Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

🙏🏼🙏🏼 अरी हो सखी
आज आज जब मैं सुबह किशोरी जी के सामने मंदिर में बैठकर उनका ध्यान कर रही थी ना जाने क्यों मुझे ठाकुर किशोरी जी की निकुंज लीला के दर्शन करने की लालसा पैदा हुई ।मैं तो निकुंज लीला के बारे में मैं सोच ही रही थी ना जाने कब ठाकुर जी और किशोरी कृपा से मैं निकुंज लीला में प्रवेश कर गई। मैं वहां पहुंच गई जहां ठाकुर जी और किशोरी जू नित्य बिहार करते थे मैंने हाथ में जल का एक लोटा लिया और कुछ फल काटकर रख लिए और अपने हाथ से बनाई हुई एक मोतियों की माला ले गई और मैंने कमल के फूलों का बिछोना वहां बिछा दिया जहां पर ठाकुर जी और किशोरी जी नित्य विहार करने के बाद विश्राम करते थे। मैंने जल का लोटा वहां रखा मोतियों की माला और फलों को वहां रखकर कुछ दूरी पर जाकर एक वृक्ष की ओट में बैठ गई ।तभी ठाकुर जी और की किशोरी जू नृत्य विहार करने के लिए वहां आए। ठाकुर जी और किशोरी जी ने एक दूसरे के हाथ में हाथ डाला हुआ था।किशोरी जी की सुंदरता को देखकर तो चांद भी बादलों की ओट में छुप गया कहीं किशोरी जी के रूप की तुलना मुझसे की गई तो कहीं मैं फीका ना पड़ जाऊं तो मुझे शर्मिंदा ना होना पड़े। और लोग मुझे तुच्छ समझे ।इसलिए वह बादलों की ओट से तब तक छिपा जब तक ठाकुर जी और लाडली जू विहार करते रहे । किशोरी जी का रूप इतना सुंदर ,नीले रंग की लहंगा चोली पहनी हुई ,गले में बड़े-बड़े हार ,माथे पर टीका ,पांव में बड़ी-बड़ी पायल डालकर और ठाकुर जी के हाथ में हाथ डालकर विहार कर रहे थे। उनकी वेणी इतनी सुंदर गुथी हुई थी और उस पर गजरा लगा हुआ था ।ठाकुर जी अपनी किशोरी जी की सुंदरता को देख देखकर निहाल हो रहे थे ।इतनी सुंदर वेणी को देखकर और उस पर गजरा हुए लगा हुआ देखकर ठाकुर जी को ठिठोली सूजी। और उन्होंने वेनी को हाथ लगाते लगाते थोड़ी सी किशोरी जू की वेनी को खींच दिया ।किशोरी जी को लगा कि शायद मेरी वेनी लता में अटक गई है ।जब उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा तो वेणी अटकी नहीं हुई थी। तब वह भृकुटी टेडी करके और अपने कटाक्ष नेत्रों से ठाकुर जी को देखती है तो ठाकुर जी मंद मंद मुस्कुरा रहे होते हैं तो किशोरी जो समझ जाती है यह शरारत ठाकुर जी की है तो वह बोली कान्हा तू ने जानबूझकर मेरी वेणी खींची है रुको मैं तुम्हें बताती हूं। तो यह कह कर वह ठाकुर जी के पीछे भागती हैं तो उनके पांव में बड़ी-बड़ी पायले कृष्ण कृष्ण की ध्वनि निकालती हुई सारे निकुंज में गूंजने लगी जब भागते भागते लाडली जू थक गई तो वह उस जगह पर आकर बैठ गई जहां पर मैंने कमल के फूलों का बिछौना बिछाया हुआ था और मान कर कर बैठ गई ।जब ठाकुर जी ने देखा कि किशोरी जो मान कर कर बैठ गई है तो उनके पास आ गए क्योंकि उनको अपनी लाडली के मान से बहुत डर लगता था तो आकर किशोरी जी के पास बैठ गए और किशोरी जू जानबूझकर अपने पांव को ऐसे देखने लगी जैसे कि उसमें कुछ चुभ गया है तो ठाकुर जी उसके पांव को पकड़ कर अपनी जांघ पर रखते हुए बोले क्या हुआ राधिके तो किशोरी जी खिलखिला कर हंसने लगी तो और शरारत से मुस्कुराने लगी ठाकुर जी भी साथ में हंसने लगे और कहने लगे राधिके भाग भाग कर थक गई होगी लो पानी पियो तो वह जल का लोटा जो मैंने रखा हुआ था उसमें से उसको किशोरी जू के अधरों पर लगा दिया और जो फल काटे हुए थे वह किशोरी जी के मुख में डाल दिए। तभी उनका ध्यान मोतियों की माला पर पड़ा । माला देखकर ठाकुर जी उसकी तरह बहुत आकर्षित हुए और उठाकर किशोरी जी के गले में डाल दी
और वह माला इतराती हुई किशोरी जी के ऊभरे हुए वक्ष स्थलों पर बहुत सुशोभित हो रही थी ।मैं वृक्ष की ओट में बैठकर यह सब देख रही थी और मैं बहुत खुश थी कि आज मैंने तो लाडली जू के दर्शन तो कर लिए लेकिन आज मैंने उस लोटे को जो कि उस मिट्टी से बना हुआ था वो मिट्टी जन्मों-जन्मों से इस इंतजार में थी कि कब मैं लोटे में बदलू और कब इसमें जल भरे और कम में किशोरी जी के अधरों तक पहुंचे। और वह जल जो हज़ारों बार कुएँ से बाहर आकर बार बार देख चुका था कि कब मैं लोटे में भरू और कब किशोरी जी के कंठ से उतरू और वह फल जो कि हजार बार वृक्षों से उतरकर हजार बार उनका जन्म हो चुका था और वह इस इंतजार में थे कि कब किशोरी जी के मुख तक पहुंचे ।और वह फूल जो कितनी बार लताओं से उतरकर कितनी बार हो दोबारा जन्म लेकर फिर लताओ पर लगे और इस विश्वास में थे कि कब किशोरी जी का चरण कमल उन पर पड़े। वह मोती जो हजारों जन्मों से सीपो में पैदा होकर फिर जन्म लेकर इंतजार में थे कि कब वह किशोरी जी के गले की शोभा को बढ़ाए इस तरह मेरे साथ इन्होंने भी किशोरी जी की कृपा प्राप्त की। यह सब बातें किशोरी जी जान गई और उन्होंने मुझे वृक्ष की ओट में देख लिया और मुस्कुराती हुई मेरी तरफ देख कर बोली आओ, सुरभि सखी !मेरे पास आओ तो मैं हैरान होती हुई किशोरी जी की तरफ देख रही थी कि आज किशोरी जी की कृपा दृष्टि मुझ पर पड़ गई है तो मैं किशोरी जो की तरफ ना जाकर उनकी उलटी दिशा में भागती हुई बोलती जा रही हूं ना ना किशोरी जू अगर मैं आपके पास आ गई तो आप मुझे अपना लोगे तब तो मैं आपकी हो जाऊंगी। मुझे तो आप अपने विरह में ही रहने दो। आप के विरह में मुझे आंसू बहाने दो ।आप के विरह में रहने वाली भक्ति मेरे लिए आपकी कृपा दृष्टि है ।इतना कहकर मैं भागती जा रही हूं और भागती जा रही हूं और ना जाने कब मेरी तंद्रा भंग हुई और मेरी आंखों से अश्रु धारा बह रही थी शरीर कांप रहा था ठाकुर जी और किशोरी जी की निकुंज लीला को देखकर मैं तो धन्य धन्य हो उठी ।
हे ठाकुर जी और लाडली जू अपनी कृपा दृष्टि हम पर हमेशा बनाए रखना।
दासी सुरभि के शब्दों से 🙏🏼🌹🙇🏻‍♀

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