Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

चेहरा नहीं व्यवहार बनाएँ सुन्दर…✍🏻
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एक सभा में गुरु जी ने प्रवचन के दौरान
एक 30 वर्षीय युवक को खडा कर पूछा कि
– आप मुम्बई मेँ जुहू चौपाटी पर चल रहे हैं और सामने से एक सुन्दर लडकी आ रही है तो आप क्या करोगे ?
युवक ने कहा – उस पर नजर जायेगी, उसे देखने लगेंगे।
गुरु जी ने पूछा – वह लडकी आगे बढ गयी तो क्या पीछे मुडकर भी देखोगे ?
लडके ने कहा – हाँ, अगर धर्मपत्नी साथ नहीं है तो। (सभा में सभी हँस पडे)
गुरु जी ने फिर पूछा – जरा यह बताओ वह सुन्दर चेहरा आपको कब तक याद रहेगा ?
युवक ने कहा 5 – 10 मिनट तक, जब तक कोई दूसरा सुन्दर चेहरा सामने न आ जाए।

गुरु जी ने उस युवक से कहा – अब जरा सोचिए,
आप जयपुर से मुम्बई जा रहे हैं और मैंने आपको एक पुस्तकों का पैकेट देते हुए कहा कि मुम्बई में अमुक महानुभाव के यहाँ यह पैकेट पहुँचा देना।
आप पैकेट देने मुम्बई में उनके घर गए।
उनका घर देखा तो आपको पता चला कि ये तो बडे अरबपति हैं।
घर के बाहर 10 गाडियाँ और 5 चौकीदार खडे हैं। आपने पैकेट की सूचना अन्दर भिजवाई तो वे महानुभाव खुद बाहर आए। आप से पैकेट लिया। आप जाने लगे तो आपको आग्रह करके घर में ले गए। पास में बैठकर गरम खाना खिलाया। जाते समय आप से पूछा – किसमें आए हो ? आपने कहा- लोकल ट्रेन में। उन्होंने ड्राइवर को बोलकर आपको गंतव्य तक पहुँचाने के लिए कहा और आप जैसे ही अपने स्थान पर पहुँचने वाले थे कि उस अरबपति महानुभाव का फोन आया – भैया, आप आराम से पहुँच गए।
अब आप बताइए कि आपको वे महानुभाव कब तक याद रहेंगे ?
युवक ने कहा – गुरु जी ! जिंदगी में मरते दम तक उस व्यक्ति को हम भूल नहीं सकते।

गुरु जी ने युवक के माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए कहा
“यह है जीवन की हकीकत।”

🍃 “सुन्दर चेहरा थोड़े समय ही याद रहता है,
पर हमारा सुन्दर व्यवहार जीवन भर याद रहता है।” 🍃

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🙏🏼🙏🏼 अरी हो सखी
आज आज जब मैं सुबह किशोरी जी के सामने मंदिर में बैठकर उनका ध्यान कर रही थी ना जाने क्यों मुझे ठाकुर किशोरी जी की निकुंज लीला के दर्शन करने की लालसा पैदा हुई ।मैं तो निकुंज लीला के बारे में मैं सोच ही रही थी ना जाने कब ठाकुर जी और किशोरी कृपा से मैं निकुंज लीला में प्रवेश कर गई। मैं वहां पहुंच गई जहां ठाकुर जी और किशोरी जू नित्य बिहार करते थे मैंने हाथ में जल का एक लोटा लिया और कुछ फल काटकर रख लिए और अपने हाथ से बनाई हुई एक मोतियों की माला ले गई और मैंने कमल के फूलों का बिछोना वहां बिछा दिया जहां पर ठाकुर जी और किशोरी जी नित्य विहार करने के बाद विश्राम करते थे। मैंने जल का लोटा वहां रखा मोतियों की माला और फलों को वहां रखकर कुछ दूरी पर जाकर एक वृक्ष की ओट में बैठ गई ।तभी ठाकुर जी और की किशोरी जू नृत्य विहार करने के लिए वहां आए। ठाकुर जी और किशोरी जी ने एक दूसरे के हाथ में हाथ डाला हुआ था।किशोरी जी की सुंदरता को देखकर तो चांद भी बादलों की ओट में छुप गया कहीं किशोरी जी के रूप की तुलना मुझसे की गई तो कहीं मैं फीका ना पड़ जाऊं तो मुझे शर्मिंदा ना होना पड़े। और लोग मुझे तुच्छ समझे ।इसलिए वह बादलों की ओट से तब तक छिपा जब तक ठाकुर जी और लाडली जू विहार करते रहे । किशोरी जी का रूप इतना सुंदर ,नीले रंग की लहंगा चोली पहनी हुई ,गले में बड़े-बड़े हार ,माथे पर टीका ,पांव में बड़ी-बड़ी पायल डालकर और ठाकुर जी के हाथ में हाथ डालकर विहार कर रहे थे। उनकी वेणी इतनी सुंदर गुथी हुई थी और उस पर गजरा लगा हुआ था ।ठाकुर जी अपनी किशोरी जी की सुंदरता को देख देखकर निहाल हो रहे थे ।इतनी सुंदर वेणी को देखकर और उस पर गजरा हुए लगा हुआ देखकर ठाकुर जी को ठिठोली सूजी। और उन्होंने वेनी को हाथ लगाते लगाते थोड़ी सी किशोरी जू की वेनी को खींच दिया ।किशोरी जी को लगा कि शायद मेरी वेनी लता में अटक गई है ।जब उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा तो वेणी अटकी नहीं हुई थी। तब वह भृकुटी टेडी करके और अपने कटाक्ष नेत्रों से ठाकुर जी को देखती है तो ठाकुर जी मंद मंद मुस्कुरा रहे होते हैं तो किशोरी जो समझ जाती है यह शरारत ठाकुर जी की है तो वह बोली कान्हा तू ने जानबूझकर मेरी वेणी खींची है रुको मैं तुम्हें बताती हूं। तो यह कह कर वह ठाकुर जी के पीछे भागती हैं तो उनके पांव में बड़ी-बड़ी पायले कृष्ण कृष्ण की ध्वनि निकालती हुई सारे निकुंज में गूंजने लगी जब भागते भागते लाडली जू थक गई तो वह उस जगह पर आकर बैठ गई जहां पर मैंने कमल के फूलों का बिछौना बिछाया हुआ था और मान कर कर बैठ गई ।जब ठाकुर जी ने देखा कि किशोरी जो मान कर कर बैठ गई है तो उनके पास आ गए क्योंकि उनको अपनी लाडली के मान से बहुत डर लगता था तो आकर किशोरी जी के पास बैठ गए और किशोरी जू जानबूझकर अपने पांव को ऐसे देखने लगी जैसे कि उसमें कुछ चुभ गया है तो ठाकुर जी उसके पांव को पकड़ कर अपनी जांघ पर रखते हुए बोले क्या हुआ राधिके तो किशोरी जी खिलखिला कर हंसने लगी तो और शरारत से मुस्कुराने लगी ठाकुर जी भी साथ में हंसने लगे और कहने लगे राधिके भाग भाग कर थक गई होगी लो पानी पियो तो वह जल का लोटा जो मैंने रखा हुआ था उसमें से उसको किशोरी जू के अधरों पर लगा दिया और जो फल काटे हुए थे वह किशोरी जी के मुख में डाल दिए। तभी उनका ध्यान मोतियों की माला पर पड़ा । माला देखकर ठाकुर जी उसकी तरह बहुत आकर्षित हुए और उठाकर किशोरी जी के गले में डाल दी
और वह माला इतराती हुई किशोरी जी के ऊभरे हुए वक्ष स्थलों पर बहुत सुशोभित हो रही थी ।मैं वृक्ष की ओट में बैठकर यह सब देख रही थी और मैं बहुत खुश थी कि आज मैंने तो लाडली जू के दर्शन तो कर लिए लेकिन आज मैंने उस लोटे को जो कि उस मिट्टी से बना हुआ था वो मिट्टी जन्मों-जन्मों से इस इंतजार में थी कि कब मैं लोटे में बदलू और कब इसमें जल भरे और कम में किशोरी जी के अधरों तक पहुंचे। और वह जल जो हज़ारों बार कुएँ से बाहर आकर बार बार देख चुका था कि कब मैं लोटे में भरू और कब किशोरी जी के कंठ से उतरू और वह फल जो कि हजार बार वृक्षों से उतरकर हजार बार उनका जन्म हो चुका था और वह इस इंतजार में थे कि कब किशोरी जी के मुख तक पहुंचे ।और वह फूल जो कितनी बार लताओं से उतरकर कितनी बार हो दोबारा जन्म लेकर फिर लताओ पर लगे और इस विश्वास में थे कि कब किशोरी जी का चरण कमल उन पर पड़े। वह मोती जो हजारों जन्मों से सीपो में पैदा होकर फिर जन्म लेकर इंतजार में थे कि कब वह किशोरी जी के गले की शोभा को बढ़ाए इस तरह मेरे साथ इन्होंने भी किशोरी जी की कृपा प्राप्त की। यह सब बातें किशोरी जी जान गई और उन्होंने मुझे वृक्ष की ओट में देख लिया और मुस्कुराती हुई मेरी तरफ देख कर बोली आओ, सुरभि सखी !मेरे पास आओ तो मैं हैरान होती हुई किशोरी जी की तरफ देख रही थी कि आज किशोरी जी की कृपा दृष्टि मुझ पर पड़ गई है तो मैं किशोरी जो की तरफ ना जाकर उनकी उलटी दिशा में भागती हुई बोलती जा रही हूं ना ना किशोरी जू अगर मैं आपके पास आ गई तो आप मुझे अपना लोगे तब तो मैं आपकी हो जाऊंगी। मुझे तो आप अपने विरह में ही रहने दो। आप के विरह में मुझे आंसू बहाने दो ।आप के विरह में रहने वाली भक्ति मेरे लिए आपकी कृपा दृष्टि है ।इतना कहकर मैं भागती जा रही हूं और भागती जा रही हूं और ना जाने कब मेरी तंद्रा भंग हुई और मेरी आंखों से अश्रु धारा बह रही थी शरीर कांप रहा था ठाकुर जी और किशोरी जी की निकुंज लीला को देखकर मैं तो धन्य धन्य हो उठी ।
हे ठाकुर जी और लाडली जू अपनी कृपा दृष्टि हम पर हमेशा बनाए रखना।
दासी सुरभि के शब्दों से 🙏🏼🌹🙇🏻‍♀

Posted in सुभाषित - Subhasit

चला लक्ष्मीश्चला: *प्राणाश्चले जीवितमन्दिरे |
चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः||

मानव द्वारा अर्जित धन-संपत्ति अस्थायी और नष्ट होने वाली होती है तथा उसके शरीर रूपी मन्दिर में स्थित प्राण शक्ति जो उसे जीवित रखती है , वह भी अस्थायी है ओर कभी भी नष्ट हो सकती है | यह सारा संसार ही अस्थायी है और अकेला धर्म ( सद् आचरण और तत्सम्बन्धी नियमों का पालन करना ) ही अपरिवर्तनीय है |

Posted in मंत्र और स्तोत्र

महा मृत्युंजय मंत्र


महामृत्युंजय मंत्र की रचना कैसे हुई
किसने की महामृत्युंजय मंत्र की रचना और जाने इसकी शक्ति

शिवजी के अनन्य भक्त मृकण्ड ऋषि संतानहीन होने के कारण दुखी थे. विधाता ने उन्हें संतान योग नहीं दिया था.

*मृकण्ड ने सोचा कि महादेव संसार के सारे विधान बदल सकते हैं. इसलिए क्यों न भोलेनाथ को प्रसन्नकर यह विधान बदलवाया जाए.

*मृकण्ड ने घोर तप किया. भोलेनाथ मृकण्ड के तप का कारण जानते थे इसलिए उन्होंने शीघ्र दर्शन न दिया लेकिन भक्त की भक्ति के आगे भोले झुक ही जाते हैं.

*महादेव प्रसन्न हुए. उन्होंने ऋषि को कहा कि मैं विधान को बदलकर तुम्हें पुत्र का वरदान दे रहा हूं लेकिन इस वरदान के साथ हर्ष के साथ विषाद भी होगा.

*भोलेनाथ के वरदान से मृकण्ड को पुत्र हुआ जिसका नाम मार्कण्डेय पड़ा. ज्योतिषियों ने मृकण्ड को बताया कि यह विलक्ष्ण बालक अल्पायु है. इसकी उम्र केवल 12 वर्ष है.

*ऋषि का हर्ष विषाद में बदल गया. मृकण्ड ने अपनी पत्नी को आश्वत किया- जिस ईश्वर की कृपा से संतान हुई है वही भोले इसकी रक्षा करेंगे. भाग्य को बदल देना उनके लिए सरल कार्य है.

*मार्कण्डेय बड़े होने लगे तो पिता ने उन्हें शिवमंत्र की दीक्षा दी. मार्कण्डेय की माता बालक के उम्र बढ़ने से चिंतित रहती थी. उन्होंने मार्कण्डेय को अल्पायु होने की बात बता दी.

मार्कण्डेय ने निश्चय किया कि माता-पिता के सुख के लिए उसी सदाशिव भगवान से दीर्घायु होने का वरदान लेंगे जिन्होंने जीवन दिया है. बारह वर्ष पूरे होने को आए थे.

मार्कण्डेय ने शिवजी की आराधना के लिए महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और शिव मंदिर में बैठकर इसका अखंड जाप करने लगे.

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

समय पूरा होने पर यमदूत उन्हें लेने आए. यमदूतों ने देखा कि बालक महाकाल की आराधना कर रहा है तो उन्होंने थोड़ी देर प्रतीक्षा की. मार्केण्डेय ने अखंड जप का संकल्प लिया था.

यमदूतों का मार्केण्डेय को छूने का साहस न हुआ और लौट गए. उन्होंने यमराज को बताया कि वे बालक तक पहुंचने का साहस नहीं कर पाए.

इस पर यमराज ने कहा कि मृकण्ड के पुत्र को मैं स्वयं लेकर आऊंगा. यमराज मार्कण्डेय के पास पहुंच गए.

बालक मार्कण्डेय ने यमराज को देखा तो जोर-जोर से महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग से लिपट गया.

*यमराज ने बालक को शिवलिंग से खींचकर ले जाने की चेष्टा की तभी जोरदार हुंकार से मंदिर कांपने लगा. एक प्रचण्ड प्रकाश से यमराज की आंखें चुंधिया गईं.

शिवलिंग से स्वयं महाकाल प्रकट हो गए. उन्होंने हाथों में त्रिशूल लेकर यमराज को सावधान किया और पूछा तुमने मेरी साधना में लीन भक्त को खींचने का साहस कैसे किया?

*यमराज महाकाल के प्रचंड रूप से कांपने लगे. उन्होंने कहा- प्रभु मैं आप का सेवक हूं. आपने ही जीवों से प्राण हरने का निष्ठुर कार्य मुझे सौंपा है.

*भगवान चंद्रशेखर का क्रोध कुछ शांत हुआ तो बोले- मैं अपने भक्त की स्तुति से प्रसन्न हूं और मैंने इसे दीर्घायु होने का वरदान दिया है. तुम इसे नहीं ले जा सकते.

*यम ने कहा- प्रभु आपकी आज्ञा सर्वोपरि है. मैं आपके भक्त मार्कण्डेय द्वारा रचित महामृत्युंजय का पाठ करने वाले को त्रास नहीं दूंगा.

*महाकाल की कृपा से मार्केण्डेय दीर्घायु हो गए. उवके द्वारा रचित महामृत्युंजय मंत्र काल को भी परास्त करता है.

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સમજાય તેને અભિનંદન. 👇🏻🙏

જેઠાલાલ એક વાર ગટર સાફ કરવા ગટર માં ઉતાર્યો. ગટર સાફ કરતા કરતા એણે કેટલા બધા વંદા જોયા. બહાર નીકળી ને એણે ઘર ના બધા સદસ્યો ને બોલાવી ને કહ્યું કે અંદર ગટર માં ખૂબ બધા વંદા છે. પણ એના પપ્પા, મમ્મી, બા, બાપુજી, પત્ની, દીકરો કે દીકરી કોઈ માનવા તૈયાર ના થાય. કહે કે આપણા ઘર માં વંદા થોડા હોઈ! એણે પાડોશી ને બોલાવી ને કહ્યું તો પાડોશી પણ માને નહીં.

બધા ને સમજાવવા માટે શુ કરવું, શુ કરવું એનો વિચાર જેઠાલાલ રોજ કરે. પણ કાંઈ સુજે નહીં.

એક દિવસ જેઠાલાલ બજાર માં જઈ ને 20 રૂપિયા ની ફીનાઇલ લઈ આવ્યો અને ઘરે કોઈ ને ખબર ના પડે એ રીતે એ ફીનાઇલ ગટર માં નાખી દીધું.

ધીરે ધીરે જેમ ફીનાઇલ અંદર જતું રહ્યું એમ એમ બધા વંદા બહાર આવવા લાગ્યા. અને બધા ને એ વંદા દેખાતા થયા.

જે બરાડા પાડી પાડી ને કહેલા શબ્દો એ ના કર્યું એવડું મોટું કામ રૂ.20 ની ફીનાઇલ એ કરી બતાવ્યું.

સમજાય જાય તો સલામ. બાકી હરિ ૐ.

જેઠાલાલ એ ઘર ના બારી-દરવાજા અને ફર્નિચર માં ઉધઈ પણ જોઈ લીધી છે એના માટે ઈલાજ વિચારી રહ્યો છે. તમારી જાણ માટે.

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जानिए कैसे खत्म हुआ श्रीकृष्ण सहित पूरा यदुकुल?
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अठारह दिन चले महाभारत के युद्ध में रक्तपात के सिवाय कुछ हासिल नहीं हुआ। इस युद्ध में कौरवों के समस्त कुल का नाश हुआ, साथ ही पाँचों पांडवों को छोड़कर पांडव कुल के अधिकाँश लोग मारे गए। लेकिन इस युद्ध के कारण, युद्ध के पश्चात एक और वंश का खात्मा हो गया वो था ‘श्री कृष्ण जी का यदुवंश’।

गांधारी का श्राप
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महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा। गांधारी के श्राप से विनाशकाल आने के कारण श्रीकृष्ण द्वारिका लौटकर यदुवंशियों को लेकर प्रयास क्षेत्र में आ गये थे। यदुवंशी अपने साथ अन्न-भंडार भी ले आये थे। कृष्ण ने ब्राह्मणों को अन्नदान देकर यदुवंशियों को मृत्यु का इंतजार करने का आदेश दिया था। कुछ दिनों बाद महाभारत-युद्ध की चर्चा करते हुए सात्यकि और कृतवर्मा में विवाद हो गया। सात्यकि ने गुस्से में आकर कृतवर्मा का सिर काट दिया। इससे उनमें आपसी युद्ध भड़क उठा और वे समूहों में विभाजित होकर एक-दूसरे का संहार करने लगे। इस लड़ाई में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न और मित्र सात्यकि समेत सभी यदुवंशी मारे गये थे, केवल बब्रु और दारूक ही बचे रह गये थे। यदुवंश के नाश के बाद कृष्ण के ज्येष्ठ भाई बलराम समुद्र तट पर बैठ गए और एकाग्रचित्त होकर परमात्मा में लीन हो गए। इस प्रकार शेषनाग के अवतार बलरामजी ने देह त्यागी और स्वधाम लौट गए।

कैसे हुई श्रीकृष्ण की मृत्यु
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बलराम जी के देह त्यागने के बाद जब एक दिन श्रीकृष्ण जी पीपल के नीचे ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे, तब उस क्षेत्र में एक जरा नाम का बहेलिया आया हुआ था। जरा एक शिकारी था और वह हिरण का शिकार करना चाहता था। जरा को दूर से हिरण के मुख के समान श्रीकृष्ण का तलवा दिखाई दिया। बहेलिए ने बिना कोई विचार किए वहीं से एक तीर छोड़ दिया जो कि श्रीकृष्ण के तलवे में जाकर लगा। जब वह पास गया तो उसने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में उसने तीर मार दिया है। इसके बाद उसे बहुत पश्चाताप हुआ और वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीकृष्ण ने बहेलिए से कहा कि जरा तू डर मत, तूने मेरे मन का काम किया है। अब तू मेरी आज्ञा से स्वर्गलोक प्राप्त करेगा।

बहेलिए के जाने के बाद वहां श्रीकृष्ण का सारथी दारुक पहुंच गया। दारुक को देखकर श्रीकृष्ण ने कहा कि वह द्वारिका जाकर सभी को यह बताए कि पूरा यदुवंश नष्ट हो चुका है और बलराम के साथ कृष्ण भी स्वधाम लौट चुके हैं। अत: सभी लोग द्वारिका छोड़ दो, क्योंकि यह नगरी अब जल मग्न होने वाली है। मेरी माता, पिता और सभी प्रियजन इंद्रप्रस्थ को चले जाएं। यह संदेश लेकर दारुक वहां से चला गया। इसके बाद उस क्षेत्र में सभी देवता और स्वर्ग की अप्सराएं, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि आए और उन्होंने श्रीकृष्ण की आराधना की। आराधना के बाद श्रीकृष्ण ने अपने नेत्र बंद कर लिए और वे सशरीर ही अपने धाम को लौट गए।

श्रीमद भागवत के अनुसार जब श्रीकृष्ण और बलराम के स्वधाम गमन की सूचना इनके प्रियजनों तक पहुंची तो उन्होंने भी इस दुख से प्राण त्याग दिए। देवकी, रोहिणी, वसुदेव, बलरामजी की पत्नियां, श्रीकृष्ण की पटरानियां आदि सभी ने शरीर त्याग दिए। इसके बाद अर्जुन ने यदुवंश के निमित्त पिण्डदान और श्राद्ध आदि संस्कार किए।

इन संस्कारों के बाद यदुवंश के बचे हुए लोगों को लेकर अर्जुन इंद्रप्रस्थ लौट आए। इसके बाद श्रीकृष्ण के निवास स्थान को छोड़कर शेष द्वारिका समुद्र में डूब गई। श्रीकृष्ण के स्वधाम लौटने की सूचना पाकर सभी पाण्डवों ने भी हिमालय की ओर यात्रा प्रारंभ कर दी थी। इसी यात्रा में ही एक-एक करके पांडव भी शरीर का त्याग करते गए। अंत में युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग पहुंचे थे।

संत लोग यह भी कहते हैं कि प्रभु ने त्रेता में राम के रूप में अवतार लेकर बाली को छुपकर तीर मारा था। कृष्णावतार के समय भगवान ने उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी बाली को दी थी।

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पवनपुत्र हनुमानजी महाराज के अजर-अमर होने के दस प्रामाणिक साक्ष्य ! साक्ष्य नंबर 5 पढ़कर आप हनुमान के परम भक्त बन जाओगे!!!!!!!!

कलयुग में अगर आप सुखी रहना चाहते हैं तो आपको हनुमान की पूजा जरूर करनी होगी। आप किसी को भी अपना प्रिय देवता मानते रहें लेकिन अगर आप हनुमान की पूजा नहीं करते हैं तो आपको दुःख और परेशानियाँ घेरती रहेंगी।

अब आप ऐसा मत सोचिये कि आपको यह बातें हम बता रहे हैं किन्तु यह तो कलयुग के शास्त्रों में लिखा है कि हनुमान कलयुग के भगवान हैं। साथ ही साथ हनुमान ही ऐसे देवता हैं जो साक्षात् धरती पर कलयुग में विराजमान भी रहेंगे। तो आज हम आपको हनुमान जी के जीवन से जुड़ी कुछ रहस्यमयी बातें बताते हैं – हनुमान के होने के सबूत बताते है –

हनुमान के होने के सबूत –

  1. रामायण में बताया गया है कि जब लक्ष्मण मुर्छित पड़ें हुए थे तो वैद जी ने जिन जड़ी बूटियों का नाम बताया था वह हिमालय पर्वत पर ही मिलती थी। तब हनुमान जी हिमालय गये थे और वहां से पूरा पहाड़ ही उठाकर लाए थे। बाद में विज्ञान के समय श्रीलंका के अन्दर जो वह पहाड़ है उसकी जांच हुई तो वह और हिमालय के पहाड़ एक समान पाए गये थे। यह बात दर्शाती है कि हनुमान जी हिमालय से पहाड़ लेकर गये थे।
  2. श्रीलंका का एक आदिवासी कबीला है जिसका नाम मातंग कबीला है। हनुमान जी इस कबीले के लोगों से आज भी साक्षात् प्रकट होकर मुलाकात करते हैं। यह कबीला विभीषण के ही खून का कबीला है. इस बात की पुष्टि रीसर्च में भी हुई है।

  3. हनुमान के साक्षात् होने का एक सबूत यह भी है कि शास्त्रों में लिखा गया है कि कलयुग में हनुमान जी गंधमादन पर्वत पर निवास करेंगे। कई साधू-संतों से आप कुंभ में मिलिए और इस सच को जानिए, तो आपको हैरान करने वाली जानकारी मिलेगी।

  4. महाभारत में भी हनुमान जी का जिक्र आता है। एक तो भीम से हनुमान जी की मुलाकात जंगलों में होती है और दूसरा कि अर्जुन के रथ के ऊपर भी हनुमान जी विराजमान थे, यह कृष्ण खुद स्वीकार करते हैं।

  5. हनुमान का कलयुग में चमत्कार नैनीताल के कैंची धाम में देखा जा सकता है। खुद फेसबुक के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने और एप्पल प्रमुख स्टीव जॉब ने इस हनुमान मंदिर का जिक्र किया है।

  6. जुग सहस्त्र जोजन पर भानू । लिल्यो ताहि मधुर फल जानू… हनुमान चालीसा की यह पंक्तियाँ सूर्य और धरती के बीच की सही दूरी हजारों साल पहले बता देती हैं। नासा ने जो दूरी आज बताई है यह लगभग उतनी ही है, जितनी की हनुमान चालीसा की यह पंक्ति बताती है।

  7. आज एक बड़ा सच यह भी है कि हनुमान जी की जिस रूप में पूजा हम कर रहे हैं वह उस रूप में नहीं हैं। हनुमान का वानर रूप गलत बताया गया है. हनुमान किसी भी रूप में आ सकते हैं। और उनका कोई एक रूप नहीं है।

  8. अमेरिका की माया सभ्यता जो हजारों साल पुरानी है। यह सभ्यता जिसकी पूजा करती है, वह MONKEY HAWKER GOD हैं और आप कभी इनके भगवान की तस्वीर देखते हैं तो आपको मालुम चलेगा कि वह हनुमान ही हैं।

  9. शिमला के अन्दर एक मंदिर है जिसका नाम जाखू मंदिर है। इस मंदिर में हनुमान जी के पैरों के निशान मौजूद हैं।

  10. हनुमान चालीसा की हर पंक्ति और शब्द में इतनी शक्ति है कि व्यक्ति इसका जापकर, कुछ भी प्राप्त कर सकता है। यहाँ तक की हनुमान चालीसा के पढ़ने के समय व्यक्ति का तेज कई लाखों गुना बढ़ जाता है, इस बात को विज्ञानं भी स्वीकार करने लगा है।

तो ये थे हनुमान के होने के सबूत – इस तरह से यह 10 बातें हनुमान के होने के सबूत हैं।

कलयुग के भगवान हनुमान जी का अगर सच्चे दिल से जाप किया जाये तो व्यक्ति हर तरह की मुश्किलों से बच सकता है….!

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बुद्धिमानी से सेवा करें!

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एक लड़की विवाह करके ससुराल में आयी| घर में एक तो उसका पति था, एक सास थी और एक दादी सास थी| वहाँ आकर उस लड़की ने देखा कि दादी सास का बड़ा अपमान, तिरस्कार हो रहा है! छोटी सास उसको ठोकर मार देती, गाली दे देती| यह देखकर उस लड़की को बड़ा बुरा लगा और दया भी आयी! उसने विचार किया कि अगर मैं सास से कह कहूँ कि आप अपनी सास का तिरस्कार मत किया करो तो वह कहेगी कि कल की छोकरी आकर मुझे उपदेश देती है, गुरु बनती है! अतः उसने अपनी सास से कुछ नहीं कहा| उसने एक उपाय सोचा| वह रोज काम-धंधा करके दादी सास के पास जाकर बैठ जाती और उसके पैर दबाती| जब वह वहाँ ज्यादा बैठने लगी तो यह सास को सुहाया नहीं| एक दिन सास ने उससे पूछा कि ‘बहु! वहाँ क्यों जा बैठी?’ लड़की ने कहा कि ‘बोलो, काम बताओ!’ सास बोली कि ‘काम क्या बतायें, तू वहाँ क्यों जा बैठी?’ लड़की बोली कि ‘मेरे पिता जी ने कहा था कि जवान लड़कों के साथ तो कभी बैठना ही नहीं, जवान लड़कियों के साथ भी कभी मत बैठना; जो घर में बड़े-बूढ़े हों, उनके पास बैठना, उनसे शिक्षा लेना| हमारे घर में सबसे बूढ़ी ये ही हैं, और किसके पास बैठूँ? मेरे पिताजी ने कहा था कि वहाँ हमारे घर की रिवाज नहीं चलेगी, वहाँ तो तेरे ससुराल की रिवाज चलेगी| मेरे को यहाँ की रिवाज सीखनी है, इसलिये मैं उनसे पूछती हूँ कि मेरी सास आपकी सेवा कैसे करती है?’ सास ने पूछा कि ‘बुढ़िया ने क्या कहा?’ वह बोली कि ‘दादी जी कहती हैं कि यह मेरे को ठोकर नहीं मारे, गाली नहीं दे तो मैं सेवा ही मान लूँ!’ सास बोली कि ‘क्या तू भी ऐसा ही करेगी?’ वह बोली कि ‘मैं ऐसा नहीं कहती हूँ, मेरे पिता जी ने कहा कि बड़ों से ससुराल की रीति सीखना!’

सास डरने लग गयी कि मैं अपनी सास के साथ जो बर्ताव करुँगी, वही बर्ताव मेरे साथ होने लग जायगा! एक जगह कोने में ठीकरी इकट्ठी पड़ी थीं| सास ने पूछा-‘बहू! ये ठीकरी क्यों क्यों इकट्ठी की हैं?’

लड़की ने कहा-‘आप दादी जी को ठीकरी में भोजन दिया करती हो, इसलिये मैंने पहले ही जमा कर ली|’

‘तू मेरे को ठीकरी में भोजन करायेगी क्या?’

‘मेरे पिता जी ने कहा कि तेरे वहाँ की रीति चलेगी|’

‘यह रीति थोड़े ही है!’

‘तो आप फिर आप ठीकरी मैं क्यों देती हो?’

‘थाली कौन माँजे?’

‘थाली तो मैं माँज दूँगी|’

‘तो तू थाली में दिया कर, ठीकरी उठाकर बाहर फेंक|’ अब बूढ़ी माँजी को थाली में भोजन मिलने लगा| सबको भोजन देने के बाद जो बाकी बचे, वह खिचड़ी की खुरचन, कंकड़ वाली दाल माँ जी को दी जाती थी| लड़की उसको हाथ में लाकर देखने लगी| सास ने पूछा-‘बहू! क्या देखती हो?’

‘मैं देखती हूँ कि बड़ों को भोजन कैसा दिया जाय|’

‘ऐसा भोजन देने की कोई रीति थोड़े ही है!’

‘तो फिर आप ऐसा भोजन क्यों देती हो?’

‘पहले भोजन कौन दे?’

‘आप आज्ञा दो तो मैं दे दूँगी|’

‘तो तू पहले भोजन दे दिया कर|’

‘अच्छी बात है!’

अब बूढ़ी माँ जी को बढ़िया भोजन मिलने लगा| रसोई बनते ही वह लड़की ताजी खिचड़ी, ताजा फुलका, दाल-साग ले जाकर माँ जी को दे देती| माँ जी तो मन-ही-मन आशीर्वाद देने लगी| माँ जी दिनभर एक खटिया में पड़ी रहती| खटिया टूटी हुई थी| उसमें से बन्दनवार की तरह मूँज नीचे लटकती थी| लड़की उस खटिया को देख रही थी| सास बोली कि ‘क्या देखती हो?’

‘देखती हूँ कि बड़ों को खाट कैसे दी जाय|’

‘ऐसी खाट थोड़े ही दी जाती है! यह तो टूट जाने से ऐसी हो गयी|’

‘तो दूसरी क्यों नही बिछातीं?’

‘तू बिछा दे दूसरी|’

‘आप आज्ञा दो तो दूसरी खाट बिछा दूँ!’

अब माँ जी के लिए निवार की खाट लाकर बिछा दी गयी| एक दिन कपड़े धोते समय वह लड़की माँ जी के कपड़े देखने लगी| कपड़े छलनी हो रखे थे| सास ने पूछा कि ‘क्या देखती हो?’

‘देखती हूँ कि बूढों को कपड़ा कैसे दिया जाय|’

‘फिर वही बात, कपड़ा ऐसा थोड़े ही दिया जाता है? यह तो पुराना होने पर ऐसा हो जाता है|’

‘फिर वही कपड़ा रहने दें क्या?’

‘तू बदल दे|’

अब लड़की ने माँ जी का कपड़ा चादर, बिछौना आदि सब बदल दिया| उसकी चतुराई से बूढ़ी माँ जी का जीवन सुधर गया!

अगर वह लड़की सास को कोरा उपदेश देती तो क्या वह उसकी बात मान लेती? बातों का असर नहीं पड़ता, आचरण का असर पड़ता है| इसलिये लड़कियों को चाहिये कि ऐसी बुद्धिमानी से सेवा करें और सबको राजी रखें|

🌹🙏🏻🚩 जय सियाराम 🚩🙏🏻🌹
🚩🙏🏻 जय श्री महाकाल 🙏🏻🚩
🌹🙏🏻 जय श्री पेड़ा हनुमान 🙏🏻🌹
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बूढ़ा पिता अपने IAS बेटे के चेंबर में जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया !*

और प्यार से अपने पुत्र से पूछा…

“इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है”?

पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा “मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी “!

पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया !

उनकी आँखे छलछला आई !
वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे !

उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ???

पुत्र ने इस बार कहा…
“पिताजी आप हैैं,
इस दुनिया के सब से
शक्तिशाली इंसान “!

पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने कहा “अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो ” ???

पुत्र ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते हुए कहा ..

“पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना,,,,,

बोलिए पिताजी” !

पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लगा लिया !
“किसी ने क्या खूब चन्द पंक्तिया लिखी हैं”
जो पिता के पैरों को छूता है *वो कभी गरीब नहीं होता।

जो मां के पैरों को छूता है वो कभी बदनसीब नही होता।

जो भाई के पैराें को छुता हें वो कभी गमगीन नही होता।

जो बहन के पैरों को छूता है वो कभी चरित्रहीन नहीं होता।

जो गुरू के पैरों को छूता है
उस जेसा कोई खुशनसीब नहीं होता…….

💞अच्छा दिखने के लिये मत जिओ
बल्कि अच्छा बनने के लिए जिओ💞

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👉 सरलता ही भक्ति का एक मात्र स्रोत

एक आलसी लेकिन भोलाभाला युवक था आनंद। दिन भर कोई काम नहीं करता बस खाता ही रहता और सोए रहता। घर वालों ने कहा चलो जाओ निकलो घर से, कोई काम धाम करते नहीं हो बस पड़े रहते हो। वह घर से निकल कर यूं ही भटकते हुए एक आश्रम पहुंचा। वहां उसने देखा कि एक गुरुजी हैं उनके शिष्य कोई काम नहीं करते बस मंदिर की पूजा करते हैं। उसने मन में सोचा यह बढिया है कोई काम धाम नहीं बस पूजा ही तो करना है।

गुरुजी के पास जाकर पूछा, क्या मैं यहां रह सकता हूं, गुरुजी बोले हां, हां क्यों नहीं? लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता हूं गुरुजी: कोई काम नहीं करना है बस पूजा करनी होगी आनंद : ठीक है वह तो मैं कर लूंगा…

अब आनंद महाराज आश्रम में रहने लगे। ना कोई काम ना कोई धाम बस सारा दिन खाते रहो और प्रभु मक्ति में भजन गाते रहो। महीना भर हो गया फिर एक दिन आई एकादशी। उसने रसोई में जाकर देखा खाने की कोई तैयारी नहीं। उसने गुरुजी से पूछा आज खाना नहीं बनेगा क्या गुरुजी ने कहा नहीं आज तो एकादशी है

तुम्हारा भी उपवास है। उसने कहा नहीं अगर हमने उपवास कर लिया तो कल का दिन ही नहीं देख पाएंगे हम तो…. हम नहीं कर सकते उपवास… हमें तो भूख लगती है आपने पहले क्यों नहीं बताया? गुरुजी ने कहा ठीक है तुम ना करो उपवास, पर खाना भी तुम्हारे लिए कोई और नहीं बनाएगा तुम खुद बना लो। मरता क्या न करता गया रसोई में, गुरुजी फिर आए ”देखो अगर तुम खाना बना लो तो राम जी को भोग जरूर लगा लेना और नदी के उस पार जाकर बना लो रसोई। ठीक है, लकड़ी, आटा, तेल, घी, सब्जी लेकर आंनद महाराज चले गए, जैसा तैसा खाना भी बनाया, खाने लगा तो याद आया गुरुजी ने कहा था कि राम जी को भोग लगाना है।

वह भजन गाने लगा…आओ मेरे राम जी, भोग लगाओ जी प्रभु राम आइए, श्रीराम आइए मेरे भोजन का भोग लगाइए….. कोई ना आया, तो बैचैन हो गया कि यहां तो भूख लग रही है और राम जी आ ही नहीं रहे। भोला मानस जानता नहीं था कि प्रभु साक्षात तो आएंगे नहीं। पर गुरुजी की बात मानना जरूरी है। फिर उसने कहा , देखो प्रभु राम जी, मैं समझ गया कि आप क्यों नहीं आ रहे हैं। मैंने रूखा सूखा बनाया है और आपको तर माल खाने की आदत है इसलिए नहीं आ रहे हैं…. तो सुनो प्रभु … आज वहां भी कुछ नहीं बना है, सबकी एकादशी है, खाना हो तो यह भोग ही खालो…

श्रीराम अपने भक्त की सरलता पर बड़े मुस्कुराए और माता सीता के साथ प्रकट हो गए। भक्त असमंजस में। गुरुजी ने तो कहा था कि राम जी आएंगे पर यहां तो माता सीता भी आईं है और मैंने तो भोजन बस दो लोगों का बनाया हैं। चलो कोई बात नहीं आज इन्हें ही खिला देते हैं। बोला प्रभु मैं भूखा रह गया लेकिन मुझे आप दोनों को देखकर बड़ा अच्छा लग रहा है लेकिन अगली एकादशी पर ऐसा न करना पहले बता देना कि कितने जन आ रहे हो, और हां थोड़ा जल्दी आ जाना। राम जी उसकी बात पर बड़े मुदित हुए। प्रसाद ग्रहण कर के चले गए। अगली एकादशी तक यह भोला मानस सब भूल गया। उसे लगा प्रभु ऐसे ही आते होंगे और प्रसाद ग्रहण करते होंगे। फिर एकादशी आई। गुरुजी से कहा, मैं चला अपना खाना बनाने पर गुरुजी थोड़ा ज्यादा अनाज लगेगा, वहां दो लोग आते हैं। गुरुजी मुस्कुराए, भूख के मारे बावला है। ठीक है ले जा और अनाज लेजा। अबकी बार उसने तीन लोगों का खाना बनाया। फिर गुहार लगाई प्रभु राम आइए, सीताराम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए…

प्रभु की महिमा भी निराली है। भक्त के साथ कौतुक करने में उन्हें भी बड़ा मजा आता है। इस बार वे अपने भाई लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न और हनुमान जी को लेकर आ गए। भक्त को चक्कर आ गए। यह क्या हुआ। एक का भोजन बनाया तो दो आए आज दो का खाना ज्यादा बनाया तो पूरा खानदान आ गया। लगता है आज भी भूखा ही रहना पड़ेगा। सबको भोजन लगाया और बैठे-बैठे देखता रहा। अनजाने ही उसकी भी एकादशी हो गई। फिर अगली एकादशी आने से पहले गुरुजी से कहा, गुरुजी, ये आपके प्रभु राम जी, अकेले क्यों नहीं आते हर बार कितने सारे लोग ले आते हैं? इस बार अनाज ज्यादा देना। गुरुजी को लगा, कहीं यह अनाज बेचता तो नहीं है देखना पड़ेगा जाकर। भंडार में कहा इसे जितना अनाज चाहिए दे दो और छुपकर उसे देखने चल पड़े।

इस बार आनंद ने सोचा, खाना पहले नहीं बनाऊंगा, पता नहीं कितने लोग आ जाएं। पहले बुला लेता हूं फिर बनाता हूं। फिर टेर लगाई प्रभु राम आइए , श्री राम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए… सारा राम दरबार मौजूद… इस बार तो हनुमान जी भी साथ आए लेकिन यह क्या प्रसाद तो तैयार ही नहीं है। भक्त ठहरा भोला भाला, बोला प्रभु इस बार मैंने खाना नहीं बनाया, प्रभु ने पूछा क्यों? बोला, मुझे मिलेगा तो है नहीं फिर क्या फायदा बनाने का, आप ही बना लो और खुद ही खा लो…. राम जी मुस्कुराए, सीता माता भी गदगद हो गई उसके मासूम जवाब से… लक्ष्मण जी बोले क्या करें प्रभु… प्रभु बोले भक्त की इच्छा है पूरी तो करनी पड़ेगी। चलो लग जाओ काम से। लक्ष्मण जी ने लकड़ी उठाई, माता सीता आटा सानने लगीं। भक्त एक तरफ बैठकर देखता रहा। माता सीता रसोई बना रही थी तो कई ऋषि-मुनि, यक्ष, गंधर्व प्रसाद लेने आने लगे। इधर गुरुजी ने देखा खाना तो बना नहीं भक्त एक कोने में बैठा है। पूछा बेटा क्या बात है खाना क्यों नहीं बनाया? बोला, अच्छा किया गुरुजी आप आ गए देखिए कितने लोग आते हैं प्रभु के साथ….. गुरुजी बोले, मुझे तो कुछ नहीं दिख रहा तुम्हारे और अनाज के सिवा भक्त ने माथा पकड़ लिया, एक तो इतनी मेहनत करवाते हैं प्रभु, भूखा भी रखते हैं और ऊपर से गुरुजी को दिख भी नहीं रहे यह और बड़ी मुसीबत है। प्रभु से कहा, आप गुरुजी को क्यों नहीं दिख रहे हैं? प्रभु बोले : मैं उन्हें नहीं दिख सकता। बोला : क्यों वे तो बड़े पंडित हैं, ज्ञानी हैं विद्वान हैं उन्हें तो बहुत कुछ आता है उनको क्यों नहीं दिखते आप? प्रभु बोले, माना कि उनको सब आता है पर वे सरल नहीं हैं तुम्हारी तरह। इसलिए उनको नहीं दिख सकता….

आनंद ने गुरुजी से कहा, गुरुजी प्रभु कह रहे हैं आप सरल नहीं है इसलिए आपको नहीं दिखेंगे, गुरुजी रोने लगे वाकई मैंने सबकुछ पाया पर सरलता नहीं पा सका तुम्हारी तरह, और प्रभु तो मन की सरलता से ही मिलते हैं। प्रभु प्रकट हो गए और गुरुजी को भी दर्शन दिए। इस तरह एक भक्त के कहने पर प्रभु ने रसोई भी बनाई, भक्ति का प्रथम मार्ग सरलता है!
🙏🏾🙏🏻🙏🏼 जय जय श्री राधे🙏🏽🙏🏿🙏