Posted in मूर्ति पूजा - Idolatry

आकाश से ऊँचा होता है पिता, देवता के समान होता है पिता
राजेश कश्यप नवंबर 28,2017

आकाश से ऊँचा होता है पिता, देवता के समान होता है पिता
भारतीय संस्कृति में ‘पितृ-दिवस’ के मायने ही अलग हैं। यहां इस दिवस का मुख्य उद्देश्य अपने पिता द्वारा उनके पालन-पोषण के दौरान किए गए असीम त्याग और उठाए गए अनंत कष्टों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना है।

वैश्विक स्तर पर विशेष दिवस के रूप में अनेक पर्व एवं कार्यक्रम प्रचलित होने लगे हैं, जिनमें से एक ‘पितृ-दिवस’ यानी ‘फादर्स डे’ भी है। दुनिया में यह अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है। भारत, अमेरिका, श्रीलंका, अफ्रीका, पाकिस्तान, बर्मा, बांग्लादेश, जापान, चीन, मलेशिया, इंग्लैण्ड आदि दुनिया के सभी प्रमुख देशों में इसे जून के तीसरे रविवार को मनाते हैं। भारत में पिछले कुछ वर्षों से ‘पितृ-दिवस’ के प्रति रूझान में बड़ी तेजी से बढ़ौतरी दर्ज की जा रही है। ‘फादर्स डे’ मनाने की शुरूआत पश्चिमी वर्जीनिया के फेयरमोंट में 5 जुलाई, 1908 को हुई थी। इसका मूल उद्देश्य 6 दिसम्बर, 1907 को पश्चिम वर्जीनिया के मोनोंगाह की एक खान दुर्घटना में मारे गए 210 पिताओं को सम्मान देना था। लेकिन, इसके बाद ‘फादर्स डे’ मनाने का सिलसिला धीरे-धीरे बढ़ता चला गया और यह वैश्विक स्तर पर मनाय जाने लगा। बेशक, ‘फादर्स डे’ के मूल में पश्चिमी वर्जीनिया की एक दर्दनाक खान दुर्घटना मौजूद हो, लेकिन भारत में अपने माता-पिता और गुरु को सम्मान देने और उन्हें भगवान समान समझने के संस्कार एवं नैतिक दायित्व चिरकाल से चलते आ रहे हैं।

भारतीय संस्कृति में ‘पितृ-दिवस’ के मायने ही अलग हैं। यहां इस दिवस का मुख्य उद्देश्य अपने पिता द्वारा उनके पालन-पोषण के दौरान किए गए असीम त्याग और उठाए गए अनंत कष्टों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना अथवा स्वर्गीय पिताश्री की स्मृतियों को संजोना है ताकि हम एक श्रेष्ठ एवं आदर्श संतान के नैतिक दायित्वों का भलीभांति पालन कर सकें। इस तरह के सुसंकार भारतीय संस्कृति में कूट-कूटकर भरे हुए हैं। अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करने, उनके दिखाए मार्ग पर चलने, वृद्धावस्था में उनकी भरपूर सेवा करने आदि हर नैतिक दायित्वों का पाठ बचपन से ही पढ़ाया जाता है। भारतीय संस्कृति और पौराणिक साहित्य में माता-पिता और गुरु को जो सर्वोच्च सम्मान और स्थान दिया गया है, शायद उतना कहीं और किसी सभ्यता व संस्कृति में देखने को नहीं मिलेगा।

हिन्दी साहित्य में ‘पिता’ को ‘जनक’, ‘तात’, ‘पितृ’, ‘बाप’, ‘प्रसवी’, ‘पितु’, ‘पालक’, ‘बप्पा’ आदि अनेक पर्यायवाची नामों से जाना जाता है। पौराणिक साहित्य में श्रवण कुमार, अखण्ड ब्रह्चारी भीष्म, मर्यादा पुरुषोत्तम राम आदि अनेक आदर्श चरित्र प्रचुर मात्रा में मिलेंगे, जो एक पिता के प्रति पुत्र के अथाह लगाव एवं समर्पण को सहज बयां करते हैं। वैदिक ग्रन्थों में ‘पिता’ के बारे में स्पष्ट तौर पर उल्लेखित किया गया है कि ‘पाति रक्षति इति पिता’ अर्थात जो रक्षा करता है, ‘पिता’ कहलाता है। यास्काचार्य प्रणीत निरूक्त के अनुसार, ‘पिता पाता वा पालयिता वा’, ‘पिता-गोपिता’ अर्थात ‘पालक’, ‘पोषक’ और ‘रक्षक’ को ‘पिता’ कहते हैं।

महाभारत में ‘पिता’ की महिमा का बखान करते हुए कहा गया है:

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परम तपः।
पितरि प्रितिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवताः

अर्थात ‘पिता’ ही धर्म है, ‘पिता’ स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या है। ‘पिता’ के प्रसन्न हो जाने से सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। इसके साथ ही कहा गया है कि ‘पितु र्हि वचनं कुर्वन न कन्श्चितनाम हीयते’ अर्थात ‘पिता’ के वचन का पालन करने वाला दीन-हीन नहीं होता।

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में पिता की सेवा करने व उसकी आज्ञा का पालन करने के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा गया है:

न तो धर्म चरणं किंचिदस्ति महत्तरम्।
यथा पितरि शुश्रुषा तस्य वा वचनक्रिपा।।

अर्थात, पिता की सेवा अथवा, उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नहीं है।

हरिवंश पुराण के विष्णुपर्व में पिता की महत्ता का बखान करते हुए कहा गया है:

दारूणे च पिता पुत्र नैव दारूणतां व्रजेत।
पुत्रार्थ पदःकष्टाः पितरः प्रान्पुवन्ति हि।।

अर्थात, पुत्र क्रूर स्वभाव का हो जाए तो भी पिता उसके प्रति निष्ठुर नहीं हो सकता, क्योंकि पुत्रों के लिए पिताओं को कितनी ही कष्टदायिनी विपत्तियाँ झेलनी पड़ती हैं।

महाभारत में युधिष्ठर ने यज्ञ के एक सवाल के जवाब में आकाश से ऊँचा ‘पिता’ को कहा है और यक्ष ने उसे सही माना भी है। इसका अभिप्राय है कि पिता के हृदय-आकाश में अपने पुत्र के लिए जो असीम प्यार होता है, वह अवर्णनीय है।

पदमपुराण में माता-पिता की महत्ता बड़े ही सुनहरी अक्षरों में इस प्रकार अंकित है:

सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता।
मातरं पितरं तस्मात सर्वयत्रेन पुतयेत्।।
प्रदक्षिणीकृता तेन सप्त द्वीपा वसुंधरा।
जानुनी च करौ यस्य पित्रोः प्रणमतः शिरः।
निपतन्ति पृथ्वियां च सोअक्षयं लभते दिवम्।।

अर्थात, माता सभी तीर्थों और पिता सभी देवताओं का स्वरूप है। इसलिए सब तरह से माता-पिता का आदर सत्कार करना चाहिए। जो माता-पिता की प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सात द्वीपों से युक्त पृथ्वी की परिक्रमा हो जाती है। माता-पिता को प्रणाम करते समय जिसके हाथ घुटने और मस्तिष्क पृथ्वी पर टिकते हैं, वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त होता है।
मनुस्मृति में महर्षि मनु भी पिता की असीम महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं:

उपाध्यान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
सहस्त्रं तु पितृन माता गौरवेणातिरिच्यते।।

अर्थात, दस उपाध्यायों से बढ़कर ‘आचार्य’, सौ आचार्यों से बढ़कर ‘पिता’ और एक हजार पिताओं से बढ़कर ‘माता’ गौरव में अधिक है, यानी बड़ी है।

‘पिता’ के बारे में मनुस्मृति में तो यहां तक कहा गया है:

‘‘पिता मूर्ति: प्रजापतेः’’

अर्थात, पिता पालन करने से प्रजापति यानी राजा व ईश्वर का मूर्तिरूप है।

भारतीय संस्कृति और वैदिक साहित्य में जोर देकर कहा गया है कि माता-पिता द्वारा जन्म पाकर ललित पालित होने के पश्चात बच्चा जब बड़ा हो जाता है तब, माता-पिता के प्रति उसके कुछ कर्तव्य हो जाते हैं, जिसका उसे पालन करना चाहिए। वैदिक संस्कृति कहती है कि पुत्र का कर्तव्य है कि माता-पिता की आज्ञा का पालन करे। जो पुत्र माता-पिता एवं आचार्य का अनादर करता है, उसकी सब क्रियाएं निष्फल हो जाती हैं, क्योंकि माता-पिता के ऋण से मुक्त होना असम्भव है। इसीलिए, माता-पिता तथा आचार्य की सेवा-सुश्रुषा ही श्रेष्ठ तप है। लेकिन, विडम्बना का विषय है कि आधुनिक युवा वर्ग अपने पथ से विचलित होकर अपनी प्राचीन भारतीय वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति को निरन्तर भुलाता चला जा रहा है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। आज घर-घर में पिता-पुत्रों के बीच आपसी कटुता, वैमनस्ता और झगड़ा देखने को मिलता है। भौतिकवाद आधुनिक युवावर्ग के सिर चढ़कर बोल रहा है। उसके लिए संस्कृति और संस्कारों से बढ़कर सिर्फ निजी स्वार्थपूर्ति और पैसा ही रह गया है।

इससे बड़ी विडम्बना का विषय और क्या हो सकता है कि एक ‘पिता’ अपने पुत्र के मुख से सिर्फ प्रेम व आदर के दो शब्द की उम्मीद करता है, लेकिन उसे पुत्र से उपेक्षित, तिरस्कृत और अभद्र आचरण के अलावा कुछ नहीं मिलता है। निःसन्देह, यह हमारी आधुनिक शिक्षा प़द्धति के अवमूल्यन का ही दुष्परिणाम है।

पौराणिक ग्रन्थ देवीभागवत में स्पष्ट तौर पर लिखा गया है:

धिक तं सुतं यः पितुरीप्सितार्थ,
क्षमोअपि सन्न प्रतिपादयेद यः।
जातेन किं तेन सुतेन कामं,
पितुर्न चिन्तां हि सतुद्धरेद यः।।

अर्थात, उस पुत्र को धिक्कार है, जो समर्थ होते हुए भी पिता के मनोरथ को पूर्ण करने में उद्यत नहीं होता। जो पिता की चिन्ता को दूर नहीं कर सकता, उस पुत्र के जन्म से क्या प्रयोजन है?

इसी तरह गरूड़ पुराण में लिखा गया है:-

सर्वसौख्यप्रदः पुत्रः पित्रोः प्रीतिविवद्धर्नः।
आत्मा वै जायते पुत्र इति वेदेषु निश्चितम्।।

अर्थात, पुत्र सब सुखों को देने वाला होता है, माता-पिता का आनंदवर्द्धक होता है। वेदों में ठीक ही कहा गया है कि आत्मा ही पुत्र के रूप में जन्म लेती है।

आधुनिक युवापीढ़ी को ‘पितृ-दिवस’ पर संकल्प लेना चाहिए कि वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति के अनुरूप वे अपने पिता के प्रति सभी दायित्वों का पालन करने का हरसंभव प्रयास करेंगे और साथ ही महर्षि वेदव्यास द्वारा महाभारत के आदिपर्व में दिए गए ज्ञान का सहज अनुसरण करेंगे कि ‘जो माता-पिता की आज्ञा मानता है, उनका हित चाहता है, उनके अनुकूल चलता है तथा माता-पिता के प्रति पुत्रोचित व्यवहार करता है, वास्तव में वही पुत्र है।’ हमें हमेशा यह याद रखने की आवश्यकता है कि ‘‘देवतं हि पिता महत्’’ अर्थात ‘पिता’ ही महान देवता है।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

” काँच और हीरा “
.
.
एक राजा का दरबार लगा हुआ था, क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था। पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी ।

महाराज के सिंहासन के सामने एक शाही मेज थी, और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं। पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि सभी दरबार मे बैठे थे और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे ।

उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा, प्रवेश मिल गया तो उसने कहा – मेरे पास दो वस्तुएं हैं, मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और अपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर कोई परख नही पाता सब हार जाते है और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ… अब आपके नगर मे आया हूँ

राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है” तो उसने दोनो वस्तुएं, उस कीमती मेज पर रख दीं । वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था। राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं, तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा और दूसरा काँच का टुकडा है ।

लेकिन रूप रंग सब एक है, कोई आज तक परख नही पाया क़ि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा, अगर कोई परख कर बताये की, ये हीरा है और ये काँच, अगर परख खरी निकली, तो मैं हार जाऊंगा और यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा।

पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी। इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से जीतता आया हूँ ।

राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा। दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है। सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था हारने पर पैसे देने पडेगे इसका कोई सवाल नही था, क्योंकि राजा के पास बहुत धन था, पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, इसका सबको भय था ।

कोई व्यक्ति पहचान नही पाया, आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई और एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा। उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो, मैने सब बाते सुनी है, और यह भी सुना है कि कोई परख नही पा रहा है एक अवसर मुझे भी दो ।

एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुंचा। उसने राजा से प्रार्थना की मै तो जनम से अंधा हू, फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये, जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं और यदि सफल न भी हुआ,तो वैसे भी आप तो हारे ही है ।

राजा को लगा कि इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है, राजा ने कहा क़ि ठीक है तो तब उस अंधे आदमी को दोनो चीजे छुआ दी गयी और पूछा गया अब बताओ इसमे कौन सा “हीरा” हैऔर कौन सा “काँच” ? यही तुम्हें परखना है …

कथा कहती है कि… उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह “हीरा” है और यह “काँच”, जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था वह नतमस्तक हो गया और बोला.. “सही है आपने पहचान लिया धन्य हो आप अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ” ..

सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला । उस आदमी, राजा और अन्य सभी लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे पहचाना कि यह “हीरा” है और वह “काँच”

उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिक धूप मे हम सब बैठे है मैने दोनो को छुआ जो ठंडा रहा वह हीरा जो गरम हो गया वह काँच…..

सार : जीवन मे भी देखना चाहिये जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये, वह व्यक्ति “काँच” हैं और जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे, वह व्यक्ति “हीरा” है..!!
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” काँच और हीरा “
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एक राजा का दरबार लगा हुआ था, क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था। पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी ।

महाराज के सिंहासन के सामने एक शाही मेज थी, और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं। पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि सभी दरबार मे बैठे थे और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे ।

उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा, प्रवेश मिल गया तो उसने कहा – मेरे पास दो वस्तुएं हैं, मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और अपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर कोई परख नही पाता सब हार जाते है और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ… अब आपके नगर मे आया हूँ

राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है” तो उसने दोनो वस्तुएं, उस कीमती मेज पर रख दीं । वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था। राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं, तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा और दूसरा काँच का टुकडा है ।

लेकिन रूप रंग सब एक है, कोई आज तक परख नही पाया क़ि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा, अगर कोई परख कर बताये की, ये हीरा है और ये काँच, अगर परख खरी निकली, तो मैं हार जाऊंगा और यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा।

पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी। इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से जीतता आया हूँ ।

राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा। दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है। सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था हारने पर पैसे देने पडेगे इसका कोई सवाल नही था, क्योंकि राजा के पास बहुत धन था, पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, इसका सबको भय था ।

कोई व्यक्ति पहचान नही पाया, आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई और एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा। उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो, मैने सब बाते सुनी है, और यह भी सुना है कि कोई परख नही पा रहा है एक अवसर मुझे भी दो ।

एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुंचा। उसने राजा से प्रार्थना की मै तो जनम से अंधा हू, फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये, जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं और यदि सफल न भी हुआ,तो वैसे भी आप तो हारे ही है ।

राजा को लगा कि इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है, राजा ने कहा क़ि ठीक है तो तब उस अंधे आदमी को दोनो चीजे छुआ दी गयी और पूछा गया अब बताओ इसमे कौन सा “हीरा” हैऔर कौन सा “काँच” ? यही तुम्हें परखना है …

कथा कहती है कि… उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह “हीरा” है और यह “काँच”, जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था वह नतमस्तक हो गया और बोला.. “सही है आपने पहचान लिया धन्य हो आप अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ” ..

सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला । उस आदमी, राजा और अन्य सभी लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे पहचाना कि यह “हीरा” है और वह “काँच”

उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिक धूप मे हम सब बैठे है मैने दोनो को छुआ जो ठंडा रहा वह हीरा जो गरम हो गया वह काँच…..

सार : जीवन मे भी देखना चाहिये जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये, वह व्यक्ति “काँच” हैं और जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे, वह व्यक्ति “हीरा” है..!!
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कृपया कितने भी व्यस्त हो तो भी ये पोस्ट एक बार जरूर पढ़े। तुम्हारे जीवन में 100% फर्क अवश्य पडेगा। 🙏 *तत्त्वनिष्ठ*

“अजी सुनते हो? राहूल को कम्पनी में जाकर टिफ़िन दे आते हो क्या?”
“क्यों आज राहूल टिफ़िन लेकर नहीं गया।?”
शरदराव ने पुछा।
आज राहूल की कम्पनी के चेयरमैन आ रहे हैं, इसलिये राहूल सुबह सात बजे ही निकल गया और इतनी सुबह खाना नहीं बन पाया था।”
” ठीक हैं। दे आता हूँ मैं।”
शरदराव ने हाथ का पेपर रख दिया और वो कपडे बदलने के लिये कमरे में चले गये।”
पुष्पाबाई ने एक उच्छ्वास छोडकर राहत की साँस ली।
शरदराव तैयार हुए मतलब उसके और राहूल के बीच हुआ विवाद उन्होंने नहीं सुना था। विवाद भी कैसा ? हमेशा की तरह राहूल का अपने पिताजी पर दोषारोपण करना और पुष्पाबाई का अपनी पति के पक्ष में बोलना।
विषय भी वही! हमारे पिताजी ने हमारे लिये क्या किया? मेरे लिये क्या किया हैं मेरे बाप ने ? ऐसा गैरसमज उसके मन में समाया हुआ था।
“माँ! मेरे मित्र के पिताजी भी शिक्षक थे, पर देखो उन्होंने कितना बडा बंगला बना लिया। नहीं तो एक ये हमारे नाना (पिताजी) । अभी भी हम किराये के मकान में ही रह रहे हैं।”
“राहूल, तुझे मालूम हैं कि तुम्हारे नाना घर में बडे हैं। और दो बहनों और दो भाईयों की शादी का खर्चा भी उन्होंने उठाया था। सिवाय इसके तुम्हारी बहन की शादी का भी खर्चा उन्होंने ने ही किया था। अपने गांव की जमीन की कोर्ट कचेरी भी लगी ही रही। ये सारी जवाबदारियाँ किसने उठाई? “
” क्या उपयोग हुआ उसका? उनके भाई – बहन बंगलों में रहते हैं। कभी भी उन्होंने सोचा कि हमारे लिये जिस भाई ने इतने कष्ट उठाये उसने एक छोटा सा मकान भी नहीं बनाया, तो हम ही उन्हें एक मकान बना कर दे दें ? “
एक क्षण के लिए पुष्पाबाई की आँखें भर आईं। क्या बतायें अपने जन्म दिये पुत्र को “बाप ने क्या किया मेरे लिये” पुछ रहा हैं? फिर बोली ….
” तुम्हारे नाना ने अपना कर्तव्य निभाया। भाई-बहनों से कभी कोई आशा नहीं रखी। “
राहूल मूर्खों जैसी बात करते हुए बोला — “अच्छा वो ठीक हैं। उन्होंने हजारों बच्चों की ट्यूशन्स ली। यदि उनसे फीस ले लेते तो आज पैसो में खेल रहे होते। आजकल के क्लासेस वालों को देखो। इंपोर्टेड गाड़ियों में घुमते हैं। “
” यह तुम सच बोल रहे हो। परन्तु, तुम्हारे नाना( पिताजी) का तत्व था, ज्ञानदान का पैसा नहीं लेना। उनके इन्हीं तत्वों के कारण उनकी कितनी प्रसिद्धि हुई। और कितने पुरस्कार मिलें। उसकी कल्पना हैं तुझे। “
ये सुनते ही राहूल एकदम नाराज हो गया।
” क्या चाटना हैं उन पुरस्कारों को? उन पुरस्कारों से घर थोडे ही बनाते आयेगा। पडे ही धूल खाते हुए। कोई नहीं पुछता उनको।”
इतने में दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। राहूल ने दरवाजा खोला तो शरदराव खडे थे। नाना ने अपना बोलना तो नहीं सुना इस डर से राहूल का चेहरा उतर गया। परन्तु, शरदराव बिना कुछ बोले अन्दर चले गये। और वह वाद वहीं खत्म हो गया।
ये था पुष्पाबाई और राहूल का कल का झगड़ा, पर आज ….

शरदरावने टिफ़िन साईकिल को अटकाया और तपती धूप में औद्योगिक क्षेत्र की राहूल की कम्पनी के लिये निकल पडे। सात किलोमीटर दूर कंपनी तक पहूचते – 2 उनका दम फूल गया था। कम्पनी के गेट पर सिक्युरिटी गार्ड ने उन्हें रोक दिया।
“राहूल पाटील साहब का टिफ़िन देना हैं। अन्दर जाँऊ क्या?”
“अभी नहीं देते आयेगा।” गार्ड बोला।
“चेयरमैन साहब आये हुए हैं। उनके साथ मिटिंग चल रही हैं। किसी भी क्षण वो मिटिंग खत्म कर आ सकते हैं। तुम बाजू में ही रहिये। चेयरमैन साहब को आप दिखना नहीं चाहिये।”
शरदराव थोडी दूरी पर धूप में ही खडे रहे। आसपास कहीं भी छांव नहीं थी।
थोडी देर बोलते बोलते एक घंटा निकल गया। पांवों में दर्द उठने लगा था। इसलिये शरदराव वहीं एक तप्त पत्थर पर बैठने लगे, तभी गेट की आवाज आई। शायद मिटिंग खत्म हो गई होगी।
चेयरमैन साहेब के पीछे पीछे अधिकारी
और उनके साथ राहूल भी बाहर आया।
उसने अपने पिताजी को वहाँ खडे देखा तो मन ही मन नाराज हो गया।
चेयरमैन साहब कार का दरवाजा खोलकर बैठने ही वाले थे तो उनकी नजर शरदराव की ओर उठ गई। कार में न बैठते हुए वो वैसे ही बाहर खडे रहे।
“वो सामने कौन खडा हैं?” उन्होंने सिक्युरिटी गार्ड से पुछा।
“अपने राहूल सर के पिताजी हैं। उनके लिये खाने का टिफ़िन लेकर आये हैं।” गार्ड ने कंपकंपाती आवाज में कहा।
“बुलवाइये उनको। “
जो नहीं होना था वह हुआ। राहूल के तन से पसीने की धाराऐं बहने लगी। क्रोध और डर से उसका दिमाग सुन्न हुआ जान पडने लगा।
गार्ड के आवाज देने पर शरदराव पास आये।
चेयरमैन साहब आगे बढे और उनके समीप गये।
” आप पाटील सर हैं ना? डी. एन. हायस्कूल में शिक्षक थे। “
” हाँ। आप कैसे पहचानते हो मुझे?”
कुछ समझने के पहले ही चेयरमैन साहब ने शरदराव के चरण छूये। सभी अधिकारी और राहूल वो दृश्य देखकर अचंभित रह गये।
“सर, मैं अतिश अग्रवाल। तुम्हारा विद्यार्थी । आप मुझे घर पर पढ़ाने आते थे। “
” हाँ.. हाँ.. याद आया। बाप रे बहुत बडे व्यक्ति बन गये आप तो …”
चेयरमैन हँस दिये। फिर बोले, “सर आप यहाँ धूप में क्या कर रहे हैं। आईये अंदर चलते हैं। बहुत बातें करनी हैं आपसे।
सिक्युरिटी तुमने इन्हें अन्दर क्यों नहीं बिठाया? “
गार्ड ने शर्म से सिर नीचे झुका लिया।
वो देखकर शरदराव ही बोले —” उनकी कोई गलती नहीं हैं। आपकी मिटिंग चल रही थी। आपको तकलीफ न हो, इसलिये मैं ही बाहर रूक गया। “
“ओके… ओके…!”
चेयरमैन साहब ने शरदराव का हाथ अपने हाथ में लिया और उनको अपने आलीशन चेम्बर में ले गये।
“बैठिये सर। अपनी कुर्सी की ओर इंगित करते हुए बोले।
” नहीं। नहीं। वो कुर्सी आपकी हैं।” शरदराव सकपकाते हुए बोले।
“सर, आपके कारण वो कुर्सी मुझे मिली हैं। तब पहला हक आपका हैं। “
चेयरमैन साहब ने जबरदस्ती से उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया।
” आपको मालूम नहीं होगा पवार सर..”
जनरल मैनेजर की ओर देखते हुए बोले,
“पाटिल सर नहीं होते तो आज ये कम्पनी नहीं होती और मैं मेरे पिताजी की अनाज की दुकान संभालता रहता। “
राहूल और जी. एम. दोनों आश्चर्य से उनकी ओर देखते ही रहे।
“स्कूल समय में मैं बहुत ही डब्बू विद्यार्थी था। जैसे तैसे मुझे नवीं कक्षा तक पहूँचाया गया। शहर की सबसे अच्छी क्लासेस में मुझे एडमिशन दिलाया गया। परन्तु मेरा ध्यान कभी पढाई में नहीं लगा। उस पर अमीर बाप की औलाद। दिन भर स्कूल में मौज मस्ती और मारपीट करना। शाम की क्लासेस से बंक मार कर मुवी देखना यही मेरा शगल था। माँ को वो सहन नहीं होता। उस समय पाटिल सर कडे अनुशासन और उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध थे। माँ ने उनके पास मुझे पढ़ाने की विनती की। परन्तु सर के छोटे से घर में बैठने के लिए जगह ही नहीं थी। इसलिये सर ने पढ़ाने में असमर्थता दर्शाई। माँ ने उनसे बहुत विनती की। और हमारे घर आकर पढ़ाने के लिये मुँह मांगी फीस का बोला। सर ने फीस के लिये तो मना कर दिया। परन्तु अनेक प्रकार की विनती करने पर घर आकर पढ़ाने को तैयार हो गये। पहिले दिन सर आये। हमेशा की तरह मैं शैतानी करने लगा। सर ने मेरी अच्छी तरह से धुनाई कर दी। उस धुनाई का असर ऐसा हुआ कि मैं चुपचाप बैठने लगा। तुम्हें कहता हूँ राहूल, पहले हफ्ते में ही मुझे पढ़ने में रूचि जागृत हो गई। तत्पश्चात मुझे पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी सुझाई नहीं देता था। सर इतना अच्छा पढ़ाते थे, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे विषय जो मुझे कठिन लगते थे वो अब सरल लगने लगे थे। सर कभी आते नहीं थे तो मैं व्यग्र हो जाता था। नवीं कक्षा में मैं दुसरे नम्बर पर आया। माँ-पिताजी को खुब खुशी हुई। मैं तो, जैसे हवा में उडने लगा था। दसवीं में मैंने सारी क्लासेस छोड दी और सिर्फ पाटिल सर से ही पढ़ने लगा था। और दसवीं में मेरीट में आकर मैंने सबको चौंका दिया था।”
” माय गुडनेस…! पर सर फिर भी आपने सर को फीस नहीं दी? “
जनरल मैनेजर ने पुछा।
” मेरे माँ – पिताजी के साथ मैं सर के घर पेढे लेकर गया। पिताजी ने सर को एक लाख रूपये का चेक दिया। सर ने वो नहीं लिया। उस समय सर क्या बोले वो मुझे आज भी याद हैं। सर बोले — “मैंने कुछ भी नहीं किया। आपका लडका ही बुद्धिमान हैं। मैंने सिर्फ़ उसे रास्ता बताया। और मैं ज्ञान नहीं बेचता। मैं वो दान देता हूँ। बाद में मैं सर के मार्गदर्शन में ही बारहवीं मे पुनः मेरीट में आया। बाद में बी. ई. करने के बाद अमेरिका जाकर एम. एस. किया। और अपने शहर में ही यह कम्पनी शुरु की। एक पत्थर को तराशकर सर ने हीरा बना दिया। और मैं ही नहीं तो सर ने ऐसे अनेक असंख्य हिरें बनाये हैं। सर आपको कोटी कोटी प्रणाम…!!”
चेयरमैन साहब ने अपनी आँखों में आये अश्रु रूमाल से पोंछे।
” परन्तु यह बात तो अदभूत ही हैं कि, बाहर शिक्षा का और ज्ञानदान का बाजार भरा पडा होकर भी सर ने एक रूपया भी न लेते हुए हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया, न केवल पढ़ाये पर उनमें पढ़ने की रूचि भी जगाई। वाह सर मान गये आपको और आपके आदर्श को।”
शरदराव की ओर देखकर जी. एम ने कहा।
” अरे सर! ये व्यक्ति तत्त्वनिष्ठ हैं। पैसों, और मान सम्मान के भूखे भी नहीं हैं। विद्यार्थी का भला हो यही एक मात्र उद्देश्य था। “चेयरमैन बोले।
” मेरे पिताजी भी उन्हीं मे से एक। एक समय भूखे रह लेंगे, पर अनाज में मिलावट करके बेचेंगे नहीं।” ये उनके तत्व थे। जिन्दगी भर उसका पालन किया। ईमानदारी से व्यापार किया। उसका फायदा आज मेरे भाईयों को हो रहा हैं।”
बहुत देर तक कोई कुछ भी नहीं बोला । फिर चेयरमैन ने शरदराव से पुछा, – “सर आपने मकान बदल लिया या उसी मकान में हैं रहते हैं। “
“उसी पुराने मकान में रहते हैं सर! “
शरदराव के बदले में राहूल ने ही उत्तर दिया।
उस उत्तर में पिताजी के प्रति छिपी नाराजगी तत्पर चेयरमैन साहब की समझ में आ गई ।
‌”तय रहा फिर। सर आज मैं आपको गुरू दक्षिणा दे रहा हूँ। इसी शहर में मैंने कुछ फ्लैट्स ले रखे हैं। उसमें का एक थ्री बी. एच. के. का मकान आपके नाम कर रहा हूँ…..”
“क्या.?”
शरदराव और राहूल दोनों आश्चर्य चकित रूप से बोलें। “नहीं नहीं इतनी बडी गुरू दक्षिणा नहीं चाहिये मुझे।”शरदराव आग्रहपूर्वक बोले।
चेयरमैन साहब ने शरदराव के हाथ को अपने हाथ में लिया। ” सर, प्लीज…. ना मत करिये और मुझे माफ करें। काम की अधिकता में आपकी गुरू दक्षिणा देने में पहले ही बहुत देर हो चुकी हैं।”
फिर राहूल की ओर देखते हुए उन्होंने पुछ लिया, राहूल तुम्हारी शादी हो गई क्या? “
‌” नहीं सर, जम गई हैं। और जब तक रहने को अच्छा घर नहीं मिल जाता तब तक शादी नहीं हो सकती। ऐसी शर्त मेरे ससुरजी ने रखी होने से अभी तक शादी की डेट फिक्स नहीं की। तो फिर हाॅल भी बुक नहीं किया। ”
चेयरमैन ने फोन उठाया और किसी से बात करने लगे।समाधान कारक चेहरे से फोन रखकर, धीरे से बोले” अब चिंता की कोई बात नहीं। तुम्हारे मेरीज गार्डन का काम हो गया। “सागर लान्स” तो मालूम ही होगा! “
” सर वह तो बहूत महंगा हैं… “
” अरे तुझे कहाँ पैसे चुकाने हैं। सर के सारे विद्यार्थी सर के लिये कुछ भी कर
‌ ‌सकते हैं। सर के बस एक आवाज देने की बात हैं। परन्तु सर तत्वनिष्ठ हैं, वैसा करेंगे भी नहीं। इस लान्स का मालिक भी सर का ही विद्यार्थी हैं। उसे मैंने सिर्फ बताया। सिर्फ हाॅल ही नहीं तो भोजन सहित संपूर्ण शादी का खर्चा भी उठाने की जिम्मेदारियाँ ली हैं उसने… वह भी स्वखुशी से। तुम केवल तारिख बताओ और सामान लेकर जाओ।
“बहूत बहूत धन्यवाद सर।” राहूल अत्यधिक खुशी से हाथ जोडकर बोला। “धन्यवाद मुझे नहीं, तुम्हारे पिताश्री को दो राहूल! ये उनकी पुण्याई हैं। और मुझे एक वचन दो राहूल! सर के अंतिम सांस तक तुम उन्हें अलग नहीं करोगे और उन्हें
कोई दुख भी नहीं होने दोगे। मुझे जब भी मालूम चला कि, तुम उन्हें दुख दे रहे होतो, न केवल इस कम्पनी से लात मारकर भगा दुंगा परन्तु पुरे महाराष्ट्र भर के किसी भी स्थान पर नौकरी करने लायक नहीं छोडूंगा। ऐसी व्यवस्था कर दूंगा।”
चेयरमैन साहब कठोर शब्दों में बोले।
” नहीं सर। मैं वचन देता हूँ, वैसा कुछ भी नहीं होगा। “राहूल हाथ जोडकर बोला।
शाम को जब राहूल घर आया तब, शरदराव किताब पढ रहे थे। पुष्पाबाई पास ही सब्जी काट रही थी। राहूल ने बॅग रखी और शरदराव के पाँव पकडकर बोला —” नाना, मुझसे गलती हो गई। मैं आपको आजतक गलत समझता रहा। मुझे पता नहीं था नाना आप इतने बडे व्यक्तित्व लिये हो।”
‌ शरदराव ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।
अपना लडका क्यों रो रहा हैं, पुष्पाबाई की समझ में नहीं आ रहा था। परन्तु कुछ अच्छा घटित हुआ हैं। इसलिये पिता-पुत्र में प्यार उमड रहा हैं। ये देखकर उनके नयनों से भी कुछ बुन्दे गाल पर लुढक आई।
……………………………….
एक विनती
☝ *उपरोक्त कथा पढने के उपरान्त आपकी आँखों से 1 भी बुन्द बाहर आ गई हो तो ही यह पोस्ट अपने स्नेहीजन तक भेजियेगा जरूर ! ✍✍✍✍✍✍ * और कृपया अपने पिताजी से कभी यह न कहे कि “आपने मेरे लिये किया ही क्या हैं? क्या कमाकर रखा मेरे लिये? जो भी कमाना हो वो स्वयम् अर्जित करें। जो शिक्षा और संस्कार उन्होंने तुम्हें दिये हैं वही तुम्हें कमाने के लिए पथप्रदर्शक रहेंगे*
✍ श्री अनिल मांडगेजी की पोस्ट का हिन्दी अनुवाद। ✍
अनुवादक
भारतेन्द्र लाम्भाते

Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

देश के पहले राष्ट्रपति की मौत का सच पढ़ेगें तो चौक जाएंगे

सोमनाथ मंदिर के लिए डा. राजेंद्र प्रसाद व सरदार पटेल को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी

ये जगजाहिर है कि जवाहर लाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पक्ष में नहीं थे
महात्मा गांधी जी की सहमति से सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का काम शुरु किया था.

पटेल की मौत के बाद मंदिर की जिम्मेदारी के एम मुंशी पर आ गई.

मुंशी नेहरू की कैबिनेट के मंत्री थे.

गांधी और पटेल की मौत के बाद नेहरू का विरोध और तीखा होने लगा था.

एक मीटिंग में तो उन्होंने मुंशी की फटकार भी लगाई थी.
उन पर हिंदू-रिवाइवलिज्म और हिंदुत्व को हवा देने का आरोप भी लगा दिया.

लेकिन, मुंशी ने साफ साफ कह दिया था कि सरदार पटेल के काम को अधूरा नहीं छोड़ेगे.

के एम मुंशी भी गुजराती थे इसलिए उन्होंने सोमनाथ मंदिर बनवा के ही दम लिया.

फिर उन्होंने मंदिर के उद्घाटन के लिए देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद को न्यौता दे दिया.

उन्होंने इस न्यौते को बड़े गर्व से स्वीकार किया लेकिन जब जवाहर लाल नेहरू की इसका पता चला तो वे नाराज हो गए.
उन्होंने पत्र लिख कर डा. राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ जाने से मना कर दिया.

राजेंद्र बाबू भी तन गए.

नेहरू की बातों को दरकिनार कर वो सोमनाथ गए और जबरदस्त भाषण दिया था.

जवाहर लाल नेहरू को इससे जबरदस्त झटका लगा.
उनके इगो को ठेंस पहुंची.
उन्होंने इसे अपनी हार मान ली.

डा. राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ जाना बड़ा महंगा पड़ा क्योंकि इसके बाद नेहरू ने जो इनके साथ सलूक किया वो हैरान करने वाला है.

सोमनाथ मंदिर की वजह से डा. राजेंद्र प्रसाद और जवाहर लाल नेहरू के रिश्ते में इतनी कड़वाहट आ गई कि जब राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति पद से मुक्त हुए तो नेहरू ने उन्हें दिल्ली में घर तक नहीं दिया.

राजेंद्र बाबू दिल्ली में रह कर किताबें लिखना चाहते थे. लेकिन, नेहरू ने उनके साथ अन्याय किया.

एक पूर्व राष्ट्रपति को सम्मान मिलना चाहिए, उनका जो अधिकार था उससे उन्हें वंचित कर दिया गया.

आखिरकार, डा. राजेंद्र प्रसाद को पटना लौटना पड़ा.
पटना में भी उनके पास अपना मकान नहीं था. पैसे नहीं थे.

नेहरू ने पटना में भी उन्हें कोई घर नहीं दिया जबकि वहां सरकारी बंगलो और घरों की भरमार है.

डा. राजेंद्र प्रसाद आखिरकार पटना के सदाकत आश्रम के एक सीलन भरे कमरे में रहने लगे.
न कोई देखभाल करने वाला और न ही डाक्टर.

उनकी तबीयत खराब होने लगी. उन्हें दमा की बीमारी ने जकड़ लिया.

दिन भर वो खांसते रहते थे. अब एक पूर्व राष्ट्रपति की ये भी तो दुविधा होती है कि वो मदद के लिए गिरगिरा भी नहीं सकता.

लेकिन, राजेंद्र बाबू के पटना आने के बाद नेहरू ने कभी ये सुध लेने की कोशिश भी नहीं कि देश का पहला राष्ट्रपति किस हाल में जी रहा है

इतना ही नहीं, जब डा. राजेंद्र प्रसाद की तबीयत खराब रहने लगी, तब भी किसी ने ये जहमत नहीं उठाई कि उनका अच्छा इलाज करा सके.

बिहार में उस दौरान कांग्रेस पार्टी की सरकार थी. आखिर तक डा. राजेन्द्र बाबू को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलीं. उनके साथ बेहद बेरुखी वाला व्यवहार होता रहा. मानो ये किसी के निर्देश पर हो रहा हो. उन्हें कफ की खासी शिकायत रहती थी.

उनकी कफ की शिकायत को दूर करने के लिए पटना मेडिकल कालेज में एक मशीन थी. उसे भी दिल्ली भेज दिया गया.

यानी राजेन्द्र बाबू को मारने का पूरा और पुख्ता इंतजाम किया गया.

एक बार जय प्रकाश नारायण उनसे मिलने सदाकत आश्रम पहुंचे.

वो देखना चाहते थे कि देश पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के अध्यक्ष आखिर रहते कैसे हैं.

जेपी ने जब उनकी हालत देखी तो उनका दिमाग सन्न रह गया. आंखें नम हो गईं.

उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वो क्या कहें.
जेपी ने फौरन अपने सहयोगियों से कहकर रहने लायक बनवाया.
लेकिन, उसी कमरे में रहते हुए राजेन्द्र बाबू की 28 फरवरी,1963 को मौत हो गई.

डा. राजेंद्र प्रसाद की मौत के बाद भी नेहरू का कलेजा नहीं पसीजा.
उनकी बेरुखी खत्म नहीं हुई.

नेहरू ने उनकी अंत्येष्टि में शामिल तक नहीं हुए. जिस दिन उनकी आखरी यात्रा थी उस दिन नेहरू जयपुर चले गए. इतना ही नहीं, राजस्थान के राज्यपाल डां. संपूर्णानंद पटना जाना चाह रहे थे लेकिन नेहरू ने उन्हें वहां जाने से मना कर दिया.

जब नेहरु को मालूम चला कि संपूर्णानंद जी पटना जाना चाहते हैं तो उन्होंने संपूर्णानंद से कहा कि ये कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो.
इसके बाद डा. संपूर्णानंद ने अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द किया.

यही नहीं, नेहरु ने राजेन्द्र बाबू के उतराधिकारी डा. एस. राधाकृष्णन को भी पटना न जाने की सलाह दी. लेकिन, राधाकृष्णन ने नेहरू की बात नहीं मानी और वो राजेन्द्र बाबू के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे.

जब भी दिल्ली के राजघाट से गुजरता हूं तो डा. राजेंद्र प्रसाद के साथ नेहरू के रवैये को याद करता हूं.

अजीब देश है, महात्मा गांधी के बगल में संजय गांधी को जगह मिल सकती है

लेकिन देश के पहले राष्ट्रपति के लिए इस देश में कोई इज्जत ही नहीं है.

सोमनाथ मंदिर के पक्ष में होनें के कारण सरदार बल्लभ भाई पटेल को भी कांग्रेसियों ने कोई सम्मान आज तक नहीं दिया,. जबकि मस्जिद क प्रेमियों को बडे बडे मंत्रालय दिये गए ၊

पूरे देश में बस गांधी परिवार के नाम पर ही स्मारक और योजनाएं बनाई गई,

ऐसा लगता है कि इस देश में महानता और बलिदान की कॉपी राइट सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार के पास है.

सच ईश्वर है
सच का साथ देना ही ईश्वर भक्ति है

आप कौन हैं,
यह आपके कर्म ही तय करेंगें
आप स्वयं नहीं ၊

डा० पवन त्यागी
पत्रकार
साहिबाबाद
फोन : 99683 04099

शेयर तो वही करेंगे जो देश भक्त या ईश्वर भक्त होंगें !!!

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

[13/02, 11:03 am] +91 90261 25507: एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।
राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया।
राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है
विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई।
कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं?

संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे।

संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं।
सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है।
अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।
ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है।
उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया

शिक्षा: अगर हम सतगुरु की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि सतगुरु हर समय हमारे साथ है।

सतगुरु को हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं कभी आप बहुत परेशान हो, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो।
आप आँखे बंद कर के विश्वास के साथ पुकारे, सच मानिये थोड़ी देर में आप की समस्या का समाधान मिल जायेगा
[13/02, 11:03 am] +91 90261 25507: महाभारत की कथा की कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

देवी लक्ष्मी का माहात्म्यप्राचीन काल की बात है। एक दिन महर्षि नारद गंगा जी में स्नान करने के लिये उनके तट पर गये। उसी समय वज्रधारी इन्द्र भी उसी तट पर पहुँचे। दोनों ने ही एक साथ जल में गोते लगाये और गायत्री मंत्र का जाप किया। उसके उपरान्त वे वहीं रेत पर बैठकर वार्तालाप करने लगे। जब वे वार्तालाप कर ही रहे थे कि सूर्य भगवान् का उदय हुआ। तत्काल ही दोनों ने सूर्य पूजा की। ठीक उसी समय आकाश से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई, जो निरन्तर उनके समीप ही आ रही थी। वह एक अनुपम दृश्य था। समस्त जगत् उस प्रकाश-पुंज से आलोकित हो रहा था। निकट आते ही उन्होंने देखा कि वह भगवान् विष्णु का विमान था और उस पर साक्षात् लक्ष्मी माता विराजमान थीं। जब वे उनके समीप आईं, तब दोनों ने उनको प्रमाण किया और इन्द्र बोले - ‘‘माता आज आपके दर्शन से चित्त प्रसन्न हो गया। इस प्रकार आपके आने का कोई न कोई भेद अवश्य है। कृपाकर हमें बतायें कि आपके आने का क्या प्रयोजन है?’’ लक्ष्मी देवी ने कहा - ‘‘इन्द्र, आप तो जानते ही हैं कि मैं सदा धर्मशील पुरुषों के देश में, नगर में एवं आवास पर निवास करती हूँ। वीरता से संघर्ष करने वाले राजाओं के शरीर में सदा उपस्थित रहती हूँ। मैं पहले सत्य और धर्म में बँधकर असुरों के पास रहती थी, किन्तु अब उन्हें धर्म के विपरीत देखकर आपके पास रहने के विचार से आई हूँ।’’ इन्द्र ने कहा - ‘‘देवि, आपका हार्दिक स्वागत है, किन्तु दैत्यों का पहले क्या आचरण था कि आप उनके पास रहती थीं।’’ लक्ष्मी ने कहा - ‘‘पहले दैत्यलोग दान, अध्ययन एवं यज्ञ में संलग्न रहते थे। देवता, पितर, गुरु एवं अतिथियों की पूजा करते थे। उनमें सदा सत्य बोलने की प्रवृत्ति थी। वे घर-द्वार स्वच्छ रखते थे। उनमें श्रद्धा थी एवं क्रोध न था। सबका स्वभाव अच्छा था, सभी दयालु थे, सबमें सरलता एवं भक्तिभाव था। उपवास एवं तप में लगे रहते थे। ब्राह्मणों की पूजा किया करते थे। सदा ही धर्म का आचरण करते थे और इसी कारण मैं सदियों से उनके पास रहती आयी हूँ।’’ इन्द्र ने पूछा - ‘‘देवि, फिर अब ऐसा क्या हो गया कि उन्हें छोड़कर हम देवताओं के पास रहने आयी हैं?’’ लक्ष्मी ने कहा - ‘‘समय के उलट-फेर से उनके गुणों में विपरीतता आयी है। अब उनमें धर्म नहीं रह गया है। गुरुओं का आदर समाप्त हो गया है। बड़े-बूढ़ों का सम्मान समाप्त हो गया है। संतानों के लालन-पालन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। संतान पिता के रहते ही मालिक बन बैठता है। स्वच्छता से उन्हें कोई मतलब नहीं रह गया है। उनके रसोइये भी अपवित्र रहने लगे हैं। स्त्रियों एवं बूढ़ों को अपमानित किया जाता है। यज्ञ, तपादि से उनका कोई नाता नहीं रह गया है। चारों ओर भय का वातावरण बन गया है। पूर्व में दानवों के उत्थान में मैं सहायक थी, किन्तु अब मैं नहीं रही, तो अवश्य ही उनका पतन प्रारंभ हो गया है। मेरे रहते ही उत्थान संभव है। मैं यदि नहीं रही तो पतन होना अवश्यम्भावी है। इसी कारण मैंने निश्चय किया है कि मैं अब आपके पास ही निवास करूँगी। मेरे साथ आठ देवियाँ भी निवास करती हैं - आशा, श्रद्धा, धृति, क्षान्ति, विजिति, संनति, क्षमा तथा जया। अब से इन देवियों का निवास भी आपके पास ही होगा। आप हमें स्वीकार कीजिये।’’ इन्द्र ने उन सभी देवियों को प्रणाम कर कहा - ‘‘हम धन्य हो गये माते, आपका हमारे यहाँ हार्दिक स्वागत है।’’ इन्द्र एवं नारद के ऐसा अभिनन्दन करने के साथ ही शीतल, सुगन्धित एवं सुखद वायु चलने लगी। उनके दर्शन करने के लिये सभी देवी-देवता उपस्थित हो गये। नारद जी ने लक्ष्मी जी के शुभागमन की प्रशंसा की। ब्रह्मा जी के लोक से अमृत वर्षा होने लगी। देवताओं की दुन्दुभि बिना बजाये ही बज उठी। समस्त दिशायें निर्मल एवं श्रीसम्पन्न दिखाई देने लगीं। लक्ष्मी जी के इस प्रकार आने से संसार में समय पर वर्षा होने लगी। पृथ्वी पर रत्नों की खानें प्रकट हो गयीं। मनुष्य, किन्नर, यक्ष, देवताओं आदि की समृद्धि बढ़ गयी। वे सभी सुख से रहने लगे। गौएँ दूध देने के साथ ही सभी की मनोकामनायें पूर्ण करने लगीं। किसी के मुख से कठोर वाणी नहीं निकलती थी। कहते हैं कि जो लोग लक्ष्मी देवी की आराधना से सम्बन्ध रखने वाले इस कथा का अध्ययन एवं वाचन ब्राह्मणों की मंडली में करते हैं, यदि वे धन के इच्छुक हों, तो उन्हें प्रचुर मात्रा में धन की प्राप्ति होती है। वे जीवन भर सुखी रहते हैं तथा उन्हें कभी भी दुःख का अनुभव नहीं होता।

[13/02, 11:03 am] +91 90261 25507: . “स्वर्ग का द्वार”

सुबह का समय था। स्वर्ग के द्वार पर चार आदमी खड़े थे। स्वर्ग का द्वार बन्द था। चारों इस इन्तजार में थे कि स्वर्ग का द्वार खुले और वे स्वर्ग के भीतर प्रवेश कर सकें।
थोड़ी देर बाद द्वार का प्रहरी आया। उसने स्वर्ग का द्वार खोल दिया। द्वार खुलते ही सभी ने द्वार के भीतर जाना चाहा, लेकिन प्रहरी ने किसी को भीतर नहीं जाने दिया।
प्रहरी ने उन आदमियों से प्रश्र किया, “तुम लोग यहां क्यों खड़े हो ?” उन चारों आदमियों में से तीन ने उत्तर दिया, “हमने बहुत दान, पुण्य किए हैं। हम स्वर्ग में रहने के लिए आए हैं।” चौथा आदमी मौन खड़ा था। प्रहरी ने उससे भी प्रश्न किया, “तुम यहां क्यों खड़े हो ?” उस आदमी ने कहा, “मैं सिर्फ स्वर्ग को झांक कर एक बार देखना चाहता था। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं स्वर्ग में रहने के काबिल नहीं हूँ क्योंकि मैंने कोई दान, पुण्य नहीं किया।”
प्रहरी ने चारों आदमियों की ओर ध्यान से देखा। फिर उसने पहले आदमी से प्रश्र किया, “तुम अपना परिचय दो और वह काम बताओ, जिससे तुम्हें स्वर्ग में स्थान मिलना चाहिए।” वह आदमी बोला, “मैं एक राजा हूँ। मैंने तमाम देशों को जीता। मैंने अपनी प्रजा की भलाई के लिए बहुत से मंदिर, मस्जिद, नहर, सड़क, बाग, बगीचे आदि का निर्माण करवाया तथा ब्राह्मणों को दान दिए।” प्रहरी ने प्रश्र किया, “दूसरे देशों पर अधिकार जमाने के लिए तुमने जो लड़ाइयाँ लड़ीं, उनमें तुम्हारा खून बहा कि तुम्हारे सैनिकों का ? उन लड़ाइयों में तुम्हारे परिवार के लोग मरे कि दोनों ओर की प्रजा मरी ?” “दोनों ओर की प्रजा मरी।” उत्तर मिला। “तुमने जो दान किए, प्रजा की भलाई के लिए सड़कें, कुएँ, नहरें आदि बनवाई, वह तुमने अपनी मेहनत की कमाई से किया या जनता पर लगाए गए ‘कर’ से ?” इस प्रश्र पर राजा चुप हो गया। उससे कोई उत्तर न देते बना। प्रहरी ने राजा से कहा, “लौट जाओ। यह स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए नहीं खुल सकता।”
अब बारी आई दूसरे आदमी की। प्रहरी ने उससे भी अपने बारे में बताने को कहा। दूसरे आदमी ने कहा, “मैं एक व्यापारी हूँ। मैंने व्यापार में अपार धन संग्रह किया। सारे तीर्थ घूमे। खूब दान किए।” “तुमने जो दान किए, जो धन तुमने तीर्थों में जाने में लगाया, वह पाप की कमाई थी। इसलिए स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए भी नहीं खुलेगा।” प्रहरी ने व्यापारी से कहा।
अब प्रहरी ने तीसरे आदमी से अपने बारे में बताने को कहा, “तुम भी अपना परिचय दो और वह काम भी बताओ जिससे तुम स्वर्ग में स्थान प्राप्त कर सको।” तीसरे आदमी ने अपने बारे में बताते हुए कहा, “मैं एक धर्म गुरु हूँ। मैंने लोगों को अच्छे,अच्छे उपदेश दिए। मैंने हमेशा दूसरों को ज्ञान की बातें बताई एवं अच्छे मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित किया।”
प्रहरी ने धर्मगुरु से कहा, “तुमने अपनी नेक कमाई के होते हुए उसे पूजा स्थलों के निर्माण में नहीं लगाया बल्कि केवल चंदे के पैसों से पूजा स्थलों का निर्माण करवाया। चंदा केवल आवश्यकता पड़ने पर ही यानि आपके पास नहीं है तो लेना चाहिए ! इस प्रकार तुमने ऋषियों , संतो के बनाये “अपरिग्रह ” के सिद्धांत की अवहेलना की थी !तुमने लोगों को ज्ञान और अच्छाई की बातें तो जरूर बताईं मगर तुम स्वयं उपदेशों के अनुरूप अपने आपको न बना सके। क्या तुमने स्वयं उन उपदेशों का पालन किया ? एक बार फिर पृथ्वी पर जन्म लो और अपने आचरण को अपने उपदेशों के अनुरूप बनाओ ! अतः स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए भी नहीं खुलेगा।”
अब चौथे आदमी की बारी आई। प्रहरी ने उससे भी उसका परिचय पूछा। उस आदमी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, “मैं एक गरीब किसान हूँ। मैं जीवन भर अपने परिवार के भरण,पोषण हेतु स्वयं पैसों के अभाव में तरसता रहा। मैंने कोई दान,पुण्य नहीं किया। इसलिए मैं जानता हूँ कि स्वर्ग का द्वार मेरे लिए नहीं खुल सकता।”
प्रहरी ने कहा, “नहीं तुम भूल रहे हो। एक बार एक भूखे आदमी को तुमने स्वयं भूखे रह कर अपना पूरा खाना खिला दिया था, पक्षियों को दाना डाला और प्यासे लोगों के लिए पानी का इंतजाम किया था।” “हाँ मुझे याद है, लेकिन वे काम तो कोई बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थे। मुझे बस थोड़ा सा स्वर्ग में झांक लेने दीजिए।” किसान ने विनती की।
प्रहरी ने किसान से कहा, “नहीं तुम्हारे ये काम बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये सब कुछ तुमने अपनी थोड़ी सी नेक कमाई से किया था ! यह तुम्हारी देविक प्रवृति के पर्याप्त परिचायक है और देवता ही स्वर्ग में रह सकते है ! अतः आओ ! स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए ही खुला है।’

विशेष ,,,,,, अगर मृत्योपरांत परलोक में स्वर्ग / देवलोक/ मोक्ष चाहते है तो अपने महतत्व ( मन ) में देविक प्रवृतियों के निर्माण के लिए सात्विक आहार ही ग्रहण करे ! तामसिक आहार असुरलोक ( नरक ) ही ले जा सकता है स्वर्ग में नहीं !
*** बाकि जैसी इच्छा आपकी ****
“जय जय श्री राधे कृष्ण “
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अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वापि विषया,
वियोगे को भे दस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून्।
व्रजन्त: स्वातंत्र्यादतुलपरितापाय मनस:
स्वयं त्यक्ता ह्ये शमसुखमनन्तं विदधति ।।

भावार्थ – सांसारिक विषय एक दिन हमारा साथ छोड़ देंगे, यह एकदम सत्य है। उन्होंने हमको छोड़ा या हमने उन्हें छोड़ा, इसमें क्या भेद है ? दोनों एक बराबर हैं। अतएव सज्जन पुरुष स्वयं उनको त्याग देते हैं। स्वयं छोड़ने में ही सच्चा सुख है, बड़ी शान्ति प्राप्त होती है।
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हमेशा ध्यान में रखिये —
” आप एक शुद्ध चेतना है यानि स्व ऊर्जा से प्रकाशित आत्मा ! माया (अज्ञान ) ने आपकी आत्मा के शुद्ध स्वरुप को छीन रखा है ! अतः माया ( अज्ञान ) से पीछा छुडाइये और शुद्ध चेतना को प्राप्त कर परमानन्द का सुख भोगिए !
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सत्कर्म करते रहना ही सही अर्थों में,,, जीवन से प्रेम,, है !
सुप्रभात ,,,,आपका दिवस मंगलमय हो !
मंगलकामना : प्रभु आपके जीवन से अन्धकार (अज्ञान )को मिटायें एवं प्रकाश (ज्ञान )से भर दें !

( मनुष्य पद की गरिमा को क्यों खोता है और उसके क्या परिणाम होते है ?
उत्तर — मनुष्य पद की गरिमा को तामसिक प्रवृतियों ( वासना , लालच एवं अहंकार ) के आधीन होने के कारण खोता है ! पवित्र गीता के अनुसार ये प्रवृतिया नरक का द्वार है ! हमारे मत में ये प्रवृतिया हमारे जीवन में तामस के उदय का आरम्भ है और यही तामस मानवो के जीवन में अज्ञानता , जड़ता एवं मूढ़ता के उदय का कारण है जो हमें नरक लोक ले जाने में सक्षम है ! अतः भ्रष्टाचार से बचो यानि पद की गरिमा को मत खोओ ! कोई भी पद या सम्मान (गरिमा ) इस जन्म में (पूर्व में संचित ) पुण्य कर्मो की देन है !पुण्य कर्मो के ह्यास के साथ ही गरिमा भी समाप्त हो जाती है और मानव को फिर अनेक योनियों में भटकना पड़ता है )
धर्मशील व्यक्ति ,,,,,,,
जिमि सरिता सागर महँ जाहीं l
जद्यपि ताहि कामना नाहीं ll
तिमि सुख सम्पति बिनहिं बुलाये l
धर्मशील पहँ जाइ सुहाये ll
जैसे सरिता (नदी ) उबड-खाबड़, पथरीले स्थानों को पार करते हुए पूर्ण रूपेण निष्काम भाव से समुद्र में जा मिलती है, उसी प्रकार धर्म-रथ पर आसीन मनुष्य के पास उसके न चाहते हुए भी समस्त सुख-सम्पत्ति, रिद्धियाँ-सिद्धियाँ स्वत: आ जाती हैं, सत्य तो यह है कि वे उसकी दासिता ग्रहण करने के लिए लालायित रहती है !
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,,,,सच्चे संतो की वाणी से अमृत बरसता है , आवश्यकता है ,,,उसे आचरण में उतारने की ….

जिस प्रकार मैले दर्पण में सूर्य देव का प्रकाश नहीं पड़ता है उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है अर्थात मलिन अंतःकरण में शैतान अथवा असुरों का राज होता है ! अतः ऐसा मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदत्त ” दिव्यदृष्टि ” या दूरदृष्टि का अधिकारी नहीं बन सकता एवं अनेको दिव्य सिद्धियों एवं निधियों को प्राप्त नहीं कर पाता या खो देता है !
गौशाला में दान देकर गौवंश को बचाये और देवताओं का आशीर्वाद एवं कृपा प्राप्त करे ! साथ ही अपने प्रारब्ध ( भाग्य ) में पुण्य संचित करे ! यह एक ऐसा पुण्य है जिससे इहलोक में देवताओ से सुख समृद्धि मिलती है एवं परलोक में स्वर्ग ! == देवलोक गौशाला आपकी अपनी == 🙏👏🌹🌲🌿🌹
” जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !”

“सत्य वचन में प्रीति करले,सत्य वचन प्रभु वास।
सत्य के साथ प्रभु चलते हैं, सत्य चले प्रभु साथ।। “

“एक माटी का दिया सारी रात अंधियारे से लड़ता है,
तू तो प्रभु का दिया है फिर किस बात से डरता है…”
हे मानव तू उठ और सागर (प्रभु ) में विलीन होने के लिए पुरुषार्थ कर ,,,,,,,

शरीर परमात्मा का दिया हुआ उपहार है ! चाहो तो इससे ” विभूतिया ” (अच्छाइयां / पुण्य इत्यादि ) अर्जित करलो चाहे घोरतम ” दुर्गति ” ( बुराइया / पाप ) इत्यादि !
परोपकारी बनो एवं प्रभु का सानिध्य प्राप्त करो !
प्रभु हर जीव में चेतना रूप में विद्यमान है अतः प्राणियों से प्रेम करो !
शाकाहार अपनाओ , करुणा को चुनो !
जय गौमाता की 🙏👏🌹🌲🌿

Note ; कृपया पोस्ट के साथ ही देवलोक गौशाला का page भी लाइक करें और हमेशा के लिए सत्संग का लाभ उठाएं ! देवलोक गौशाला सदैव आपको सन्मार्ग दिखाएगी और उस पर चलने के लिए प्रेरित करती रहेगी! ! सर्वदेवमयी यज्ञेश्वरी गौमाता को नमन 🙏👏🌹🌲🌿🌹

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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अधूरा सर्वे

(टिंग-टॉन्ग…. दरवाजे पर घन्टी बजती है। )
बहु देखना कौन है? सोफे पर लेटकर टीवी देख रहे ससुर ने कहा।
माया किचन से निकलकर दरवाज़ा खोलती है।
हां जी, आप कौन?
‘महिलाओं की स्थिति पर एक सर्वे चल रहा है। उसी की जानकारी के लिए आई हूँ।’ दरवाज़े पर खड़ी महिला ने जवाब दिया।
कौन है बहु? पूछते हुए ससुरजी बाहर आ जाते हैं।

महिला- ‘बाऊजी सर्वे करने आई हूँ।’

घनश्याम जी- ‘हां पूछिए’

महिला- ‘आपकी बहु सर्विस करती हैं या हाउस वाइफ हैं?’
माया हाउस वाइफ बोलने ही वाली होती है कि उससे पहले घनश्याम जी बोल पड़ते हैं।

घनश्याम जी- ‘सर्विस करती है’

‘किस पद पर हैं और किस कंपनी में काम कर रही हैं?’ महिला ने पूछा।

घनश्याम जी कहते हैं

  • वो एक नर्स है, जो मेरा और मेरी पत्नी का बखूबी ध्यान रखती है। हमारे उठने से लेकर रात के सोने तक का हिसाब बहु के पास होता है। ये जो मैं आराम से लेटकर टीवी देख रहा था ना वो माया की बदौलत ही है।

-माया बेबीसीटर भी है। बच्चों को नहलाने, खिलाने और स्कूल भेजने का काम भी वही देखती है। रात को रो रहे बच्चे को नींद माँ की थपकी से ही आती है।

-मेरी बहु ट्यूटर भी है। बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी इसी के कंधे पर है।

  • घर का पूरा मैनेजमेंट इसी के हाथों में है। रिश्तेदारी निभाने में इसे महारत हासिल है।
  • मेरा बेटा एयरकंडीशन्ड ऑफिस में चैन से अपने काम कर पाता है तो इसी की बदौलत। इतना ही नहीं ये मेरे बेटे की एडवाइजर भी है।
  • ये हमारे घर की इंजन है। जिसके बग़ैर हमारा घर तो क्या इस देश की रफ़्तार ही थम जाएगी।

बाऊजी मेरे फॉर्म में इनमें से एक भी कॉलम नहीं है, जो आपकी बहु को वर्किंग कह सके।

घनश्याम जी मुस्कुराते हुए कहते हैं, फिर तो आपका ये सर्वे ही अधूरा है।

महिला- ‘लेकिन बाऊजी इससे इनकम तो नहीं होती है ना।

घनश्याम जी कहते हैं, अब आपको क्या समझाएं। इस देश की कोई भी कंपनी ऐसी बहुओं को वो सम्मान, वो सैलरी नहीं दे पाएंगी। बड़ी शान से वो कहते हैं, मेरी हार्ड वर्किंग बहु की इनकम हमारे घर की मुस्कुराहट है
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एक आदरणीय सदस्य द्वारा भेजा गया बहुत अच्छा मैसेज जो मैं आपको प्रस्तुत कर रहा हूं

ज्यादा सैलरी वाली बहू मत ढूंढिए….

ज्यादा संस्कार वाली बहू ढूंढिए….