Posted in रामायण - Ramayan

આપણો ભ્રમ

અશોક વાટિકામાં જ્યારે રાવણ ક્રોધમાં આવીને સીતા માતાને તલવાર લઈ મારવા દોડ્યો, ત્યારે હનુમાનજીને લાગ્યું કે રાવણ પાસેથી તલવાર છીનવી લઈને, તેનું ગળું કાપી નાખવું જોઈએ. પરંતુ એ જ સમયે મંદોદરીએ રાવણ નો હાથ પકડી લીધો. આ દ્રશ્ય જોઈને હનુમાનજી ગદગદ થઈ ગયા. પરંતુ હનુમાનજી વિચારવા લાગ્યા કે, “જો હું સીતાજીને બચાવવા આગળ ગયો હોત, તો મને એ વાતનો ભ્રમ થઈ જાત કે, હું ન હોત તો આજે સીતા માતાનું શું થાત ? તેમને બચાવવા માટે કોણ આગળ આવે ?” તો આવી જ રીતે ઘણીવાર આપણને પણ એવો ભ્રમ થતો હોય છે કે હુ હોત તો શું થાત ?

પરંતુ ત્યારે બન્યું એવું કે સીતાજીને બચાવવાનું કામ પ્રભુએ રાવણની પત્ની મંદોદરીને સોપ્યું. ત્યારે હનુમાનજી સમજી ગયા કે, “ પ્રભુ જે કાર્ય જેમની પાસે કરવાવવા માંગે છે, તેઓ તેમની પાસે જ કરાવે છે.” ઈશ્વરની ઈચ્છા વગર કોઈ પણ કાર્ય થતું નથી.

આગળ જતા જ્યારે ત્રીજટાએ રાવણને કહ્યું કે, “ લંકામાં કોઈ વાનર ઘુસી આવ્યો છે અને તે લંકાને સળગાવવાનો છે. ત્યારે હનુમાનજી ચિંતામાં પડી ગયા અને વિચારવા લાગ્યા કે, “ પ્રભુ એ મને લંકા સળગાવવાનું તો કીધું નથી. તો પછી આ ત્રીજટા કેમ આવું કહે છે કે, મેં સપનું જોયું છે અને તેમાં એક વાનર લંકા ને સળગાવી રહ્યો છે. તો હવે મારે શું કરવું ? હનુમાનજી એ ત્યારે કહે છે જેવી પ્રભુ ની ઈચ્છા.

જ્યારે રાવણ નાં સૈનિકો તલવાર લઈ હનુમાનજીને મારવા દોડ્યા, ત્યારે હનુમાનજીએ પોતાના બચાવમાં થોડો પણ પ્રયત્ન ન કર્યો. પરંતુ એ સમય જ ત્યાં વિભીષણ આવ્યા અને કહ્યું કે, કોઈ દૂતને મારવા એ અનીતિ છે. ત્યારે પણ હનુમાનજી સમજી ગયા કે પ્રભુએ મને બચાવવા માટે આ ઉપાય કર્યો છે.
હનુમાનજી ને ખુબ જ આશ્ચર્ય થયું કે જ્યારે રાવણે કીધું કે, આ વાનર ને મારવો નથી,પરંતુ તેની પૂછડી પર કપડું બાંધી, ઘી નાખી અને આગ લગાવી દો. ત્યારે હનુમાનજી વિચારવા લાગ્યા કે ત્રીજટાના સપનાની વાત સાચી હતી. કેમ કે લંકા સળગાવવા હું કપડું અને ઘી ક્યાંથી લાવું ? અને આગ પણ કંઈ રીતે પ્રગટાવેત ? પણ આ બધી તૈયારીઓ પ્રભુએ રાવણ પાસે જ કરાવી લીધી. ત્યારે હનુમાનજી કહે છે, જ્યારે તમે રાવણ પાસે પણ આવું કામ કરાવી લ્યો છો, તો મારે આમાં આશ્વર્ય કર્યા જેવું કંઈ નથી. ત્યારે હનુમાનજી ને પણ સમજાય જાય છે કે આપણા વગર પણ બધું શક્ય હોય છે. આપણે બસ નિમિત હોઈએ.
એટલા માટે હંમેશા યાદ રાખો કે આ સંસાર માં જે કંઈ પણ થાય છે, તે ક્રમબદ્ધ થાય છે. હું અને તમે, તેના માત્રને માત્ર નિમિત પાત્ર છીએ. એટલા માટે ક્યારે પણ મનુષ્ય જીવેભ્રમ માં રહેવું જોઈએ કે, “ હું હોત તો શુ થાત ? અથવા હું નહી હોઉ તો શું થશે ? જો આપણે એ સ્થાન પર ન હોઈએ તો તેની જગ્યાએ ભગવાન કોઈ બીજા પાત્ર ને નિમ્મીત બનાવે ,

શીખ* :- માણસ માત્ર કોઈ ભ્રમ માં રહેવુ કે હુ છુ તો શક્ય છે , અને હુ નહી હોઉ તો શુ થશે , માણસ ને પ્રભુ કાર્ય માટે નિમ્મીત બનાવે છે .

Posted in सुभाषित - Subhasit

એક કોળીયો પેટ સુધી પહોંચાડવા માટે ઈશ્વરે કેવી અદભૂત વ્યવસ્થા કરી છે…! ☺️🙏

ગરમ હોય તો હાથ કહી દે
કઠણ હોય તો દાંત કહી દે
કડવુ કે તીખુ હોય તો જીભ જાણ કરી દે
અને
વાસી હોય તો નાક ને ખબર પડી જાય.. 💐

બસ ખાલી હક્કનું છે કે હરામનું એ આપણે નક્કી કરવાનુ હોય છે. 👌

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, :       🙏श्री गणेशाय नम:🙏    : , *जय माता दी*

//रात्रि कथा// ,,,,, *"भाग्य"* ,,,,,

चंदन नगर का राजा चंदन सिंह बहुत ही पराक्रमी एवं शक्तिशाली था । उसका राज्य भी धन-धान्य से पूर्ण था । राजा की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी ।

एक बार चंदन नगर में एक ज्योतिषी पधारे । उनका नाम था भद्रशील । उनके बारे में विख्यात था कि वह बहुत ही पहुंचे हुए ज्यातिषी हैं और किसी के भी भविष्य के बारे में सही-सही बता सकते हैं । वह नगर के बाहर एक छोटी कुटिया में ठहरे थे ।

उनकी इच्छा हुई कि वह भी राजा के दर्शन करें । उन्होंने राजा से मिलने की इच्छा व्यक्त की और राजा से मिलने की अनुमति उन्हें सहर्ष मिल गई । राज दरबार में राजा ने उनका हार्दिक स्वागत किया ।
चलते समय राजा ने ज्योतिषी को कुछ हीरे-जवाहरात देकर विदा करना चाहा, परंतु ज्योतिषी ने यह कह कर मना कर दिया कि वह सिर्फ अपने भाग्य का खाते हैं ।
राजा की दी हुई दौलत से वह अमीर नहीं बन सकते ।
राजा ने पूछा – “इससे क्या तात्पर्य है आपका गुरुदेव ?”

“कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत और मेहनत से गरीब या अमीर होता है ।
यदि राजा भी किसी को अमीर बनाना चाहे तो नहीं बना सकता । राजा की दौलत भी उसके हाथ से निकल जाएगी ।”

यह सुनकर राजा को क्रोध आ गया ।
“गुरुदेव ! आप किसी का हाथ देखकर यह बताइए कि उसकी किस्मत में अमीर बनना लिखा है या गरीब, मैं उसको उलटकर दिखा दूंगा ।” राजा बोले ।
“ठीक है, आप ही किसी व्यक्ति को बुलाइए, मैं बताता हूं उसका भविष्य और भाग्य ।” ज्योतिषी ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया ।

राजा ने अपने मंत्री को चुपचाप कुछ आदेश दिया और कुछ ही क्षणों में एक सजा-धजा नौजवान ज्योतिषी के सामने हाजिर था । ज्योतिषी भद्रशील ने ध्यान से उस व्यक्ति का माथा देखा फिर हाथ देखकर कहा – “यह व्यक्ति गरीबी में जन्मा है और जिन्दगी भर गरीब ही रहेगा । इसे खेतों और पेड़ों के बीच कुटिया में रहने की आदत है और वहीं रहेगा ।”

राजा चंदन सिंह सुनकर हैरत में पड़ गया, बोला – “आप ठीक कहते हैं, यह सजा-धजा नौजवान महल के राजसी वस्त्र पहनकर आया है, परंतु वास्तव में यह महल के बागों की देखभाल करने वाला गरीब माली है ।
परंतु गुरुदेव एक वर्ष के भीतर मैं इसे अमीर बना दूंगा । यह जिन्दगी भर गरीब नहीं रह सकता ।”

राजा का घमंड देखकर ज्योतिषी ने कहा – “ठीक है, आप स्वयं प्रयत्न कर लीजिए, मुझे आज्ञा दीजिए ।” और ज्योतिषी भद्रशील चंदन नगर से चले गए ।

राजा ने अगले दिन माली दयाल को बुलाकर एक पत्र दिया और साथ में यात्रा करने के लिए कुछ धन दिया । फिर उससे कहा – “यहां से सौ कोस दूर बालीपुर में मेरे परम मित्र भानुप्रताप रहते हैं, वहां जाओ और यह पत्र उन्हें दे आओ ।”

सुनकर दयाल का चेहरा लटक गया । वह पत्र लेकर अपनी कुटिया में आ गया और सोचने लगा यहां तो पेड़ों की थोड़ी-बहुत देखभाल करके दिन भर आराम करता हूं । अब इतनी गर्मी में इतनी दूर जाना पड़ेगा ।

परंतु राजा की आज्ञा थी, इसलिए अगले दिन सुबह तड़के वह चंदन नगर से पत्र लेकर निकल गया । दो गांव पार करते-करते वह बहुत थक चुका था और धूप चढ़ने लगी थी । इस कारण उसे भूख और प्यास भी जोर की लगी थी । वह उस गांव में बाजार से भोजन लेकर एक पेड़ के नीचे खाने बैठ गया । अभी आधा भोजन ही कर पाया था कि उसका एक अन्य मित्र, जो खेती ही करता था, मिल गया ।

दयाल ने अपनी परेशानी अपने मित्र टीकम को बताई । सुनकर टीकम हंसने लगा, बोला – “इसमें परेशानी की क्या बात है ? राजा के काम से जाओगे, खूब आवभगत होगी । तुम्हारी जगह मैं होता तो खुशी-खुशी जाता ।” यह सुनकर दयाल का चेहरा खुशी से खिल उठा, “तो ठीक है भैया टीकम, तुम ही यह पत्र लेकर चले जाओ, मैं एक दिन यहीं आराम करके वापस चला जाऊंगा ।”

टीकम ने खुशी-खुशी वह पत्र ले लिया और दो दिन में बाली नगर पहुंच गया । वहां का राजा भानुप्रताप था । टीकम आसानी से भानुप्रताप के दरवाजे तक पहुंच गया और सूचना भिजवाई कि चंदन नगर के राजा का दूत आया है । उसे तुरंत अंदर बुलाया गया ।

टीकम की खूब आवभगत हुई । दरबार में मंत्रियों के साथ उसे बिठाया । गया जब उसने पत्र दिया तो भानुप्रताप ने पत्र खोला । पत्र में लिखा था – “प्रिय मित्र, यह बहुत योग्य एवं मेहनती व्यक्ति है । इसे अपने राज्य में इसकी इच्छानुसार चार सौ एकड़ जमीन दे दो और उसका मालिक बना दो । यह मेरे पुत्र समान है । यदि तुम चाहो तो इससे अपनी पुत्री का विवाह कर सकते हो । वापस आने पर मैं भी उसे अपने राज्य के पांच गांव इनाम में दे दूंगा ।”

राजा भानुप्रताप को लगा कि यह सचमुच में योग्य व्यक्ति है, उसने अपनी पुत्री व पत्नी से सलाह करके पुत्री का विवाह टीकम से कर दिया और चलते समय ढेरों हीरे-जवाहारात देकर विदा किया ।

उधर, आलसी दयाल थका-हारा अपनी कुटिया में पहुंचा और जाकर सो गया । दो दिन सोता रहा । फिर सुबह उठकर पेड़ों में पानी देने लगा । सुबह जब राजा अपने बाग में घूमने निकले तो दयाल से पत्र के बारे में पूछा । दयाल ने डरते-डरते सारी राजा को बता दी ।

राजा को बहुत क्रोध आया और साथ ही ज्योतिषी की भविष्यवाणी भी याद आई । परंतु राजा ने सोचा कि कहीं भूल-चूक भी हो सकती है । अत: वह एक बार फिर प्रयत्न करके देखेगा कि दयाल को धनी किस प्रकार बनाया जाए ? तीन-चार दिन पश्चात् दयाल राजा का गुस्सा कम करने की इच्छा से खेत से बड़े-बड़े तरबूज तोड़कर लाया ।
और बोला – “सरकार, इस बार फसल बहुत अच्छी हुई है । देखिए, खेत में कितने बड़े-बड़े तरबूज हुए हैं । राजा खुश हो गया । उसने चुपचाप अपने मंत्री को इशारा कर दिया । मंत्री एक बड़ा तरबूज लेकर अंदर चला गया और उसे अंदर से खोखला कर उसमें हीरे-जवाहारात भरवाकर ज्यों का त्यों चिपकाकर ले आया ।
राजा ने दयाल से कहा – “हम आज तुमसे बहुत खुश हुए हैं । तुम्हें इनाम में यह तरबूज देते हैं ।”
सुनकर दयाल का चेहरा फिर लटक गया । वह सोचने लगा कि राजा ने इनाम दिया भी तो क्या ? वह बड़े उदास मन से तरबूज लेकर जा रहा था, तभी उसका परिचित लोटन मिल गया वह बोला – “क्यों भाई, इतने उदास होकर तरबूज लिए कहां चले जा रहे हो ?”

दयाल बोला – “क्या करूं, बात ही कुछ ऐसी है आज राजा मुझसे खुश हो गए, पर इनाम में दिया यह तरबूज । भला तरबूज भी इनाम में देने की चीज है ? मैं किसे खिलाऊंगा इतना बड़ा तरबूज ?”
लोटन बोला – “निराश क्यों होते हो भाई, इनाम तो इनाम ही है । मुझे ऐसा इनाम मिलता तो मेरे बच्चे खुश हो जाते ।”
“फिर ठीक है, तुम्हीं ले लो यह तरबूज ।” और दयाल तरबूज देकर कुटिया पर आ गया ।
अगले दिन राजा ने दयाल का फिर वही फटा हाल देखा तो पूछा – “क्यों, तरबूज खाया नहीं ?”
दयाल ने सारी बात चुपचाप बता दी । राजा को दयाल पर बड़ा क्रोध आया ? पर कर क्या सकता था ।

अगले दिन दयाल ने लोटन को बड़े अच्छे-अच्छे कपड़े पहने बग्घी में जाते देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । दयाल ने अचानक धनी बनने का राज लोटन से पूछा तो उसने तरबूज का किस्सा बता दिया । सुनकर दयाल हाथ मलकर रह गया । तभी उसने देखा कि किसी राजा की बारात – सी आ रही है । उसने पास जाकर पता किया तो पता लगा कि कोई राजा अपनी दुल्हन को ब्याह कर ला रहा था । ज्यों ही उसने राजा का चेहरा देखा तो उसके हाथों के तोते उड़ गए । उसने देखा, राजसवारी पर टीकम बैठा था । अगले दिन टीकम से मिलने पर उसे पत्र की सच्चाई पता लगी, परंतु अब वह कर ही क्या सकता था ?

राजा ने भी किस्मत के आगे हार मान ली और सोचने लगा – ‘ज्योतिषी ने सच ही कहा था, राजा भी गरीब को अमीर नहीं बना सकता, यदि उसकी भाग्य में गरीब रहना लिखा है ।’ अब राजा ने ज्योतिषी भद्रशील को बहुत ढ़ुंढ़वाया, पर उनका कहीं पता न लगा ।*ऐ कहाणी हमनें नहीं लिखी है,हमने केवल आप तक पहुँचाने का प्रयास किया है*

  . “卐 ज्योतिषी और हस्तरेखाविद 卐”
   :                      :🙏🙏:                    :
                  पं,संजय आमले
                     (  शास्त्री )
               मो,9860298094
,,, 8790466194,,,

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राजा दशरथ की मृत्यु,


राजा दशरथ की मृत्यु,,,,,,,

देवलोक गौशाला

राजा दशरथ को अपनी मृत्यु के समय श्रवणकुमार की याद आई तो उन्होंने माता कौसल्या को यह वृतांत सुनाया !
तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई॥

  • भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा॥
    भावार्थ:- राजा को अंधे तपस्वी (श्रवणकुमार के पिता) के शाप की याद आ गई। उन्होंने सब कथा कौसल्या को कह सुनाई॥ व्याकुल होकर राजा श्रवणकुमार की कथा बताने लगे।
    महाराज दशरथ ने कहा, कौशल्या !! यह मेरे विवाह से पूर्व की घटना है। एक दिन सन्ध्या के समय अकस्मात मैं धनुष बाण ले रथ पर सवार हो शिकार के लिये निकल पड़ा। जब मैं सरयू के तट के साथ-साथ रथ में जा रहा था तो मुझे ऐसा शब्द सुनाई पड़ा मानो वन्य हाथी गरज रहा हो।
    उस हाथी को मारने के लिये मैंने तीक्ष्ण शब्दभेदी बाण छोड़ दिया। बाण के लक्ष्य पर लगते ही किसी जल में गिरते हुए मनुष्य के मुख से ये शब्द निकले – आह, मैं मरा! मुझ निरपराध को किसने मारा ? हे पिता जी ! हे मेरी माता!
    अब मेरी मृत्यु के पश्चात् तुम लोगों की भी मृत्यु, जल के बिना प्यासे ही तड़प-तड़प कर, हो जायेगी। न जाने किस पापी ने बाण मार कर मेरी और मेरे माता-पिता की हत्या कर डाली।
    इससे मुझे ज्ञात हुआ कि हाथी की गरज सुनना मेरा भ्रम था, वास्तव में वह शब्द जल में डूबते हुये घड़े का था।
    उन वचनों को सुन कर मेरे हाथ काँपने लगे और मेरे हाथों से धनुष भूमि पर गिर पड़ा।
    दौड़ता हुआ मैं वहाँ पर पहुँचा जहाँ पर वह मनुष्य था। मैंने देखा कि एक वनवासी युवक रक्तरंजित पड़ा है और पास ही एक औंधा घड़ा जल में पड़ा है। मुझे देखकर क्रुद्ध स्वर में वह बोला – राजन! मेरा क्या अपराध था जिसके लिये आपने मेरा वध करके मुझे दण्ड दिया है? क्या मेरा अपराध यही है कि मैं अपने प्यासे वृद्ध माता-पिता के लिये जल लेने आया था?
    यदि आपके हृदय में किंचित मात्र भी दया है तो मेरे प्यासे माता-पिता को जल पिला दो जो निकट ही मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। किन्तु पहले इस बाण को मेरे कलेजे से निकालो जिसकी पीड़ा से मैं तड़प रहा हूँ। यद्यपि मैं वनवासी हूँ किन्तु फिर भी ब्राह्मण नहीं हूँ। मेरे पिता वैश्य और मेरी माता शूद्र है। इसलिये मेरी मृत्यु से तुम्हें ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगेगा।
    मेरे द्वारा उसके हृदय से बाण खींचते ही उसने प्राण त्याग दिये। अपने इस कृत्य से मेरा हृदय “पश्चाताप” से भर उठा। घड़े में जल भर कर मैं उसके माता पिता के पास पहुँचा। मैंने देखा, वे दोनों अत्यन्त दुर्बल और नेत्रहीन थे। उनकी दशा देख कर मेरा हृदय और भी विदीर्ण हो गया। मेरी आहट पाते ही वे बोले – बेटा श्रवण! इतनी देर कहाँ लगाई? पहले अपनी माता को पानी पिला दो क्योंकि वह प्यास से अत्यंत व्याकुल हो रही है।
    श्रवण के पिता के वचनों को सुन कर मैंने डरते-डरते कहा – हे मुने! मैं अयोध्या का राजा दशरथ हूं। मैंने, अंधकार के कारण, हाथी के भ्रम में तुम्हारे निरपराध पुत्र की हत्या कर दी है। अज्ञानवश किये गये अपने इस अपराध से मैं अत्यंत व्यथित हूँ। आप मुझे दण्ड दीजिये।
    पुत्र की मृत्यु का समाचार सुन कर दोनों विलाप करते हुये कहने लगे – मन तो करता है कि मैं अभी शाप देकर तुम्हें भस्म कर दूँ और तुम्हारे सिर के सात टुकड़े कर दूँ। किन्तु तुमने स्वयं आकर अपना अपराध स्वीकार किया है, अतः मैं ऐसा नहीं करूँगा। अब तुम हमें हमारे श्रवण के पास ले चलो। श्रवण के पास पहुँचने पर वे उसके मृत शरीर को हाथ से टटोलते हुये हृदय-विदारक विलाप करने लगे।
    अपने पुत्र को उन्होंने जलांजलि दिया और उसके पश्चात् वे मुझसे बोले – हे राजन्! जिस प्रकार पुत्र वियोग में हमारी मृत्यु हो रही है, उसी प्रकार तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग में घोर कष्ट उठा कर होगी। शाप देने के पश्चात् उन्होंने अपने पुत्र की चिता बनाई और पुत्र के साथ वे दोनों स्वयं भी चिता में बैठ जल कर भस्म हो गये।
    कौशल्ये! मेरे उस पाप कर्म का दण्ड आज मुझे प्राप्त हो रहा है। ऐसा कहकर राजा विलाप करते हुए कहते हैं।
    ,,,, हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते॥
    ,,हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर॥
    भावार्थ:-हा रघुकुल को आनंद देने वाले मेरे प्राण प्यारे राम! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गए। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुवीर! हा पिता के चित्त रूपी चातक के हित करने वाले मेघ!॥
  • राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
    तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥
    भावार्थ:-राम-राम कहकर, फिर राम कहकर, फिर राम-राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्री राम के विरह में शरीर त्याग कर सुरलोक को सिधार गए॥…

विशेष ,,,,,, हिंसा चाहे अनजाने में ही क्यों ना हो वह प्रारब्ध ( भाग्य ) में पाप बन कर संचित हो जाती है ! परिणाम “जैसे कर्म करेगा वैसा फल दिन भगवान ” अतः “अहिंसा परमोधर्म “
** जय श्री राम **
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आध्यात्मिक जीवन ,,,,,,
आत्मा के कल्याण की अनेक साधनायें हैं। सभी का अपना-अपना महत्त्व है और उनके परिणाम भी अलग-अलग हैं।
‘स्वाध्याय’ से ,,,,सन्मार्ग,,,,,, की जानकारी होती है।
‘सत्संग’ से ,,,,,,स्वभाव और संस्कार,,,,, बनते हैं। कथा सुनने से सद्भावनाएँ जाग्रत होती हैं।
‘तीर्थयात्रा’ से ,,,,,,,भावांकुर,,,,,, पुष्ट होते हैं।
‘कीर्तन’ से ,,,,,,,तन्मयता,,,,,, का अभ्यास होता है।
दान-पुण्य से ,,,,,,सुख-सौभाग्यों,,,,,, की वृद्धि होती है।
‘पूजा-अर्चना से ,,,,,,आस्तिकता,,,,,,, बढ़ती है।
@इस प्रकार यह सभी साधन ऋषियों ने बहुत सोच-समझकर प्रचलित किये हैं। पर ,,,,,,,,,,,,,,,,‘तप’ (परिश्रम ),,,,,,,,,,,,, का महत्त्व इन सबसे अधिक है। तप की अग्नि में पड़कर ही आत्मा के मल विक्षेप और पाप-ताप जलते हैं। तप के द्वारा ही आत्मा में वह प्रचण्ड बल पैदा होता है, जिसके द्वारा सांसारिक तथा आत्मिक जीवन की समस्याएँ हल होती हैं। तप की सामर्थ्य से ही नाना प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ और दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसलिए तप साधन को सबसे शक्तिशाली माना गया है। तप के बिना आत्मा में अन्य किसी भी साधन से तेज प्रकाश बल एवं पराक्रम उत्पन्न नहीं होता।
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” जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !”
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जिस प्रकार मैले दर्पण में सूर्य देव का प्रकाश नहीं पड़ता है उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है अर्थात मलिन अंतःकरण में शैतान अथवा असुरों का राज होता है ! अतः ऐसा मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदत्त अनेक दिव्य सिद्धियों एवं निधियों का अधिकारी नहीं बन सकता है !
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“जब तक मन में खोट और दिल में पाप है, तब तक बेकार सारे मन्त्र और जाप है !”
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,,,,सच्चे संतो की वाणी से अमृत बरसता है , आवश्यकता है ,,,उसे आचरण में उतारने की ….
Note ; कृपया पोस्ट के साथ ही देवलोक गौशाला का page भी लाइक करें और हमेशा के लिए सत्संग का लाभ उठाएं ! देवलोक गौशाला सदैव आपको सन्मार्ग दिखाएगी और उस पर चलने के लिए प्रेरित करती रहेगी! ! सर्वदेवमयी यज्ञेश्वरी गौमाता को नमन
जय गौमाता की 🙏👏🌹🌲🌿🌹
शरीर परमात्मा का दिया हुआ उपहार है ! चाहो तो इससे ” विभूतिया ” (अच्छाइयां / पुण्य इत्यादि ) अर्जित करलो चाहे घोरतम ” दुर्गति ” ( बुराइया / पाप ) इत्यादि !
परोपकारी बनो एवं प्रभु का सानिध्य प्राप्त करो !
प्रभु हर जीव में चेतना रूप में विद्यमान है अतः प्राणियों से प्रेम करो !
शाकाहार अपनाओ , करुणा को चुनो !
choice is yours . 🚩🙏🙏🚩

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2️⃣3️⃣❗0️⃣3️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣0️⃣
एक अनोखे प्रेम का संबंध

एक बार एक चिड़िया का बच्चा आकाश में उड़ता हुआ अचानक किसी घर के आंगन में पड़ा दाना देख कर उसे चुगने के लिए वहां पर जा पहुंचा। जब वह दाना चुग कर वापिस आकाश में उड़ने लगा तो ना जाने कैसे वह उस घर के एक कमरे के दरवाजे से उसमें जा घुसा। कमरे में घुसकर उसे कमरे से बाहर जाने का रास्ता भूल गया और वह घबरा कर कमरे में ही कभी इधर तो कभी उधर भटकने लगा। कभी वह कमरे के एक छोर पर मौजूद जालीदार खिड़की से चहकता हुआ बाहर जाने की कोशिश करता तो कभी दूसरे छोर की खिड़की से, जब वह थक जाता तो पंखे पर जाकर बैठ जाता। परंतु किसी भी हाल में वह अपने बाहर जाने का रास्ता नहीं ढूंढ पाया।

अंत में जब उस चिड़िया के बच्चे की मां उसे ढूंढती हुई उस घर में पहुंची तो उसने खिड़की से अपने बच्चे को तड़पते हुए उस कमरे से बाहर आने की कोशिश करते हुए देखा। यह सब देख कर उसकी मां ने अपने बच्चे की मदद करनी चाही। उसने खिड़की के अंदर से देख रहे आपने बच्चे को आवाज देकर कहा कि “बच्चे अब तुम घबराओ नही क्योंकि अब मैं आ गई हूं और मैं यहां से तुम्हें बाहर निकलने में तुम्हारी पूरी मदद करूंगी।” ऐसा कह कर उसकी मां ने खुद यह निर्णय किया कि वह उस कमरे में जाकर अपने बच्चे को बाहर लेकर आएगी। उसकी मां कमरे में दरवाजे के रास्ते से घुसी और उस कमरे के पंखे पर जा बैठी फिर जैसे ही वह बच्चा अपनी मां को पंखे पर बैठा देख कर अपनी मां के पास आकर बैठा तो उसकी मां उस कमरे के दरवाजे से बाहर की ओर उड़ गई और पीछे-पीछे उसका बच्चा भी उड़कर उस कमरे से बाहर आ गया और दोनों खुशी-खुशी अपने घर की और लौट गए।

मित्रों यह कहानी केवल चिड़िया और उसके बच्चे की ही नहीं थी बल्कि हमारी और हमारे पिता परमेश्वर की भी है। हम सब भी अपने पिता के ऐसे ही नादान बच्चे हैं जो इस संसार रुपी कमरे में आकर कैद हो चुके हैं और अब इससे बाहर निकलने का रास्ता भूल चुके हैं। परंतु हमारे पिता के साथ हमारा एक अनोखे प्रेम का संबंध है। जिसके चलते वह हमें इस संसार रुपी कमरे की कैद से बाहर निकालने में हमारी मदद करने के लिए आते हैं। भगवान श्री कृष्ण गीता में अर्जुन से यह कहते हैं कि “हे अर्जुन! अपने भक्तो का उद्धार करने, दुष्टों का संहार करने तथा धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूं।”

जब कभी भी प्राणी इस संसार रुपी कमरे में आकर फंस जाते हैं और बहुत दुखी हो जाते हैं तो भगवान इस धरती पर अवतरित होकर अपने बच्चों को इस संसार रुपी कैद से मुक्त होने में उनकी मदद करने के लिए अवश्य आते हैं। जो बच्चे पूरी लगन और मेहनत के साथ अपने पिता द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हैं वह शीघ्र ही इस संसार रुपी कैद से स्वतंत्र हो जाते हैं और सदा के लिए अपने पिता के साथ उनके धाम में निवास करते हैं। इसी को यहां पर “एक अनोखे प्रेम के संबंध” का नाम दिया गया है क्योंकि इस संबंध में एक पिता और एक पुत्र का आपसी गहरा प्रेम समाहित है।
🙏🏻🙏🙏🏽जय जय श्री राधे🙏🏼🙏🏾🙏🏿

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एक अनोखे प्रेम का संबंध

एक बार एक चिड़िया का बच्चा आकाश में उड़ता हुआ अचानक किसी घर के आंगन में पड़ा दाना देख कर उसे चुगने के लिए वहां पर जा पहुंचा। जब वह दाना चुग कर वापिस आकाश में उड़ने लगा तो ना जाने कैसे वह उस घर के एक कमरे के दरवाजे से उसमें जा घुसा। कमरे में घुसकर उसे कमरे से बाहर जाने का रास्ता भूल गया और वह घबरा कर कमरे में ही कभी इधर तो कभी उधर भटकने लगा। कभी वह कमरे के एक छोर पर मौजूद जालीदार खिड़की से चहकता हुआ बाहर जाने की कोशिश करता तो कभी दूसरे छोर की खिड़की से, जब वह थक जाता तो पंखे पर जाकर बैठ जाता। परंतु किसी भी हाल में वह अपने बाहर जाने का रास्ता नहीं ढूंढ पाया।

अंत में जब उस चिड़िया के बच्चे की मां उसे ढूंढती हुई उस घर में पहुंची तो उसने खिड़की से अपने बच्चे को तड़पते हुए उस कमरे से बाहर आने की कोशिश करते हुए देखा। यह सब देख कर उसकी मां ने अपने बच्चे की मदद करनी चाही। उसने खिड़की के अंदर से देख रहे आपने बच्चे को आवाज देकर कहा कि “बच्चे अब तुम घबराओ नही क्योंकि अब मैं आ गई हूं और मैं यहां से तुम्हें बाहर निकलने में तुम्हारी पूरी मदद करूंगी।” ऐसा कह कर उसकी मां ने खुद यह निर्णय किया कि वह उस कमरे में जाकर अपने बच्चे को बाहर लेकर आएगी। उसकी मां कमरे में दरवाजे के रास्ते से घुसी और उस कमरे के पंखे पर जा बैठी फिर जैसे ही वह बच्चा अपनी मां को पंखे पर बैठा देख कर अपनी मां के पास आकर बैठा तो उसकी मां उस कमरे के दरवाजे से बाहर की ओर उड़ गई और पीछे-पीछे उसका बच्चा भी उड़कर उस कमरे से बाहर आ गया और दोनों खुशी-खुशी अपने घर की और लौट गए।

मित्रों यह कहानी केवल चिड़िया और उसके बच्चे की ही नहीं थी बल्कि हमारी और हमारे पिता परमेश्वर की भी है। हम सब भी अपने पिता के ऐसे ही नादान बच्चे हैं जो इस संसार रुपी कमरे में आकर कैद हो चुके हैं और अब इससे बाहर निकलने का रास्ता भूल चुके हैं। परंतु हमारे पिता के साथ हमारा एक अनोखे प्रेम का संबंध है। जिसके चलते वह हमें इस संसार रुपी कमरे की कैद से बाहर निकालने में हमारी मदद करने के लिए आते हैं। भगवान श्री कृष्ण गीता में अर्जुन से यह कहते हैं कि “हे अर्जुन! अपने भक्तो का उद्धार करने, दुष्टों का संहार करने तथा धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूं।”

जब कभी भी प्राणी इस संसार रुपी कमरे में आकर फंस जाते हैं और बहुत दुखी हो जाते हैं तो भगवान इस धरती पर अवतरित होकर अपने बच्चों को इस संसार रुपी कैद से मुक्त होने में उनकी मदद करने के लिए अवश्य आते हैं। जो बच्चे पूरी लगन और मेहनत के साथ अपने पिता द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हैं वह शीघ्र ही इस संसार रुपी कैद से स्वतंत्र हो जाते हैं और सदा के लिए अपने पिता के साथ उनके धाम में निवास करते हैं। इसी को यहां पर “एक अनोखे प्रेम के संबंध” का नाम दिया गया है क्योंकि इस संबंध में एक पिता और एक पुत्र का आपसी गहरा प्रेम समाहित है।
🙏🏻🙏🙏🏽जय जय श्री राधे🙏🏼🙏🏾🙏🏿