Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

“टेढ़ी खीर”
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दो किशोरे लड़के जो बहुत गरीब थे, शहर और गाँव में घर-घर भोजन के लिए भीख मांग कर अपना जीवन-यापन करते थे. उनमे से एक जन्म से अंधा था, दूसरा उसकी सहायता करता था. इस प्रकार वे दोनों, भीख मांगने के लिए एक साथ घूमते-फिरते चक्कर लगाते.

एक दिन अंधा लड़का बीमार पड़ गया. उसके साथी ने कहा “यहीं रुको और आराम करो, मै दोनों के लिए भीख मांगने जाउंगा और तुम्हारे लिए भोजन लेकर वापस आउंगा”, और वह भीख मांगने के लिए चला गया.

उस दिन ऐसा हुआ की उस लड़के को भीख में बहुत स्वादिष्ट खीर मिली. उसने खीर पहले कभी नहीं खाई थी. उसे खीर खाने में बड़ा मजा आया. लेकिन दुर्भाग्य से उसके पास कोई पात्र नहीं था जिसमे वह अपने मित्र के लिए तरल खीर ला पाता. इसलिए वह सारी खीर खा गया.

जब वह अपने साथी के पास वापस पहुंचा, उसने कहा, “आज मुझे एक अद्भुत स्वादिष्ट भोजन, दूध से बनी खीर मिली, लेकिन मुझे बहुत अफ़सोस है कि मैं उसे तुम्हारे लिए नहीं ला सका.

अंधे लड़के ने उससे कहा नहीं ला सके-नहीं ला सके कोई बात नहीं पर यह तो बताओ कि “यह दूध से बनी खीर कैसी होती है?”

“यह सफ़ेद होती है, दूध जैसी सफ़ेद होती है.”

जन्म से अँधा होने के कारण वह समझ ना सका और पूछा “यह सफ़ेद क्या होता है?”

“तुम्हे पता नहीं, सफ़ेद क्या होता है?”

“नहीं मुझे नहीं पता.”

“यह काले का उलटा होता है.”

“पर यह काला क्या होता है?” वह यह भी नहीं जानता था कि – काला क्या होता है.

“ओह… सफ़ेद को समझने की कोशिश करो.” परन्तु वह अँधा लड़का कुछ नहीं समझ सका.

इसलिए उसके मित्र ने अपने चारों और देखा, और एक सफ़ेद बगुला देखकर उस पक्षी को पकड़ लाया और उस अंधे लड़के के पास लाकर अससे कहा, “सफ़ेद – इस पक्षी की तरह होता है.” आँख न होने के कारण, अंधा लड़का पक्षी के पास जाकर उसे अपनी अँगुलियों से छूने लगा. “ओह.. अब मै समझा कि सफ़ेद क्या होता है, सफ़ेद मुलायम होता है”.

“नहीं, बिलकुल नहीं, सफ़ेद का मुलायम से कोई लेना-देना नहीं, सफेद-सफ़ेद है. इसे समझने की कोशिश करो.

“लेकिन तुमने मुझे बताया कि यह बगुले के सामान होता है. मैंने बगुले को देखा-जांचा, यह मुलायम है. इसलिए ‘दूध की खीर’ मुलायम है. सफ़ेद माने मुलायम है.”

“नहीं तुमने समझा नहीं, फिर कोशिश करो.”

अंधे लड़के ने अपनी अंगुलियाँ बगुले के चोंच से सर – गर्दन – शरीर – पूंछ के सिरे तक घुमाकर उसे फिर से देखा-परखा. “अच्छा – अब समझ मै समझ गया, यह टेढ़ी है, खीर टेढ़ी होती है.” “खीर टेढ़ी है.”

वह समझ नहीं सकता क्योंकि उसके पास सफ़ेद को समझने की इन्द्रिय नहीं है.

उसी प्रकार यदि आपके पास सच्चाई को यथाभूत रूप में अनुभव करने की इन्द्रिय नहीं है, “सत्य” आपके लिए हमेशा “टेढ़ी खीर” ही रहेगी.

जिस व्यक्ति ने कभी सच्चाई का स्वाद न चखा हो उसे क्या मालूम सच्चाई क्या होती है. जितना-जितना सत्य जिस-जिस की अनुभूति पर उतरता है उसके लिए सत्य उतना होता है. उसके आगे की सच्चाई का स्वाद जब तक नहीं चख लेता तब तक वह सत्य होते हुए भी उसके लिए सुझाव मात्र है.

ह्रदय की तलस्पर्शी गहराइयों से क्षमस्व. – आनंद

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