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जनपदोद्ध्वंस : महामारी
📝 श्रीकृष्ण “जुगनू”
कोरोना के बहाने कुछ बातें कहने का मन है जो भारतीय मनीषा ने लगभग ढाई हजार साल पहले भोगकर आत्मसात् कीं और उसके अनुभवों को संसार के सामने आचरण के उद्देश्य से रखा। महामारी का समय सामान्य काल नहीं होता, यह मज़ाक का दौर भी नहीं बल्कि चिंता की वेला है जिसे चरक ने सबसे पहले जनपदोद्ध्वंस नाम दिया है। इसका सामान्य आशय वही है जो हम अभी – अभी चीन और इटली के अर्थ में लेे रहे हैं। देशध्वंस का मतलब उस काल में बहुत भयानक व्याधि का परिणाम था जिसे बाद में अपिडेमिक भी कहा गया।

गंगा के तटवर्ती वनों में घूमते हुए पुनर्वसु ने शिष्यों से जो कहा, चरक ने उसे बहुत उपयोगी माना क्योंकि कांपिल्य में महामारी को लेकर एक समय बड़ी संगति रखी गई थी और उसमें महामारी पर सर्व दृष्टि विमर्श किया गया। संसार में किसी महामारी पर यह कदाचित पहला और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। यकीन नहीं होगा कि पुनर्वसु ने साफ कह दिया था कि एक एक औषधि को परख कर सुरक्षित कर दिया जाए क्योंकि महामारी के समय दवा से उसके रस, गुण, शक्ति सब गुम हो जाते हैं यानि कि दवा तब दवा नहीं रहती!

स्मरण रखना चाहिए कि महामारी के समय सब असामान्य हो जाता है : नक्षत्र, ग्रह, चन्द्र, सूर्य की स्थितियां…दिशाओं में प्रकृति और ऋतुओं में विकार, दवाइयों में प्रभाव शून्यता, जन आतंक और अधिकांश लोग रोगग्रस्त, रोग भी ऐसे कि जिनका उपचार संभव नहीं हो। सब कुछ अस्वाभाविक होता है। (विमानस्थान, 3, 4)

चरक ने इसे राज्य के नष्ट होने का भाव अनेक विशेषणों से दिया है और वराह ने “मरकी” नाम दिया। वराह को मालूम था कि परिधावी नामक संवत्सर का उत्तरार्ध नाशकारी प्रवृत्ति लेकर आता है और व्यवस्था का संकट खड़ा हो जाता है : देशनाशो नृपहानि। हालांकि अब बीत गया है। दशम युग के संवत्सरों में अधिकतर कलह, रोग, मरक (मरी) और नाश काल के रूप में रेखांकित किया है। प्रभव, राक्षस भी न्यारे नहीं। चरक इस अर्थ में पहले से ही उपचार की व्यवस्था करके रखने की बात कहते हैं : भैषज्येषु सम्यग्विहितेषु सम्यक् चावचारितेषु जनपदोद्ध्वंसकराणां विकाराणां…।

वायरस वाले रोगों के प्रसंग में यह बहुत आश्चर्यकारक है कि महामारी की उत्पत्ति और प्रसार के चार कारण हैं : विकृत वायु, विकृत जल, विकृत देश और विकृत काल। चरक ने जिस तरह इनके भेद, लक्षण और सर्वेक्षण आधारित चरण दिए हैं, वे आज के विज्ञान के अनुसार है।

आत्रेय से अग्निवेश संवाद के अन्तर्गत यह भी कहा है कि क्यों मनुष्य भिन्न-भिन्न प्रकृति, आहार, शरीर, बल, सात्मय, सत्व और आयु के होते हैं तो फिर एक ही साथ, एक ही समय में उनका देशव्यापी महामारी से क्योंकर विनाश होता है? महामारी इति से बढ़कर है और महा अकाल है जिसे “गर्गसंहिता” में उपसर्ग के लक्षणों सहित बताया गया है। इसके शांति उपायों पर मध्य काल तक पूरी ताकत लगी।

चरक ने क्यों खुलकर कहा कि स्पर्श, वायु और खाद्य पदार्थों के दोषपूर्ण होने से उपजी महामारी से देश नष्ट होते हैं : तत उद्ध्वंसन्ते जनपदा: स्पृश्याभ्यवहार्य दोषात्। यह सब बहुत लंबा विषय है। लेकिन, हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि मानवता की सुरक्षा के लिए सात्विक आहार, विहार, आचरण हो, हितकर स्थान पर रहें, महर्षियों की चर्चा हो और उन उपायों में ही जीवन लगाएं जिनसे जीवन रक्षा के प्रयास तय हों और परस्पर विश्वास का भाव बढ़े। अपनी रक्षा स्वयं करें। वाग्भट्ट और चरक का मत है :
इत्येतद् भेषजं प्रोक्तमायुष: परिपालनम्।
येषामनियतो मृत्युस्तस्मिन्काले सुदारुणे।।
🌄
सभी के लिए स्वास्थ्य की कोटि कोटि मंगल कामनाएं : सर्वे संतु निरामया।
(शिल्पशास्त्र में आयुर्वेद)
चित्र : DrSatyanarayan Suthar

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