Posted in लक्ष्मी प्राप्ति - Laxmi prapti

💐 जय श्री काल भैरवाय नम:💐
रामनगर जसवाडी रोड खंडवा

हंस जैन 98272 14427 आज का वास्तु ज्ञान

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सुबह मुख्य दरवाजे के बाहर से सफाई करके एक गिलास पानी छिड़क दें। इससे घर में धन की बरकत होती है।

अशोक का पेड़ लगाने और उसको सींचने से धन में वृद्धि होती है।
अशोक के पेड़ की जड़ का एक टुकड़ा पूजा घर में रखने और रोजाना उसकी पूजा करने से घर में धन की कमी नहीं रहती।

सूर्योदय के समय यदि घर की छत पर काले तिल बिखेर दें तो घर में सुख समृद्धि बनी रहती है।

पानी की बाल्टी में 2 चम्मच नमक डाल दें फिर पोंछा लगाएं। इससे नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।

यदि पति-पत्नी में झगड़ा होता रहता है, तो पूजा घर में मंगल यंत्र रखें। साथ ही रोज रसोई बनाने के पश्चात् चूल्हे को दूध से ठंडा करें। इससे संबंधों में मधुरता आती है।

सदा पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोएं। पूर्व की तरफ सिर करके सोने से विद्या की प्राप्ति होती है। दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से धन और आयु में वृद्धि होती है।

तुलसी के गमले में दूसरा कोई पौधा ना लगाएं। तुलसी हमेशा घर के पूर्व या उत्तर दिशा में लगाएं।

मकान के उत्तरी एवं पूर्वी भाग में खाली जगह अधिक हो। इससे व्यापार वृद्धि के साथ आर्थिक उन्नति में भी वृद्धि होती है।

तिजोरी के लॉकर में हमेशा दो बॉक्स रखें। एक में कुछ रूपए रख कर बंद कर दें और उसमें से रूपए ना निकालें। दूसरे बॉक्स में से काम के लिए रूपए निकालें।
घर में पड़ा टूटा-फूटा फर्नीचर, बर्तन, कांच, फटे हुए कपड़े और कतरनें पड़ी हों तो तुरंत घर से निकाल दें।

हंस जैन 98272 14427 🌺🌺⛔⛔🌺🌺

Posted in मंत्र और स्तोत्र


भगवान शिव
शिव शब्द ‘वश’ शब्द के, अक्षरो के क्रम को बदलने से बना है । ‘वश’ यानि प्रकाशित होना, अर्थात शिव वह है जो प्रकाशित है । शिव स्वयंसिद्ध व स्वयंप्रकाशी है । वे स्वयं प्रकाशित होकर सम्पूर्ण विश्व को भी प्रकाशित करतें है ।

शिव अर्थात मंगलमय एंव कल्याणकारी तत्व।
शिव अर्थात ईश्वर/ब्रह्म व परमशिव अर्थात परमेश्वर/ परब्रह्म ।

भगवान शिव के कुछे मुख्य नामो का आध्यात्मिक अर्थ:-
1. महादेव:- विश्व के सृजन एवम् व्यावहारिक विचारों मे मूल रूप से तीन कारण होते है –
परिपूर्ण पवित्रता
परिपूर्ण ज्ञान
परिपूर्ण साधना
ये तीनो गुण जिस देवता मे विद्यमान हैं, वे ही है देवो के देव ” महादेव” ।
2. भालचंद्र:- भाल अर्थात मस्तक पर जिनके चंद्रमा शोभायमान है, वे है भालचंद्र ।
3. शंकर:- ‘श’ करोति इति शंकरः । ‘श’ यानि कल्याण तथा करोति यानि करता है जो । शंकर वे है जो कल्याणकरते है ।
4. महाकालेश्वर:- समस्त विश्व तथा ब्रह्मांड के अधिष्ठाता यानि (क्षेत्रपाल देवता) को कालपुरूष यानि महाकाल कहते है । इन महाकाल के जो ईश्वर है उन्हें “महाकालेश्वर” कहतें हैं ।
5. कर्पूरगौरं:- जिनका रंग कर्पूर की भांति श्वेत है, ऐसे ईश्वर को कर्पूरगौरं के नाम से भी जाना जाता है
6. गंगाधर:- स्वर्ग मे विचरने वाली गंगा, भगीरथी ऋषि की कठोर तपस्या के द्वारा पृथ्वी पर अवतरित हुई, उस समय गंगा के प्रचंड वेग को कोई सह नही सकता था । ऐसी गंगा को भगवान शंकर ने अपनी छटा भेज धारण किया इसलिए उन्हें गंगाधर कहते हैं
7. पिंगलाक्ष:-
पिंगल + अक्ष = पिंगलाक्ष ।
पिंगल नामक पक्षी मे भूतकाल, वर्तमान तथा भविष्य काल को जानने की क्षमता होती हैं । इसी प्रकार शिवजी सर्वज्ञानी हैं । इसलिए उन्हें पिंगलाक्ष नाम से भी संबोधित किया जाता है ।
( पिंगल, अर्थात उल्लू प्रजाति का ही एक पक्षी होता है )
8. अघोर:- ‘अ’ + घोर = अघोर अर्थात जिसे किसी भी प्रकार की चिंता न हो ।
शिव का वास होता है शमशान में तथा भूतो के सान्निध्य में, वे गले मे सर्प धारण करते है तथा विष का पान करते है, और ऐसे मे भी वह समस्त चिंताओं से परे रहते है । (शमशान,भूतो, सर्प तथा विष के सान्निध्य मे रहने पर भी चिंता मुक्त रहने वाला)
9. भोलानाथ:- बहुत ही सहज भाव से अंहकार रहित अवस्था में विचरने वाले जीव को भोला की संज्ञा दी गई हैं ।
10.आदिनाथ शिव:- सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें ‘आदिदेव’ भी कहा जाता है। ‘आदि’ का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम ‘आदिश’ भी है।
भगवान शिव के विषय मे महत्वपूर्ण जानकारियां:-
शिवलिंग:-
वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।
भगवान शिव के माता-पिता:-
भगवान शिव का कोई माता-पिता नही है । उन्हें अनादि माना गया है, अर्थात जो अनन्त काल से था, जिसके जन्म की कोई तिथि नही ।
भगवान शिव की बहन:-
शंकर भगवान की एक बहन थी अमावरी । जिन्हे माता पार्वती की जिद्द पर खुद महादेव ने अपनी माया से बनाया था ।
भगवान शिव के पुत्र:-
भगवान शिव और माता पार्वती का अपना केवल एक ही पुत्र था। जिसका नाम कार्तिकेय है ।
शिव और माता पार्वती के अन्य विख्यात पांच पुत्रों का जन्म अन्य प्रकार से हुआ, परंतु यह सब कहलाये शिव-पार्वती के पुत्र ही जाते हैं, जोकि इस प्रकार से है।गणेश भगवान को मां पार्वती ने अपने उबटन (शरीर पर लगे लेप) से बनाया था।सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म के विषय मे रोचक कथाएं प्रचलित है।
शिव के गण:-
शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं।इसके अलावा,पिशाच,दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है।इनमे से नंदी ही शिव के मुख्य गण है, जो कि भगवान शंकर के वाहन और उसके सभी गणों में सबसे ऊपर भी है । (नंदी दरअसल शिलाद ऋषि के घर वरदान में पुत्र रूप मे जन्मे थे, जोकि बाद में कठोर तप के कारण नंदी बने । नंदी ने ही ‘कामशास्त्र’ की रचना की थी। ‘कामशास्त्र’ के आधार पर ही ‘कामसूत्र’ लिखा गया।)
शिव का नाग:-
शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।
शिव की पत्नी:-
शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।
भगवान शिव का निवास:-
ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।
शिव के अस्त्र-शस्त्र:- पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, पाशुपतास्त्र भगवान शिव के अस्त्र है तथा शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी अस्त्र-शस्त्र के निर्माता भी स्वयं भगवान शिव ही है ।
शिव के शिष्य:-
शिव के सात शिष्य हैं, जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी।
शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा आठवें गौरशिरस मुनि भी थे।
शिव पंचायत:-
भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।
शिव के द्वारपाल:-
नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।
शिव पार्षद:-
जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।
शिव चिह्न:-
शिवलिंग ही मुख्य रूप से भगवान शिव का चिन्ह है, विश्व भर मे हिन्दू धर्मावलंबी शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।इसके अतिरिक्त शालिग्राम,पत्‍थर के ढेले,बटिया को भी शिव का चिह्न माना जाता है।इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है।इसी प्रकार से डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न हैं ।__________
आगामी व्रत तथा त्यौहार:- 19 फर०-विजया एकादशी।20 फर०-प्रदोष व्रत।21 फर०- महाशिवरात्रि।23 फर०-फाल्गुन अमावस्या।6 मार्च- आमलकी एकादशी।7 मार्च- प्रदोष व्रत।9 मार्च- होलिका दहन/फाल्गुन पूर्णिमा व्रत।10 मार्च- होली।12 मार्च-संकष्टी चतुर्थी।14 मार्च-मीन संक्रांति।19 मार्च-पापमोचिनी एकादशी।21 मार्च-प्रदोष व्रत।22 मार्च-मासिक शिवरात्रि।24 मार्च-चैत्र अमावस्या।25 मार्च- चैत्र नवरात्रि घट स्थापना।