Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

,#मलमल के कुर्ते पे छीट लाल*

ये गाना सुने तो ध्यान आया कि, मलमल जैसे शानदार कपड़े पर छीट वो भी लाल रंग की कैसे पड़ी ।

खोज शुरू त्रिभुवन सिंह सर की संगति का असर और इशारा हम धुस गये नंग्रेजों की गांव मे। अब पता लगा ये छीट खून के है। जो ईस्ट इंडिया कंपनी के नंग्रेजों ने मलमल के बुनकरों के अंगूठे काटे उसकी छीटें है।

मछलीपट्टनम (तेलुगु : మచిలీపట్నం / मचिलीपट्नं) आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा जिले का एक नगर है। यह कृष्णा जिले का मुख्यालय एवं नगरपालिका है। यह मचहलीपट्टनम मण्डल का मण्डल मुख्यालय भी है। यह नगर १४वीं शताब्दी में स्थापित हुआ था तथा १७वीं शताब्दी में ब्रिटिश, डच एवं फ्रांसीसी ब्यापारियों के लिये प्रमुख ब्यापारिक पत्तन था।
मसलिन या मलमल सरल बुनाई वाला सूती वस्त्र है। ‘मसलिन’ शब्द इसी ‘मसलीपट्नम’ नामक तत्कालीन उड़ीसा के भारतीय पत्तन से आया है।

कहते हैं कि ढाका का मलमल इतनी महीन होती थी मसलिन की साड़ी अंगूठी से निकल जाय किन्तु नंग्रेजों की दमनकारी व्यापारिक नीति के कारण यह अंगूठी से निकलने वाली साड़ी बनाने वाले अपना अंगूठा कटा बैठे और यह उद्योग नष्ट हो गया।
भारतीय मसलिन हाथ से निर्मित अत्यन्त कोमल सूत से हाथ से बुनी जाती थी। भारत का वह भाग जो आजकल बंगलादेश है, इसका मुख्य केन्द्र था। १७वीं और १८वीं शताब्दी में भारत से ही मसलिन पूरे यूरोप में निर्यात की जाती थी।इसी मछली पट्टनम మచిలీపట్నం मसुलीपत्तनम्
मसूल के नाम पर यूरोपियन मसलिन कहने लगे। रोमन साम्राज्य काल मे यह वस्त्र शासक वर्ग की पसंद था।

During the Roman period, muslin was the foremost export of Masulipatam, in present Andhra Pradesh, India. Bengali khadi muslin was so prized by well-dressed ladies of Rome that according to Roman legend, “an ounce of muslin used to sell in Rome for an ounce of gold”.

पर जैसे रोमन साम्राज्य को समुद्री डकैतों की नजर लगी वैसे ही हमारे मलमल पर भी इन डकैतों का कहर बरपा।

Under British rule, the British East India company could not compete with local muslin with their own export of cloth to the Indian subcontinent. The colonial government favored imports of British textiles. Colonial authorities attempted to suppress the local weaving culture. Muslin production greatly declined and the knowledge of weaving was nearly eradicated.

It is alleged that in some instances the weavers were rounded up and their thumbs chopped off,

जी हां बुनकरों के अंगूठे काट दिये गये। ये कटे अंगूठे
बीपी मण्डल को नहीं दिखे।एकलव्य का फर्जी अंगूठा उन्हे दिखा और पंडी जी का अत्याचार बां बां कर बताये लेकिन अपने बाप की करतूत को देखा तक नहीं।

a report from 1772. The Bengali muslin industry was suppressed by various colonial policies. As a result, the quality of muslin suffered and the finesse of the cloth was lost.

अब ये खबर कहां से लाये हम। ये पंडित जी की बटलोई मे नहीं पकाएं है। लीजिए मौलिक रिफ्ररेंसः

(1)william bolts(1772)
considerations on Indian affair,j almon page.194

(2)Michael Edwards (1976)
Growth of british cotton trade(1780-1815)
Augustus M kelley pubs p.37
isbn 0-678-06775-9

(3)J.P.Marshall(1988) India abd Indonesia during the ancient Regime
E.J.Brull p.90
isbn 978-90-04-0865-3

(4)T. John Samuel
many avtars:challangea, achievements and future (S1)
friesn press
isbn1-4602-2893-6

इन अध्ययेताओ का निष्कर्ष निकलता है कि

From 1782 to 1787 the industrial revolution began in Britain, and fine cotton was produced locally. During British colonial rule, the muslin industry declined due to various colonial policies, which supported imports of industrially manufactured textiles from Britain. A heavy duty of 75 percent was imposed on export of cotton from Bengal. These measures ultimately lead to the decline of muslin trade in Bengal.

In 1811, Bengal was still a major exporter of cotton cloth to the Americas and the Indian Ocean. However, Bengali exports declined over the course of the early 19th century, as British imports to Bengal increased, from 25% in 1811 to 93% in 1840.

अब इन डकैतों ने अंगूठे काट लिए। इम्पोर्ट बढ़ा दिया, एक्सपोर्ट पर 75%ड्यूटी लगा दी परिणाम मलमल उद्योग की बर्बाद और भारी जनशक्ति की बेकारी,। उद्योग के अभाव मे गरीबी की नंगा नाच शुरू। फिर दुनिया के सबसे कमीनी संस्कृति के अत्याचार ने बंगाल को1770 में अकाल के मुंह मे झोंक दिया। लाखों श्रम शक्ति बेरोजगारी, गरीबी के चलते अकाल और बीमारियों की मौत मर गई।यूरोप का पेट भरने के लूट मार कर एकत्र अनाज बन्दरगाहों पर सड़ता रहा। हमारे लोग मरते रहे।
इसका सीधा फायद मानचेस्टर के काटन मिलों का हुआ। मरने से बचे मलमल के बंगाली बुनकर मजदूर बन कर रह गये। इन्हीं नंग्रेजों ने बहुतों को गिरमिटिया मजदूर बना कर वेस्टइंडीज अफ्रीकाऔर दक्षिण अमेरिकी द्वीपीय देशों में भेज दिया। मानव तस्करी और व्यापार के अभ्यास्त इन हरामियों ने हमारे पूर्वजों को हमारी भूमि से दूर फेंक दिया। जो बचे वो लार्ड कार्नवालिस की जमीदारी व्यवस्थामे पिस गये. कुछ ईसाई बन गये कुछ गरीबी के चलते अंग्रेजों की गन्दगी साफ करते करते अछूत वन गये।
बेशर्म लाइसेंसी जमीदारों, नवाबों ने भी नंग्रेजों की दलाली की
:-
When Edward VII, the Prince of Wales in 1875, came to Bengal, Sir Abdul Gani – the first Nawab of Dhaka – ordered 30 yards of the most superior muslin as a gift for the Prince. It is said that one yard of that fabric weighted only 10 grams!

फिर आये पेरियार, फूले और बाबा साहब ।जिन्होंने इस शोषण को धर्म मे खोजा और दुकान सजा कर बैठ गये। यह धंधा तो खूब फला फूला लेकिन मलमल के वे शानदार बुनकर कभी नहीं फल फूल पाये। बस नंग्रेजों के राजनैतिक जमीदारों के शो रुम मे बिकने को बैठे हैं।
कॉपी की हुई पोस्ट

Posted in खान्ग्रेस

1963 के बाद कांग्रेस शासन में कुल 1200 मिग-21 लड़ाकू विमान खरीदे गए थे, 2013 तक उनमें से 840 विमान अर्थात 70% विमान दुर्घटनाग्रस्त (क्रैश) हुए
इन दुर्घटनाओं में भारतीय वायुसेना के 140 अमूल्य पायलेट शहीद हुए और 40 नागरिक मारे गए
ज्यादातर दुर्घटनाएँ विमानो में तकनीकी खराबी के कारण हुई

क्या भारत के किसी एक पत्रकार की भी हिम्मत हुई कि वह गांधी परिवार से उन 140 पायलेट के नुकसान और 840 विमानों के दुर्घटनाग्रस्त होने पर कोई सवाल पूछ सके ?

क्या कांग्रेस से किसी ने पूछा कि उन सस्ते व घटिया मिग-21 की खरीद व उसके बाद उनके घटिया स्पेयर पार्ट्स की खरीद का जिम्मेदार कौन है?

आज जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार विश्व के सबसे उन्नत #राफेल लड़ाकू विमान खरीद रहा है जिनके स्पेयर पार्ट्स यहां भारत मे ही बनेगें तो यही कांग्रेस व गांधी परिवार उसमे रोड़े अटका रहा है।🤔🤔🤔

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अतिविवादित NPR और NRC में जटिलता तो यही है :-

💃 फातिमा 12 साल की भरी जवानी
में अब्बूजान के यहां प्रेग्नेंट हो गई , अब्बूजान ने तभी जल्दी से पंक्चर
वाले अब्दुल से उसका निकाह करा
दिया , 4 बच्चे पैदा करके फिर कुछ
साल बाद अब्दुल ने गुस्से में आकर फातिमा को ट्रिपल तलाक दे दिया।

मस्जिद के चतुर मौलाना ने शरिया
का हवाला देकर फातिमा से हलाला
कर हवस का शिकार बनाया, प्रेंग्नेंट
कर के कुछ दिन बाद मौलाना ने
फातिमा को ट्रिपल तलाक़ दिया,
हलाला कर लौटी बेचारी फातिमा
को अब्दुल ने फिर शादी कर अपनी
बीवी बना दिया फिर 4 साल में 4
बच्चे पैदा किये।

उसके बाद दोबारा अब्दुल ने ट्रिपल
तलाक दे दिया, फिर परेशान फातिमा
ने पड़ोस के मुर्गीवाले रहमान से दूसरी शादी कर ली , और फिर उसने भी 3
बच्चे पैदा हो गए लेकिन अब मुर्गी
वाला रहमान मर गया , फातिमा
अब भंगार वाले फखरुद्दीन की
तीसरी बीवी बन कर रहती है ,
अब तक फातिमा के कुल मिला
कर 14 बच्चे है 😢😢

😱 तो आखिर फातिमा के बच्चे
किसे अपना अब्बू साबित करें,
किस बाप का आधार कार्ड दिखाये ?

🙆 फातिमा के 14 बच्चो के सामने
एक बड़ा सवाल आ गया कि NPR में किस बाप का नाम दर्ज करवाये,
अब्दुल का,
मौलाना का,
रेहमान का
या फिर फखरुद्दीन का ?????
इनके लिए यही सब से बड़ी
परेशानी है।

🤔 आप ही बताओ देशवासियों
कोई आसान कानून है क्या फातिमा
के बच्चों के लिए ….????

इसीलिए मौलाना, अब्दुल, फातिमा
अपने 12 बच्चों के साथ CAA, व
NPR के विरोध में धरना देने निकल
पड़ा है।

किसी भी तरीके से अपने शरिया कानून को मेंटेन करने के लिए, जिस में उन्हें 3 बीवियां रखने की छूट मिलती है

इनकी बढ़ती जनसंख्या और घुसपैठ
के कारण ये धीरे धीरे अपने पार्षद, विधायक, सांसद बना लेंगे और समय आने पर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, राष्ट्रपति
और फिर गजवा हिन्द का नारा देते हुए भारत को इस्लामिक स्टेट घोषित करवा लेंगे।

इनकी रोकथाम करने के लिए NPR-NRC के साथ साथ कॉमन
सिविल कोड और जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की भी आवश्यकत्ता है
जो केवल मोदी सरकार ही ला सकती
है, ये अब आपका बहुमूल्य वोट ही
तय कर सकता है –
कि किसकी सरकार बने।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक दिन स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण, एक दर्जी का बेटा, अपने पापा की दुकान पर चला गया। वहाँ जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पापा को काम करते हुए देखने लगा। उसने देखा कि उसके पापा कैंची से कपड़े को काटते हैं और कैंची को पैर के पास टांग से दबा कर रख देते हैं । फिर सुई से उसको सीते हैं और सीने के बाद सुई को अपनी टोपी पर लगा लेते हैं ।

जब उसने इसी क्रिया को चार-पाँच बार देखा तो उससे रहा नहीं गया, तो उसने अपने पापा से कहा कि वह एक बात उनसे पूछना चाहता है ? पापा ने कहा- बेटा बोलो क्या पूछना चाहते हो ? बेटा बोला- पापा मैं बड़ी देर से आपको देख रहा हूं , आप जब भी कपड़ा काटते हैं, उसके बाद कैंची को पैर के नीचे दबा देते हैं, और सुई से कपड़ा सीने के बाद, उसे टोपी पर लगा लेते हैं, ऐसा क्यों ? इसका जो उत्तर पापा ने दिया- उन दो पंक्तियाँ में मानों उसने ज़िन्दगी का सार समझा दिया ।

उत्तर था- ” बेटा, कैंची काटने का काम करती है, और सुई जोड़ने का काम करती है, और काटने वाले की जगह हमेशा नीची होती है परन्तु जोड़ने वाले की जगह हमेशा ऊपर होती है । यही कारण है कि मैं सुई को टोपी पर लगाता हूं और कैंची को पैर के नीचे रखता हूं ।”

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अपनों से अपनी बाते
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हंस जैन 98272 14427

दोस्तों,समय के साथ साथ अब अच्छे व्यक्तित्व , विचारों, कार्यो की अहमियत समाप्त होती जा रही हैं। अब इंसान की अहमियत और सम्मान

सिर्फ और सिर्फ पैसो से होता हैं ।अब ये धन की महत्ता को ज्यादा नही बताकर इस कथा से ही प्रेरणा लीजिये।

बहुत पुरानी बात है। किसी गांव में एक सेठ रहता था। उसका नाम था मुन्नालाल । वो जब भी गांव के बाजार से निकलता था तब लोग उसे दुआ-सलाम करते थे। वो उसके जवाब में मुस्कुरा कर अपना सिर हिला देता था और बहुत धीरे से बोलता था कि ‘घर जाकर बोल दूंगा’।

एक बार किसी परिचित व्यक्ति ने सेठ को यह बोलते हुए सुन लिया। तो उसने सेठ से पूछा सेठजी, आप ऐसा क्यों बोलते हो कि कि ‘घर जाकर बोल दूंगा’।

तब सेठ ने उस व्यक्ति को कहा, ‘में पहले धनवान नहीं था उस समय लोग मुझे ‘मुन्ना’ कहकर बुलाते थे और आज के समय में धनवान हूं तो लोग मुझे मुन्नालाल सेठ बुलाते है। ये इज्जत मुझे नहीं धन को दे रहे है।

इसलिए मैं रोज घर जाकर तिजोरी खोल कर लक्ष्मीजी (धन) को ये बता देता हूं कि आज तुम्‍हें कितने लोगों ने नमस्ते व सलाम किया। इससे मेरे मन अभिमान या गलतफहमी नहीं आती कि लोग मुझे मान या इज्जत दे रहे है। इज्जत सिर्फ पैसों की हैं। इंसान की नहीं।

हंस जैन 98272 14427 💥💥💥💢💥💥💥