Posted in आयुर्वेद - Ayurveda

सौंफ

दो दिन पहले वैज्ञानिको के एक ग्रुप के साथ बैठा था। कुछ विज्ञान कुछ बियर कुछ खाने के बाद स्वीट्स का दौर चल रहा था। यूँ ही बात करते करते किसी ने बात छेड़ दी विदेश में भोजन की। एक नए लड़के ने अपना एक्सपीरियंस बताया कि किस प्रकार उसके दोस्त को कोरिया में कुछ भी खाने को नही मिला तो उसको एक इंडियन ने थोड़ा सा दही का कल्चर दिया कि जा दही जमा ले। मतलब वहां दही भी नही मिलता। खैर अपन को इहाँ तक तो वार्ता में कोई इंटरेस्ट नही आ रहा था और हम चुपचाप अपना भोजन खा रहे थे।

वहीं एक बक्टेरियोलॉजिस्ट भी बैठा था। इसी बात पर उसने यूँ ही कमेंट कर दिया कि हाँ जब पहली बार कभी दही का कल्चर बनाया गया होगा तो सौंफ से बनाया था।

हमारे कान खड़े हो गए। सौंफ? सौंफ से?? वही सौंफ जो हम हजारों सालों से खाने के बाद यूँ ही चबा लेते हैं या पान में डाल कर खाते आये हैं सदियों से।

खड़े कान लिए हमने उस वैज्ञानिक का रूबरू किया और फिर पूछा सौंफ से दही का कल्चर? वो कैसे??

तो वैज्ञानिक महोदय ने बड़े कूल कूल बताया कि हां, सौंफ के सरफेस पर बहुत सारा लैक्टोबैसिलस होता है ना।

वो कहाँ से आता है सौंफ पर? हमने पूछा ।

वो बोले बस होता है प्राकृतिक। सौंफ के सरफेस पर खुद की प्रकृति में होता है। वो वैज्ञानिक अपने क्षेत्र के बड़े वैज्ञानिक। उनकी बात पर शक का तो सवाल ही नही।

वो चर्चा तो खत्म हो गई। हमारे दीमाग़ में ढोल नगाड़े बाजे गाजे सब बजने लगे। हिंदुस्तान जिंदाबाद गूंजने लगा। जय हिंद जय सनातन जय पुरातन के नारे लगने लगे।

हजारों साल पहले की भारतीय प्रथा का वैज्ञानिक कारण सामने था।

लैक्टोबैसिलस एक बहुत ही स्ट्रांग प्रोबियोटिक्स होती है। पेट में स्वास्थ्यवर्धक जीवाणुओं का बैलेंस बनाये रखने के लिए इस बैक्टीरिया का आंत में होना बहुत जरूरी है।

यह नही होगा तो हजार बीमारियां आती हैं। डायबिटीज से लेकर थायराइड अल्सर कैंसर न जाने क्या क्या।

Sporlac नाम की एलोपथिक गोलियां तो लंबी बीमारी से उठने के बाद सिर्फ इसलिए दी जाती हैं ताकि शरीर में लैक्टोबैसिलस की जनसंख्या पुनः बढ़ जाये। इम्युनिटी और ताकत आ जाये। पर आजकल डॉक्टर लोग भी चलता काम करते हैं sporlac नही देते किसी को भी। उनको किसी की इम्युनिटी से क्या मतलब।

अब आते हैं सौंफ पर।

हजारों साल पहले से भोजन के तुरंत बाद हम जो सौंफ खाते थे न, वो सौंफ नही अपने स्वास्थ्य की गारंटी पर दस्तखत करते थे। सौंफ के साथ लांखो लैक्टोबसिलस पेट मे रोज चले जाते थे।

यह था उस प्रथा का वैज्ञानिक कारण।

अब तो हम इस प्रथा को लगभग भूल गए।

तो गणतंत्र दिवस पर आइए दुबारा अपनी प्राचीन प्रथाओं को बिना सवाल पूछे दुबारा शुरू करने का प्रण लें ।

वो ग्रेट थी, ग्रेट हैं। वैज्ञानिक कारण जब मिलेगा, मिल जाएगा।

तो कल से खाने के बाद सौंफ फिर शुरू। ओके। और भुनी हुई नही। धुली हुई नही। फैंसी सुगर कोटेड नही। बिल्कुल ताजी सौंफ हरी हरी।

और देखिए, मुझे उड़ते उड़ते भी कोई वैज्ञानिक तथ्य सुनाई देता है तो मैं उसमें सनातन खोजता हूँ। आपका स्वास्थ्य खोजता हूँ। और आप तक पहुंचाता भी हूँ।

चलो फिर बोलो इसी बात पर जय हिंद जय सनातन। 🚩

✍️ डॉ.सुनील वर्मा (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी)

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