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देवी सिंग तोमर

19 जनवरी 1990 को काश्मीर में जो कुछ भी हुआ उसकी नींव करीब सौ साल पहले रखी गयी थी ।

सन 1889 में डोगरा शाषक प्रताप सिंह की राजकीय ताकतें छीन कर ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई गई स्टेट काउंसिल को दे दी गयी ।
स्टेट काउंसिल ने प्रशासनिक भर्तियों की प्रकिया को इंडियन सिविल सर्विसेज के द्वारा लागू कर दिया गया और राज्य भाषा फ़ारसी से बदलकर उर्दू कर दी गयी ।
अभी तक राज्य के प्रशाषन में कश्मीरी पंडितों का बोलबाला था जो अंग्रेजी माध्यम की परीक्षा व्यवस्था के बाद बदल गया । कश्मीर के प्रशासनिक पदों में बाहरी राज्य के लोगों का दबदबा बढ़ने लगा खासकर हिन्दू पंजाबियों का ।
लगातार अपना दबदबा खो रहे पंडितों ने स्टेट कॉउन्सिल से लेकर डोगरा राजा और ब्रिटिश सरकार तक बार बार अपनी बात पहुंचाई ।
1905 में प्रताप सिंह को वापस राजा बना दिया गया और कश्मीरी पंडितों के दबाव में 1912 में सीमित बनाई गई जिसने ये माना कि हर वो व्यक्ति जिसके पास राज्य में स्थाई सम्पत्ति है या जो 20 वर्ष से राज्य में रह रहा हो उसे स्थाई निवासी माना जायेगा और प्रशासनिक पदों में उनको वरियता दी जायेगी ।
1912 के बने इस फार्मूले ने भी पंडितों में ज्यादा उत्साह नही भरा क्योंकि अधिकतर पंजाबी राज्य में बीस से अधिक वर्ष से रह रहे थे और मुस्लिम समाज ने अपने समाज की पिछड़ी स्थिति को देखकर इस दौड़ से खुद को दूर ही रखा क्योंकि वो जानते थे मेरिट के आधार पर चयन से उनका कोई फायदा नही होना है हालांकि उन्होंने मुस्लिमों की संख्या बढ़ाने के लिये दूसरे राज्य से मुस्लिमों को चुने जाने की मांग रखी जिसे डोगरा राजा द्वारा खारिज कर दिया गया ।
कश्मीरी पंडितों ने इसके बाद स्थाई निवासी की परिभाषा बदलने के लिये दबाव बनाना शुरू किया ।
संकर लाल कौल ने पहली बार कश्मीरियत को परिभाषित करने का प्रयास किया और सिर्फ उन्हें ही कश्मीरी मुल्की माना जो पाँच जनरेशन से राज्य में रह रहा हो ।
कश्मीरियत के इस फार्मूले से काश्मीरी पंडितों ने काश्मीरी मुसलमानों को भी अपनी मुहिम में जोड़ने की कोसिस शुरू की जो अभी तक मेरिट के सवाल पर चयन के विरुद्ध थे ।
प्रताप सिंह की मृत्यु के बाद राजा हरि सिंह ने शाषन सम्भाला और 31 जनवरी 1927 को नये स्टेट ऑर्डर द्वारा कश्मीरी मुल्की होने को फिर से डिफाइन किया गया और प्रथम दर्जे का नागरिक उन्हें माना गया जो प्रथम डोगरा राजा के समय से राज्य में बसे हुये थे और इन्हें प्रशसनिक पदों में उच्च वरीयता दी गयी ।
जन्हा एक ओर इस कानून के बाद पंडितो का बोलबाला प्रशासन में फिर से बढ़ने लगा मुसलमानों की स्थिति में शिक्षा की कमी की वजह से ज्यादा सुधार ना हुआ और उन्होंने जनसँख्या के आधार पर रिजर्वेशन की मांग की जिसे सिरे से नकार दिया गया ।
मुसलमानों ने इसके बाद राजा हरि सिंह और कश्मीरी पंडितों के खिलाफ मुहिम शुरू कर दी जिसका परिणीति हुई 13 जुलाई 1931 को भयानक दंगो के रूप ने जिसमे मुसलमानों ने कश्मीरी पंडितों पर हमले कर घरो को जलाना शुरू कर दिया जिसका अंतिम विस्तार 19 जनवरी 1990 को कश्मीरी पंडितों के निर्वासन के रूप में हुआ ।
आज सीएए और एनसीआर का विरोध करने वाले हिंदुओं खासकर असमिया हिंदुओं के तर्क आज वही नजर आते हैं जो 1912 में कश्मीरी पंडितों के थे ।

इतिहास पढ़ने का कोई फायदा नही अगर उससे कुछ सीखा ना जाय

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