Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

इतिहास का ठुकराया हीरा- वीर छत्रपति शम्भा जी

(11 मार्च को बलिदान दिवस पर विशेष रूप से प्रचारित)

डॉ विवेक आर्य

वीर शिवाजी के पुत्र वीर शम्भा जी वीरता में अपने पिता से किसी भी प्रकार से कम नहीं थे। वीर शम्भा जी कायर होते तो वे औरंगजेब की दासता स्वीकार कर इस्लाम ग्रहण कर लेते। वह न केवल अपने प्राणों की रक्षा कर लेते अपितु अपने राज्य को भी बचा लेते। वीर शम्भा जी का जन्म 14 मई 1657 को हुआ था। आप वीर शिवाजी के साथ अल्पायु में औरंगजेब की कैद में आगरे के किले में बंद भी रहे थे। आपने 11 मार्च 1689 को वीरगति प्राप्त की थी। इस लेख में वीर शम्भाजी जी के उस महान और प्रेरणादायक जीवन के हमें दर्शन होते है जिसका वर्णन इतिहासकार प्राय:नहीं करते।

औरंगजेब के जासूसों ने सुचना दी की शम्भा जी इस समय आपने पांच-दस सैनिकों के साथ वारद्वारी से रायगढ़ की ओर जा रहे है। बीजापुर और गोलकुंडा की विजय में औरंगजेब को शेख निजाम के नाम से एक सरदार भी मिला जिसे उसने मुकर्रब की उपाधि से नवाजा था। मुकर्रब अत्यंत क्रूर और मतान्ध था। शम्भा जी के विषय में सुचना मिलते ही उसकी बांछे खिल उठी। वह दौड़ पड़ा रायगढ़ की ओर। शम्भा जी आपने मित्र कवि कलश के साथ इस समय संगमेश्वर पहुँच चुके थे। वह एक बाड़ी में बैठे थे की उन्होंने देखा कवि कलश भागे चले आ रहे है और उनके हाथ से रक्त बह रहा है। कलश ने शम्भा जी से कुछ भी नहीं बोला। बल्कि उनका हाथ पकड़कर उन्हें खींचते हुए बाड़ी के तलघर में ले गए। परन्तु उन्हें तलघर में घुसते हुए मुकर्रब खान के पुत्र ने देख लिया था। शीघ्र ही मराठा रणबांकुरों को बंदी बना लिया गया। शम्भा जी व कवि कलश को लोहे की जंजीरों में जकड़ कर मुकर्रब खान के सामने लाया गया। वह उन्हें देखकर खुशी से नाच उठा। दोनों वीरों को बोरों के समान हाथी पर लादकर मुस्लिम सेना बादशाह औरंगजेब की छावनी की और चल पड़ी।

औरंगजेब को जब यह समाचार मिला, तो वह ख़ुशी से झूम उठा। उसने चार मील की दूरी पर उन शाही कैदियों को रुकवाया। वहां शम्भा जी और कवि कलश को रंग बिरंगे कपडे और विदूषकों जैसी घुंघरूदार लम्बी टोपी पहनाई गयी। फिर उन्हें ऊंट पर बैठा कर गाजे बाजे के साथ औरंगजेब की छावनी पर लाया गया। औरंगजेब ने बड़े ही अपशब्द शब्दों में उनका स्वागत किया। शम्भा जी के नेत्रों से अग्नि निकल रही थी, परन्तु वह शांत रहे। उन्हें बंदी ग्रह भेज दिया गया। औरंगजेब ने शम्भा जी का वध करने से पहले उन्हें इस्लाम काबुल करने का न्योता देने के लिए रूह्ल्ला खान को भेजा।

नर केसरी लोहे के सींखचों में बंद था। कल तक जो मराठों का सम्राट था। आज उसकी दशा देखकर करुणा को भी दया आ जाये। फटे हुए चिथड़ों में लिप्त हुआ उनका शरीर मिटटी में पड़े हुए स्वर्ण के समान हो गया था। उन्हें स्वर्ग में खड़े हुए छत्रपति शिवाजी टकटकी बंधे हुए देख रहे थे। पिता जी पिता जी वे चिल्ला उठे- मैं आपका पुत्र हूँ। निश्चित रहिये। मैं मर जाऊँगा लेकिन…..

लेकिन क्या शम्भा जी …रूह्ल्ला खान ने एक और से प्रकट होते हुए कहां।

तुम मरने से बच सकते हो शम्भा जी। परन्तु एक शर्त पर।

शम्भा जी ने उत्तर दिया में उन शर्तों को सुनना ही नहीं चाहता। शिवाजी का पुत्र मरने से कब डरता है।

लेकिन जिस प्रकार तुम्हारी मौत यहाँ होगी उसे देखकर तो खुद मौत भी थर्रा उठेगी शम्भा जी- रुहल्ला खान ने कहा।

कोई चिंता नहीं , उस जैसी मौत भी हम हिन्दुओं को नहीं डरा सकती। संभव है कि तुम जैसे कायर ही उससे डर जाते हो। शम्भा जी ने उत्तर दिया।

लेकिन… रुहल्ला खान बोला वह शर्त है बड़ी मामूली। तुझे बस इस्लाम कबूल करना है। तेरी जान बक्श दी जाएगी। शम्भा जी बोले बस रुहल्ला खान आगे एक भी शब्द मत निकालना मलेच्छ। रुहल्ला खान अट्टहास लगाते हुए वहाँ से चला गया।

उस रात लोहे की तपती हुई सलाखों से शम्भा जी की दोनों आँखे फोड़ दी गई। उन्हें खाना और पानी भी देना बंद कर दिया गया।

आखिर 11 मार्च को वीर शम्भा जी के बलिदान का दिन आ गया। सबसे पहले शम्भा जी का एक हाथ काटा गया, फिर दूसरा, फिर एक पैर को काटा गया और फिर दूसरा पैर। शम्भा जी कर पाद-विहीन धड़ दिन भर खून की तलैया में तैरता रहा। फिर सांयकाल में उनका सर काट दिया गया और उनका शरीर कुत्तों के आगे डाल दिया गया। फिर भाले पर उनके सर को टांगकर सेना के सामने उसे घुमाया गया और बाद में कूड़े में फेंक दिया गया।

मरहठों ने अपनी छातियों पर पत्थर रखकर आपने सम्राट के सर का इंद्रायणी और भीमा के संगम पर तुलापुर में दांह संस्कार कर दिया गया। आज भी उस स्थान पर शम्भा जी की समाधी है। जो पुकार पुकार कर वीर शम्भा जी की याद दिलाती है कि हम सर कटा सकते है पर अपना प्यारे वैदिक धर्म कभी नहीं छोड़ सकते।

मित्रों शिवाजी के तेजस्वी पुत्र शंभाजी के अमर बलिदान यह गाथा हिन्दू माताएं अपनी लोरियों में बच्चो को सुनाये तो हर घर से महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे महान वीर जन्मेंगे। इतिहास के इन महान वीरों के बलिदान के कारण ही आज हम गर्व से अपने आपको श्री राम और श्री कृष्ण की संतान कहने का गर्व करते है। आईये आज हम प्रण ले हम उसी वीरों के पथ के अनुगामी बनेगे।

बोलों वीर छत्रपति शिवाजी की जय।
बोलों वीर छत्रपति शम्भा जी की जय।।

SambhajiMaharajmartyrdomday

JaiBhawani

Jay Sambhaji Maharaj
Jai Shivaji

sambhajimaharaj

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

में कभी भी शराब पीते हुए रिस्क नहीं लेता।
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मैं ऑफिस से शाम को घर पे आया तो बीवी खाना बना रही थी।

हाँ, मुझे रसोई से बर्तनों की आवाज़ आ रही है।

मैं छुपके से घर में घुस गया

काले रंग की अलमारी में से ये मैंने बोतल निकाली

शिवाजी महाराज फ़ोटो फ्रेम में से मुझे देख रहे हैं

पर अब भी किसी को कुछ पता नहीं लगा

क्योंकि मैं कभी रिस्क नहीं लेता।
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मैंने पुरानी सिंक के ऊपर वाली रैक से गिलास निकाला

और फटाक से एक पेग गटक लिया।

गिलास धोया, और उसे फिर से रैक पे रख दिया।

बेशक मैंने बोतल भी अलमारी में वापस रख दी

शिवाजी महाराज मुस्कुरा रहे हैं

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मैंने रसोई में झांका

बीवी आलू काट रही है।

किसी को कुछ पता नहीं चला के मैंने अभी अभी क्या किया

क्योंकि मैं कभी रिस्क नहीं लेता।
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मैं बीवी से पूछा: चोपड़ा की बेटी की शादी का कुछ हुआ ?

बीवी : नहीं जी, बड़ी ख़राब किस्मत है बेचारी की। अभी लड़का देख ही रहे हैं वो लोग उसके लिए।
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मैं फिर से बाहर आया, काली अलमारी की हलकी सी आवाज़ हुई

पर बोतल निकालते हुए मैंने बिल्कुल आवाज़ नहीं की

सिंक के ऊपर वाली पुरानी रैक से मैंने गिलास निकाला

लो जी फटाफट दो पेग और मार लिए
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बोतल धोयी और संभाल के सिंक में रख दी

और काले गिलास को अलमारी में भी रख दिया

पर किसी को अब भी हवा तक नहीं लगी के मैंने क्या किया

क्योंकि मैं कभी रिस्क नहीं लेता
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मैं बीवी से : फिर भी ! चोपड़ा की लड़की की अभी उम्र ही क्या है

बीवी: क्या बात कर रहे हो जी !!! 28 की हो गयी है…बूढ़ी घोड़ी की तरह दिखने लगी है।

मैं: (भूल ही गया कि उसकी उम्र तो 28 साल है) अच्छा अच्छा..
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मैंने फिर से मौका देख के काली अलमारी में से आलू निकाले

पर पता नहीं यार अलमारी की जगह कैसे अपने आप बदल गयी!

ये मैंने रैक से बोतल निकाली, सिंक में एक पेग बनाया और गटागट पी गया
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शिवाजी महाराज बड़ी जोर जोर से हँस रहे हैं

रैक को ये मैंने आलू में रक्खा, शिवाजी महाराज की फ़ोटो भी ढंग से धो दी और लो जी काली अलमारी में भी रख दी
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बीवी क्या कर रही है, हाँ ! वो सिंक चूल्हे पे चढ़ा रही है।

पर अब भी किसी को कुछ पता नहीं चला के मैंने क्या किया

क्योंकि! क्योंकि मैं कभी रिस्क नहीं लेता।
(ये हुचकि क्यों आ रही है, कौन याद किया मेरे को)
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मैं बीवी से: (गुस्सा होते हुए) तुमने चोपड़ा साहब को घोड़ा बोला? अगर तुमने दोबारा ऐसा बोला तो तुम्हारी ज़ुबान काट दूंगा…!

बीवी: हाँ बाबा बड़बड़ाओ मत ! शांति से बैठो तुम अब बाहर जाकर, इस समय वही ठीक है तुम्हारे लिए…
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मैंने आलू में से बोतल निकाली

काली अलमारी में गया और अपने पेग के मजे लिए

सिंक धोया और उसको रैक के ऊपर रख दिया

बीवी फ्रेम में से अब भी मुस्कुरा रही है
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शिवाजी महाराज खाना बनाने में बिजी हैं

पर अब भी किसी को कुछ नहीं पता मैंने क्या किया

क्योंकि मैं रिस्क लेता ही नहीं ना यार
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मैं बीवी से : (हँसते हुए) तो चोपड़ा घोड़े से शादी कर रहा है!!

बीवी: सुनो ! जाओ, तुम पहले अपने मुँह पे पानी के छपाके मारो…
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मैं फिर रसोई में गया और चुपचाप रैक पे बैठ गया

चूल्हा भी रखा है रैक पे

बाहर कमरे से बोतल की आवाज़ सी आई
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मैंने झाँका और देखा की बीवी सिंक में बैठी पेग के मजे ले रही है

पर अब तक किसी भी घोड़े को पता नहीं लगा के मैंने क्या किया

क्योंकि शिवाजी महाराज कभी रिस्क नहीं लेते
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चोपड़ा साला अब भी खाना बना रहा है

और मैं फ़ोटो में से अपनी बीवी को देख रहा हूँ और हँस रहा हूँ

क्योंकि! क्योंकि मैं कभी! क्योंकि मैं कभी क्या नहीं लेता। यार??? हाँ !!!
मैं कभी आलू नहीं लेता… शायद!

Cheers!!???? 😄
🥃🥃🍻🍻🍺🍺
होली है
😃😃🍺🍺🍻🍻🥃🥃 चियर्स

देवी सिंग तोमर

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નેગેટીવ માથી પોઝીટીવ જીવન જીવવાની ફોર્મ્યુલા…

એક મહિલાને રોજ સૂતા પહેલા પોતાની દિવસભરની ખુશીઓ કાગળ પર લખવાની આદત હતી. એક રાતે તેણે લખ્યું :

.. હું ખુશ છું કે મારા પતિ આખી રાત મોટેથી નસકોરાં બોલાવે છે કારણ એ દર્શાવે છે કે તે જીવિત છે અને મારી પાસે છે. આ ઈશ્વરની કૃપા છે.

..હું ખુશ છું કે દર મહિને વિજળી, ગેસ, પેટ્રોલ, પાણી વગેરેનું બિલ ભરવું પડે છે. આ દર્શાવે છે કે આ બધી ચીજવસ્તુઓનો હું વપરાશ કરું છું – એ મારી પાસે છે. જો એ ન હોત તો જિંદગી કેટલી મુશ્કેલ બની રહેત..? આ ઈશ્વરની કૃપા છે.

..હું ખુશ છું કે દિવસને અંતે મારા થાકીને બૂરા હાલ થઈ જાય છે. આમ થવાનું કારણ એ છે કે મારામાં દિવસભર સખત કામ કરવાની તાકાત અને હિંમત છે. આ ઈશ્વરની કૃપા છે.

..હું ખુશ છું કે મારે રોજ મારા ઘેર ઝાડુ – પોતા કરવા પડે છે, બારી – દરવાજા સાફ કરવા પડે છે. ભગવાનનો આભાર માનવાનો કે મારી પાસે મારું પોતાનું ઘર છે! આ ઈશ્વરની કૃપા છે. જેમની પાસે તેમનું પોતાનું ઘર અને માથે છત નથી હોતાં તેમની શી હાલત થતી હશે..?

..હું ખુશ છું કે હું ક્યારેક ક્યારેક માંદી પડું છું.મોટે ભાગે તો હું સાજી જ હોઉં છું ને..? આ ઈશ્વરની કૃપા છે.

..હું ખુશ છું કે દર વર્ષે તહેવારો આવે એટલે ભેટ સોગાદો આપવામાં પાકીટ ખાલી થઈ જાય છે. આ દર્શાવે છે કે મારી પાસે મારા ચાહવાવાળાઓ, મારા આપ્તજનો, સગા સંબંધીઓ, મિત્રો છે જેમને હું ભેટ સોગાદ આપી શકું છું. જો એ ના હોય તો જિંદગી કેટલી નીરસ હોય..! આ ઈશ્વરની કૃપા છે.

..હું ખુશ છું કે રોજ એલાર્મ વાગતા મારે ઉઠી જવું પડે છે. આનો અર્થ એવો થાય છે કે રોજ એક નવી સવાર જોવાનું સદ્ભાગ્ય મને પ્રાપ્ત થાય છે. આ ઈશ્વરની કૃપા છે.

જીવન જીવવાના આ ફોર્મ્યુલાનો અમલ કરી પોતાની અને પોતાની આસપાસનાં લોકોની જીંદગી સુખ – શાંતિમય અને વધુ જીવવાલાયક બનાવવી જોઈએ. નાની કે મોટી કોઈ પણ મુશ્કેલીમાંયે ખુશીની તલાશ કરવી જોઈએ અને ઈશ્વરનો આભાર માની જીંદગી ખુશહાલ બનાવવી જોઈએ…

🙏👌💐💐👌

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🌹🌷जय श्री राधे कृष्ण 🌷🌹

राहुल शिवहरे जिला छतरपुर भोपाल

📲📲📲 9340275910

योग्यता की परख


युवक अंकमाल भगवान बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ और बोला- “भगवन्! मेरी इच्छा है कि मैं संसार की कुछ सेवा करूं, आप मुझे जहाँ भी भेजना चाहें भेज दें ताकि मैं लोगों को धर्म का रास्ता दिखाऊँ?”

बुद्ध हँसे और बोले- “तात! संसार को कुछ देने के पहले अपने पास कुछ होना आवश्यक है, जाओ पहले अपनी योग्यता बढ़ाओ फिर संसार की भी सेवा करना।“

अंकमाल वहाँ से चल पड़ा और कलाओं के अभ्यास में जुट गया। बाण बनाने से लेकर चित्रकला तक मल्लविद्या से लेकर मल्लाहकारी तक उसने जितनी भी कलायें हो सकती हैं उन सबका उसने 10 वर्ष तक कठोर अभ्यास किया।

अंकमाल की कला-विशारद के रूप में सारे देश में ख्याति फैल गई।

अपनी प्रशंसा से आप प्रसन्न होकर अंकमाल अभिमान पूर्वक लौटा और तथागत की सेवा में जा उपस्थित हुआ। अपनी योग्यता का बखान करते हुये उसने कहा- “भगवन्! अब मैं संसार के प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा सकता हूँ। अब मैं 24 कलाओं का पंडित हूँ।“

भगवान बुद्ध मुस्कराये और बोले- “अभी तो तुम कलायें सीख कर आये हो परीक्षा दे लो तब उन पर अभिमान करना।“

अगले दिन भगवान बुद्ध एक साधारण नागरिक का वेश बदलकर अंकमाल के पास गये और उसे अकारण खरी-खोटी सुनाने लगे। अंकमाल क्रुद्ध होकर मारने दौड़ा तो बुद्ध वहाँ से मुस्कराते हुये वापस लौट पड़े।

उसी दिन मध्याह्न दो बौद्ध श्रमण वेश बदलकर अंकमाल के समीप जाकर बोले- “आचार्य आपको सम्राट हर्ष ने मन्त्रिपद देने की इच्छा की है क्या आप उसे स्वीकार करेंगे?“

अंकमाल को लोभ आ गया उसने कहा- “हाँ-हाँ अभी चलो।“

दोनों श्रमण भी मुस्करा दिये और चुपचाप लौट आये।

अंकमाल हैरान था- ‘बात क्या है?’

थोड़ी देर पीछे भगवान बुद्ध पुनः उपस्थित हुये। उनके साथ आम्रपाली थीं। अंकमाल जितनी देर तथागत वहाँ रहे आम्रपाली की ही ओर बार-बार देखता रहा। बात समाप्त कर तथागत आश्रम लौटे।

सायंकाल अंकमाल को बुद्ध देव ने पुनः बुलाया और पूछा- “वत्स। क्या तुमने क्रोध, काम और लोभ पर विजय की विद्या भी सीखी है?”

अंकमाल को दिनभर की सब घटनायें याद हो आई। उसने लज्जा से अपना सिर झुका लिया और उस दिन से आत्म-विजय की साधना में संलग्न हो गया।

🌹🌷जय श्री राधे कृष्णा 🌷🌹

राहुल शिवहरे जिला छतरपुर भोपाल

📲📲📲9340275910

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1 मिनिट लगेगा किंतु पढ़े जरूर
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एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए! कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता, तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता, उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता!
अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता हैं, जबकी मै उन्हे उसके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हुँ। फिर भी थोड़े से कष्ट मे ही मेरे पास आ जाता हैं। जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं, जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।
प्रभू के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं। भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा। इंद्रदेव ने सलाह दी- कि वह किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले- आप अंतरिक्ष में चले जाइए।
भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा। भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- “क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं”।
अंत में सूर्य देव बोले- प्रभू! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं! मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा। ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया और वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए।
उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मन्दिर, ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहें हैं।
परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर- “हृदय रूपी मन्दिर” में बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पाता।

🌷🌹जय श्री राधे कृष्णा🌷🌹

राहुल शिवहरे जिला छतरपुर भोपाल

📲📲📲 9340275910

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योग्यता की परख


युवक अंकमाल भगवान बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ और बोला- “भगवन्! मेरी इच्छा है कि मैं संसार की कुछ सेवा करूं, आप मुझे जहाँ भी भेजना चाहें भेज दें ताकि मैं लोगों को धर्म का रास्ता दिखाऊँ?”

बुद्ध हँसे और बोले- “तात! संसार को कुछ देने के पहले अपने पास कुछ होना आवश्यक है, जाओ पहले अपनी योग्यता बढ़ाओ फिर संसार की भी सेवा करना।“

अंकमाल वहाँ से चल पड़ा और कलाओं के अभ्यास में जुट गया। बाण बनाने से लेकर चित्रकला तक मल्लविद्या से लेकर मल्लाहकारी तक उसने जितनी भी कलायें हो सकती हैं उन सबका उसने 10 वर्ष तक कठोर अभ्यास किया।

अंकमाल की कला-विशारद के रूप में सारे देश में ख्याति फैल गई।

अपनी प्रशंसा से आप प्रसन्न होकर अंकमाल अभिमान पूर्वक लौटा और तथागत की सेवा में जा उपस्थित हुआ। अपनी योग्यता का बखान करते हुये उसने कहा- “भगवन्! अब मैं संसार के प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा सकता हूँ। अब मैं 24 कलाओं का पंडित हूँ।“

भगवान बुद्ध मुस्कराये और बोले- “अभी तो तुम कलायें सीख कर आये हो परीक्षा दे लो तब उन पर अभिमान करना।“

अगले दिन भगवान बुद्ध एक साधारण नागरिक का वेश बदलकर अंकमाल के पास गये और उसे अकारण खरी-खोटी सुनाने लगे। अंकमाल क्रुद्ध होकर मारने दौड़ा तो बुद्ध वहाँ से मुस्कराते हुये वापस लौट पड़े।

उसी दिन मध्याह्न दो बौद्ध श्रमण वेश बदलकर अंकमाल के समीप जाकर बोले- “आचार्य आपको सम्राट हर्ष ने मन्त्रिपद देने की इच्छा की है क्या आप उसे स्वीकार करेंगे?“

अंकमाल को लोभ आ गया उसने कहा- “हाँ-हाँ अभी चलो।“

दोनों श्रमण भी मुस्करा दिये और चुपचाप लौट आये।

अंकमाल हैरान था- ‘बात क्या है?’

थोड़ी देर पीछे भगवान बुद्ध पुनः उपस्थित हुये। उनके साथ आम्रपाली थीं। अंकमाल जितनी देर तथागत वहाँ रहे आम्रपाली की ही ओर बार-बार देखता रहा। बात समाप्त कर तथागत आश्रम लौटे।

सायंकाल अंकमाल को बुद्ध देव ने पुनः बुलाया और पूछा- “वत्स। क्या तुमने क्रोध, काम और लोभ पर विजय की विद्या भी सीखी है?”

अंकमाल को दिनभर की सब घटनायें याद हो आई। उसने लज्जा से अपना सिर झुका लिया और उस दिन से आत्म-विजय की साधना में संलग्न हो गया।

साभार~ जय नामदेव