Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार मुगल बादशाह अकबर और उनका अति प्रिय मंत्री बीरबल दोनों शतरंज खेलने बैठे। दोनों के बीच यह शर्त लगी कि उन में से जो भी व्यक्ति शतरंज की यह बाजी हारेगा, उसे जीतने वाले की इच्छा के अनुसार जुर्माना चुकाना होगा। इसी क्रम में पहले बीरबल बोला जहांपनाह यदि आप जीत गए और मैं हार गया तो हुकुम फरमाएं कि मैं आपको क्या जुर्माना चुकाऊंगा ? बादशाह ने जवाब दिया बीरबल यदि यह बाजी मैं जीता और तुम हारे तो तुम्हें, जुर्माना स्वरूप मुझे सौ स्वर्ण मुद्राएं सौंपनी होगी। इस पर बीरबल ने हां में गर्दन हिलाई ‌। अब बारी बीरबल की थी, वह बोला जहांपनाह यदि इस बाजी में आप हारे और मैं जीता तो आप मुझे जुर्माने के रूप में शतरंज के 64 खानों में गेहूं के दाने रखकर चुकाएंगे‌ लेकिन इसमें मेरी एक छोटी सी शर्त यह रहेगी कि आपको शतरंज के पहले खाने में गेहूं का एक दाना रखना होगा, दूसरे खाने में पहले के दुगने दो दाने, तीसरे खाने में दो के दुगने चार दाने, चौथे खाने में चार के दुगने आठ दाने, पांचवें खाने में आठ के दुगने सोलह दाने। ऐसे करते हुए शतरंज के सभी चौसठ खानों में गेहूं के दाने रख कर वे सारे गेहूं के दाने जुर्माना स्वरूप मुझे सौंप दें। बस यही मेरी शर्त है। बीरबल की इस छोटी सी मांग को सुनकर बादशाह अकबर ने जोरदार ठहाका लगाया और बोला बीरबल मुझे तुम्हारी यह शर्त मंजूर है। इसके बाद शतरंज का खेल शुरू हुआ। अब संयोग देखिए कि शतरंज की उस बाजी में बीरबल जीत गया और बादशाह अकबर को हार का मुंह देखना पड़ा। अब बारी आई हारने वाले को जीतने वाले का जुर्माना चुकाने की। हारने वाले अकबर बादशाह ने बड़े ही अहंकार के साथ अपने खजांची को हुकुम दिया कि वह बीरबल को शर्त के अनुसार शतरंज के चौसठ खानों में गेहूं के दाने रख कर कुल दाने चुका दें। बीरबल की इस शर्त को पूरी करने के दौरान अकबर बादशाह का खजांची थोड़ी ही देर में पसीने-पसीने हो गया। फिर वह अकबर बादशाह के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला जहांपनाह हम हुकूमत का सारा खजाना खाली कर लें तो भी बीरबल की इस शर्त को पूरी नहीं कर पाएंगे। अकबर याने सुल्तान-ए-हिन्द को खजांची की बात पर विश्वास नहीं हुआ लेकिन जब खुद उसने 64 खानों की जोड़ लगाई तो उसका मुंह खुला का खुला रह गया।
आप भी शायद मेरी बात से इत्तेफाक नहीं रख रहे हैं। चलिए मैं आपको समझाता हूं। बीरबल की शर्त के अनुसार जहां शतरंज के पहले खाने में गेहूं का केवल एक दाना, दूसरे खाने में दो दाने, तीसरे खाने में चार दाने ऐसे रखे गये थे वहीं शतरंज के सबसे आखिरी अकेले चौसठवें खाने में गेहूं के 9223372036854775808 दाने रखने पड़ रहे थे और एक से लगा कर चौसठ तक के सभी खानों में रखे जाने वाले गेहूं के कुल दानों की संख्या हो रही थी 18446744073709551615. जिनका कुल वजन होता है 1,19,90,00,00,000 मैट्रिक टन जो कि वर्ष 2019 के सम्पूर्ण विश्व के गेहूं के उत्पादन से 1645 गुणा अधिक है।
साथियों, वृद्धि दो तरह की होती है। पहली संख्यात्मक वृद्धि और दूसरी होती है गुणात्मक वृद्धि। यदि शतरंज के चौसठ खानों में क्रमशः 1, 2, 3…..62, 63, 64 कर के प्रत्येक खाने में उसकी संख्या के अनुसार गेहूं के दाने रखे जाते तो सभी 64 खानों में रखे गेहूं के कुल दानों का योग होता मात्र 2080 दाने और यह कहलाती है संख्यात्मक वृद्धि जबकि बीरबल के द्वारा बताई गई गणना कहलाती है गुणात्मक वृद्धि। जहां संख्यात्मक वृद्धि में 64 खानों का योग मात्र 2080 दाने होते हैं वहीं गुणात्मक वृद्धि में तो मात्र 11 खानों का योग ही 2047 दाने हो जाता है।

विश्वव्यापी कोरोनावायरस की वृद्धि को आप संख्यात्मक वृद्धि समझने की भूल कभी मत करना। हकीकत में कोरोनावायरस की वृद्धि एक गुणात्मक वृद्धि है इसलिए मेरी आप सभी से विनती है कि कोरोनावायरस को हल्के में ना लें। और मेहरबानी करके आगामी एक पखवाड़े तक अपने परिवार के साथ अपने घरों में ही बने रहें। इससे ना केवल आप खुद सुरक्षित रहेंगे अपितु इस महामारी को फैलने से रोकने की आप एक अहम कड़ी भी बनेंगे।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक प्रसिद्ध कैंसर स्पैश्लिस्ट था|
नाम था मार्क,
एक बार किसी सम्मेलन में
भाग लेने लिए किसी दूर के शहर जा रहे थे।
वहां उनको उनकी नई मैडिकल रिसर्च के महान कार्य के लिए पुरुस्कृत किया जाना था।
वे बड़े उत्साहित थे,
व जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना चाहते थे। उन्होंने इस शोध के लिए बहुत मेहनत की थी।

बड़ा उतावलापन था,
उनका उस पुरुस्कार को पाने के लिए।

जहाज उड़ने के लगभग दो घण्टे बाद उनके जहाज़ में तकनीकी खराबी आ गई,
जिसके कारण उनके हवाई जहाज को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।
डा. मार्क को लगा कि वे अपने सम्मेलन में सही समय पर नहीं पहुंच पाएंगे,

इसलिए उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों से रास्ता पता किया और एक टैक्सी कर ली, सम्मेलन वाले शहर जाने के लिए।
उनको पता था की अगली प्लाईट 10 घण्टे बाद है।
टैक्सी तो मिली लेकिन ड्राइवर के बिना इसलिए उन्होंने खुद ही टैक्सी चलाने का निर्णय लिया।

जैसे ही उन्होंने यात्रा शुरु की कुछ देर बाद बहुत तेज, आंधी-तूफान शुरु हो गया।
रास्ता लगभग दिखना बंद सा हो गया। इस आपा-धापी में वे गलत रास्ते की ओर मुड़ गए।
लगभग दो घंटे भटकने के बाद उनको समझ आ गया कि वे रास्ता भटक गए हैं। थक तो वे गए ही थे,
भूख भी उन्हें बहुत ज़ोर से लग गई थी। उस सुनसान सड़क पर भोजन की तलाश में वे गाड़ी इधर-उधर चलाने लगे।
कुछ दूरी पर उनको एक झोंपड़ी दिखी।

झोंपड़ी के बिल्कुल नजदीक उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी।
परेशान से होकर गाड़ी से उतरे और उस छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया।

एक स्त्री ने दरवाज़ा खोला।
डा. मार्क ने उन्हें अपनी स्थिति बताई और एक फोन करने की इजाजत मांगी। उस स्त्री ने बताया कि उसके यहां फोन नहीं है।
फिर भी उसने उनसे कहा कि आप अंदर आइए और चाय पीजिए।
मौसम थोड़ा ठीक हो जाने पर,
आगे चले जाना।

भूखे,
भीगे
और
थके हुए डाक्टर ने तुरंत हामी भर दी।

उस औरत ने उन्हें बिठाया,
बड़े सम्मान के साथ चाय दी व कुछ खाने को दिया।
साथ ही उसने कहा, “आइए, खाने से पहले भगवान से प्रार्थना करें
और उनका धन्यवाद कर दें।”

डाक्टर उस स्त्री की बात सुन कर मुस्कुरा दिेए और बोले,

“मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता।
मैं मेहनत पर विश्वास करता हूं।
आप अपनी प्रार्थना कर लें।”

टेबल से चाय की चुस्कियां लेते हुए डाक्टर उस स्त्री को देखने लगे जो अपने छोटे से बच्चे के साथ प्रार्थना कर रही थी।
उसने कई प्रकार की प्रार्थनाएं की। डाक्टर मार्क को लगा कि हो न हो,
इस स्त्री को कुछ समस्या है।

जैसे ही वह औरत
अपने पूजा के स्थान से उठी,
तो डाक्टर ने पूछा,

“आपको भगवान से क्या चाहिेए?
क्या आपको लगता है कि भगवान आपकी प्रार्थनाएं सुनेंगे?”

उस औरत ने धीमे से उदासी भरी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा,

“ये मेरा लड़का है
और इसको कैंसर रोग है
जिसका इलाज डाक्टर मार्क नामक व्यक्ति के पास है
परंतु मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं
कि मैं उन तक,
उनके शहर जा सकूं
क्योंकि वे दूर किसी शहर में रहते हैं।

यह सच है की कि भगवान ने अभी तक मेरी किसी प्रार्थना का जवाब नहीं दिया किंतु मुझे विश्वास है
कि भगवान एक न एक दिन कोई रास्ता बना ही देंगे।
वे मेरा विश्वास टूटने नहीं देंगे।
वे अवश्य ही मेरे बच्चे का इलाज डा. मार्क से करवा कर इसे स्वस्थ कर देंगे।

डाक्टर मार्क तो सन्न रह गए।
वे कुछ पल बोल ही नहीं पाए।
आंखों में आंसू लिए धीरे से बोले,
“भगवान बहुत महान हैं।”

(उन्हें सारा घटनाक्रम याद आने लगा। कैसे उन्हें सम्मेलन में जाना था।
कैसे उनके जहाज को इस अंजान शहर में आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।
कैसे टैक्सी के लिए ड्राइवर नहीं मिला और वे तूफान की वजह से रास्ता भटक गए और यहां आ गए।)

वे समझ गए कि यह सब इसलिए नहीं हुआ कि भगवान को केवल इस औरत की प्रार्थना का उत्तर देना था

बल्कि भगवान उन्हें भी एक मौका देना चाहते थे
कि वे भौतिक जीवन में
धन कमाने,
प्रतिष्ठा कमाने, इत्यादि
से ऊपर उठें और असहाय लोगों की सहायता करें।

वे समझ गए की भगवान चाहते हैं
कि मैं उन लोगों का इलाज करूं जिनके पास धन तो नहीं है
किंतु जिन्हें भगवान पर विश्वास है।

हर इंसान को ये ग़लतफहमी होती है
की जो हो रहा है,
उस पर उसका कण्ट्रोल है
और वह इन्सान ही
सब कुछ कर रहा है ।

पर अचानक ही कोई
अनजानी ताकत सबकुछ बदल देती है
कुछ ही सेकण्ड्स लगते हैं
सबकुछ बदल जाने में
फिर हम याद करते हैं
परमपिता परमात्मा को।

🙏🙏🙏

या ईश्वर को छोड़ दो…
या ईश्वर के ऊपर छोड़ दो….

सादर चरण वंदन पूज्य भगवन
।। जय सियाराम ।। नमामि शंभु ।।
।। जय हो श्री हनुमान जी महाराज की ।।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक प्रसिद्ध कैंसर स्पैश्लिस्ट था|
नाम था मार्क,
एक बार किसी सम्मेलन में
भाग लेने लिए किसी दूर के शहर जा रहे थे।
वहां उनको उनकी नई मैडिकल रिसर्च के महान कार्य के लिए पुरुस्कृत किया जाना था।
वे बड़े उत्साहित थे,
व जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना चाहते थे। उन्होंने इस शोध के लिए बहुत मेहनत की थी।

बड़ा उतावलापन था,
उनका उस पुरुस्कार को पाने के लिए।

जहाज उड़ने के लगभग दो घण्टे बाद उनके जहाज़ में तकनीकी खराबी आ गई,
जिसके कारण उनके हवाई जहाज को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।
डा. मार्क को लगा कि वे अपने सम्मेलन में सही समय पर नहीं पहुंच पाएंगे,

इसलिए उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों से रास्ता पता किया और एक टैक्सी कर ली, सम्मेलन वाले शहर जाने के लिए।
उनको पता था की अगली प्लाईट 10 घण्टे बाद है।
टैक्सी तो मिली लेकिन ड्राइवर के बिना इसलिए उन्होंने खुद ही टैक्सी चलाने का निर्णय लिया।

जैसे ही उन्होंने यात्रा शुरु की कुछ देर बाद बहुत तेज, आंधी-तूफान शुरु हो गया।
रास्ता लगभग दिखना बंद सा हो गया। इस आपा-धापी में वे गलत रास्ते की ओर मुड़ गए।
लगभग दो घंटे भटकने के बाद उनको समझ आ गया कि वे रास्ता भटक गए हैं। थक तो वे गए ही थे,
भूख भी उन्हें बहुत ज़ोर से लग गई थी। उस सुनसान सड़क पर भोजन की तलाश में वे गाड़ी इधर-उधर चलाने लगे।
कुछ दूरी पर उनको एक झोंपड़ी दिखी।

झोंपड़ी के बिल्कुल नजदीक उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी।
परेशान से होकर गाड़ी से उतरे और उस छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया।

एक स्त्री ने दरवाज़ा खोला।
डा. मार्क ने उन्हें अपनी स्थिति बताई और एक फोन करने की इजाजत मांगी। उस स्त्री ने बताया कि उसके यहां फोन नहीं है।
फिर भी उसने उनसे कहा कि आप अंदर आइए और चाय पीजिए।
मौसम थोड़ा ठीक हो जाने पर,
आगे चले जाना।

भूखे,
भीगे
और
थके हुए डाक्टर ने तुरंत हामी भर दी।

उस औरत ने उन्हें बिठाया,
बड़े सम्मान के साथ चाय दी व कुछ खाने को दिया।
साथ ही उसने कहा, “आइए, खाने से पहले भगवान से प्रार्थना करें
और उनका धन्यवाद कर दें।”

डाक्टर उस स्त्री की बात सुन कर मुस्कुरा दिेए और बोले,

“मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता।
मैं मेहनत पर विश्वास करता हूं।
आप अपनी प्रार्थना कर लें।”

टेबल से चाय की चुस्कियां लेते हुए डाक्टर उस स्त्री को देखने लगे जो अपने छोटे से बच्चे के साथ प्रार्थना कर रही थी।
उसने कई प्रकार की प्रार्थनाएं की। डाक्टर मार्क को लगा कि हो न हो,
इस स्त्री को कुछ समस्या है।

जैसे ही वह औरत
अपने पूजा के स्थान से उठी,
तो डाक्टर ने पूछा,

“आपको भगवान से क्या चाहिेए?
क्या आपको लगता है कि भगवान आपकी प्रार्थनाएं सुनेंगे?”

उस औरत ने धीमे से उदासी भरी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा,

“ये मेरा लड़का है
और इसको कैंसर रोग है
जिसका इलाज डाक्टर मार्क नामक व्यक्ति के पास है
परंतु मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं
कि मैं उन तक,
उनके शहर जा सकूं
क्योंकि वे दूर किसी शहर में रहते हैं।

यह सच है की कि भगवान ने अभी तक मेरी किसी प्रार्थना का जवाब नहीं दिया किंतु मुझे विश्वास है
कि भगवान एक न एक दिन कोई रास्ता बना ही देंगे।
वे मेरा विश्वास टूटने नहीं देंगे।
वे अवश्य ही मेरे बच्चे का इलाज डा. मार्क से करवा कर इसे स्वस्थ कर देंगे।

डाक्टर मार्क तो सन्न रह गए।
वे कुछ पल बोल ही नहीं पाए।
आंखों में आंसू लिए धीरे से बोले,
“भगवान बहुत महान हैं।”

(उन्हें सारा घटनाक्रम याद आने लगा। कैसे उन्हें सम्मेलन में जाना था।
कैसे उनके जहाज को इस अंजान शहर में आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।
कैसे टैक्सी के लिए ड्राइवर नहीं मिला और वे तूफान की वजह से रास्ता भटक गए और यहां आ गए।)

वे समझ गए कि यह सब इसलिए नहीं हुआ कि भगवान को केवल इस औरत की प्रार्थना का उत्तर देना था

बल्कि भगवान उन्हें भी एक मौका देना चाहते थे
कि वे भौतिक जीवन में
धन कमाने,
प्रतिष्ठा कमाने, इत्यादि
से ऊपर उठें और असहाय लोगों की सहायता करें।

वे समझ गए की भगवान चाहते हैं
कि मैं उन लोगों का इलाज करूं जिनके पास धन तो नहीं है
किंतु जिन्हें भगवान पर विश्वास है।

हर इंसान को ये ग़लतफहमी होती है
की जो हो रहा है,
उस पर उसका कण्ट्रोल है
और वह इन्सान ही
सब कुछ कर रहा है ।

पर अचानक ही कोई
अनजानी ताकत सबकुछ बदल देती है
कुछ ही सेकण्ड्स लगते हैं
सबकुछ बदल जाने में
फिर हम याद करते हैं
परमपिता परमात्मा को।

🙏🙏🙏

या ईश्वर को छोड़ दो…
या ईश्वर के ऊपर छोड़ दो….

सादर चरण वंदन पूज्य भगवन
।। जय सियाराम ।। नमामि शंभु ।।
।। जय हो श्री हनुमान जी महाराज की ।।

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2️⃣2️⃣❗0️⃣3️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣0️⃣
“झूठे रिश्ते (एक प्रसंग)” एक बार एक संत के पास एक युवक सत्संग सुनने के लिए आया। संत ने उससे हाल-चाल पूछा, तो उसने स्वयं को अत्यंत सुखी बताया। वह बोला, ''मुझे अपने परिवार के सभी सदस्यों पर बड़ा गर्व है। मैं उनके व्यवहार से संतुष्ट हूँ।'' संत बोले, ''तुम्हें अपने परिवार के बारे में ऐसी धारणा नहीं बनानी चाहिए। इस दुनिया में अपना कोई नहीं होता। जहाँ तक माता-पिता की सेवा और पत्नी-बच्चों के पालन-पोषण का संबंध है, उसे तो कर्तव्य समझकर ही करना चाहिए। उनके प्रति मोह या आसक्ति रखना उचित नहीं।" युवक को संत की बात ठीक नहीं लगी। उसने कहा, ''आपको विश्वास नहीं कि मेरे परिवार के लोग मुझसे अत्यधिक स्नेह करते हैं। यदि मैं एक दिन घर न जाऊं, तो उनकी भूख-प्यास, नींद सब उड़ जाती है और पत्नी तो मेरे बिना जीवित भी नहीं रह सकती है।" संत बोले, "तुम्हें प्राणायाम तो आता ही है। कल सुबह उठने के बजाए प्राणवायु मस्तक में खींचकर निश्चेत पड़े रहना। मैं आकर सब कुछ देख लूँगा।'' दूसरे दिन युवक ने जैसा संत ने बताया था वैसा ही किया। युवक को मृत जानकर उसके सभी घर के लोग विलाप करने लगे। तभी संत वहाँ पहुँचे। घर के सभी सदस्य संत के चरणों में गिर गए। संत बोले, ''आप चिंता मत करें मैं मंत्र से प्रयत्न कर इसे जिंदा कर देता हूँ। लेकिन कटोरी भर पानी परिवार के किसी अन्य सदस्य को पीना पड़ेगा। उस पानी में ऐसी शक्ति है कि यह तो जीवित हो उठेंगे, लेकिन उस पानी को पीने वाला मर जाएगा।" यह सुनने के बाद घर के सभी सदस्य एक दूसरे का मुँह देखने लगे। किसी को भी पानी पीने के लिए तैयार होता न देखकर संत ने कहा कि मैं ही इस पानी को पी लेता हूँ। इस पर घर के सभी सदस्य बोले कि, ''आप धन्य हैं। आप जैसे परोपकारी लोग बहुत कम पैदा होते हैं।" युवक इस पूरे घटनाक्रम को चुपचाप सुन रहा था। उसे संत की बातों पर विश्वास हो गया। प्राणायाम कर वह उठ गया। यह देखकर घर के सभी सदस्य चौंक गए। युवक संत से बोला कि, "आपने मुझे नया जीवन दिया है। इस नश्वर संसार में कोई भी अपना नहीं है। अब मैं हरि भजन करूँगा। संसार में आसक्ति नहीं रखूँगा, अपना कर्तव्य समझकर माता-पिता, पत्नी और बच्चों का पालन करूँगा।"

🙏🏾🙏🏼🙏🏽जय जय श्री राधे🙏🙏🏻🙏🏿

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एक प्रसिद्ध कैंसर स्पैश्लिस्ट था|
नाम था मार्क,
एक बार किसी सम्मेलन में
भाग लेने लिए किसी दूर के शहर जा रहे थे।
वहां उनको उनकी नई मैडिकल रिसर्च के महान कार्य के लिए पुरुस्कृत किया जाना था।
वे बड़े उत्साहित थे,
व जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना चाहते थे। उन्होंने इस शोध के लिए बहुत मेहनत की थी।

बड़ा उतावलापन था,
उनका उस पुरुस्कार को पाने के लिए।

जहाज उड़ने के लगभग दो घण्टे बाद उनके जहाज़ में तकनीकी खराबी आ गई,
जिसके कारण उनके हवाई जहाज को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।
डा. मार्क को लगा कि वे अपने सम्मेलन में सही समय पर नहीं पहुंच पाएंगे,

इसलिए उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों से रास्ता पता किया और एक टैक्सी कर ली, सम्मेलन वाले शहर जाने के लिए।
उनको पता था की अगली प्लाईट 10 घण्टे बाद है।
टैक्सी तो मिली लेकिन ड्राइवर के बिना इसलिए उन्होंने खुद ही टैक्सी चलाने का निर्णय लिया।

जैसे ही उन्होंने यात्रा शुरु की कुछ देर बाद बहुत तेज, आंधी-तूफान शुरु हो गया।
रास्ता लगभग दिखना बंद सा हो गया। इस आपा-धापी में वे गलत रास्ते की ओर मुड़ गए।
लगभग दो घंटे भटकने के बाद उनको समझ आ गया कि वे रास्ता भटक गए हैं। थक तो वे गए ही थे,
भूख भी उन्हें बहुत ज़ोर से लग गई थी। उस सुनसान सड़क पर भोजन की तलाश में वे गाड़ी इधर-उधर चलाने लगे।
कुछ दूरी पर उनको एक झोंपड़ी दिखी।

झोंपड़ी के बिल्कुल नजदीक उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी।
परेशान से होकर गाड़ी से उतरे और उस छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया।

एक स्त्री ने दरवाज़ा खोला।
डा. मार्क ने उन्हें अपनी स्थिति बताई और एक फोन करने की इजाजत मांगी। उस स्त्री ने बताया कि उसके यहां फोन नहीं है।
फिर भी उसने उनसे कहा कि आप अंदर आइए और चाय पीजिए।
मौसम थोड़ा ठीक हो जाने पर,
आगे चले जाना।

भूखे,
भीगे
और
थके हुए डाक्टर ने तुरंत हामी भर दी।

उस औरत ने उन्हें बिठाया,
बड़े सम्मान के साथ चाय दी व कुछ खाने को दिया।
साथ ही उसने कहा, “आइए, खाने से पहले भगवान से प्रार्थना करें
और उनका धन्यवाद कर दें।”

डाक्टर उस स्त्री की बात सुन कर मुस्कुरा दिेए और बोले,

“मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता।
मैं मेहनत पर विश्वास करता हूं।
आप अपनी प्रार्थना कर लें।”

टेबल से चाय की चुस्कियां लेते हुए डाक्टर उस स्त्री को देखने लगे जो अपने छोटे से बच्चे के साथ प्रार्थना कर रही थी।
उसने कई प्रकार की प्रार्थनाएं की। डाक्टर मार्क को लगा कि हो न हो,
इस स्त्री को कुछ समस्या है।

जैसे ही वह औरत
अपने पूजा के स्थान से उठी,
तो डाक्टर ने पूछा,

“आपको भगवान से क्या चाहिेए?
क्या आपको लगता है कि भगवान आपकी प्रार्थनाएं सुनेंगे?”

उस औरत ने धीमे से उदासी भरी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा,

“ये मेरा लड़का है
और इसको कैंसर रोग है
जिसका इलाज डाक्टर मार्क नामक व्यक्ति के पास है
परंतु मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं
कि मैं उन तक,
उनके शहर जा सकूं
क्योंकि वे दूर किसी शहर में रहते हैं।

यह सच है की कि भगवान ने अभी तक मेरी किसी प्रार्थना का जवाब नहीं दिया किंतु मुझे विश्वास है
कि भगवान एक न एक दिन कोई रास्ता बना ही देंगे।
वे मेरा विश्वास टूटने नहीं देंगे।
वे अवश्य ही मेरे बच्चे का इलाज डा. मार्क से करवा कर इसे स्वस्थ कर देंगे।

डाक्टर मार्क तो सन्न रह गए।
वे कुछ पल बोल ही नहीं पाए।
आंखों में आंसू लिए धीरे से बोले,
“भगवान बहुत महान हैं।”

(उन्हें सारा घटनाक्रम याद आने लगा। कैसे उन्हें सम्मेलन में जाना था।
कैसे उनके जहाज को इस अंजान शहर में आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।
कैसे टैक्सी के लिए ड्राइवर नहीं मिला और वे तूफान की वजह से रास्ता भटक गए और यहां आ गए।)

वे समझ गए कि यह सब इसलिए नहीं हुआ कि भगवान को केवल इस औरत की प्रार्थना का उत्तर देना था

बल्कि भगवान उन्हें भी एक मौका देना चाहते थे
कि वे भौतिक जीवन में
धन कमाने,
प्रतिष्ठा कमाने, इत्यादि
से ऊपर उठें और असहाय लोगों की सहायता करें।

वे समझ गए की भगवान चाहते हैं
कि मैं उन लोगों का इलाज करूं जिनके पास धन तो नहीं है
किंतु जिन्हें भगवान पर विश्वास है।

हर इंसान को ये ग़लतफहमी होती है
की जो हो रहा है,
उस पर उसका कण्ट्रोल है
और वह इन्सान ही
सब कुछ कर रहा है ।

पर अचानक ही कोई
अनजानी ताकत सबकुछ बदल देती है
कुछ ही सेकण्ड्स लगते हैं
सबकुछ बदल जाने में
फिर हम याद करते हैं
परमपिता परमात्मा को।

🙏🙏🙏

या ईश्वर को छोड़ दो…
या ईश्वर के ऊपर छोड़ दो….

सादर चरण वंदन पूज्य भगवन
।। जय सियाराम ।। नमामि शंभु ।।
।। जय हो श्री हनुमान जी महाराज की ।।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🌷🌹जय श्री राधे कृष्ण 🌷🌹

राहुल शिवहरे जिला छतरपुर भोपाल

📲📲📲📲 9340275910

🌷| पेड़ नहीं छोड़ता |🌷
💐💐🌺📚🌺💐💐
एक बार की बात है एक व्यक्ति को रोज़ रोज़ जुआ खेलने की बुरी आदत पड़ गयी थी उसकी इस आदतसे सभी बड़े परेशान रहते लोगउसे समझाने कि भी बहुत को शिश करते कि वो ये गन्दी आदत छोड़ दे लेकिन वो हर किसी को एक ही जवाब देता,मैंने ये आदत नहीं पकड़ी,इस आदत ने मुझे पकड़ रखा है और सचमुच वो इस आदत को छोड़ना चाहता था पर हज़ार कोशिशों के बावजूद वो ऐसा नहीं कर पा रहा था परिवार वालों ने सोचा कि शायद शादी करवा देने से वो ये आदत छोड़ दे , सो उसकी शादी करा दी गयी.पर कुछ दिनों तक सब ठीक चला और फिर से वह जुआ खेलने जाना लगा.उसकी पत्नी भी अब काफी चिंतित रहने लगी और उसने निश्चय किया कि वह किसी न किसी तरह अपने पति की इस आदत को छुड़वा कर ही दम लेगी.एक दिन पत्नी को किसी सिद्ध साधु-महात्मा के बारे में पता चला, और वोअपने पति को लेकर उनकेआश्रम पहुंची. साधु ने कहा,बताओ पुत्री तुम्हारी क्या समस्या है पत्नी ने दुखपूर्वक सारी बातें साधु-महाराज को बता दी साधु महा राज उनकी बातें सुनकर समस्या कि जड़ समझ चुके थे,और समाधान देने के लिए उन्होंने पति-पत्नी को अगले दिन आने के लिए कहा अगले दिन वे आश्रम पहुंचे तो उन्होंने देखा कि साधु-महाराज एक पेड़ को पकड़ के खड़े है उन्होंने साधु से पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं और पेड़ को इस तरह क्यों पकडे हुए हैं साधु ने कहा आप लोग जाइये और कल आइ येगा फिर तीसरे दिन भी पति-पत्नी पहुंचे तो देखा कि फिर से साधु पेड़ पकड़ के खड़े हैं उन्होंने जिज्ञासा वश पूछामहाराज आप ये क्या कर रहेहैं साधु बोले पेड़ मुझे छोड़ नहीं रहा हैआप लोग कल आना पति पत्नीको साधु जी का व्यवहार कुछविचित्र लगा पर वे बिना कुछ कहे वापस लौट गए.अगले दिन जब वे फिर आये तो देखा कि साधु महाराज अभी भी उसी पेड़ को पकडे खड़े है पति परेशान होते हुए बोला बाबा आप ये क्या कर रहे हैंआप इस पेड़ को छोड़ क्यों नहीं देते साधु बोले मैं क्या करूँ बालक ये पेड़ मुझे छोड़ ही नहीं रहा है पति हँसते हुए बोला महाराज आप पेड़ को पकडे हुए हैं पेड़ आप को नहीं !…आप जब चाहें उसे छोड़ सकते हैं साधू महाराज गंभीर होते हुए बोले इतने दिनों से मै तुम्हे क्या समझाने कि कोशिश कर रहा हूँ यही न कि तुम जुआ खेलने की आदत को पकडे हुए हो ये आदत तुम्हे नहीं पकडे हुए है पति को अपनी गलती का अहसास हो चुका था वह समझ गया कि किसी भी आदत के लिए वह खुद जिम्मेदार है और वह अपनी इच्छा शक्ति के बल पर जब चाहे उसे छोड़ सकता है.
💐👌📚🌷📚👌
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🌷🌹जय श्री राधे कृष्ण🌷🌹

राहुल शिवहरे जिला छतरपुर भोपाल

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🌹🌷जय श्री राधे कृष्णा 🌷🌹

राहुल शिवहरे जिला छतरपुर भोपाल

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“झूठे रिश्ते (एक प्रसंग)” एक बार एक संत के पास एक युवक सत्संग सुनने के लिए आया। संत ने उससे हाल-चाल पूछा, तो उसने स्वयं को अत्यंत सुखी बताया। वह बोला, ''मुझे अपने परिवार के सभी सदस्यों पर बड़ा गर्व है। मैं उनके व्यवहार से संतुष्ट हूँ।'' संत बोले, ''तुम्हें अपने परिवार के बारे में ऐसी धारणा नहीं बनानी चाहिए। इस दुनिया में अपना कोई नहीं होता। जहाँ तक माता-पिता की सेवा और पत्नी-बच्चों के पालन-पोषण का संबंध है, उसे तो कर्तव्य समझकर ही करना चाहिए। उनके प्रति मोह या आसक्ति रखना उचित नहीं।" युवक को संत की बात ठीक नहीं लगी। उसने कहा, ''आपको विश्वास नहीं कि मेरे परिवार के लोग मुझसे अत्यधिक स्नेह करते हैं। यदि मैं एक दिन घर न जाऊं, तो उनकी भूख-प्यास, नींद सब उड़ जाती है और पत्नी तो मेरे बिना जीवित भी नहीं रह सकती है।" संत बोले, "तुम्हें प्राणायाम तो आता ही है। कल सुबह उठने के बजाए प्राणवायु मस्तक में खींचकर निश्चेत पड़े रहना। मैं आकर सब कुछ देख लूँगा।'' दूसरे दिन युवक ने जैसा संत ने बताया था वैसा ही किया। युवक को मृत जानकर उसके सभी घर के लोग विलाप करने लगे। तभी संत वहाँ पहुँचे। घर के सभी सदस्य संत के चरणों में गिर गए। संत बोले, ''आप चिंता मत करें मैं मंत्र से प्रयत्न कर इसे जिंदा कर देता हूँ। लेकिन कटोरी भर पानी परिवार के किसी अन्य सदस्य को पीना पड़ेगा। उस पानी में ऐसी शक्ति है कि यह तो जीवित हो उठेंगे, लेकिन उस पानी को पीने वाला मर जाएगा।" यह सुनने के बाद घर के सभी सदस्य एक दूसरे का मुँह देखने लगे। किसी को भी पानी पीने के लिए तैयार होता न देखकर संत ने कहा कि मैं ही इस पानी को पी लेता हूँ। इस पर घर के सभी सदस्य बोले कि, ''आप धन्य हैं। आप जैसे परोपकारी लोग बहुत कम पैदा होते हैं।" युवक इस पूरे घटनाक्रम को चुपचाप सुन रहा था। उसे संत की बातों पर विश्वास हो गया। प्राणायाम कर वह उठ गया। यह देखकर घर के सभी सदस्य चौंक गए। युवक संत से बोला कि, "आपने मुझे नया जीवन दिया है। इस नश्वर संसार में कोई भी अपना नहीं है। अब मैं हरि भजन करूँगा। संसार में आसक्ति नहीं रखूँगा, अपना कर्तव्य समझकर माता-पिता, पत्नी और बच्चों का पालन करूँगा।"

🌹🌷जय श्री राधे कृष्णा 🌹🌷

राहुल शिवहरे जिला छतरपुर भोपाल

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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“झूठे रिश्ते (एक प्रसंग)” एक बार एक संत के पास एक युवक सत्संग सुनने के लिए आया। संत ने उससे हाल-चाल पूछा, तो उसने स्वयं को अत्यंत सुखी बताया। वह बोला, ''मुझे अपने परिवार के सभी सदस्यों पर बड़ा गर्व है। मैं उनके व्यवहार से संतुष्ट हूँ।'' संत बोले, ''तुम्हें अपने परिवार के बारे में ऐसी धारणा नहीं बनानी चाहिए। इस दुनिया में अपना कोई नहीं होता। जहाँ तक माता-पिता की सेवा और पत्नी-बच्चों के पालन-पोषण का संबंध है, उसे तो कर्तव्य समझकर ही करना चाहिए। उनके प्रति मोह या आसक्ति रखना उचित नहीं।" युवक को संत की बात ठीक नहीं लगी। उसने कहा, ''आपको विश्वास नहीं कि मेरे परिवार के लोग मुझसे अत्यधिक स्नेह करते हैं। यदि मैं एक दिन घर न जाऊं, तो उनकी भूख-प्यास, नींद सब उड़ जाती है और पत्नी तो मेरे बिना जीवित भी नहीं रह सकती है।" संत बोले, "तुम्हें प्राणायाम तो आता ही है। कल सुबह उठने के बजाए प्राणवायु मस्तक में खींचकर निश्चेत पड़े रहना। मैं आकर सब कुछ देख लूँगा।'' दूसरे दिन युवक ने जैसा संत ने बताया था वैसा ही किया। युवक को मृत जानकर उसके सभी घर के लोग विलाप करने लगे। तभी संत वहाँ पहुँचे। घर के सभी सदस्य संत के चरणों में गिर गए। संत बोले, ''आप चिंता मत करें मैं मंत्र से प्रयत्न कर इसे जिंदा कर देता हूँ। लेकिन कटोरी भर पानी परिवार के किसी अन्य सदस्य को पीना पड़ेगा। उस पानी में ऐसी शक्ति है कि यह तो जीवित हो उठेंगे, लेकिन उस पानी को पीने वाला मर जाएगा।" यह सुनने के बाद घर के सभी सदस्य एक दूसरे का मुँह देखने लगे। किसी को भी पानी पीने के लिए तैयार होता न देखकर संत ने कहा कि मैं ही इस पानी को पी लेता हूँ। इस पर घर के सभी सदस्य बोले कि, ''आप धन्य हैं। आप जैसे परोपकारी लोग बहुत कम पैदा होते हैं।" युवक इस पूरे घटनाक्रम को चुपचाप सुन रहा था। उसे संत की बातों पर विश्वास हो गया। प्राणायाम कर वह उठ गया। यह देखकर घर के सभी सदस्य चौंक गए। युवक संत से बोला कि, "आपने मुझे नया जीवन दिया है। इस नश्वर संसार में कोई भी अपना नहीं है। अब मैं हरि भजन करूँगा। संसार में आसक्ति नहीं रखूँगा, अपना कर्तव्य समझकर माता-पिता, पत्नी और बच्चों का पालन करूँगा।"

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सकारात्मक सोच
🌺🌹🌺🌹🌺🌹💢दिल की बाते💢 ग्रुप की सादर भेंट

दोस्तों , ईश्वर हर सुख हर किसी को नही देता पर इंसान ईश्वर द्वारा दिए

गये छोटे से सुख से भी अपार सुख
प्राप्त कर सकता हैं । बस अंदाज
आना चाहिए । एक कहानी के माध्यम से आप समझ जाओगे ।

एक गरीब वृद्ध पिता के पास अपने अंतिम समय में दो बेटों को देने के लिए मात्र एक आम था। पिताजी आशीर्वादस्वरूप दोनों को वही देना चाहते थे, किंतु बड़े भाई ने आम हठपूर्वक ले लिया। रस चूस लिया छिल्का अपनी गाय को खिला दिया। गुठली छोटे भाई के आँगन में फेंकते हुए कहा- ‘ लो, ये पिताजी का तुम्हारे लिए आशीर्वाद है।’ –
छोटे भाई ने ब़ड़ी श्रद्धापूर्वक गुठली को अपनी आँखों व सिर से लगाकर गमले में गाढ़ दिया। छोटी बहू पूजा के बाद बचा हुआ जल गमले में डालने लगी। कुछ समय बाद आम का पौधा उग आया, जो देखते ही देखते बढ़ने लगा। छोटे भाई ने उसे गमले से निकालकर अपने आँगन में लगा दिया। कुछ वर्षों बाद उसने वृक्ष का रूप ले लिया। वृक्ष के कारण घर की धूप से रक्षा होने लगी, साथ ही प्राणवायु भी मिलने लगी। बसंत में कोयल की मधुर कूक सुनाई देने लगी। बच्चे पेड़ की छाँव में किलकारियाँ
भरकर खेलने लगे।
पेड़ की शाख से झूला बाँधकर झूलने लगे। पेड़ की छोटी-छोटी लक़िड़याँ हवन करने एवं बड़ी लकड़ियाँ
घर के दरवाजे-खिड़कियों में भी काम आने लगीं। आम के पत्ते त्योहारों पर तोरण बाँधने के काम में आने लगे। धीरे-धीरे वृक्ष में कैरियाँ लग गईं। कैरियों से अचार व मुरब्बा डाल दिया गया। आम के रस से घर-परिवार के सदस्य रस-विभोर हो गए तो बाजार में आम के अच्छे दाम मिलने से आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई। रस से पाप़ड़ भी बनाए गए, जो पूरे साल मेहमानों व घर वालों को आम रस की याद दिलाते रहते। ब़ड़े बेटे को आम फल का सुख क्षणिक ही मिला तो छोटे बेटे को पिता का ‘ आशीर्वाद’ दीर्घकालिक व सुख- समृद्धिदायक मिला।

यही हाल हमारा भी है परमात्मा हमे सब कुछ देता है सही उपयोग हम करते नही हैं दोष परमात्मा और किस्मत को देते हैं।

इसी प्रकार ईश्वर ने हमको जो बेहतरीन जीवन दिया हैं उसको हम
व्यर्थ व्यतीत कर रहे हैं ।उसको ऐसा बोओ की भविष्य में हमारी फसल लहलहाने लगे ।

हंस जैन 98272 14427💐💢🌻🌻💢💐

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🌹मनुष्य है वही कि जो……🌹

🌹मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए जिये।
मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

🌹ईश्वरचन्द्र विद्यासागर अपनी परदुःखकातरता के लिए विख्यात थे। वे सदैव कोई-न-कोई सेवा का मौका खोज ही लेते थे।
एक बार वे रास्ते से गुजर रहे थे। सामने एक ब्राह्मण आँसू बहाता हुआ मिला। विद्यासागर ने उस ब्राह्मण को थाम लिया और पूछाः “क्या बात है जो आपकी आँखों से आँसू गिर रहे हैं ?”
“अरे भाई ! आप क्या मेरा दुःख करेंगे !”
विद्यासागर ने प्रार्थना करते हुए कहाः “फिर भी भैया ! बताओ न, मेरी जिज्ञासा है।”

🌹ब्राह्मण बोलाः “मैंने अपनी लड़की की शादी में देखा-देखी ज्यादा धन खर्च कर दिया क्योंकि जाति में ऐसा रिवाज है। खर्च के लिए कर्जा लिया। जिस महाजन से कर्जा लिया था, उसने मुझ पर दावा कर दिया है। मैं अदालत में जाकर खड़ा रहूँगा तो कैसा लगेगा। कितनी शर्मनाक घटना होगी वह ! हमारी सात पीढ़ियों में, पूरे खानदान में कभी कोई कोर्ट कचहरी नहीं गया। अब मैं ही ऐसा बेटा पैदा हुआ हूँ कि मेरे बाप, दादा, नाना सबकी नाक कट जायेगी।”

🌹ऐसा कहकर वह सिसक-सिसककर रोने लगा।
विद्यासागर ने पूछाः “अच्छा, महाजन का नाम क्या है ?”
ब्राह्मणः “नाम जानकर आप क्या करेंगे ? अपना दुर्भाग्य मैं स्वयं भोग लूँगा। आप अपने काम में लगें।”

🌹विद्यासागर ऐसा नहीं बोले कि ‘मैं कर्जा चुका दूँगा। मैं सब ठीक कर दूँगा। मैं विद्यासागर हूँ….’ परोपकारी पुरुष सेवा का अभिमान नहीं करते, न ही प्रशंसा चाहते हैं।
विद्यासागर ने कहाः “कृपा करके बताओ तो सही।”

🌹ब्राह्मण से बहुत विनती करके उन्होंने महाजन का नाम-पता तथा कोर्ट की तारीख जान ली। जिस दिन ब्राह्मण को कोर्ट जाना था, उससे पहले ही घर बैठे उसे पता लग गया कि उसका केस खारिज हो गया है। क्यों ? क्योंकि महाजन को रूपये मिल गये थे। किसने दिये ? कोई पता नहीं।

🌹आखिर उसे पता लग ही गया कि परदुःखकातर विद्यासागर ही उस दिन उसे सड़क पर मिले थे और उन्होंने ही पैसे भरकर उसे ऋण से मुक्त कराया है।
आजकल के धनाढ्य और देश-विदेश में धन की थप्पियाँ लगाने वाले लोग विद्यासागर की नाईं परोपकार का, परदुःखकातरता का महत्त्व समझें तो उनका और गरीबों का कितना मंगल होगा !
अपने दुःख में रोने वाले ! मुस्कराना सीख ले।
औरों के दुःख-दर्द में आँसू बहाना सीख ले।।
जो खिलाने में मजा है आप खाने में नहीं।
जिंदगी में तू किसी के काम आना सीख ले।।

🌹प्रभु की प्रीति के लिए सेवा करो फिर देखो ! वाहवाही के लिए, अखबार में नाम आये इसलिए तो बहुत लोग सेवाकार्य करके दिखाते हैं, लेकिन नाम की फिक्र न करो। अंतर्यामी ईश्वर सब जानते हैं। छुपकर पाप करने से धड़कनें बढ़ जाती हैं, पाप का फल मिलता है तो छुपकर पुण्य करोगे तो वह प्रसन्न नहीं होगा क्या ? उसकी प्रीति के लिए गरीब-गुरबे की सेवा करो। दाता, दयालु या सेठ होकर नहीं, नेता होकर नहीं, गरीब का होकर गरीब की सेवा करो। दुखियारे का साथी होकर उसकी सेवा करो क्योंकि दुखियारे में भी वही बैठा है। माँ की सेवा करो लेकिन दया धर्म से उनकी सेवा मत करो। ‘माँ में भी मेरा अनंत है, पिता में भी मेरा अनन्त है।’ इसी प्रकार की भावना से अगर उनकी सेवा करते हो तो तुम्हारी सेवा अनंत तुरंत स्वीकार लेता है, तुरंत हृदय में प्रेरणा देता है और सिंह जैसा बल देता है। मुझे तो कई बार इसके अनुभव हुए हैं। जो भी थोड़ी बहुत सेवा होती तो भीतर से जो भाव उभरता उसे तो वह जाने और मैं जानूँ ! क्या बताऊँ आपको…..!!