा है। वह इंग्लैंड का भविष्य है उसकी अच्छी परवरिश करिए।

इस घटना की खबर प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के पास जब पहुंची तो वे जर्मनी के जबरदस्त हमलों की विभीषिका से उत्पन्न चिंता से उबरकर बोल पड़े।

हिटलर को संदेश भेज दो , ब्रिटेन की जीत को कोई नहीं रोक सकता क्योंकि यहां के लोग देश पर मंडरा रहे संकट के समय अपना निजी हित भूलकर देश के बारे में सोचते हैं।

चर्चिल का विश्वास सच निकला। ब्रिटेन विश्वयुद्ध में विजेता बनकर उभरा ।

हमारे देश पर भी संकट मंडरा रहा है। क्या हम अपनी चारित्रिक श्रेष्ठता प्रमाणित करने तैयार हैं?

सादर, साभार