Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

પુસ્તકોનું દાન.________________________________________

માણસ આંખ નું દાન કરે, ધન નું દાન કરે. આંખ નું દાન લઇ ભગવાન ના દર્શન કરવાને બદલે ગન્દી ફિલ્મો જુએ. ધન નું દાન લઇ ખરાબ કામ કરે. જો વિચારો ની ઉપલબ્ધી જ ના હોય તો આમ જ થવાનું. વિચારો ની ઉપલબ્ધી ના અલગ અલગ માર્ગ છે. તેમનું એક એટલે સારા પુસ્તકો.

આજે તમે પુસ્તકો ના શોખીન છો, પણ તમારો છોકરો પુસ્તકો વાંચવાનો જ નથી તે તમારા ગયા પછી બધા પુસ્તકો રદ્દી માં નાખી દેશે. આટલા બધા પુસ્તકો વ્યય થઇ જાય તે પહેલા તમે પુસ્તકો દાન આપી શકો છો. હિંદુ શાસ્ત્ર માં શાસ્ત્રોક્ત વાત કહી છે, જે વસ્તુ તમે આ જન્મ માં દાન આપો છો તે તમને આવતા જન્મ માં મળે છે.

તેથી જ રૂક્ષ્મણી એ ક્રષ્ણ નું દાન દીધું કે આવતા જન્મ માં તેને ક્રષ્ણ જ મળે.

તમારા જુના મેગેઝીન, પુસ્તકો નું કિલોના ભાવે સુ મળશે? પણ એજ કોઈ તમારા પુસ્તકો વાંચશે તો તમને સુભાષીસ જરૂર મળશે. એક સત્કાર્ય તમારા હાથે થશે.

આજે સંસ્કૃતી ઇબૂક્સ તમારી પાસે પુસ્તકોનું દાન માંગે છે. તમારા પુસ્તકો નીચેના સ્થળે મોકલી શકો છો.

11-A, Hemsmurti Bldg, Girivihar Socy. Mulund Mumbai 400080 India.
harshad30@hotmail.com
Mob: 973-66331781

સાહિત્ય રસિક લોકો મારી સાથે watsup ગ્રુપ માં જોડાઈ સકે છે.
તમે આપેલા પુસ્તકો કોમ્પુટર માં PDF માં રૂપાંતરિત કરી ebooks રૂપે તમને પાછા મળશે. આ ઉપરાંત તમારા પુસ્તકોની સાથે બીજા અનેક ગણા ebooks પણ ઉપહાર રૂપે મળશે.


आदमी आंख दान करता है, धन दान करता है। वह भगवान को नाचने के बजाय गंदी फिल्में देखता है। धन का दान
लेने से बुरा काम होता है यदि विचार उपलब्ध नहीं हैं तो यही होगा। विचार प्रदान करने के विभिन्न तरीके हैं। उनमें से एक अच्छी किताबें हैं।

आज आप किताबों के शौकीन हैं, लेकिन आपका लड़का न केवल किताबें पढ़ने जा रहा है, आपके जाने के बाद वह सारी किताबें हटा देगा।

इतनी सारी किताबें बर्बाद होने से पहले आप किताबें दान कर सकते हैं। हिंदू शास्त्र में, शास्त्र कहता है, इस जन्म के लिए आप जो चीज दान
करते हैं वह आपको आने वाले जन्म में मिलती है।
इसीलिए रुक्मिणी ने अगले जन्म में कृष्ण को दान दिया।

आपकी पुरानी पत्रिकाएं, किताबें एक किलो में बेची जाएंगी? लेकिन अगर कोई आपकी किताबें पढ़ता है, तो आपको सुभासिस मिलेगा। एक रिसेप्शन आपके हाथों में होगा।

आज, संस्कृत ई-बुक्स आपके लिए पुस्तकों का दान चाहता है। आप अपनी किताबें निम्नलिखित स्थान पर भेज सकते हैं।

11-A, Hemsmurti Bldg, Girivihar Socy. Mulund Mumbai 400080 India.
harshad30@hotmail.com
Mob: 973-66331781

साहित्य के इच्छुक लोग मुझसे वाट्सअप ग्रुप में जुड़ सकते हैं।
आप अपने कंप्यूटर में पीडीएफ में परिवर्तित ई-बुक्स के रूप में लौटी पुस्तकें प्राप्त करेंगे। आपकी पुस्तकों के अलावा, कई अन्य ई-पुस्तकें उपहार के रूप में उपलब्ध होंगी।


Man donates eye, donate money. Instead of dancing to God, he watches filthy films. Taking a donation

of money does a bad job. If ideas are not available then this is what will happen. There are different
ways of providing ideas. One of them is good books.
Today you are fond of books, but your boy is not only going to read books, he will delete all books

after you leave. You can donate books before so many books are wasted. In Hindu scripture,
the scripture says, the thing you donate to this birth is what you get in the coming birth.
That is why Rukmini donated Krishna to Krishna in the next life.

Your old magazines, books will be sold at a kilo? But if someone reads your books, then you
will get blassing. A reception will be in your hands.

Today, Sanskrit eBooks wants the donation of books for you. You can send your books to the following place.

11-A, Hemsmurti Bldg, Girivihar Socy. Mulund Mumbai 400080 India.
harshad30@hotmail.com
Mob: 973-66331781

Literary interested people can join me in the watsup group.
You will receive returned books in the form of ebooks converted to PDF in your computer. In addition to your books, many other ebooks will be available as gifts.

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🙏 भक्त के अधीन भगवान

एक कसाई था सदना। वह बहुत ईमानदार था, वो भगवान के नाम कीर्तन में मस्त रहता था। यहां तक की मांस को काटते-बेचते हुए भी वह भगवद्नाम गुनगुनाता रहता था।

एक दिन वह अपनी ही धुन में कहीं जा रहा था, कि उसके पैर से कोई पत्थर टकराया। वह रूक गया, उसने देखा एक काले रंग के गोल पत्थर से उसका पैर टकरा गया है। उसने वह पत्थर उठा लिया व जेब में रख लिया, यह सोच कर कि यह माँस तोलने के काम आयेगा।

वापिस आकर उसने वह पत्थर माँस के वजन को तोलने के काम में लगाया। कुछ ही दिनों में उसने समझ लिया कि यह पत्थर कोई साधारण नहीं है। जितना वजन उसको तोलना होता, पत्थर उतने वजन का ही हो जाता है।

धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी कि सदना कसाई के पास वजन करने वाला पत्थर है, वह जितना चाहता है, पत्थर उतना ही तोल देता है। किसी को एक किलो मांस देना होता तो तराजू में उस पत्थर को एक तरफ डालने पर, दूसरी ओर एक किलो का मांस ही तुलता। अगर किसी को दो किलो चाहिए हो तो वह पत्थर दो किलो के भार जितना भारी हो जाता।

इस चमत्कार के कारण उसके यहां लोगों की भीड़ जुटने लगी। भीड़ जुटने के साथ ही सदना की दुकान की बिक्री बढ़ गई।

बात एक शुद्ध ब्राह्मण तक भी पहुंची। हालांकि वह ऐसी अशुद्ध जगह पर नहीं जाना चाहता थे, जहां मांस कटता हो व बिकता हो। किन्तु चमत्कारिक पत्थर को देखने की उत्सुकता उसे सदना की दुकान तक खींच लाई ।

दूर से खड़ा वह सदना कसाई को मीट तोलते देखने लगा। उसने देखा कि कैसे वह पत्थर हर प्रकार के वजन को बराबर तोल रहा था। ध्यान से देखने पर उसके शरीर के रोंए खड़े हो गए। भीड़ के छटने के बाद ब्राह्मण सदना कसाई के पास गया।

ब्राह्मण को अपनी दुकान में आया देखकर सदना कसाई प्रसन्न भी हुआ और आश्चर्यचकित भी। बड़ी नम्रता से सदना ने ब्राह्मण को बैठने के लिए स्थान दिया और पूछा कि वह उनकी क्या सेवा कर सकता है!

ब्राह्मण बोला- “तुम्हारे इस चमत्कारिक पत्थर को देखने के लिए ही मैं तुम्हारी दुकान पर आया हूँ, या युँ कहें कि ये चमत्कारी पत्थर ही मुझे खींच कर तुम्हारी दुकान पर ले आया है।”

बातों ही बातों में उन्होंने सदना कसाई को बताया कि जिसे पत्थर समझ कर वो माँस तोल रहा है, वास्तव में वो शालीग्राम जी हैं, जोकि भगवान का स्वरूप होता है। शालीग्राम जी को इस तरह गले-कटे मांस के बीच में रखना व उनसे मांस तोलना बहुत बड़ा पाप है।

सदना बड़ी ही सरल प्रकृति का भक्त था। ब्राह्मण की बात सुनकर उसे लगा कि अनजाने में मैं तो बहुत पाप कर रहा हूं। अनुनय-विनय करके सदना ने वह शालिग्राम उन ब्राह्मण को दे दिया और कहा कि “आप तो ब्राह्मण हैं, अत: आप ही इनकी सेवा-परिचर्या करके इन्हें प्रसन्न करें। मेरे योग्य कुछ सेवा हो तो मुझे अवश्य बताएं।“

ब्राह्मण उस शालीग्राम शिला को बहुत सम्मान से घर ले आए। घर आकर उन्होंने श्रीशालीग्राम को स्नान करवाया, पँचामृत से अभिषेक किया व पूजा-अर्चना आरम्भ कर दी।

कुछ दिन ही बीते थे कि उन ब्राह्मण के स्वप्न में श्री शालीग्राम जी आए व कहा- हे ब्राह्मण! मैं तुम्हारी सेवाओं से प्रसन्न हूं, किन्तु तुम मुझे उसी कसाई के पास छोड़ आओ।

स्वप्न में ही ब्राह्मण ने कारण पूछा तो उत्तर मिला कि- तुम मेरी अर्चना-पूजा करते हो, मुझे अच्छा लगता है, परन्तु जो भक्त मेरे नाम का गुणगान – कीर्तन करते रहते हैं, उनको मैं अपने-आप को भी बेच देता हूँ। सदना तुम्हारी तरह मेरा अर्चन नहीं करता है परन्तु वह हर समय मेरा नाम गुनगुनाता रहता है जोकि मुझे अच्छा लगता है, इसलिए तो मैं उसके पास गया था।

ब्राह्मण अगले दिन ही, सदना कसाई के पास गया व उनको प्रणाम करके, सारी बात बताई व श्रीशालीग्रामजी को उन्हें सौंप दिया। ब्राह्मण की बात सुनकर सदना कसाई की आंखों में आँसू आ गए। मन ही मन उन्होंने माँस बेचने-खरीदने के कार्य को तिलांजली देने की सोची और निश्चय किया कि यदि मेरे ठाकुर को कीर्तन पसन्द है, तो मैं अधिक से अधिक समय नाम-कीर्तन ही करूंगा l

इस संदेश को सिर्फ पड़कर भूल मत जाइएगा , हो सके तो मेरी तरह आप भी शेयर कर अपना जीवन धन्य कीजियेगा। धन्यवाद 🙏 एक भक्त का आग्रह

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🙏🏻 पड़ने में 10 मिनट तो लग सकते है, किन्तु मन प्रसन्न हो जाएगा 🙏🏻

भगवान पर भरोसा :

एक पुरानी सी इमारत में था वैद्यजी का मकान था। पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था। उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी। वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ। वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो।

एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं पर नियंत्रण पा लिया। आटे-दाल-चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, “बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।” कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, ” यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।

एक-दो रोगी आए थे। उन्हें वैद्यजी दवाई दे रहे थे। इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी। वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे। दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए। वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए। वैद्यजी ने कहा कि अगर आपको अपने लिए दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन करें।

वह साहब कहने लगे “वैद्यजी! आपने मुझे पहचाना नहीं। मेरा नाम कृष्णलाल है लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं? क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ। आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी। जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था अपितु ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था। हुआ इस तरह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था। बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया। आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ। अंधा क्या चाहे दो आँखें और कुर्सी पर आकर बैठ गया। ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी।

एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, ” चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है। आप उससे कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं। मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे। मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें। मैंने कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ। इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ। यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।”

आपने कहा था, “मेरे भाई! भगवान से निराश न होओ। याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है। यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में होता है। जो कुछ होना होता है वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है। मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे। सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था।

मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था। लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था, बस ठीक है। मैंने जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है। मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई। इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें दे दी है। अधिक पैसे वे नहीं ले सकते।

मैं कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में लज्जित भी कि मेरे विचार कितने निम्न थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है। मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी। आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं। हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं। इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता। इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है।

वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है। केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ भारत में रहती है। हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है। न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था तो मेरी आँखों के सामने आपकी वह छोटी-सी बेटी भी आ जाती थी और हर सामान मैं दोहरा खरीद लेता था। मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिख रहा है वह भी मेरी भान्जी ही है। मुझे लगता था कि ईश्वर ने इस भान्जी के विवाह में भी मुझे भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है।

वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, ” कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है। आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।” और वैद्यजी ने चिट्ठी खोलकर कृष्णलाल जी को पकड़ा दी। वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ”दहेज का सामान” के सामने लिखा हुआ था ” यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।”

काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, “कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो। आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता परमात्मा ने। वाह भगवान वाह! तू महान है तू दयावान है। मैं हैरान हूँ कि वह कैसे अपने रंग दिखाता है।”

वैद्यजी ने आगे कहा,सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो।

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Posted in कविता - Kavita - કવિતા

“हर उस बेटे को समर्पित जो घर से दूर है”

बेटे भी घर छोड़ जाते हैं
जो तकिये के बिना कहीं…भी सोने से कतराते थे…
आकर कोई देखे तो वो…कहीं भी अब सो जाते हैं…
खाने में सो नखरे वाले..अब कुछ भी खा लेते हैं…
अपने रूम में किसी को…भी नहीं आने देने वाले…
अब एक बिस्तर पर सबके…साथ एडजस्ट हो जाते हैं…
बेटे भी घर छोड़ जाते हैं.!!
घर को मिस करते हैं लेकिन…कहते हैं ‘बिल्कुल ठीक हूँ’…
सौ-सौ ख्वाहिश रखने वाले…अब कहते हैं ‘कुछ नहीं चाहिए’…
पैसे कमाने की जरूरत में…वो घर से अजनबी बन जाते हैं
लड़के भी घर छोड़ जाते हैं।
बना बनाया खाने वाले अब वो खाना खुद बनाते है,
माँ-बहन-बीवी का बनाया अब वो कहाँ खा पाते है।
कभी थके-हारे भूखे भी सो जाते हैं।
लड़के भी घर छोड़ जाते है।
मोहल्ले की गलियां, जाने-पहचाने रास्ते,
जहाँ दौड़ा करते थे अपनों के वास्ते,,,
माँ बाप यार दोस्त सब पीछे छूट जाते हैं
तन्हाई में करके याद, लड़के भी आँसू बहाते है
लड़के भी घर छोड़ जाते हैं
नई नवेली दुल्हन, जान से प्यारे बहिन- भाई,
छोटे-छोटे बच्चे, चाचा-चाची, ताऊ-ताई ,
सब छुड़ा देती है साहब, ये रोटी और कमाई।
मत पूछो इनका दर्द वो कैसे छुपाते हैं,
बेटियाँ ही नही साहब, बेटे घर छोड़ जाते हैं

massom__neeraj

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अरविंद केजरीवाल आणि कंपनी

भारताचे सार्वभौमत्व संपवण्यासाठी राजकारणात प्लांट केलेली माणसे

© समीर गोरे

अरविंद केजरीवाल काल तिसऱ्यांदा दिल्लीचे मुख्यमंत्री झाले. आज भारतात या माणसाला ओळखत नाही असा कोणीही नसेल. पण मला आपल्याला 2006 या काळात घेऊन जायचे आहे.
आपल्यापैकी किती जणांनी अरविंद केजरीवाल हे नाव 2006 साली ऐकलं होतं ? कोणीच नसेल, मलातरी अजिबात माहीत नव्हते. पण या माणसाला 2006 साली रोमन मॅगसेसे अवॉर्ड मिळाला होता. आपण म्हणाला कित्येक समाजसेवक आपल्याला माहीत पण नसतात पण अवॉर्ड मिळाल्यावर समजतात. पण हा रोमन मॅगसेसे अवॉर्ड या केजरीवाल ला कशासाठी मिळाला जे जेव्हा तुम्हाला समजेल तेंव्हा तुमच्या पायाखालची जमीन पहिल्यांदा सरकेल.

या केजरीवाल ला अवॉर्ड Emerging Leadership in india या साठी मिळाला होता. लागला का पहिला शॉक ? ज्या माणसाला आपण ओळखत पण नाही त्याला लिडरशीप साठी आशिया चे नोबेल समजले जाणारे अवॉर्ड कसे मिळाले ? इथूनच या कहाणीची सुरवात आहे.
सर्वप्रथम हा रोमन मॅगसेसे अवॉर्ड काय आहे? तो कोणाला दिला जातो ? यात अमेरिकन गुप्तचर यंत्रणा सीआयए चा संबंध काय हे तुम्हाला खालच्या लिंकमध्ये समजेल.

Ramon Magsaysay Award: Established by two CIA linked American organisations in memory of a CIA groomed Philippines president

त्यातला एक परिच्छेद खालील प्रमाणे

President Magsaysay died in a plane crash in 1957, and the Ramon Magsaysay Award was established in his memory. It may be noted that the award was constituted by New York-based Rockefeller Brothers Fund. In 2000, Ramon Magsaysay Emergent Leadership Award was established by Ford Foundation, another American organisation. Both these organisations are known for working for American interests in foreign countries, and have a history of closely working with the CIA. In fact, the Ford Foundation is alleged to be a philanthropic facade of the Central Intelligence Agency.

आता आपण परत येऊ या केजरीवाल वर. केजरीवाल आणि सिसोदिया यांची कबीर नावाची एक एनजीओ होती ज्याला याच फोर्ड फाउंडेशन ने प्रचंड पैसा पुरवला. अशाच अनेक एनजीओ चे त्यावेळचे मालक आठवा, काही नावं मी सांगतो ज्यांना ह्या फोर्ड फाउंडेशन ने पैसे दिले. तिस्ता सेटलवाड, योगेंद्र यादव, मीरा सान्याल, मल्लिका साराभाई, अमर्त्य सेन, मेधा पाटकर, या सगळ्यांना फोर्ड फाउंडेशन ने लाखो करोडो डॉलर्सची मदत केली आहे आणि काहींना मॅगसेसे अवॉर्ड पण मिळाले आहेत. या बद्दलची एक लिंक खाली देत आहे ती पण नक्की बघा

https://m.facebook.com/notes/surajit-dasgupta/the-cia-ford-ngo-congress-nac-aap-nexus/10152395314509630/

आता 2006 ला अमेरिकेला भारत अशांत करण्यात काय फायदा होता तर तेव्हा भारत परत एकदा द्विपक्षीय राजनीतिकडे चालला होता. भाजप हरली तरी काँग्रेस जिंकली होती आणि सत्तेचा खेळ या दोन राष्ट्रीय पक्षात खेळला जाऊ लागला होता. दोन्ही पक्षांच्या इकॉनॉमिक पोलिसीज जवळपास सारख्याच होत्या आणि त्यामुळे भारत झपाट्याने विकसित होऊ लागला होता. त्या काळात 10℅ जीडीपी ग्रोथ आपल्या आवाक्यात आली होती. भारत पाकिस्तान संबंध चांगले होऊ लागले होते. त्यामुळेच अमेरिकेच्या पोटात दुखणे सहाजिकच होते. म्हणूनच ही वर दिलेली फौज पैसे देऊन बनवली गेली आणि त्या फौजेचा म्होरक्या बनवला अण्णा हजारे

आता येऊ अण्णा आंदोलन वर. अण्णा हजारे असाच एक एनजीओ वाला. ज्याला महाराष्ट्रा बाहेर कोणी ओळखत नव्हते तो उपोषणाला काय बसतो, स्टेज वर हे सगळे फोर्ड फाउंडेशन चे पोसलेले कावळे अवतरतात, मीडिया ला अमाप पैसा वाटला जातो आणि 28 न्यूज चॅनल त्या अण्णा आंदोलनाचे लाईव्ह प्रक्षेपण 15 दिवस करतात. कोणाच्याच मनात शंकेची पाल कशी चुकचुकली नाही ? अण्णा देशाचा नेता बनलाच कसा ज्याला त्याच्या महाराष्ट्रात कोणी विचारत नव्हते. केजरीवाल, सिसोदिया, किरण बेदी, प्रशांत भूषण आणि त्याचा बाप डायरेक्ट स्टेजवर पोचलेच कसे ? केंद्र सरकारने यांना लोकपाल कायदा बनवताना बोलावलेच कसे ? असे अनेक अनुत्तरित प्रष्ण आहेत. पण या सर्व प्रकारामुळे केंद्रातील तेव्हाचे सरकार अस्थिर झाले आणि करप्शन प्रचंड वाढले.
या अण्णा आंदोलन वाल्यांनी परदेशातून आणि इथे आंदोलनाला जमणाऱ्या लोकांच्या कडून जे पैसे जमा केले होते त्या पैशावरून अण्णा आणि केजरीवाल यांच्यात भांडणे झाली. पैसे अण्णांच्या नावावर जमा केले होते म्हणून अण्णांनी 125 कोटी केजरीवाल कडे मागितले आणि ह्या मिटिंगचे किरण बेदीच्या घरी व्हिडीओ रेकॉर्डिंग (स्टिंग ऑपरेशन) करून अण्णांना ब्लॅकमेल केले गेले. याची लिंक

https://dai.ly/x55vwwi

आता अण्णांचा पत्ता कट होता. अ टिपिकल युझ अँड थ्रो केस. आजची अण्णांची परिस्थिती काय आहे ? त्यांनी कितीही घासले तरी ते पुन्हा आंदोलन करू शकत नाहीत, त्यांना जनता आणि मीडिया कोणीही किंमत देत नाहीत.

अरविंद चे सहकारी प्रशांत भूषण याचे काश्मीर बद्दल विधान आठवा, आठवत नसेल तर ही लिंक बघा

काश्मीर बद्दल कोणत्याही काँग्रेसी ने पण असे विधान केलेले नाही. अफझल गुरू ला फाशी पासून वाचवायला रात्री सुप्रीम कोर्ट उघडायला लावणारा पण हाच भूषण आहे.
आता या आपला येणारा जो पैसा आहे त्याचा मेजर स्रोत हा खलिस्तान चळवळी च्या लोकांच्या कडून आहे. याबद्दल आलेली बातमी

https://www.financialexpress.com/india-news/bjp-congress-attack-arvind-kejriwal-after-sting-operation-claims-pro-khalistan-front-funded-aap-during-punjab-elections/1338269/

यावर झालेले स्टिंग ऑपरेशन

https://www.republicworld.com/india-news/general-news/watch-after-stung-khalistan-terror-support-group-talks-about-aap-funding-manish-sisodia-abuses-republic-tv-on-being-asked-a-question.html

आणि सर्वात महत्वाचे की अरविंद केजरीवाल आणि मनीष सिसोदिया जेव्हा परदेशात फंड गोळा करायला गेलेत तेव्हा ते खलिस्तान चळवळीच्या लोकांच्या घरात राहिले आहेत.
ही त्याची लिंक

https://www.indiatoday.in/assembly-elections-2017/punjab-assembly-election-2017/story/punjab-polls-arvind-kejriwal-khalistani-terrorist-house-957933-2017-01-30

या खलिस्तानी आणि मिशनरी च्या पाठिंब्यावर आप पंजाब आणि गोव्यात पसरली. आता आपण म्हणाल मिशनरी यात कुठून आले. तर फोर्ड फाउंडेशन पासून ते मॅगसेसे अवॉर्ड ते अण्णा आंदोलन यात मिशनरी होतेच याचं आणिक एक प्रूफ देतो.
जेव्हा मदर तेरेसा ना सेंट हा सन्मान दिला गेला तेव्हा भारताच्या परराष्ट्र मंत्री म्हणून सुषमा स्वराज उपस्थित होत्या पण तिथे बोलावले गेलेल्यांमध्ये बंगालचा मुख्यमंत्री आणि केजरीवाल होता. त्याची लिंक

https://www.indiatoday.in/india/story/arvind-kejriwal-to-attend-mother-teresa-sainthood-ceremony-in-vatican-331578-2016-07-27

पंजाब मध्ये जेव्हा हे प्रचार करत होते तेव्हा त्यांच्या सुखबिर सिंग खैरा ने उघडपणे रेफ़्रेंडम 2020 या खलिस्तानी अजेंड्याला सपोर्ट केला होता. त्याची लिंक

https://m.hindustantimes.com/punjab/khaira-s-support-to-referendum-2020-lands-aap-in-a-mess-again/story-sl1HWuXFwxeJDEIhR6xkWM.html

आता सर्वात शेवटचे आणि सर्वात भयानक. आपल्याला आठवत असेल तर अण्णाला उपोषणाला बसवून हे सर्व चोर रोज सरकार ने बनवलेल्या लोकपाल कमिटी मध्ये मिटिंग ला जायचे आणि काही खुसपट काढून मिटिंग फेल व्हायची. तेव्हा यांना मार्ग निघणे अभिप्रेत नव्हतेच फक्त हा विषय मोठा करून देशात आग लावायची होती. आणि त्या साठी त्यांनी अनेक मौलवींना हाताशी धरून दिल्लीत इजिप्त च्या तेहरीर स्क्वेअर सारखे आंदोलन करून भारतात क्रांती आणायची होती आणि हे आहे त्याचे प्रूफ

आता तुम्हीच ठरवा हा केजरीवाल देशप्रेमी आहे, देशद्रोही आहे, का कोण आहे.

I rest my case here.

Thanks for reading

समीर गोरे