Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे।

रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु – एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ ?

श्री कृष्ण ने कहा – अर्जन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो।

तब अर्जुन ने कहा कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं ?

यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले कि आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूंगा।

श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का बना दिया।

इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो।

अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया।

उसने सभी गाँव वालों को बुलाया।

उनसे कहा कि वह लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना शुरू कर दिया।

गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरु कर दी।

अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए।

लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे।

उनमे अब तक अहंकार आ चुका था।

गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे।

इतने समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे।

जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी।

उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।

प्रभु ने कहा कि ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण बुला लिया।

उन्होंने कर्ण से कहा कि इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो।

कर्ण तुरंत सोना बांटने चल दिये।

उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा – यह सोना आप लोगों का है , जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये।

ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।

यह देख कर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया?

श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को शिक्षा..

इस पर श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि तुम्हे सोने से मोह हो गया था। तुम खुद यह निर्णय कर रहे थे कि किस गाँव वाले की कितनी जरुरत है।

उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे।

तुम में दाता होने का भाव आ गया था।

दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए। वह नहीं चाहते थे कि उनके सामने कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे। उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।

यह उस आदमी की निशानी है जिसे आत्मज्ञान हांसिल हो चुका है। इस तरह श्री कृष्ण ने खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया, अर्जुन को भी अब अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।

●● कथासार ●●

दान देने के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है।

यदि हम किसी को कुछ दान या सहयोग करना चाहते हैं तो हमे यह बिना किसी उम्मीद या आशा के करना चाहिए, ताकि यह हमारा सत्कर्म हो, न कि हमारा अहंकार।सुनते रहिये रेडियो जय जिनेंद्र

मंगलमय प्रभात
स्नेह वंदन
प्रणाम good evening

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अन्याय या न्याय

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दो लड़के बाग में खेल रहे थे, तभी उन्होंने एक पेड़ पर जामुन लगे देखे। उनके मुंह में पानी भर आया। वे जामुन खाना चाहते थे लेकिन पेड़ बहुत ऊंचा था। अब कैसे खाएं जामुन ? समस्या बड़ी विकट थी।

एक लड़का बोला-‘‘कभी-कभी प्रकृति भी अन्याय करती है। अब देखो, जामुन जैसा छोटा-सा फल इतनी ऊंचाई पर इतने बड़े पेड़ पर लगता है और बड़े-बड़े खरबूजे बेल से लटके जमीन पर पड़े रहते हैं।’’
दूसरे लड़के ने भी सहमति जताई। वह बोला-‘‘तुम ठीक कहते हो, तुम्हारी बात में दम है लेकिन मेरी समझ में यह बात नहीं आई कि प्रकृति ने छोटे-बड़े के अनुपात का ध्यान क्यों नहीं रखा। अब यह भी कोई तुक हुई कि इतना छोटा-सा फल तोड़ने के लिए इतने ऊंचे पेड़ पर चढ़ना पड़े। मेरा तो मानना है कि प्रकृति भी संपूर्ण नहीं।’’
तभी अचानक ऊपर से जामुन का एक गुच्छा एक लड़के के सिर पर आ गिरा। उसने ऊपर की ओर देखा लेकिन कुछ बोला नहीं।

तभी दूसर लड़का बोला-‘‘मित्र ! अभी हम प्रकृति की आलोचना कर रहे थे और प्रकृति ने ही हमें सबक सिखा दिया। सोचो जरा, यदि जामुन के बजाए तरबूज गिरा होता तो क्या होता ? शायद तुम्हारा सिर फट जाता और शायद फिर बच भी न पाते।’’

‘‘हां, प्रकृति जो भी करती है अच्छा ही करती है।’’ वह लड़का बोला जिसके सिर पर जामुन का गुच्छा गिरा था।

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🌹🙏
🌹🌹अति सुन्दर प्रसंग🌹🌹
एक आदमी ने एक पेंटर को बुलाया अपने घर, और अपनी नाव दिखाकर कहा कि इसको पेंट कर दो !
उस पेंटर ने पेंट लेकर उस नाव को लाल रंग से पेंट कर दिया जैसा कि नाव का मालिक चाहता था।
फिर पेंटर ने अपने पैसे लिए और चला गया !
अगले दिन, पेंटर के घर पर वह नाव का मालिक पहुँच गया, और उसने एक बहुत बड़ी धनराशी का चेक दिया उस पेंटर को !
पेंटर भौंचक्का हो गया, और पूछा – ये किस बात के इतने पैसे हैं ? मेरे पैसे तो आपने कल ही दे दिया था !
मालिक ने कहा – ये पेंट का पैसा नहीं है, बल्कि ये उस नाव में जो “छेद” था, उसको रिपेयर करने का पैसा है !
पेंटर ने कहा – अरे साहब, वो तो एक छोटा सा छेद था, सो मैंने बंद कर दिया था। उस छोटे से छेद के लिए इतना पैसा मुझे, ठीक नहीं लग रहा है !
मालिक ने कहा – दोस्त, तुम्हें पूरी बात पता नहीं !अच्छा में विस्तार से समझाता हूँ। जब मैंने तुम्हें पेंट के लिए कहा तो जल्दबाजी में तुम्हें ये बताना भूल गया कि नाव में एक छेद है उसको रिपेयर कर देना !
और जब पेंट सूख गया, तो मेरे दोनों बच्चे उस नाव को समुद्र में लेकर नौकायन के लिए निकल गए !
मैं उस वक़्त घर पर नहीं था, लेकिन जब लौट कर आया और अपनी पत्नी से ये सुना कि बच्चे नाव को लेकर नौकायन पर निकल गए हैं !

तो मैं बदहवास हो गया। क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में तो छेद है !

मैं गिरता पड़ता भागा उस तरफ, जिधर मेरे प्यारे बच्चे गए थे। लेकिन थोड़ी दूर पर मुझे मेरे बच्चे दिख गए, जो सकुशल वापस आ रहे थे !

अब मेरी ख़ुशी और प्रसन्नता का आलम तुम समझ सकते हो !

फिर मैंने छेद चेक किया, तो पता चला कि, मुझे बिना बताये तुम उसको रिपेयर कर चुके हो !
तो मेरे दोस्त उस महान कार्य के लिए तो ये पैसे भी बहुत थोड़े हैं !

मेरी औकात नहीं कि उस कार्य के बदले तुम्हे ठीक ठाक पैसे दे पाऊं !

जीवन मे “भलाई का कार्य” जब मौका लगे हमेशा कर देना चाहिए, भले ही वो बहुत छोटा सा कार्य ही क्यों न हो !

क्योंकि कभी कभी वो छोटा सा कार्य भी किसी के लिए बहुत अमूल्य हो सकता है।

🙏🌹 सभी मित्रों को जिन्होने ‘हमारी जिन्दगी की नाव’ कभी भी रिपेयर की है उन्हें हार्दिक धन्यवाद ….. 🌹
🙏 और सदैव प्रयत्नशील रहें कि हम भी किसी की नाव रिपेयरिंग करने के लिए हमेशा तत्पर रहें!! 🙏

🌹🙏जय श्री राधे कृष्णा 🙏🌹

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आज इस पोस्ट को पढ़कर सारी ज़िन्दगी की टेंशन खत्म हो जायेगी

बस धैर्य ओर शांति से पढ़े

POWER OF POSITIVE THOUGHT

एक व्यक्ति काफी दिनों से चिंतित चल रहा था जिसके कारण वह काफी चिड़चिड़ा तथा तनाव में रहने लगा था। वह इस बात से परेशान था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी ना किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ आना जाना लगा ही रहता है…

इन्ही बातों को सोच सोच कर वह काफी परेशान रहता था तथा बच्चों को अक्सर डांट देता था तथा अपनी पत्नी से भी ज्यादातर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा चलता रहता था

एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये, वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था तो उसने बेटे को डांट कर भगा दिया. लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा शांत हुआ तो, वह बेटे के पास गया तो देखा कि बेटा सोया हुआ है, और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है। उसने कॉपी लेकर देखी, और जैसे ही उसने कॉपी नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी

होमवर्क का टाइटल था

वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं, लेकिन बाद में वे अच्छी ही होती हैं

इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया बच्चे ने लिखा था •••

● मैं अपने फाइनल एग्जाम को बहुंत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन इनके बाद स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जाती हैं

● मैं ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाइयों को बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं

● मैं सुबह – सुबह जगाने वाली उस अलार्म घड़ी को बहुत धन्यवाद् देता हूँ जो मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ

● मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बहुत बुरी लगती है लेकिन वो मेरे लिए खिलौने लाते हैं, मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे अच्छी अच्छी चीजें खिलाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त सोहन के तो पिता ही नहीं हैं

बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग गया हो। उसकी सोच बदल सी गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार बार घूम रही थी। खासकर वह last वाली लाइन। उसकी नींद उड़ गयी थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में सोचना शुरू किया

●● मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि मेरे पास घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास घर नहीं है

●● मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, इसका मतलब है कि मेरा परिवार है, बीवी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो दुनियाँ में बिल्कुल अकेले हैं

●● मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक हैसियत है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले लोग हैं

हे ! मेरे भगवान् ! तेरा बहुंत बहुंत शुक्रिया ••• मुझे माफ़ करना, मैं तेरी कृपा को पहचान नहीं पाया

इसके बाद उसकी सोच एकदम से बदल गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म हो गयी। वह एकदम से बदल सा गया। वह भागकर अपने बेटे के पास गया और सोते हुए बेटे को गोद में उठाकर उसके माथे को चूमने लगा और अपने बेटे को तथा ईश्वर को धन्यवाद देने लगा

हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक नज़रिये से देखते रहेंगे तब तक हम परेशानियों से घिरे रहेंगे लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्तिथियों को सकारात्मक नज़रिये से देखेंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए – नए रास्ते दिखाई देने लगेंगे

अगर आपको बात अच्छी लगे तो उसका अनुकरण करके जिन्दगीको खुशहाल बनाइये
🙏

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ભીખુદાનભાઇ ગઢવી નો એક જોક યાદ છે???…

નવા વર્ષના દિવસે એક નામાંકિત સ્પ્રે……વાળાની દુકાનમા…. ડબ્બાવાળો સંડાસ સફાઈ કામદાર સફાઈ કરવા આવીયો .. તો દુકાનદારને થયું કે આ બિચારો આખું વરસ સફાઈ કરે છે તો આ નવા વર્ષે આને સારા માં સારો સ્પ્રે ગિફ્ટ આપું.. પેલા ને સ્પ્રે આપતા પહેલા એના કપડાં પર સ્પ્રે લગાવી ને કહીયું લે મેપા તારી આ નવા વર્ષ ની બોણી…પણ સ્પ્રે ની સુગંધ નાક માં જતા જ મેપો તો બેભાન થય ગયો ને પગ ઘસવા મંડિયો.. લોકો ભેગા થય ગયા ને દુકાનદાર ને ખિજાવા માંડયા .. કે શેઠ આ શું કરીયું કે મેપો બેભાન થય ગયો .. શેઠ તો બિચારો મુંજાય ગયો..

ત્યાં મેપા ની ઘરવાલી ડબ્બો લય ને ત્યાં આવી .. ટોળું જોયું તો ત્યાં ગઇ ને મેપાની હાલત જોય ને

મેપી કે મારા મેપા ને શું થયું શેઠ.. 😡…..

શેઠ કે મેપીબેન કાંઈ નથી કરિયું .. સારા માં સારો સ્પ્રે બોણી માં આપીયો ને એના કપડાં પર લગાવીઓ તો એ બેભાન થય ગયો…

એ સાંભળીને મેપી હસવા લાગી ..

બધાને કહે દૂર જવો .. અને એમ કહી ને સાથે લાવેલી સંડાસ નો ડબ્બો મેપા ના નાક ઉપર ઊંધો રાખીયો તો મેપો તરત બેઠો થઈ ગયો 😃🤣..

મેપી પેલા શેઠ ને કહે .. શેઠ અમારા નસીબ માં સુગંધ છે જ નહીં અમે અને અમારી પેઢીઓ દુર્ગંધ થી ટેવાઇ ગયેલ છે.. એટલે મેપો સુગંધ ના કારણે બેભાન થઇ ગયેલો.. 😃😃🤣

બોધ :- આવીજ રીતે ભારત ના નાગરિકો 70 વરસ થી સડેલા અર્થતંત્ર થી એવા ટેવાઈ ગયા છે .. એને આ 3 વર્ષ ની નવી કેડી ઓ પર ચાલવાની આદત નથી .. નોટબંધી.. GST.. એ બધા નવા રસ્તાઓ છે… સાલ્લુ એક ગુજરાતી થઇ ને આપણા પોતાના સપૂત ને આપણે ઓળખી નથી શકતા..

… જો આ માણસ સત્તાનો જ લાલચુ હોત તો નોટબંધ ને GST શું કામ લાવત..

BJP .. Congress .. બધી પાર્ટીઓ ભૂલી જાવ સાહેબ .. એ માણસ માટે તો ગૌરવ લો… સાહેબ કે આપણો ગુજરાતી છે.. જેવો છે એવો આપણો તો છે.. મને આ માણસ માટે હંમેશા ગૌરવ છે ને રહેશે…… જો ગોળીઓ નો વરસાદ થતો હોય ને તો આ માણસ ની ઢાલ બની ને ફના પણ થાય જાવ ..

આજ આ ગુજરાતી નો હાથ પકડો ..ગુજરાત ને અને ભારત ને બચાવવા નો મોકો ફરી કયારેય નહીં મળે……

70 વર્ષ ની દુર્ગંધ માંથી બહાર આવી ને નવી સુગંધ લેવા ની ટેવ પાડો … ચંદન માંથી સુગંધ મેળવવાં એને ઘસવું પડે..

મોરારીબાપુ જેવા મહાત્મા પણ કહે છે કે એક ગુજરાતી તરીકે આપણે મોદીજી માટે ગૌરવ હોવું જ જોઈએ…..🙏🏻

Posted in मंत्र और स्तोत्र

Audio – Tulsi Poojan
तुलसी पूजन के सम्पूर्ण श्लोक, म्यूजिक, महिमा आदि का आॅडियो निचे दिए लिंक मे दिया जा रहा है। आप इसे सुनकर विधि पूर्वक तुलसी पूजन सम्पन्न कर सकते है।

Posted in रामायण - Ramayan

नारी गहने क्यों पहनती है ?????
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भगवान राम ने धनुष तोड दिया था, सीताजी को सात फेरे लेने के लिए सजाया जा रहा था तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी, ‘‘माताश्री इतना श्रृंगार क्यों ?’’
‘‘बेटी विवाह के समय वधू का 16 श्रृंगार करना आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार वर या वधू के लिए नहीं किया जाता, यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है?’’ उनकी माताश्री ने उत्तर दिया था।
‘‘अर्थात?’’ सीताजी ने पुनः पूछा, ‘‘इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध?’’
‘‘बेटी, मिस्सी धारण करने का अर्थ है कि आज से तुम्हें बहाना बनाना छोड़ना होगा।’’
‘‘और मेहंदी का अर्थ?’’
मेहंदी लगाने का अर्थ है कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।’’
‘‘और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी?’’
‘‘बेटी! काजल लगाने का अर्थ है कि शील का जल आंखों में हमेशा धारण करना होगा अब से तुम्हें।’’
‘‘बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री?’’
‘‘बेंदी का अर्थ है कि आज से तुम्हें शरारत को तिलांजलि देनी होगी और सूर्य की तरह प्रकाशमान रहना होगा।’’
‘‘यह नथ क्यों?’’
‘‘नथ का अर्थ है कि मन की नथ यानी किसी की बुराई आज के बाद नहीं करोगी, मन पर लगाम लगाना होगा।’’
‘‘और यह टीका?’’
‘‘पुत्री टीका यश का प्रतीक है, तुम्हें ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जिससे पिता या पति का घर कलंकित हो, क्योंकि अब तुम दो घरों की प्रतिष्ठा हो।’’
‘‘और यह बंदनी क्यों?’’
‘‘बेटी बंदनी का अर्थ है कि पति, सास ससुर आदि की सेवा करनी होगी।’’
‘‘पत्ती का अर्थ?’’
‘‘पत्ती का अर्थ है कि अपनी पत यानी लाज को बनाए रखना है, लाज ही स्त्री का वास्तविक गहना होता है।’’
‘‘कर्णफूल क्यों?’’
‘‘हे सीते! कर्णफूल का अर्थ है कि दूसरो की प्रशंसा सुनकर हमेशा प्रसन्न रहना होगा।’’
‘‘और इस हंसली से क्या तात्पर्य है?’’
‘‘हंसली का अर्थ है कि हमेशा हंसमुख रहना होगा सुख ही नहीं दुख में भी धैर्य से काम लेना।’’
‘‘मोहनलता क्यों?’’
‘‘मोहनमाला का अर्थ है कि सबका मन मोह लेने वाले कर्म करती रहना।’’
‘‘नौलखा हार और बाकी गहनों का अर्थ भी बता दो माताश्री?’’
‘‘पुत्री नौलखा हार का अर्थ है कि पति से सदा हार स्वीकारना सीखना होगा, कडे का अर्थ है कि कठोर बोलने का त्याग करना होगा, बांक का अर्थ है कि हमेशा सीधा-सादा जीवन व्यतीत करना होगा, छल्ले का अर्थ है कि अब किसी से छल नहीं करना, पायल का अर्थ है कि बूढी बडियों के पैर दबाना, उन्हें सम्मान देना क्योंकि उनके चरणों में ही सच्चा स्वर्ग है और अंगूठी का अर्थ है कि हमेशा छोटों को आशीर्वाद देते रहना।’’
‘‘माताश्री फिर मेरे अपने लिए क्या श्रंृगार है?’’
‘‘बेटी आज के बाद तुम्हारा तो कोई अस्तित्व इस दुनिया में है ही नहीं, तुम तो अब से पति की परछाई हो, हमेशा उनके सुख-दुख में साथ रहना, वही तेरा श्रृंगार है और उनके आधे शरीर को तुम्हारी परछाई ही पूरा करेगी।’’
‘‘हे राम!’’ कहते हुए सीताजी मुस्करा दी। शायद इसलिए कि शादी के बाद पति का नाम भी मुख से नहीं ले सकेंगी, क्योंकि अर्धांग्नी होने से कोई स्वयं अपना नाम लेगा तो लोग क्या कहेंगे.. 🙏

!! जय श्री राम !!
लेख गीत प्रलेख लिखें, लिखें कथा संदेश।
नित नूतन हम धर्म की, बातें करें विशेष
!! जय श्री राम !!

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

સાવરકરની આંદામાનની કાળા પાણીની સજા અને પિટિશન કેવા હતા?

ઝીરો લાઈન : ગીતા માણેક

સૌજન્ય:- http://sandesh.com/savarkar-andaman-black/

“એકસરખું કોલુ ફેરવ્યા કરવાથી તમ્મર આવતાં. શરીર એટલું દુખતું કે પાટિયા પર સૂવા માટે આડા પડીએ તો ઊંઘ આવવાને બદલે આખું શરીર દુખવા માંડતું ને તાવ ભરાતો…કોલુ (ઘાણીમાં તેલ કાઢવા માટે ફેરવવો પડતો લાકડાનો દાંડો) ફેરવતી વખતે પરસેવાથી તરબોળ થયેલા શરીર પર ઊડી રહેલો તે ભૂસો, પીસાઈ-પીસાઈને નીકળતો એ લોટ તેમજ કચરા વડે ગંદું બનેલું ઉઘાડું શરીર…નહાવા માટે મર્યાદિત અને સમુદ્રનું ખારું પાણી…રાત્રે કેદીને છ-સાત વાગ્યે પૂરી દેવાતો અને સવારે છ વાગ્યે ખોલવામાં આવતો. તે સમય દરમિયાન પેશાબ માટે માત્ર એક નાનકડી માટલી અંદર મૂકવામાં આવતી. રાતના બાર કલાક દરમિયાન કેદીને ઝાડે જવાની જરૂર પડે અને વોર્ડર પરવાનગી આપે તો જ બહાર જઈ શકતો. આવી પરવાનગી ન મળે અને મલાવરોધ અશક્ય થવાથી કોટડીમાં જ શૌચ કરવું પડે અને આઠ-દસ ફૂટની કોટડીમાં તે મળની પાસે જ માથું મૂકીને સૂવું પડે.” આ શબ્દો છે વીર સાવરકર દ્વારા આંદામાનની કાળા પાણીની સજાના દિવસોના તેમનાં સંસ્મરણોના. માઝી જન્મઠેપ એટલે કે મારી જનમટીપ નામના પુસ્તકમાં તેમણે લગભગ ૧૦ વર્ષ કાળા પાણીની સજા ભોગવી એનો વિસ્તારપૂર્વક વૃત્તાંત છે. એ પુસ્તકમાં જે યાતનાઓની વાત આલેખી છે એ વાંચતા-વાંચતા અરેરાટી ન થઈ જાય, આંખમાં આંસુ ન આવી જાય તો જ નવાઈ!

બધી જ સ્થાવરજંગમ મિલકતની જપ્તી, ૫૦ વર્ષ માટે આંદામાનમાં કાળા પાણીની સજા આખા ભારતમાં અત્યાર સુધી ફ્ક્ત વીર સાવરકરને ફ્રમાવવામાં આવી હતી. આવી સજા ફ્ક્ત તેમને જ નહીં પણ તેમના પિતા અને ભાઈને પણ કરવામાં આવી હતી. વીર સાવરકરે આવી કાળા પાણીની સજાની યાતના ભોગવ્યા બાદ માફી માગી હતી અને છુટકારો મેળવ્યો હતો એવું ઘણાં લોકો માને છે. અત્યારે આ મુદ્દે રાજકારણીઓ સામસામે આવી ગયા છે અને આરોપ-પ્રતિઆરોપ કરી રહ્યા છે. આપણે એ વિશે કોઈ વિશ્લેષણ કરવું નથી. માત્ર તથ્યો જાણવા અને સમજવાનો પ્રયાસ કરીશું. વીર સાવરકર વિશે આપણામાંના ઘણાંને બહુ માહિતી નથી. હકીકત શું હતી એની વિગતો માત્ર ઇતિહાસનાં પાનાંઓ પરથી કાઢીને અહીં મૂકવાનો પ્રયાસ કર્યો છે.

વીર સાવરકરે ૫ ઓક્ટોબર, ૧૯૧૭ના બ્રિટિશ સરકારને જે એક લેખિત અરજી કરી હતી, એની પ્રત લંડન વસતા સંકેત કુલકર્ણી પાસેથી પ્રાપ્ત થઈ છે. સાડા પાંચ ફુલસ્કેપ પેપર ભરીને અંગ્રેજીમાં ટાઇપ કરેલી આ પિટિશનનો સ્થળસંકોચને કારણે સંપૂર્ણ અનુવાદ કરીને આપી નથી શકતા, પરંતુ એનો સાર મૂકવાનો અહીં પ્રયત્ન કરી રહ્યા છીએ.

આંદામાનના યાતનામય દિવસોની કથા ‘માઝી જન્મઠેપ’ વાંચનારને ખ્યાલ આવ્યા વિના ન રહે કે આવી દોઝખને પણ સારું કહેવડાવે એવી સ્થિતિમાં રહ્યા પછી પણ સાવરકર ક્યાંય નિરાશ થયા નહોતા. સાડા પાંચ પાનાની આ અરજીમાં એ જ સૂર છે જેનો તેમણે જેલના અનુભવોના પુસ્તકમાં પણ ઉલ્લેખ કર્યો છે. “આંદામાનની જેલમાં રહીને માતૃભૂમિની સેવા કરી શકાતી નથી, સમય બરબાદ થાય છે. આ અફ્સોસ તેમને ફ્ક્ત પોતાના માટે નહીં ત્યાં પુરાયેલા તમામ રાજકીય કેદીઓ માટે છે. રાજદ્રોહ માટે જેલમાં સબડી રહેલા લોકોની જિંદગી અહીં જ વીતશે તો સર્વસામાન્ય લોકોનું નેતૃત્વ કોણ કરશે એનો તરફ્ડાટ છે.” આ જ કારણસર કેદી નંબર ૩૨૭૭૮ વી.ડી. (વિનાયક દામોદર) સાવરકરે એ અરજીમાં લખ્યું છે, ‘હવે કાળ બદલાયો છે. જગતની કોઈ પણ સરકાર હવે રાજકેદીઓને જેલમાં રાખતી નથી. મને ભલે ન છોડવો હોય તો ન છોડો પણ અહીંના બાકીના રાજકેદીઓને છોડો. જો તેમને છોડવામાં તમને મારે કારણે અડચણ થતી હોય તો મને ન છોડતા પણ તેમને છોડી મૂકો. જો તમે તેમને છોડી મૂકશો તો મને એટલો જ આનંદ થશે જેટલો મને મારી મુક્તિથી થાય.’

તો આવો છે વી. ડી. સાવરકરની આંદામાન જેલમાંથી અંગ્રેજ સરકારને કરવામાં આવેલી પીટીશનની વિગતોનો ટૂંકસાર.

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

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धर्म और संस्कृति ग्रुप
की सादर भेंट
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हँस जैन रामनगर खण्डवा मध्यप्रदेश
98272 14427

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प्रभु कल्याण करते हैं
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संतों की एक सभा चल रही थी.
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किसी ने एक दिन एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संत जन जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें.
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संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था. उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे.
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वह सोचने लगा- अहा ! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है !
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एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा.
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संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा. ऐसी किस्मत किसी किसी की ही होती है.
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घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा था.
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किसी काम का नहीं था. कभी नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है.
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फिर एक दिन एक कुम्हार आया. उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और गधे पर लादकर अपने घर ले गया.
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वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा. फिर पानी डालकर गूंथा. चाकपर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा. फिर थापी मार-मारकर बराबर किया.
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बात यहीं नहीं रूकी. उसके बाद आंवे के आग में झोंक दिया जलने को.
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इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेज दिया. वहां भी लोग ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं ?
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ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये ! मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था.
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रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो. मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है ! भगवान ने कृपा करने की भी योजना बनाई है यह बात थोड़े ही मालूम पड़ती थी !
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किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया. तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी भगवान् की कृपा थी.
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उसका वह गूंथना भी भगवान् की कृपा थी.
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आग में जलाना भी भगवान् की कृपा थी और बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भगवान् की कृपा ही थी.
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अब मालूम पड़ा कि सब भगवान् की कृपा ही कृपा थी !
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परिस्थितियां हमें तोड़ देती हैं. विचलित कर देती हैं- इतनी विचलित की भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं क्यों हम सबमें शक्ति नहीं होती ईश्वर की लीला समझने की, भविष्य में क्या होने वाला है उसे देखने की.
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इसी नादानी में हम ईश्वर द्वारा कृपा करने से पूर्व की जा रही तैयारी को समझ नहीं पाते. बस कोसना शुरू कर देते हैं कि सारे पूजा-पाठ, सारे जतन कर रहे हैं फिर भी ईश्वर हैं कि प्रसन्न होने और अपनी कृपा बरसाने का नाम ही नहीं ले रहे.
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पर हृदय से और शांत मन से सोचने का प्रयास कीजिए, क्या सचमुच ऐसा है या फिर हम ईश्वर के विधान को समझ ही नहीं पा रहे ?
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आप अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को चलाने को नहीं देते जिसे अच्छे से ड्राइविंग न आती हो तो फिर ईश्वर अपनी कृपा उस व्यक्ति को कैसे सौंप सकते हैं जो अभी मन से पूरा पक्का न हुआ हो.
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कोई साधारण प्रसाद थोड़े ही है ये, मन से संतत्व का भाव लाना होगा.
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ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा की घड़ी में भी हम सत्य और न्याय के पथ से विचलित नहीं होते तो ईश्वर की अनुकंपा होती जरूर है. किसी के साथ देर तो किसी के साथ सवेर.
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यह सब पूर्वजन्मों के कर्मों से भी तय होता है कि ईश्वर की कृपादृष्टि में समय कितना लगना है. घड़े की तरह परीक्षा की अवधि में जो सत्यपथ पर टिका रहता है वह अपना जीवन सफल बना सकता हैं।

हंस जैन, रामनगर खण्डवा 98272 14427

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Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

23 दिसंबर / 8 पोह आज के दिन चमकौर की जुंग में शहीद होए गुरु गोबिंद सिंह जी बड़े साहिबज़ादे, साहिबज़ादा अजीत सिंह साहिबज़ादा जुझार सिंह और अन्य सिखों को शत शत प्रणाम

इतिहास

पूरे हिदुस्तान में स्वयं का राज स्थापित करने के मुगल सम्राट औरंगजेब के सपने को तब बड़ा झटका लगा जब, सिखों के दसवें गुरू गुरू गोबिंद सिंह जी महाराज ने उसकी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और सिखों के साथ-साथ हिन्दु धर्म की रक्षा के लिए एक अभेद दीवार बन कर खडे़ हो गए। इससे गुस्साएं औरंगजेब ने सरहिंद के नवाब वज़ीर खान की अगुवार्इ में अन्य मुगल राजाओं की लम्बी चौड़ी फौज जिसमें कुल सैनिकों की संख्या 10 लाख थी। गुरू गोविद सिंह जी महाराज को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए आनंदपुर साहिब (पंजाब) भेज दी। वज़ीर खान की अगुवार्इ में आयी फौज ने 6 महीनें तक आनंदपुर साहिब (पंजाब) की सरहदों को घेरे रखा। मगर अंदर जाने की हिम्मत नही कर पाये साथ ही उनका मानना था कि जैसे ही नगर के अंदर राशन-पानी समाप्त हो जाएगा गुरू जी स्वयं आकर सर्मपण कर देंगे। मगर ऐसा सोचना मुगलों की नासमझी साबित हुई

उसके बाद मुग़ल और उनके साथ जो हिन्दू राजे भी थे उन्होंने गुरु जी को कुरान और गायें की कसम खाई कि आप यह किला छोड़ दे और हम आपको कुछ नहीं कहेंगे, गुरु जी ने ऐसा करने से मना कर दिया था मगर कुछ सिखों के कहने पर, कि वो अपने धरम की कसम खा रहें है, तो हमे उनपे यकीं करना चाहिए, मगर गुरु जी ने कहा कि, वो आपको धोखा दे सकते है, मगर गुरु जी अपने सिखों की बात भी टाल नहीं सकते थे, इसलिए परमात्मा के हुकम को मानते हुए आनंदगढ़ का किला परिवार समेत छोड़ कर निकले, अभी कुछ ही दूर गए थे कि मुगलो और बाइसधार कि राजाओं ने पीशे से हमला कर दिया

उस हमले में भी बुहत सारे सिख शहीद हो गए थे

गुरु जी का पूरा परिवार जो कि सरसा नदी को पार करने के वक़्त ३ हिस्सों में बट गए, सरसा नदी में उस वक़्त भरी बरसात के कारण बाढ़ आई हुई थी, तो एक तरफ गुरु जी की पत्नी और भाई मनी सिंह बट गए, दूसरी तरफ माता गुज़र कौर जी और २ छोटे साहिबज़ादे बट गए, और तीसरी तरफ गुरु गोबिंद सिंह जी, २ बड़े साहिबज़ादे और कुछ सिख जो बच गए वो एक तरफ बट गए, सरसा नदी में बुहत सारे सिख और बेशकीमती खजाना उसमे बह गया

अपने साथियों के साथ आगे बढ़ते हुए गुरूजी पंजाब के रूपनगर में सिथत सरहिंद नहर के बसे चमकौर नामक स्थान पहुंचे। जहां स्थानीय लोगों ने उनका जमकर स्वागत किया। साथ ही एक स्थानीय निवासी स्वामी बुद्चंद ने अपनी कच्ची गढ़ी (किलानुमा हवेली) गुरूजी का ठहरने के लिए दे दी। गुरूजी को हवेली सामरिक दृषिट से बहुत उपयोगी लगी उन्होंने वही अपने साथी सैनिकों के साथ रूकने का निर्णय किया।

23 दिसंबर 1704 काले घने बादलों से घिरे चमकौर में हल्की-हल्की बारिश और ठण्डी हवा के बीच दुनिया का एक मात्र अनोखा युद्ध प्रारंभ हो चुकाँ था सिख सूरमा अपने दिल की गरमी मुगलों पर उढ़ेलने के लिए बैचेन थे

एक तरफ जहाँ 10 लाख मुगल सैनिक थे वही दूसरी ओर मात्र 40 सिख यौद्धा गुरूजी और उनके 2 साहिबजादे। गुरूजी ने रणनीती बनाकर पांच-पांच सिख सैनिको का जत्था मुगलों से लड़ने के लिए किले से बाहर भेजना शुरू कर दिया। पहले जत्थे में भार्इ हिम्मत सिंह जी अपने बाकी के चार साथियों के साथ मैदान में उतर गए। गुरूजी स्वयं भी किले की डियोढ़ी (छत) से मुगलों पर तीरों की बौछार करने लगे।

लम्बे समय तक खूब लोहे से लोहा बजा फिर पहला जत्था शहीद हो गया। गुरू जी ने फिर दूसरा जत्था युद्ध के लिए बाहर भेजा देखते ही देखते मुगलों के पैर उखड़ने लगे उनमें अजीब सा डर घर कर गया। हर किसी की समझ से बाहर था कि कैसे मात्र 40 सिख 10 लाख की फौज से लोहा ले सकते है

जल्द ही शाम घिर आर्इ गुस्साएं वज़ीर खान ने अपने कर्इ साथी हिदायत खान, फूलान खान, इस्माइल खान, असलम खान, जहान खान, खलील खान, भूरे खान को किले के भीतर चलने को कहाँ आदेश पा कर सारे मुगल कच्ची डियोढ़ी में घुसने की तैयारी करने लगे।

खबर पाकर सिख सैनिकों ने गुरूजी से उनके पुत्रों सहित डियोढ़ी से निकल जाने का आग्रह किया क्योंकि इतना बढ़ा हमला रोक पाना मुश्किल था। इस पर गुरूजी ने कहाँ कि तुम सारे मेरे साहिबजादे ही तो हो मैं तुम्हें छोड कर नहीं जा सकता।

इस पर उनके बडे़ साहिबजादे साहिबज़ादा अजीत सिंह ने गुरू जी से युद्ध स्थल में जाने की आज्ञा मांगी। सैकडों मुगलों को मौत के घाट उतारने के बाद भार्इ अजीत सिंह भी शहीद हो गए।

उसके बाद साहिबज़ादा जुझार सिंह ने रण भूमि में मोर्चा संभाला वो भी दुश्मनों के लिए काल साबित हुए बाद में उन्हें भी वीरगति प्राप्त हुर्इ। उस समय बडे़ साहेबजादे अजीत सिंह 18 वर्ष के थे जबकि छोटे साहिबजादे भार्इ जुझार सिंह की उम्र मात्र 14 वर्ष थी।

((पंजाब के रूपनगर से 15 किलोमीटर दूर सिथत चमकौर नामक स्थान सिख इतिहास की शौर्य गाथा का जीवंत उदाहरण है। यहाँ के प्रसिद्ध राजा विडिचंद बाग में ऐतिहासिक गुरूद्वारा श्री कतलगढ़ साहिब स्थापित है। जो चमकौर के युद्ध में शहीद हुए सिख सैनिकों को सर्मपित है ))