Posted in स्वाध्याय

पर्यावरण
समुद्र वसने देवि पर्वत स्तन मंडले
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यम पाद स्पर्शम क्षमस्व
( सागर के नील हरित वस्त्रो से सजी हैं जो उतुंग पर्वत जिनके अमृत स्रावी स्तन हैं ऐसी जगतपिता विष्णु की वल्लभा पर हम अपने पांवो का स्पर्श कर रहे हैं इस हेतु भगवती हमको क्षमा करे )
ये प्रार्थना लगभग सभी संस्कारी परिवार के जन नित्य प्रात:काल मे बिस्तर से उठते ही करते हैं
ये कैसा सम्मान है धरती को
जगतपिता की पत्नि मंजे सर्वजगत ,चर-अचर को पालने वाली माता ,प्रकृति शक्ति
इससे मिलता जुलता सबक लगभग हम सबको अपने परिवारों से मिला है
बहुत पहले हमारी भांजियां शायद सात आठ साल की थीं तब वे भरतनाट्यम सीख रहीं थीं
छुट्टियों मे ननिहाल मे आने पर वो हमको अपना सीखा नृत्य दिखाने लगीं
लेकिन जब भी वे नाच शुरू करती तब प्रारम्भहमेशा एकसा रहता जिसमे वे हाथ जोड़ कर फिर नीचे झुक करदोनो हाथो से भूमि स्पर्श कर के माथे पर लगाती
हमारे पूछने पर उस सातसाल की भांजी ने जो कारण बताया अपने अनगढ़शब्दो में वो हमारे हृदय मे भिंद गयाथा
बच्ची ने कहा
“मामा !ये भूमि अम्बा को प्रणाम करके स्पर्श कररहे हैं और क्षमा मांगरहे हैं की हम अपने विलास और आनंद के लिये बार बार अपने पैरो से उनका ताड़न करेंगे “
शब्द कम थे पर उस बच्ची ने भाव पूरा समझा दिया था अपनी भावभंगिमा से
हम बहुत देर तक सोचते रहे प्रकृति की सम्मान की कैसी परम्परा और संस्कार पूर्वजो ने रोपित किये लोक में , कला में, धर्म में, नीती में
शम चैतन्य बापा कहते थे की जब भी किसी कुंड मे , नदी मे , तालाब मे स्नान करो तो उसके बाद उसके अंदर की मिट्टी से तीन पिंड बना कर वहां की क्षेत्रकृत्या के निमित्त पिंडदान करना चाहिये
सोचिये अगर हर स्नानार्थी यहकर दे तो कुंडो ,तालाबो की वह दुर्गत रहती जो हम आप देख रहे हैं
पिताजी हमेशा सुबह पांच साढे पांच बजे उठ जाते थे
नित्यकर्मो से निवृत्त होकर वो बगीचे मे पानी लगाने लगते
तब तक हम सब उठ कर अपने कामो मे लगते
हम सुबह दौड़ने की निकलजाते
जब आधेंघंटे बाद वापस आते तबतक मालकिन नाश्ता बना कर पिताजी को दे चुकीं होती थीं
नहाये धोये पिताजी पोर्च मे बैठ कर नाश्ता करने से पहले अपना नित्य कर्तव्य नही भूलते सेर भर चावल टुकड़ी या बाजरा अपनी गौरेंयों को डालना उनका नित्य कर्म था
और वो चिड़ियायें गिलहरियां सब इसकी प्रतीक्षामें रहती थीं
जरी सी देर होने पर चिड़ियाये और गिलहरियां उनके कंधो ,सर और गोद मे बैठ कर शोर करने लगती थीं
रोज कितनी चिड़ियायें आती उनको गिनती रहती थी
कम या ज्यादा होने पर वो हम लोगो से कहते थे
येबात 2006की बात है अगस्त का आखिरी सप्ताह था
हम ताजे ताजे कोर्ट केस से सफलता पूर्वक निपटे थे जिसमे हमारे अँदर जाने की पूरी संभावना थी
सुबह पिताजी ने हमसे कहा की बाजरा ले आना खत्म होगया है हमने हां कर दी पर कामो में भूल गये
अगलीसुबह जब दौड़ कर वापस आये तो पिताजी के मांगने पर याद आया
हम कहे की आजले आयेंगे बाजरा
इस पर पिताजी ने कहा
” इतना लापरवाह मत हो जाओ की यह भी भूल जाओ की तुम्हारे बाप ने कभी बिना इनको दाने डाले एक कौर मुंह मे नही रखा
जिस भयानक संकट से बचे हो
बहुत संभावना तो यही है की इन नन्हे पखेरुओँ और बेजुबान गिलहरियों की प्रार्थना हो की इनके पुत्र को बचाये रखना नही तो इन बुड्डे बुढियाकी देखभाल कौन करेगा
और ये बुड्ढा हमको फिर कैसे खाने देगा “
हम पर घड़ो पानी पड़ गया
हम वापस लौट कर दुकान खुलवाये और बाजरा लाकर पिताजी कोसौंप दिया
थोड़ी देर बाद देखा तो सर्दी की धूप मे अपनी आराम कुर्सी पर बैठ कर पोहे खा रहे थे और उनके आसपास गौरेयोॆ और गिलहरियों का के कारण उनकी
चीं चीं चीं चीं से पोर्च गुलजार हो गयाथा
पिताजी के जाने के बाद यह जिम्मेदारी मालकिन ने ले ली
इसी तरह दो साल पहले नर्मदा किनारे अदलपुरा मे मैं और उन्मेष गये थे स्नान वगैरह करके हम अपने नित्य जप को बैठ गये उन्मेष दाल बाफले की रंगत जमाने लगा किनारे के मॆदिर मे
हम जप करते मे सोच रहे थे की शायद हम से दस पांच ही लोग इस घने जगंल के तट पर नर्मदा के दर्शन को चले आते हों अन्यथा यहां कौन आरहा है
तभी देखा कीबांयी ओर दूर से एक ग्रामीण जोड़ा चला आरहा है तट पर पहुंच कर उन दोनो ने माई को तट पर से ही दंडवत कर ढोक दी और अपना लोक बोली मे माई की जयजयकार करी
बहुत संभलते हुये वो पानी मे उतरे पर स्नान करने की जगह वे नर्मदा के प्रवाह मे किनारे पर जमे सड़े घास , पेड़पत्ते ,काई ,सिवार को हटाने लगे
जबकरीब आठ दस बार उन दोनो ने प्रवाह से बाहर आकर कचरा फेंक दिया तब उनने स्नान करना शुरू किया
फिर स्नान करकेजब बाहर आये तो उनकी नजर जप करते हम पर पड़ी
सरल विश्वासी उन गांव के पुण्यमूर्ति युगल ने हमको ढोक लगायी हम जोयह सब दृश्य मंत्रमुग्ध होकर देख रहे थे फिर से आपे मे आये और हम जिस चट्टान पर बैठे थे उसको वे दोनो बुहारने लगे
पत्नि बुहार रही थी और पति जाकर हमारे खाली पड़े पानी के पात्र को मांजकर माई का अमृत भर लाया
और इसके बाद वो जैसे घने पेड़ो के ओर से आये थे वहीं चले गये
हमारा जप पूरा हुआ तो हमने उठ कर पहला प्रणाम रेवा माई को करा और दूसरा उन पुण्यमयि युगल के पदचिन्हो पर
(शायद माई हमको निजी तौर पर समझाना चाहरही थी कहम और हमारे सरीखे शहरीमूढ़ो की उसे कोई जरूरत नही
उसके पास सदा ऐसे रत्न हैं जो तपस्वीयो के भी प्रणम्य हैं )
ये सब उन वन्य क्षेत्र के ग्रामीणो को किसने सिखाया था की प्रकृति से जो कुछ लिया जाये उसका मूल्य किसी भी तरह चुकाना ही उसके कर्ज से मुक्ति का उपाय है
ये सब हमारे मन मे सैकड़ो भावनाओँ का ज्वार लाने मे सक्षम था
अब जब अर्थ डे पर दर्जनो व्यर्थ के शगूफे देखते हैं तो ये सब बाते बहुत याद आतीं है
अर्थ डे को गये बहुत दिन होगये हैं पर आज इसपर लिखने का कारण यहरहा की हम पर एक वचन का कर्ज था और कर्ज कैसा भी हो उसे समय रहते चुका देना चाहिये
(नीचे के चित्र मे समुद्र लहरो के समक्ष हाथ जोड़ कर वंदना करती सरल ग्रामीण महिला दिख रही हैजो तीर्थ राज स्वरूप रत्नाकर को भावार्घ्य देरही है कौन सा पर्यावरण विद या हम आप इनकी सरल विश्वास और प्रकृति से समीपता की होड़कर सकते हैं
या कुछ खास लोग इस चित्र को हमारे कर्ज से मुक्ति की रसीद मान सकते हैं 😊 )
लेखक अज्ञात है शायद गंगा महतो जी पोस्ट है..

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