Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

उपासना फेसबुक

बहुत पहले एक कहानी पढ़ी थी कि एक दफा बीजिंग शहर के एक मुहल्ले में एक युवती का बलात्कार हुआ। ये खबर किसी तरह चेयरमैन क्रांतिकारी माओ त्से तुंग तक पहुंची। वह खुद पीड़ित लड़की से मिले। उन्होंने उस लड़की से पूछा “जब तुम्हारे साथ जबरदस्ती किया जा रहा था तो तुम मदद के लिये चिल्लाई थी?” लड़की ने हां में सर हिलाया।

चेयरमैन माओ ने उस लड़की के सर पर प्यार से हाथ रखा और नरमी से कहा “मेरी बच्ची! क्या तुम उसी ताक़त के साथ दोबारा चिल्ला सकती हो?” लड़की ने कहा “जी हां।”

चेयरमैन माओ के आदेश पर कुछ सिपाहियों को आधे किलोमीटर के सर्कल में खड़ा कर दिया गया और उसके बाद लड़की से कहा कि अब तुम उसी ताक़त से चीखो। लड़की ने ऐसा ही किया माओ ने उन सिपाहियों को बुलाया और हर एक से पूछा गया कि लड़की की चीख सुनाई दी या नहीं? सभी सिपाहियों ने कहा कि लड़की की चीख सुनाई दी गई।

चेयरमैन माओ ने अब सिपाहियों को आदेश दिया कि आधे किलोमीटर के उस इलाक़े के तमाम मर्दों को गिरफ्तार कर लिया जाए और तीस मिनट के अंदर अगर मुजरिम की पहचान न हो सके तो गिरफ्तार मर्दों को गोली मार दिया जाए।

फौरन आदेश का पालन हुआ और दिये गये मुहलत को बमुश्किल अभी दस मिनट ही हुए होंगे कि मुजरिम की पहचान हो गई और अगले बीस मिनट के अंदर अंदर मुजरिम को पकड़कर चेयरमैन माओ के सामने लाया गया। लड़की ने शिनाख़्त की मौक़े पर फैसला हुआ और मुजरिम का भेजा उड़ा दिया गया।

जुर्म से सज़ा तक की अवधि लगभग तीन घंटे की रही होगी। इसे कहते हैं फौरन इंसाफा मिलना जिस कारण आज चीन हर क्षेत्र में प्रगति पर है।

काश कुछ ऐसा ही अपने देश में होता तो शायद बलात्कार की इतनी घटनाएं न होती। पर अपने यहां होता क्या है..?? अगर पीड़िता ज़िंदा है तो वर्षों तक अदालत का चक्कर और अगर जला दी गई तो उसके नाम पर केवल कैंडल मार्च..??
प्रियंका रेडी को हार्दिक श्रद्धांजलि।

ईश्वर से चाहेंगे दरिंदों दोषियों की गर्दन कलम की जाए

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अढ़ाईदिनका_झोंपड़ा
या
सरस्वतीकंठावरणमहाविद्यालय
अढ़ाई दिन का झोंपड़ा, इस स्थान पर संस्कृत विद्यालय ‘सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय’ एवं विष्णु मन्दिर का निर्माण विशालदेव चौहान ने करवाया था|इस बात का प्रमाण मस्जिद के मुख्यद्वार के बायीं और लगा संगमरमर का संस्कृत में खुदा हुआ शिलालेख है और इधर-उधर बिखरी सैकड़ों देवी-देवताओं की मूर्तियां मस्जिद के अंदर खम्बों पर खंडित मूर्तियां भी अलौकिक है।
मोहम्मद गौरी ने तराईन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को धोखे से हरा दिया उसके बाद पृथ्वीराज की राजधानी तारागढ़ अजमेर पर हमला किया। यहां स्थित संस्कृत विद्यालय में रद्दो बदल करके मस्जिद में परिवर्तित कर दिया। । इसका निर्माण संस्कृत महाविद्यालय के स्थान पर हुआ। इसका प्रमाण अढाई दिन के झोपड़े के मुख्य द्वार के बायीं ओर लगा संगमरमर का एक शिलालेख है जिस पर संस्कृत में इस विद्यालय का उल्लेख है। ये अजीब बात है मोहम्मद गौरी और उसकी सेना संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ थी जिस कारण वो इसे पढ़ नही पाए जिससे ये पत्थर नष्ट होने से बच गया । ऐसा माना जाता है कि यहाँ चलने वाले ढाई दिन के उर्स के कारण इसका नाम पड़ा । ये भी अजीब संयोग है कि अढाई दिन का झोपड़ा से मशहूर इस इमारत के अंदर कही कोई झोपड़ा नही है फिर भी इस जगह को झोपड़ा कहा जाता है । यहाँ भारतीय शैली में अलंकृत स्तंभों का प्रयोग किया गया है, जिनके ऊपर छत का निर्माण किया गया है । मस्जिद के प्रत्येक कोने में चक्राकार एवं बासुरी के आकार की मीनारे निर्मित है । 90 के दशक में इस मस्जिद के आंगन में कई देवी – देवताओं की प्राचीन मूर्तियां यहां-वहां बिखरी हुई पड़ी थी जिसे बाद में एक सुरक्षित स्थान रखवा दिया गया ।

सच्चाई यही है कि यह किसी भी प्रकार से मस्जिद नजर नहीं आती इसकी वास्तु कला शिल्प कला और चारों तरफ हिंदू देवी देवताओं की लगी मूर्तियां इसका प्रांगण इसकी छत हर प्रकार से सनातन संस्कृति की है
हिंदू मुस्लिम वास्तुकला नाम की कोई चीज नहीं है हर राष्ट्र की अपनी एक संस्कृति होती है और वहां की एक अपनी वास्तु कला और शिल्प कला होती है भारत में या भारत से बाहर जितने भी मंदिर और धरोहर बनी हुई है उनकी वास्तु कला और शिल्प कला जो है वह हमारी है और वह वास्तु कला और शिल्प कला हवा में नहीं बनाई जाती उसके हमारे पास प्रमाण है शास्त्र है शास्त्रों के आधार पर वह सारी शिल्प कला और वास्तुकला तैयार की जाती है
★इतिहास★
इस स्थान पर संस्कृत विद्यालय ‘सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय’ एवं विष्णु मन्दिर का निर्माण विशालदेव चौहान ने करवाया था|
अजमेर राजस्थान
आर्यवर्त
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, :       🙏श्री गणेशाय नम:🙏    : , *जय माता दी*

\रात्रि कथा// ,,,, *"बुद्धिमान साधु"* ,,,

एक साधु घने जंगल से होकर जा रहा था। उसे अचानक सामने से बाघ आता हुआ दिखाई दिया। साधु ने सोचा कि अब तो उसके प्राण नहीं बचेंगे।
यह बाघ निश्चय ही उसे खा जाएगा। साधु भय के मारे काँपने लगा। फिर उसने सोचा कि मरना तो है ही, क्यों न बचने का कुछ उपाय करके देखे ।

साधु ने बाघ के पास आते ही ताली बजा-बजाकर नाचना शुरू कर दिया। बाघ को यह देख कर बहुत आश्चर्य हुआ ।
वह बोला, ओ रे मूर्ख ! क्यों नाच रहे हो ? क्या तुम्हें नहीं पता कि मैं तुम्हें कुछ ही देर में खा डालूंगा ।”

साधु ने कहा, “हे बाघ, मैं प्रतिदिन बाघ का भोजन करता हूं। मेरी झोली में एक बाघ तो पहले से ही है किंतु वह मेरे लिए अपर्याप्त है। मुझे एक और बाघ चाहिए था। मैं उसी की खोज में जंगल में आया था। तुम अपने आप हो मेरे पास आ गए हो इसीलिए मुझे खुशी हो रही है ।”

साधु की बात सुन कर बाघ मन-ही-मन कुछ डरा।
फिर भी उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने साधु से कहा, “तुम अपनी झोली वाला बाघ मुझे दिखाओ । यदि नहीं दिखा सके तो मैं तुम्हें मार डालूँगा।”

साधु ने उत्तर दिया, “ठीक है, अभी दिखाता हूँ। तुम जरा ठहरो, देखो भाग मत जाना ।”

इतना कहकर साधु ने अपनी झोली उठाई। उसकी झोली में एक शीशा था। उसने शीशे को झोली के मुख के पास लाकर बाघ से कहा, “देखो, यह रहा पहला वाला बाघ ।”

बाघ साधु के पास आया। उसने जैसे ही झोली के मुंह पर देखा, उसे शीशे में अपनी ही परछाई दिखाई दी । इसके बाद वह गुर्राया तो शीशे वाला बाघ भी गुर्राता दिखाई दिया। अब बाघ को विश्वास हो गया कि साधु की झोली में सचमुच एक बाघ बंद है । उसने सोचा कि यहाँ से भाग जाने में ही कुशल है। वह पूँछ दबाकर साधु के पास से भाग गया।

वह अपने साथियों के पास पहुँचा और सब मिल कर अपने राजा के पास गए। राजा ने जब सारी घटना सुनी तो उसे बहुत क्रोध आया। वह बोला, “तुम सब कायर हो । कहीं आदमी भी बाघ को खा सकता है। चलो, मैं उस साधु को मजा चखाता हूं।”

बाघ का सरदार दूसरे बाघों के साथ साधु को खोजने चल पड़ा। इसी बीच साधु के पास एक लकड़हारा आ गया था। साधु उसे बाघ वाली घटना सुना रहा था। तभी बाघों का सरदार वहाँ पहुँचा। जब लकड़हारे ने बहुत से बाघों को अपनी ओर आते देखा तो डर के मारे उसकी घिग्घी बंध गई । वह कुल्हाड़ी फेंक कर पेड़ पर चढ़ गया। साधु को पेड़ पर चढ़ना नहीं आता था। वह पेड़ के पीछे छिप कर बैठ गया।

जो बाघ साधु के पास से जान बचा कर भागा था, वह अपने सरदार से बोला, देखो सरदार सामने देखो, पहले तो एक ही साधु था, अब दूसरा भी आ गया है । एक नीचे छिप गया है और दूसरा पेड़ के ऊपर,चलो भाग चलें ।”

बाघों का सरदार बोला, “मैं इनसे नहीं डरता । तुम सब लोग इस पेड़ को चारों तरफ से घेर लो, ताकि ये दोनों भाग न जाएं। मैं पेड़ के पास जाता हूं ।”

इतना कह कर बाघों का सरदार पेड़ की तरफ बढ़ने लगा। साधु और लकड़हारा अपनी-अपनी जान की खैर मनाने लगे। अचानक लकड़हारे को एक चींटी ने काट खाया । जैसे ही वह दर्द से तिलमिलाया कि उसके हाथ से टहनी छूट गई । वह घने पत्तों और टहनियों से रगड़ खाता हुआ धड़ाम से नीचे आ गिरा । जब साधु ने उसे गिरते हुए देखा तो वह बहुत जोर से चिल्लाया,“बाघ के सरदार को पकड़ लो । जल्दी करो, फिर यह भाग जाएगा ।”

धड़ाम की आवाज और साधु के चिल्लाने से बाघों का सरदार डर गया । उसने सोचा कि यह साधु सचमुच ही बाघों को खाने वाला है। वह उलटे पैरों भागने लगा। उसके साथी भी उसे भागता हुआ देखते ही सिर पर पैर रखकर भाग गए।*ऐ कहाणी हमनें नहीं लिखी है,हमने केवल आप तक पहुँचाने का प्रयास किया है*

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  . “卐 ज्योतिषी और हस्तरेखाविद 卐”
   :                      :🙏🙏:                    :
                  पं,संजय आमले
                     (  शास्त्री )
               मो,9860298094
,,, 8790466194,,,

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बहता पानी और चलते विचार..
एक दिन ऋषिवर शिष्य को एक खेत पर लेकर गये जहाँ एक किसान बहती हुई नहर से पानी को रास्ता बनाकर खेत तक ले जा रहा था और ऋषिवर ने वो दृश्य शिष्य को बड़ी गहराई से दिखाया और फिर कहा!
ऋषिवर – वत्स इस बहते हुये पानी को यदि सही दिशा मिल जायें तो ये पानी खेत तक जाकर वहाँ की फसल को निहाल कर देगी और यदि आप इस पानी को सही दिशा न दोगे तो पानी तो अपना रास्ता स्वयं बनाकर इधरउधर व्यर्थता मे चला जायेगा और खेत की सारी फसल बर्बाद हो जायेगी !
शिष्य – जी गुरुदेव!
आगे ऋषिवर ने कहा – वत्स जिस तरह से बहते हुये पानी को सही दिशा देना जरूरी है उसी तरह से चलते हुये विचारों को सही दिशा देना बहुत जरूरी है और विचार कभी नही रुक सकते है वो निरन्तर चलते रहेंगे ! विचारों को दिशा देना आपके अपने हाथ मे है तुम चाहो तो उन्हे आध्यात्मिक राह दे दो और तुम चाहो तो उन्हे भोगीयो की राह दे दो! विचार और मन का बहुत गहरा सम्बन्ध है मन वही जायेगा जहाँ उसे विचार लेके जायेंगे इसलिये हमेशा पवित्र और आध्यात्मिक विचारों से ओतप्रोत रहो ताकि मन ईष्ट मे लगे इस मन को येनकेन प्रकारेण ईष्ट के श्री चरणों मे लगाओ साधना, सत्संग, भजन, कथा, स्वाध्याय और भी जिस भी तरीके से ये ईष्ट मे रमे उसे ईष्ट मे रमाओ क्योंकि यदि तुमने विचारों को सही दिशा प्रदान न की तो विचार और फिर मन गलत दिशा मे चला जायेगा!
पहले विचार आयेगा फिर कर्म शुरू होगा फ़िर आगे की राह बनेगी और फिर सफलता असफलता मिलेगी! विचारों से ही पराया भी अपना हो जाता है और विचारों से ही अपने भी पराये हो जाते है! हे वत्स ये कभी न भुलना की विचार एक महाशक्ति है सकारात्मक विचारधारा एक वरदान है और नकारात्मक विचारधारा एक महाअभिशाप है ! समान विचारों से ही रिश्तें युगों युगों तक रहते है और ऐसा कहते है की नही कहते है की भाई मेरे और उसके विचार एक दुसरे से नही मिलते है इसलिये हम दोनो के रास्ते अलगअलग है इसलिये अपने विचारों को अध्यात्मिक राह की और मोड़ देना क्योंकि जब विचारों को सही राह मिल जायेगी तो मन भी सही जगह लग जायेगा और ईष्ट और गुरू चरण के अतिरिक्त इस मन को कही पर भी शान्ति न मिलेगी।
इसलिये वत्स अपना तन, अपना मन और अपना धन बस अच्छे विचारों मे लगा देना क्योंकि सच्ची सफलता और आत्मशान्ति हमेशा अच्छे विचारों से आती है, और अच्छे विचार के लिये निरन्तर अच्छे लोगों के सम्पर्क मे रहना क्योंकि निरन्तर अच्छे लोगों के सम्पर्क मे रहने से जीवन मे अच्छे विचार ज़रूर आते है ।

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“चार मित्र” चार मित्र थे। एक ब्राह्मण था, एक क्षत्रिय, एक वैश्य और एक शूद्र। चारों में इतना प्रेम था, जैसे एक प्राण, चार तन हों। चारों सदा साथ रहते, परदेश भी

जाते तो एक साथ।
ब्राह्मण सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञाता था। क्षत्रिय शस्त्र-विद्या में पूर्ण पारंगत था। वैश्य को व्यापार की एक-एक बारीक कला ज्ञात थी। शूद्र में सभी के प्रति सहज सेवा-भाव था। न किसी में अहंकार था, न हीनभाव।
एक बार वे चारों घूमते-घूमते दूसरे नगर में पहुँच गये। वहाँ का राजा सन्तानहीन था। सन्तान की आशा करते-करते वह वृद्ध हो चला। उसे अब किसी योग्य उत्तराधिकारी की तलाश थी। राजा के सिंहासन के सामने एक सुन्दर-सी मिट्टी की प्रतिमा रखी रहती। राजा स्वयं कलाकार था। उसने स्वयं ही गढ़कर यह प्रतिमा तैयार की थी। वह प्रतिमा सदा उसके सामने रहती और वह अक्सर सोचता ‘काश! इस प्रतिमा में कोई प्राण फूँक देता तो यह सजीव हो उठती।’
वे चारों मित्र एक दिन घूमते-घूमते उस राजा के दरबार में जा पहुँचे। चारों राजाको झुककर प्रणाम कर रहे थे कि उनकी दृष्टि उस प्रतिमा पर पड़ी । प्रतिमा का अनूठा सौन्दर्य उन्हें आकर्षित करने लगा । चारों विचार करने लगे ‘क्या ही अच्छा होता कि यह प्रतिमा सजीव हो उठती।’ तभी शूद्र ने अपनी इच्छा-शक्ति से उसके पैरों में प्राण-शक्ति आरोपित की। वैश्य ने उसके हृदयप्रदेश में चेतना का संचार किया। क्षत्रिय ने अपनी सम्पूर्ण क्षात्र-शक्ति की सहायता से उसकी बाहुओं में प्राण फूँके। अब ब्राह्मण ने अपने ब्रह्मज्ञान के बल पर उसके मस्तिष्क में प्राणों का प्रवेश कराया। इतने में ही वह मिट्टी की प्रतिमा जो अब तक निर्जीव खड़ी थी, एक सुन्दर सर्वगुण सम्पन्न नवयुवक के रूप में सजीव होकर सामने खड़ी हो गयी। सहसा यह चमत्कार देख राजा अपार हर्ष से झूम उठा। उसका ध्यान उन चारों मित्रों पर गया। उसने उन्हें अपने पास बुलाकर कहा, ‘आप चारों में से जिसने भी इस प्रतिमा में प्राण डाले हैं, मैं उसे अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता हूँ।’ ब्राह्मण विनम्रता से बोला, ‘महाराज! हम चारों में कोई अलग नहीं है, हम चार शरीर एक प्राण हैं, हम एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।’ राजा ने कहा, ‘फिर आप ही निर्णय करके बतायें कि मैं किसे अपना उत्तराधिकारी घोषित करूँ?’
चारों मित्र कहने लगे, ‘महाराज! हममें से किसी को भी राज्य का मोह नहीं है, आप हम चारों के प्रतिनिधिरूप इस प्रतिमा को ही अपना उत्तराधिकारी बना लें, हम चारों ने समानरूप से प्रयत्न करके इस प्रतिमा को सजीव बनाया है। इस प्रतिमा के रूप में हम चारों आपके सामने उपस्थित रहेंगे, जब तक आपके राज्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र प्रेम एवं सद्भाव से रहेंगे, तब तक यह प्रतिमा सजीव रहेगी।’ राजा ने प्रसन्न होकर अपने उत्तराधिकारी का राज्याभिषेक किया। तभी सबने देखा कि उन चारों मित्रों के नेत्रों से प्रकाश की किरणें निकलीं और नये शासक के नेत्रों में समा गयीं।
🙏🏿🙏🙏🏽जय जय श्री राधे🙏🏼🙏🏾🙏🏻

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2⃣ 6⃣ 👁 0⃣ 3️⃣ 👁 2⃣0⃣2⃣0⃣ *घरों में क्यों रहें*

महात्मा विदुरजी को लगातार अपने गुप्तचरों से, दुर्योधन के द्वारा किए जाने वाले षड्यंत्रों और तैयारियों की सूचना मिल रही थी।

पांडवों को वारणावत जाने से रोकना, महात्मा विदुरजी के वश मेंं नहीं था, परन्तु वे उनकी सुरक्षा तो कर ही सकते थे।

वे लगातार उनकी सुरक्षा के उपाय सोचते रहते।

वारणावत जाने के पहले, पांडव माता कुंती सहित, महात्मा विदुरजी को प्रणाम करने आये।

महात्मा विदुरजी ने अवसर देखकर युधिष्ठिर से पूछा, “वत्स, यदि जंगल में भीषण आग लग जाये, तो जंगल के कौन से जानवर सुरक्षित रहेंगे ?”

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “तात, जंगल में आग लगने पर, स्वछंद और निर्भय घूमने वाले, शेर, चीते, हाथी और सबसे तेज भागने वाले हिरण आदि सारे जानवर, जंगल की आग में जलकर राख हो जायेंगे। परन्तु बिलों में रहने वाले चूहे सुरक्षित रहेंगे। दावानल के शांत होने पर वो पुनः बिलों से बाहर निकल कर, शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करेगें.!

“वत्स युधिष्ठिर, तुम्हारे उत्तर से मैं निश्चिंत हुआ। मेरी समस्त चिंतायें दूर हुईं।जाओ, सुरक्षित रहो।यशस्वी भव।* महात्मा विदुरजी ने आर्शीवाद दिया।

कोरोना वायरस भी एक भयानक आग के समान है, जो लगातार सारी सीमायें लांघ रहा है।जो लोग अपने घरों में रहेंगे, वो सुरक्षित रहेंगे और दुनिया पर राज करेंगे।

कृपया इस आग के ठंडे होने तक घर पर रहें.. *🌹🙏जय श्री कृष्ण🙏🌹*