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^ राजा युधिष्ठिर की 30 पीढ़ियां

महाभारत के बाद से आधुनिक काल तक के सभी राजाओं का विवरण क्रमवार तरीके से नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है…!

आपको यह जानकर एक बहुत ही आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी होगी कि महाभारत युद्ध के पश्चात् राजा युधिष्ठिर की 30 पीढ़ियों ने 1770 वर्ष 11 माह 10 दिन तक राज्य किया था….. जिसका पूरा विवरण इस प्रकार है :
… क्र………………. शासक का नाम………. वर्ष….माह.. दिन

  1. राजा युधिष्ठिर (Raja Yudhisthir)….. 36…. 08…. 25
    2 राजा परीक्षित (Raja Parikshit)…….. 60…. 00….. 00
    3 राजा जनमेजय (Raja Janmejay)…. 84…. 07…… 23
    4 अश्वमेध (Ashwamedh )…………….. 82…..08….. 22
    5 द्वैतीयरम (Dwateeyram )…………… 88…. 02……08
    6 क्षत्रमाल (Kshatramal)………………. 81…. 11….. 27
    7 चित्ररथ (Chitrarath)…………………. 75……03…..18
    8 दुष्टशैल्य (Dushtashailya)…………… 75…..10…….24
    9 राजा उग्रसेन (Raja Ugrasain)……… 78…..07…….21
    10 राजा शूरसेन (Raja Shoorsain)…….78….07……..21
    11 भुवनपति (Bhuwanpati)…………….69….05…….05
    12 रणजीत (Ranjeet)…………………….65….10……04
    13 श्रक्षक (Shrakshak)…………………..64…..07……04
    14 सुखदेव (Sukhdev)……………………62….00…….24
    15 नरहरिदेव (Narharidev)……………..51…..10…….02
    16 शुचिरथ (Suchirath)…………………42……11…….02
    17 शूरसेन द्वितीय (Shoorsain II)……..58…..10…….08
    18 पर्वतसेन (Parvatsain )………………55…..08…….10
    19 मेधावी (Medhawi)……………………52…..10……10
    20 सोनचीर (Soncheer)…………………50…..08…….21
    21 भीमदेव (Bheemdev)………………..47……09…….20
    22 नरहिरदेव द्वितीय (Nraharidev II)…45…..11…….23
    23 पूरनमाल (Pooranmal)………………44…..08…….07
    24 कर्दवी (Kardavi)………………………44…..10……..08
    25 अलामामिक (Alamamik)……………50….11……..08
    26 उदयपाल (Udaipal)…………………..38….09……..00
    27 दुवानमल (Duwanmal)………………40….10…….26
    28 दामात (Damaat)……………………..32….00…….00
    29 भीमपाल (Bheempal)……………….58….05……..08
    30 क्षेमक (Kshemak)……………………48….11……..21

इसके बाद ….क्षेमक के प्रधानमन्त्री विश्व ने क्षेमक का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 14 पीढ़ियों ने 500 वर्ष 3 माह 17 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 विश्व (Vishwa)……………………. 17 3 29
2 पुरसेनी (Purseni)………………… 42 8 21
3 वीरसेनी (Veerseni)……………… 52 10 07
4 अंगशायी (Anangshayi)……….. 47 08 23
5 हरिजित (Harijit)……………….. 35 09 17
6 परमसेनी (Paramseni)…………. 44 02 23
7 सुखपाताल (Sukhpatal)……… 30 02 21
8 काद्रुत (Kadrut)………………. 42 09 24
9 सज्ज (Sajj)…………………… 32 02 14
10 आम्रचूड़ (Amarchud)……… 27 03 16
11 अमिपाल (Amipal) ………….22 11 25
12 दशरथ (Dashrath)…………… 25 04 12
13 वीरसाल (Veersaal)……………31 08 11
14 वीरसालसेन (Veersaalsen)…….47 0 14

इसके उपरांत…राजा वीरसालसेन के प्रधानमन्त्री वीरमाह ने वीरसालसेन का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 445 वर्ष 5 माह 3 दिन तक राज्य किया जिसका विरवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 राजा वीरमाह (Raja Veermaha)……… 35 10 8
2 अजितसिंह (Ajitsingh)…………………. 27 7 19
3 सर्वदत्त (Sarvadatta)……………………..28 3 10
4 भुवनपति (Bhuwanpati)……………….15 4 10
5 वीरसेन (Veersen)……………………….21 2 13
6 महिपाल (Mahipal)……………………….40 8 7
7 शत्रुशाल (Shatrushaal)…………………26 4 3
8 संघराज (Sanghraj)……………………17 2 10
9 तेजपाल (Tejpal)…………………….28 11 10
10 मानिकचंद (Manikchand)…………37 7 21
11 कामसेनी (Kamseni)………………42 5 10
12 शत्रुमर्दन (Shatrumardan)……….8 11 13
13 जीवनलोक (Jeevanlok)………….28 9 17
14 हरिराव (Harirao)………………….26 10 29
15 वीरसेन द्वितीय (Veersen II)……..35 2 20
16 आदित्यकेतु (Adityaketu)……….23 11 13

ततपश्चात् प्रयाग के राजा धनधर ने आदित्यकेतु का वध करके उसके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 9 पीढ़ी ने 374 वर्ष 11 माह 26 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण इस प्रकार है ..

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 राजा धनधर (Raja Dhandhar)………..23 11 13
2 महर्षि (Maharshi)………………………….41 2 29
3 संरछि (Sanrachhi)……………………….50 10 19
4 महायुध (Mahayudha)…………………….30 3 8
5 दुर्नाथ (Durnath)………………………….28 5 25
6 जीवनराज (Jeevanraj)…………………..45 2 5
7 रुद्रसेन (Rudrasen)……………………..47 4 28
8 आरिलक (Aarilak)……………………..52 10 8
9 राजपाल (Rajpal)…………………………36 0 0

उसके बाद …सामन्त महानपाल ने राजपाल का वध करके 14 वर्ष तक राज्य किया। अवन्तिका (वर्तमान उज्जैन) के विक्रमादित्य ने महानपाल का वध करके 93 वर्ष तक राज्य किया। विक्रमादित्य का वध समुद्रपाल ने किया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 372 वर्ष 4 माह 27 दिन तक राज्य किया !
जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 समुद्रपाल (Samudrapal)………….54 2 20
2 चन्द्रपाल (Chandrapal)…………….36 5 4
3 सहपाल (Sahaypal)……………….11 4 11
4 देवपाल (Devpal)…………………27 1 28
5 नरसिंहपाल (Narsighpal)………18 0 20
6 सामपाल (Sampal)……………27 1 17
7 रघुपाल (Raghupal)………..22 3 25
8 गोविन्दपाल (Govindpal)……..27 1 17
9 अमृतपाल (Amratpal)………36 10 13
10 बालिपाल (Balipal)………12 5 27
11 महिपाल (Mahipal)………..13 8 4
12 हरिपाल (Haripal)……….14 8 4
13 सीसपाल (Seespal)…….11 10 13
14 मदनपाल (Madanpal)……17 10 19
15 कर्मपाल (Karmpal)……..16 2 2
16 विक्रमपाल (Vikrampal)…..24 11 13

टिप : कुछ ग्रंथों में सीसपाल के स्थान पर भीमपाल का उल्लेख मिलता है, सम्भव है कि उसके दो नाम रहे हों।

इसके उपरांत …..विक्रमपाल ने पश्चिम में स्थित राजा मालकचन्द बोहरा के राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसमे मालकचन्द बोहरा की विजय हुई और विक्रमपाल मारा गया। मालकचन्द बोहरा की 10 पीढ़ियों ने 191 वर्ष 1 माह 16 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 मालकचन्द (Malukhchand) 54 2 10
2 विक्रमचन्द (Vikramchand) 12 7 12
3 मानकचन्द (Manakchand) 10 0 5
4 रामचन्द (Ramchand) 13 11 8
5 हरिचंद (Harichand) 14 9 24
6 कल्याणचन्द (Kalyanchand) 10 5 4
7 भीमचन्द (Bhimchand) 16 2 9
8 लोवचन्द (Lovchand) 26 3 22
9 गोविन्दचन्द (Govindchand) 31 7 12
10 रानी पद्मावती (Rani Padmavati) 1 0 0

रानी पद्मावती गोविन्दचन्द की पत्नी थीं। कोई सन्तान न होने के कारण पद्मावती ने हरिप्रेम वैरागी को सिंहासनारूढ़ किया जिसकी पीढ़ियों ने 50 वर्ष 0 माह 12 दिन तक राज्य किया !
जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 हरिप्रेम (Hariprem) 7 5 16
2 गोविन्दप्रेम (Govindprem) 20 2 8
3 गोपालप्रेम (Gopalprem) 15 7 28
4 महाबाहु (Mahabahu) 6 8 29

इसके बाद…….राजा महाबाहु ने सन्यास ले लिया । इस पर बंगाल के अधिसेन ने उसके राज्य पर आक्रमण कर अधिकार जमा लिया। अधिसेन की 12 पीढ़ियों ने 152 वर्ष 11 माह 2 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 अधिसेन (Adhisen) 18 5 21
2 विल्वसेन (Vilavalsen) 12 4 2
3 केशवसेन (Keshavsen) 15 7 12
4 माधवसेन (Madhavsen) 12 4 2
5 मयूरसेन (Mayursen) 20 11 27
6 भीमसेन (Bhimsen) 5 10 9
7 कल्याणसेन (Kalyansen) 4 8 21
8 हरिसेन (Harisen) 12 0 25
9 क्षेमसेन (Kshemsen) 8 11 15
10 नारायणसेन (Narayansen) 2 2 29
11 लक्ष्मीसेन (Lakshmisen) 26 10 0
12 दामोदरसेन (Damodarsen) 11 5 19

लेकिन जब ….दामोदरसेन ने उमराव दीपसिंह को प्रताड़ित किया तो दीपसिंह ने सेना की सहायता से दामोदरसेन का वध करके राज्य पर अधिकार कर लिया तथा उसकी 6 पीढ़ियों ने 107 वर्ष 6 माह 22 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।

क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 दीपसिंह (Deepsingh) 17 1 26
2 राजसिंह (Rajsingh) 14 5 0
3 रणसिंह (Ransingh) 9 8 11
4 नरसिंह (Narsingh) 45 0 15
5 हरिसिंह (Harisingh) 13 2 29
6 जीवनसिंह (Jeevansingh) 8 0 1

पृथ्वीराज चौहान ने जीवनसिंह पर आक्रमण करके तथा उसका वध करके राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पृथ्वीराज चौहान की 5 पीढ़ियों ने 86 वर्ष 0 माह 20 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।
क्र. शासक का नाम वर्ष माह दिन

1 पृथ्वीराज (Prathviraj) 12 2 19
2 अभयपाल (Abhayapal) 14 5 17
3 दुर्जनपाल (Durjanpal) 11 4 14
4 उदयपाल (Udayapal) 11 7 3
5 यशपाल (Yashpal) 36 4 27

विक्रम संवत 1249 (1193 AD) में मोहम्मद गोरी ने यशपाल पर आक्रमण कर उसे प्रयाग के कारागार में डाल दिया और उसके राज्य को अधिकार में ले लिया।

इस जानकारी का स्रोत स्वामी दयानन्द सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश ग्रंथ, चित्तौड़गढ़ राजस्थान से प्रकाशित पत्रिका हरिशचन्द्रिका और मोहनचन्द्रिका के विक्रम संवत1939 के अंक और कुछ अन्य संस्कृत ग्रंथ है।
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8 जनवरी 2013 की हड्डीयाँ गला डालने वाली एक सर्द रात,



Ashu Himanshu
 
8 जनवरी 2013 की हड्डीयाँ गला डालने वाली एक सर्द रात,जिसमें राजस्थान रायफल्स की रोमियो फोर्स के कोई 6-7 जवान आपस में ठिठोली कर रहे थे,तभी उनके कानों में एक कड़क आवाज,जवान होशियार रहना,दुश्मन की LOC पर एक्टिविटी संदिग्ध लग रही हैं। सिगार मुँह में दबाये एक रोबदार व्यक्तित्व सिर पे गोल हैट और उठी हुई छाती पे एक नेम प्लेट लेफ्टिनेंट अर्जुन सिंह शेखावत।
यस सर, 6 स्वर एक सुर में गरजे,साला बहुत परेशान करता हैं, ना खुद चैन से रहता हैं ना रहने देता हैं, मैगजीन की बैल्ट कमर पर बाँधते हुये लांस नायक सुधाकर सिंह बोलता जा रहा था,कौन मरेगा यहाँ इतनी सर्द रात में,दूसरे ने पीठ्ठू बैग उसकी कमर पे टाँगते हुये कहा सालो जल्दी गश्त लगाकर आना कही भाभी की याद में खो जाए,सुधाकर सिंह ने हेमराज को देखकर एक शैतानी मुस्कान फेंकी और रायफ़ल उठा चल दिये,
जल्दी आना,
हाय इतने प्यार से तो तेरी भाभी ने भी नही कहा कभी,
इधर से बर्फ का गोला फेंकते हुये एक भद्दी सी गाली और भग साले।और उधर से हँसी का स्वर दूर पुंज सेक्टर की वादियों में घुलता चला गया।

रात बीतने लगी,कॉफी का मग हाथ मे लिये दूरबीन से दूर तलक देखते हुये वे बड़बड़ाये दोनों हरामखोर हैं तुम्हे इन दोनों को अलग अलग भेजना चाहिये।
साले दिखावे के लिये सारा दिन लड़ते रहते हैं पर एक दूसरे पे जान छिड़कते हैं।
बहुत रात बीत गई,पर वे वापस नही आये, अब चिंता होने लगी उन्हें ,यार चलो देखते हैं बहुत टाईम हुआ आये क्यो नही अभी तक??
आनन फानन में चारो ने हथियार उठाये और चल पड़े,पाक अधिकृत कश्मीर का बोर्डर था ये,वे उन्हें तलासते बहुत दूर निकल आये,
और फिर उनमें से एक चींख पड़ा सुधाकर मेरे यार ………..,
बर्फ पर औंधे मुँह सुधाकर की लाश पड़ी थी,वो रोने लगा,उनमें से एक बोला हेमराज को ढूंढो,
हेमराज,हेमराज पुकारते वे बदहवास से भाग रहे थे,की अचानक जो दिखा वो उन्हें पत्थर बना गया,
सामने हेमराज की लाश पड़ी थी,सर गायब।
आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे पर बहुत देर तक वे मूर्ति बने रहे।सुबह हुई ,मगर सिर्फ कहने को राजपुताना बटालियन पर गहन मौत का अंधकार छाया हुआ था।
यूँ तो उन दो जियालों की मौत पर सारा देश रोया होगा,पर उनका दर्द कौन समझ सकता हैं वो कुछ घंटों पूर्व ही एक दूसरे को छेड़ रहे थे वो अचानक छोड़ जाए।
खैर उन दोनों के शव उनके घर भेज दिये, मगर उन शवो का कोई क्या करें जो वही छूट गये थे ,ज़िंदा लाशें,ना कोई आवाज,ना ख़ाना ना पीना,सिर्फ क्रोध और दुःख से सुलगति आँखे।
4 दिन बाद,
लेफ्टिनेंट उन चारों के टेंट में आया ,
वे खड़े हो गये,
आवाज वही थी,पर उसमें वो रॉब नही था,तुम चारो ने खाना क्यो नही खाया 4 दिनों से,
उधर से कोई जवाब नही।
इधर से फिर बात दोहराई गई,मगर उधर से सिर्फ आँखों की दिशा बदली आवाज कोई नही,

फिर लेफ्टिनेंट का बेबस स्वर,मैं तुम्हे इसकी इजाजत नही दे सकता,तुम जो चाहते हो जानते हो उसका अंजाम क्या होगा ??

लेफ्टिनेंट साब,सुधाकर और हेमराज की कसम जब तक दुश्मनों से उनके खून का हिसाब चुकता ना कर ले हम चारो एक निवाला मुँह में नही डालेंगें।

लेफ्टिनेंट कसमसा कर बोला कि बिना सरकारी आदेश इसकी इजाजत कैसे दे दु ??
तो फिर जाईये लेफ्टिनेंट साब,हमारी फिक्र छोड़िये।
वो मुड़ा और पीठ करके बोला,ठीक हैं जाओ,पर ध्यान रहे मुझमे अब और लाश देखने का साहस नही,यदि तुम नही लौटे तो भवानी की सौगंध मैं खुद को गोली मार लूँगा।
इतना कहकर वो रुके नही,और वो चारो अचंभित रह गये,
वे तैयारी करके बाहर निकले तो बहुत से जवान बाहर खड़े थे,आँखों मे खून उतरा हुआ,चेहरा सपाट।
तुम सब केवल सीमा तक बैकअप दोगे, केवल हम अंदर जायेंगे,वे चल पड़े।
सर्द हवाएं सांय सांय करती बह रही थी,परन्तू वे मानो साक्षात काल बने दुश्मन की सीमा में प्रवेश कर गये।

इधर लेफ्टिनेंट फ़र्श पर बुझी सिगरेट के अशख़्य टुकडो को रौंदता चहल कदमी कर रहा था कि कोई 8-9 घंटो बाद वे चारो वापस आये,
खून के छींटों से मुँह और कपडे सने हुये, चारो के हाथों में बालों से पकड़े हुये कोई 14-15 पाकिस्तानी सैनिकों के सिर।

लीजिये सर सुधाकर और हेमराज को हमारी श्रद्धांजलि।

लेफ्टिनेंट आगे बढ़ा और उन्हें सैल्यूट मारकर बाँहे फैला दी,
वे चारो उन नरमुंडों को फेंक उनसे लिपट गये और फुट फुट कर रोते रहे,चट्टान की तरह दिखने वाला लेफ्टिनेंट भी उन संग रोता रहा।

#मुकेश_शर्मा_अलजेड़ा
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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

स्त्री की चाहत क्या है।
एक ऐसा प्रश्न जिसका जवाब हर पुरुष को जानना ही चाहिए है ।

एक विद्वान को फांसी लगने वाली थी।

राजा ने कहा, आपकी जान बख्श दुंगा यदि सही उत्तर बता देगा तो

प्रशन : आखिर स्त्री चाहती क्या है ??

विद्वान ने कहा, मोहलत मिले तो पता कर के बता सकता हूँ।

राजा ने एक साल की मोहलत दे दी और साथ में बताया कि अगर उतर नही मिला तो फांसी पर चढा दिये जाओगे,

विद्वान बहुत घूमा बहुत लोगों से मिला पर कहीं से भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।

आखिर में किसी ने कहा दूर एक जंगल में एक भूतनी रहती है वही बता सकती है।

भूतनी ने कहा कि मै इस शर्त पर बताउंगी यदि तुम मुझसे शादी करो।

उसने सोचा, जान बचाने के लिए शादी की सहमति देदी।

शादी होने के बाद भूतनी ने कहा, चूंकि तुमने मेरी बात मान ली है, तो मैंने तुम्हें खुश करने के लिए फैसला किया है कि 12 घन्टे मै भूतनी और 12 घन्टे खूबसूरत परी बनके रहूंगी,
अब तुम ये बताओ कि दिन में भूतनी रहूँ या रात को?
उसने सोचा यदि वह दिन में भूतनी हुई तो दिन नहीं कटेगा, रात में हुई तो रात नहीं कटेगी।

अंत में उस विद्वान कैदी ने कहा, जब तुम्हारा दिल करे परी बन जाना, जब दिल करे भूतनी बनना।

ये बात सुनकर भूतनी ने प्रसन्न हो के कहा, चूंकि तुमने मुझे अपनी मर्ज़ी की करने की छूट देदी है, तो मै हमेशा ही परी बन के रहा करूँगी।

यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है।

स्त्री अपनी मर्जी का करना चाहती है।

यदि स्त्री को अपनी मर्ज़ी का करने देंगे तो,

वो परी बनी रहेगी वरना भूतनी
😃😃☹☹

फैसला आप का ,
ख़ुशी आपकी

सभी विवाहित पुरुषों को समर्पित। 🙏🙏🙏

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तुलसी जी को तोडने के नियम!!

  1. तुलसी जी को नाखूनों से कभी नहीं तोडना चाहिए,नाखूनों के तोडने से पाप लगता है।

2.सांयकाल के बाद तुलसी जी को स्पर्श भी नहीं करना चाहिए ।

  1. रविवार को तुलसी पत्र नहीं
    तोड़ने चाहिए ।
  2. जो स्त्री तुलसी जी की पूजा करती है। उनका सौभाग्य अखण्ड रहता है । उनके घर
    सत्पुत्र का जन्म होता है ।

  3. द्वादशी के दिन तुलसी को नहीं तोडना चाहिए ।

  4. सांयकाल के बाद तुलसी जी लीला करने जाती है।

  5. तुलसी जी वृक्ष नहीं है! साक्षात् राधा जी का अवतार है ।

  6. तुलसी के पत्तो को चबाना नहीं चाहिए।

“तुलसी वृक्ष ना जानिये।
गाय ना जानिये ढोर।।
गुरू मनुज ना जानिये।
ये तीनों नन्दकिशोर।।

अर्थात-

तुलसी को कभी पेड़ ना समझें
गाय को पशु समझने की गलती ना करें और गुरू को कोई साधारण मनुष्य समझने की भूल ना करें, क्योंकि ये तीनों ही साक्षात भगवान रूप हैं।

 !!     ॐ नमः भगवते वासुदेवाय नमः🚩⛳️    !!

🕉️ 🙏🏻🙏🏻🌹🌹🍁🍁🌹🌹🙏🏻🙏🏻

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक शिकारी जंगल मे शिकार करने गया। शेर ने एक थप्पड़ मारा और कहा देखते नहीं हो कि बोर्ड पर लिखा है,
“यहाँ शिकार करना मना है।”
शिकारी ने कहा सॉरी और बंदूक वापिस रख ली।
बंदूक रखते ही शेर ने शिकारी पर झपट्टा मारा। शिकारी बोला कि बोर्ड पर लिखा नही पढा?
शेर बोला कि मैं तो अनपढ़ हूँ और शिकारी को मार कर खा गया।
यही स्थिति दंगा करने वालों की है। जब खुद करते हैं तो ठीक जब दंगाइयों पर कानूनी एक्शन या दंगा पीड़ितों की प्रतिक्रिया होती है,,,,
तब कानून और मानवाधिकार याद आता है।
महाभारत युद्ध में कर्ण भी अर्जुन के सामने धर्म और कर्तत्व की बात करता है।
परन्तु भगवान श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि आज तुम संकट में हो तो तुम्हे धर्म याद आ रहा है।
ध्यान रखें।
कानून और मानवाधिकार का आतंकी और दंगाई से कोई सम्बन्ध नहीं है।
इसलिए जो भी आतंकी और दंगाई के मानवाधिकार की बात करे वह मानवता का सबसे बड़ा शत्रु है। याद रहें, हर वक्त,,,,

Posted in हास्यमेव जयते

😎जस्ट पूछिंग …
किसी को पता है,
गलतियों पर डालने वाला
पर्दा कहाँ मिलता है..?
और कपड़ा कितना लगेगा .??

जस्ट पूछिंग …
एक बात बताओ,
धोखा खाने के बाद
पानी पी सकते हैं क्या ?

जस्ट पूछिंग …
अगर किसी से चिकनी-चुपड़ी
बात करनी हो तो
कौन सा घी सही रहेगा ?
किसी को पता है ?

जस्ट पूछिंग …
पाप को हमेशा
घड़े में ही क्यूँ भरते हैं ?
ठंडा रहता है क्या ?

जस्ट पूछिंग …
ये दिल पर रखने वाला
पत्थर कहाँ मिलता है ?
और वो कितने किलो का होता है ?

जस्ट पूछिंग …
किसी के जख्मों पर
नमक छिड़कना है।
कौन सा सही रहेगा?
टाटा या पतंजलि का…?

जस्ट पूछिंग …
कोई मुझे बताएगा कि
जो लोग कहीं के नहीं रहते,
आखिर वो रहते कहां हैं ?

जस्ट पूछिंग …
सब लोग “इज्जत” की
रोटी कमाना चाहते हैं।
लेकिन कोई “इज्जत” की
सब्जी क्यों नहीं कमाता..?

जस्ट पूछिंग …
भाड़ में जाने के लिए
ऑटो ठीक रहेगा या टैक्सी ?

जस्ट पूछिंग …
एक बात पूछनी थी,
ये जो इज्ज़त का
सवाल होता है….
ये कितने नम्बर का होता है ?
जस्ट पूछिंग … 😉🤪😁😄😆😂

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

●————:◆ शुभ प्रभात मित्रांनो ◆:————●

● पंढरपुरमधील पांडुरंगाच्‍या मुर्तीवर आहे शिवलिंग
● जाणुन घ्‍या त्‍यामागील कथा ◆:— 🙏

।। पंढरपूरच्या श्री पाडुरंगाच्या मूर्तीच्या मस्तकावर
।। शिवलिंग आहे, असे सांगितले जाते. त्या प्रमाणे
।। त्या शिवलिंगाला गंध वगैरे लावून रोज पूजाही केली
।। जाते. त्या संबंधीची अशी कथा सांगितली जाते की
।। एकदा भगवान शंकर श्री विठ्ठलाच्या भेटीला आले
।। व ते विठ्ठलाच्या मूर्तीत विलीन झाले. श्री विठ्ठलाने
।। त्यांना आपल्या मस्तकावर स्थान दिले.

।। पांडुरंग हे नाव शंकराचेच आहे. कारण पांडुर म्हणजे
।। पांढराशुभ्र आणि अंग म्हणजे शरीर. ज्याचे अंग
।। पांढरेशुभ्र आहे असा देव कोण आहे तर भगवान
।। शंकर. श्री विठ्ठल हा तर कृष्ण असल्यामुळे काळा
।। आहे आणि शंकर करपूरगौरवम म्हणजे कापराप्रमाणे
।। गोरा आहे. पण सावळ्या विठ्ठलाने त्यास
।। मस्तकीधारण केल्याने त्यांचे नावही धारण केले पांडुरंग

।। समर्थ रामदास स्वामींनी म्हटले आहे विठोने वाहिला
।। शिरदेव राणा म्हणजे विठ्ठलाने शंकराला मस्तकावर
।। वाहिले आहे. प्रख्यात कवी अनंतरावजी आठवले
।। शंकराच्या स्तोत्रात म्हणतात.
।। विठ्ठले धरिले शिरी शिवलिंग ते मुक्कुटा करती
।। म्हणजे विठ्ठलाने मुक्कुटाच्या आकाराचे शिवलिंग
।। धारण केले आहे.

।। पुढे ते म्हणतात.
।। शोभतो जलदापरी ( ढगापरी ) हरि इंदिरावर सावळा
।। कुंद सुंदर गौर हा हर भेद ना परी राहिला
।। पांडुरंगच बोलती गुज भाविका कळले यदा
।। म्हणजेच विठ्ठल हा मेघाप्रमाणे सावळा आहे
।। व शंकर हा कुंद कळ्याप्रमाणे शुभ्र आहे.

।। पण दोघेही एकरूप झाल्यामुळे विठ्ठलालाच लोक
।। पांडुरंग म्हणतात शिव आणि विष्णू यांचे ऐक्य
।। झालेले एकमेव तीर्थक्षेत्र म्हणजे पंढरपूर आहे.
।। संत नरहरी सोनार हे कट्टर शिवभक्त होते.
।। ते श्री विठुरायाच्या दर्शनालाही जात नव्हते. पण
।। विठ्ठलाच्या करदोड्यासाठी माप घेण्यास येथील
।। मंदिरात गेले ते डोळे बांधून. हाताने श्री विठ्ठल
।। मूर्तीच्या कमरेचे माप घेऊ लागले तो शंकराची चिन्हे
।। त्यांच्या हाताला लागली. डोळे उघडले तर श्री
।। विठ्ठलाची मूर्ती त्यांना दिसली. त्यांचा भ्रम दूर झाला
।। आणि शिव व विठ्ठल हे एकच आहेत असा त्यांना
।। साक्षात्कार झाला.

।। ही घटना सुमारे ७०० वर्षांपूर्वी घडली. त्यामुळेच
।। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश आणि सध्याचे
।। तेलंगणा राज्यातून शिवभक्त तसेच लिंगायत पथाचे
।। धर्मगुरू श्री विठ्ठलाच्या दर्शनासाठी आवर्जून येथे
।। येतात. शिवरात्रीलाही पंढरपुरात सर्व वारकरी
।। उपवास करतात. पांडुरंगाला उपवासाच्या पदार्थांचा
।। नैवेद्य दाखवतात. पंढरपुरात शिव आणि विठ्ठल
।। यामध्ये भेद नाही, हेच या क्षेत्राचे वैशिष्ट्य आहे.
।। महाशिवरात्रीचा उपवास केल्यास १२ एकादशींचे
।। पुण्य लाभते अशीदेखील वारकऱ्यांची श्रध्दा आहे.
।। त्यावरून वारकरी सांप्रदायामध्ये देखील शिवरात्रीचे
।। महत्त्व किती आहे, हे समजते.

●———:◆🌺 राम कृष्ण हरी माऊली 🌺◆:———●

● शुक्रवार ◆:— { ०६ / ०३ / २०२० } ◆:————●

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ओ३म्
-रामजन्म रामनवमी 2 अप्रैल पर-

“राम का वनगमन से पूर्व अपने पिता दशरथ व माता से प्रशंसनीय संवाद”

राम को हमारे पौराणिक बन्धु ईश्वर मानकर उनकी मूर्तियों की पूजा अर्थात् उनको सिर नवाते हैं और यत्रतत्र समय-समय पर राम चरित मानस का पाठ भी आयोजित किया जाता है। वाल्मीकि रामायण ही राम के जीवन पर आद्य महाकाव्य एवं इतिहास होने सहित प्रामाणिक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में परवर्ती काल में अनेक लोगों ने कुछ प्रक्षेप भी किये हैं परन्तु इनका पता लगाया जा सकता है। कुछ विद्वानों ने यह कार्य किये भी हैं। उनके प्रयत्नों का परिणाम है कि हमें शुद्ध रामायण उपलब्ध होता है जिसमें से एक स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी का ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण है। आगामी रामनवमी पर्व, चैत्र शुक्ल नवमी तदनुसार 2 अप्रैल सन् 2020 को ध्यान में रखकर हम राम के राज्याभिषेक के निर्णय, उनके वनगमन तथा श्रीराम के अपने पिता दशरथ एवं माता कैकेयी के साथ संवाद का वर्णन कर रहे हैं। इसका वर्णन पढ़ व सुन कर हम स्वयं व अपनी भावी पीढ़ियों को सन्मार्ग दिखा सकते हैं और हमारी युवा पीढ़ी अपने देवता के समान माता-पिता को आदर सम्मान देकर उनकी पूजा वन्दना कर सके।

राम के राज्याभिषेक के निर्णय व वनगमन की कथा इस प्रकार है। महाराजा दशरथ ने राज्य पुरोहित वसिष्ठ को बुलाकर उन्हें कल अर्थात् अगले दिन होने वाले राम के राज्याभिषेक के विषय में राम को सूचित करने के लिये कहा। उन्होंने कहा कि हे तपोधन! आप राम के पास जाइए और उनसे कल्याण, यश और राज्य-प्राप्ति के लिये पत्नी सीता सहित उपवास कराइए। वेदज्ञों में श्रेष्ठ भगवान वसिष्ठ ‘‘बहुत अच्छा” कहकर स्वयं श्री राम के घर गये। महर्षि वसिष्ठ श्वेत बादलों के समान सफेद रंग वाले भवन में पहुंच कर श्री राम को हर्षित करते हुए बोले। हे राम! तुम्हारे पिता दशरथ तुम पर प्रसन्न हैं। वह कल तुम्हारा राज्याभिषेक करेंगे। अतः आज आप सीता सहित उपवास करें। यह कहकर मुनिवर वसिष्ठ ने श्रीराम एवं सीता जी से उस रात्रि को नियत व्रत वा उपवास कराया। इसके बाद राजगुरु वसिष्ठ राम द्वारा भलीप्रकार सम्मानित एवं सत्कृत होकर अपने निवास स्थान को चले गये। वसिष्ठ जी के जाने के बाद श्रीराम एवं विशालाक्षी सीता जी ने स्नान किया। उन्होंने शुद्ध मन से एकाग्रचित्त होकर परमपिता परमात्मा की उपासना की। जब एक प्रहर रात्रि शेष रही तो वह दोनो उठे और प्रातःकालीन सन्ध्योपासन कर, एकाग्रचित्त होकर गायत्री का जप करने लगे। इस समाचार को सुनकर सभी प्रजाजनों ने अयोध्या को सजाया। राजमार्गों को फुल-मालाओं से सुशोभित एवं इत्र आदि से सुगन्धित किया। भवनों एवं वृक्षों पर ध्वजा एवं पताकाएं फहराई गईं। सभी लोग राज्याभिषेक की प्रतीक्षा करने लगे।

इसी बीच कैकेयी को अपनी दासी मन्थरा से राम के राज्याभिषेक की जानकारी मिली और साथ ही महाराज दशरथ से वर मांगने तथा राम को 14 वर्ष के लिये वन भेजने तथा भरत को कौशल देश का राजा बनाने का परामर्श मिला। इस मंथरा-कैकेयी के इस षडयन्त्र ने राम को राजा बनाने की सारी योजना को धराशायी कर दिया। राज्याभिषेक के दिन राम प्रातः अपने पिता के दर्शन करने आते हैं। वहां पिता की जो दशा वह देखते हैं उसका वर्णन महर्षि वाल्मीकि जी ने करते हुए लिखा है कि राजभवन मेघ-समूह के समान जान पड़ता था। साथ के सब लोगों को अन्तिम डयोढ़ी पर छोड़ कर श्रीराम ने अन्तःपुर में प्रवेश किया। अन्तःपुर में जाकर श्रीराम ने देखा कि महाराज दशरथ कैकेयी के साथ सुन्दर आसन पर विराजमान हैं। वे दीन और दुःखी हैं तथा उनके मुख का रंग फीका पड़ गया है। श्रीराम ने जाते ही पहले अत्यन्त विनीत भाव से पिता के चरणों में शीश झुकाया, फिर बड़ी सावधानी से माता कैकेयी के चरणों का स्पर्श किया। श्री राम को देखकर महाराज दशरथ केवल ‘राम!’ ही कह सके। क्योंकि फिर महाराज के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। उनका कष्ठ बन्द हो गया। फिर वे न तो कुछ देख ही सके और न बोल ही सके। अपने पिताजी की ऐसी असम्भावित दशा देख और उनके शोक का कारण न जानकर श्रीराम ऐसे विक्षुब्ध हुए जैसे पूर्णमासी के दिन समुद्र क्षुब्ध होता है। सदा पिता के हित में लगे रहने वाले राम विचारने लगे कि क्या कारण है कि पिता इतनी प्रसन्नता के अवसर पर भी न तो मुझसे प्रसन्न हैं और न ही मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं।

राम पिता दशरथ तथा माता कैकेयी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि और दिन तो पिताजी क्रुद्ध होने पर भी मुझे देखते ही प्रसन्न हो जाया करते थे परन्तु आज मुझे देखकर उन्हें कष्ट क्यों हो रहा है? इस चिन्ता से श्रीराम का मुंह उतर गया। दीनों की भांति शोक-पीड़ित और द्युतिहीन श्रीराम कैकेयी को अभिवादन करके बोले। यदि अज्ञानवश मुझसे कोई अपराध हो गया हो जिससे पिताजी मुझसे अप्रसन्न हैं तो आप मुझे उस अपराध को बतायें और मेरी ओर से आप इनकी शंका का निवारण कर इन्हें प्रसन्न करें। महाराज का कहना न मानकर उनको असन्तुष्ट एवं कुपित कर मैं एक क्षण भी जीना नहीं चाहता। जब श्रीराम ने कैकेयी से उपर्युक्त वचन कहे तब कैकेयी ने यह धृष्टता एवं स्वार्थपूर्ण वचन कहे। कैकेयी ने कहा हे राम! न तो महाराज तुमसे अप्रसन्न हैं, न ही इनके शरीर में कोई रोग हैं। इनके शरीर में कोई बात है जिसे तुम्हारे भय से यह कहते नहीं। यदि तुम यह बात स्वीकार करो कि महाराज उचित या अनुचित जो कुछ कहें उसे करोगे तो मैं तुम्हें सब कुछ बतला दूं। कैकेयी के इन वचनों को सुनकर राम अत्यन्त दुःखी हुए। उन्होंने महाराज दशरथ के समीप बैठी हुई कैकेयी से कहा ‘अहो! धिक्कार है!! हे देवि! आपको ऐसा कहना उचित नहीं। महाराज की आज्ञा से मैं जलती चिता में कूद सकता हूं, हलाहल विष का पान कर सकता हूं और समुद्र में छलांग लगा सकता हूं। अपने गुरु, हितकारी, राजा और पिता के आदेश से ऐसा कौन-सा कार्य है जिसे मैं न कर सकूं? हे देवि महाराज दशरथ को जो भी अभीष्ट है वह तू मुझसे कह। मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं उनकी आज्ञा का पालन करूंगा। माता! सदा स्मरण रख राम दो प्रकार की बात नहीं कहता अर्थात् राम जो कहता है वही करता है।’

राम के इन शब्दों को सुनकर अनार्या कैकेयी सरल स्वभाव एवं सत्यवादी श्रीराम से ये कठोर वचन बोली। हे राम! पूर्वकाल में देवासुर-संग्राम में शत्रु के बाणों से पीड़ित और मेरे द्वारा रक्षित तुम्हारे पिता ने मेरी सेवाओं से प्रसन्न होकर मुझे दो वर दिये थे। हे राम! उन दो वरों में से मैंने एक से तो ‘भरत का राज्याभिषेक’ और दूसरे से ‘तुम्हारा आज ही दण्डकारण्य-गमन’ मांगा है। हे नरश्रेष्ठ! यदि तुम अपने पिता को और अपने आपको सत्यप्रतिज्ञ सिद्ध करना चाहते हो तो मैं जो कुछ कहूं उसे सुनो। ‘तुम पिता की आज्ञा के पालन में तत्पर रहो। जैसा कि उन्होंने प्रतिज्ञा की है–तुम्हें चौदह वर्ष के लिए वन में चले जाना चाहिए। हे राम! महाराज दशरथ ने तुम्हारे राज्याभिषेक के लिए जो सामग्री एकत्र कराई है उससे भरत का राज्याभिषेक हो। तुम इस अभिषेक को त्याग कर तथा जटा और मृगचर्म धारण कर चैदह वर्ष तक दण्डक वन में वास करो। भरत कौसलपुर में रह कर विभिन्न प्रकार के रत्नों से भरपूर तथा घोड़े, रथ और हाथियों सहित इस राज्य का शासन करे। यही कारण है कि महाराज करुणा से पूर्ण हैं, शोक से उनका मुख शुष्क हो रहा है और वे तुम्हारी ओर देख भी नहीं सकते। हे रघुनन्दन! तुम महाराज की इस प्रतिज्ञा को पूर्ण करो। राम! महान् सत्य के पालन द्वारा तुम महाराज का उद्धार करो।’ कैकेयी के इस प्रकार के कठोर वचन बोलने पर भी श्रीराम को कोई शोक नहीं हुआ परन्तु महाराज दशरथ जो पहले ही दुःखी थे, राम के संभावित वियोग के कारण होने वाले दुःख से अति व्याकुल हुए।

कैकेयी के इन कठोर वचनों पर राम की प्रतिक्रिया संसार के सभी लोगों मुख्यतः युवा पुत्रों को पढ़नी चाहिये। शत्रु-संहारक श्रीराम मृत्यु के समान पीड़ादायक कैकेयी के इन अप्रिय वचनों को सुनकर तनिक भी दुःखी नहीं हुए और उससे बोले ‘‘बहुत अच्छा” ऐसा ही होगा। महाराज की प्रतिज्ञा पूर्ण करने के लिए मैं जटा और वल्कल वस्त्र धारण कर अभी नगर को छोड़कर वन को जाऊंगा। राम ने कहा ‘मैं यह अवश्य जानना चाहता हूं कि अजेय तथा शत्रु-संहारक महाराज पूर्ववत् मुझसे बोलते क्यों नहीं? एक मानसिक दुःख मेरे हृदय को बुरी तरह से जला-सा रहा है कि महाराज ने भरत के अभिषेक के विषय में स्वयं मुझसे क्यों नहीं कहा। महाराज की तो बात ही क्या मैं तो तेरे कहने से ही प्रसन्नतापूर्वक भाई भरत के लिये राज्य ही नही अपितु सीता, अपने प्राण, इष्ट और धन सब कुछ वार सकता हूं।’ श्री राम के इन वचनों को सुन कैकेयी अति प्रसन्न हुई। राम के वनगमन के सम्बन्ध में विश्वस्त होकर वह श्रीराम को शीघ्रता करने के लिए प्रेरित करने लगी।

क्या आज के युग में कोई पुत्र राम के समान अपने माता-पिता का शुभचिन्तक, आज्ञाकारी तथा उनके के लिये अपने जीवन को सकट में डाल सकता है? हमें लगता है कि उपर्युक्त पंक्तियों में वर्णित राम के आदर्श को कोई पुत्र निभा नहीं सकता। इसी लिये रामायण संसार का आदर्श ग्रन्थ है। संसार के सभी स्त्री-पुरुषों व युवाओं को इसे नियमित पढ़ना चाहिये और इससे शिक्षा लेकर अपने परिवार व माता-पिता को सुख व शान्ति प्रदान करनी चाहिये। आगामी रामनवमी पर श्रीराम का जन्मदिवस है। हमें इस दिन इन पंक्तियों को पढ़कर और इन पर मनन कर श्री राम को अपनी श्रद्धांजलि देनी चाहिये और उनके जीवन का अनुकरण करने का व्रत लेना चाहिये। हमने इस लेख की सामग्री स्व. स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती जी की पुस्तक ‘वाल्मीकि रामायण’ से ली है उनका आभार एवं वन्दन करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य