Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

नरकचतुर्दशी


प्रसाद देवरानी

पंच दिवसीय त्यौहार दीवाली का आज दूसरा दिन नरकचतुर्दशी है। आपको आपके परिवार को आज के पावन दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं!

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दीपावली को एक दिन का पर्व कहना न्यायोचित नहीं होगा। दीपावली पर्व के ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली, रूप चौदस और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है।

यह त्यौहार नरक चौदस या नर्क चतुर्दशी या नर्का पूजा के नाम से भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल तेल लगाकर अपामार्ग (चिचड़ी) की पत्तियाँ जल में डालकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है। विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो स्वर्ग को प्राप्त करते हैं।

शाम को दीपदान की प्रथा है जिसे यमराज के लिए किया जाता है। दीपावली को एक दिन का पर्व कहना न्योचित नहीं होगा। इस पर्व का जो महत्व और महात्मय है उस दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण पर्व व हिन्दुओं का त्यौहार है। यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्यौहार है जैसे मंत्री समुदाय के बीच राजा। दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस फिर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली फिर दीपावली और गोधन पूजा, भाईदूज।

नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली भी कहते हैं। इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले, रात के वक्त उसी प्रकार दीए की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुंज से दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की रात को। इस रात दीए जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं हैं। (एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। इस उपलक्ष में दीयों की बारत सजायी जाती है।)

इस दिन के व्रत और पूजा के संदर्भ में एक अन्य कथा यह है कि रन्ति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके सामने यमदूत आ खड़े हुए। यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। पुण्यात्मा राजा की अनुनय भरी वाणी सुनकर यमदूत ने कहा हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक भूखा ब्राह्मण लौट गया यह उसी पापकर्म का फल है।

दूतों की इस प्रकार कहने पर राजा ने यमदूतों से कहा कि मैं आपसे विनती करता हूं कि मुझे वर्ष का और समय दे दे। यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचा और उन्हें सब वृतान्त कहकर उनसे पूछा कि कृपया इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय है। ऋषि बोले हे राजन् आप कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्रह्मणों को भोजन करवा कर उनसे अनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें।

राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया। इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ।

उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करने का बड़ा महात्मय है। स्नान के पश्चात विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायक कहा गया है। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को उपरोक्त कारणों से नरक चतुर्दशी, रूप चतुर्दशी और छोटी दीपावली के नाम से जाना जाता है। और इसके बाद क्रमशः दीपावली, गोधन पूजा और भाई दूज मनायी जाती है।

पौराणिक कथा है कि इसी दिन कृष्ण ने एक दैत्य नरकासुर का संहार किया था। सूर्योदय से पूर्व उठकर, स्नानादि से निपट कर यमराज का तर्पण करके तीन अंजलि जल अर्पित करने का विधान है। संध्या के समय दीपक जलाए जाते हैं।

विष्णु और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार नरकासुर नामक असुर ने अपनी शक्ति से देवी-देवताओं और मानवों को परेशान कर रखा था। असुर ने संतों के साथ 16 हजार स्त्रियों को भी बंदी बनाकर रखा था। जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता और ऋषि-मुनियों ने भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आकर कहा कि इस नरकासुर का अंत कर पृथ्वी से पाप का भार कम करें।

भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें नरकासुर से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया लेकिन नरकासुर को एक स्त्री के हाथों मरने का शाप था इसलिए भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और उनकी सहायता से नरकासुर का वध किया। जिस दिन नरकासुर का अंत हुआ, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी।

नरकासुर के वध के बाद श्रीकृष्ण ने कन्याओं को बंधन से मुक्त करवाया। मुक्ति के बाद कन्याओं ने भगवान कृष्ण से गुहार लगाई कि समाज अब उन्हें कभी स्वीकार नहीं करेगा, इसके लिए आप कोई उपाय निकालें। हमारा सम्मान वापस दिलवाएं। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए भगवान कृष्ण ने सत्यभामा के सहयोग से 16 हजार कन्याओं से विवाह कर लिया। 16 हजार कन्याओं को मुक्ति और नरकासुर के वध के उपलक्ष्य में घर-घर दीपदान की परंपरा शुरू हुई।

भगवान कृष्‍ण ने इस दिन 16 हजार कन्‍याओं का उद्धार किया, इसी खुशी में इस दिन महिलाएं 16 श्रृंगार करती हैं। नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी भी कहते हैं। इस दिन जल में औषधि मिलाकर स्नान करने और 16 ऋृंगार करने से रूप सौन्दर्य और सौभाग्य बढ़ता है ऐसी मान्यताएं कहती हैं।

इस त्योहार को मनाने का मुख्य उद्देश्य घर में उजाला और घर के हर कोने को प्रकाशित करना है। कहा जाता है कि दीपावली के दिन भगवान श्री राम चन्द्र जी चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या आये थे तब अयोध्या वासी ने अपनी खुशी दिए जलाकर और उत्सव मनाया व भगवान श्री राम चन्द्र माता जानकी व लक्ष्मण का स्वागत किया।

साथ ही मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने आज ही के दिन वामन रूप में अवतार लिया था।इस दिन दान-पूण्य करने का विशेष महत्व बताया गया है,जिससे की माता लक्ष्मी की कृपा हम पर सदैव बनी रहे।कहते हैं कि नरक चतुर्दशी के दिन विधि-विधान से पूजा-पाठ करने से मनुष्य को मनचाहा फल प्राप्त होता हैं और उसे नरक की यातनाओं से मुक्ति मिल जाती है।

इसी दिन देवाधीदेव महादेव के एकादश अवतार बजरंगबली भगवान हनुमान जी महाराज की जयंती भी मनाई जाती है।हनुमान जी महाराज की पूजा पंचोपचार विधि से करनी चाहिए।इस पूजा में पूरुषों के बाद ही स्त्रियों को पूजा करनी चाहिए। पूजा के बाद घर के चारों दिशाओं में दीपक को जलाने चाहिए साथ ही एक दीपक घर के मुख्य द्वार पर रखना चाहिए।

नरक चतुर्दशी पर यमतर्पण, आरती, अभ्यंगस्नान, यमदीपदान, ब्राह्मणभोज, शिवपूजा, वस्त्रदान, प्रदोष पूजा, दीप प्रज्वलन करने से कहा गया है कि मनुष्य अपने सभी पाप बंधन से मुक्त हो कर ईश्वर की कृपा का पात्र बनता है।

काली चौदस, आज रात घर पर करें प्रयोग, मिलेगा हर कार्य का तुरंत परिणाम!!!!!!

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को काली चौदस का पर्व मनाया जाता है। दिवाली के पंच दिवस उत्सव का यह दूसरा दिन होता है। काली चौदस का पर्व भगवान विष्णु के नरकासुर पर विजय पाने के उपलक्ष में मनाया जाता है तथा इस पर्व का देवी काली के पूजन से गहरा संबंध है।

तंत्रशास्त्र के अनुसार महाविद्याओं में देवी कालिका सर्वोपरीय है। काली शब्द हिन्दी के शब्द काल से उत्पन्न हुआ है जिसके अर्थ हैं समय, काला रंग, मृत्यु देव या मृत्यु। तंत्र के साधक महाकाली की साधना को सर्वाधिक प्रभावशाली मानते हैं और यह हर कार्य का तुरंत परिणाम देती है।

साधना को सही तरीके से करने से साधकों को अष्टसिद्धि प्राप्त होती है। काली चौदस के दिन कालिका के विशेष पूजन-उपाय से लंबे समय से चल रही बीमारी दूर होती है। काले जादू के बुरे प्रभाव, बुरी आत्माओं से सुरक्षा मिलती है। कर्ज़ मुक्ति मिलती हैं। बिजनैस की परेशानियां दूर होती हैं। दांपत्य से तनाव दूर होता हैं। यही नहीं काली चौदस के विशेष पूजन उपाय से शनि के प्रकोप से भी मुक्ति मिलती है।

  • यदि आपके व्यवसाय में निरन्तर गिरावट आ रही है, तो आज रात्रि में पीले कपड़े में काली हल्दी, 11 अभिमंत्रित गोमती चक्र, चांदी का सिक्का व 11 अभिमंत्रित धनदायक कौड़ियां बांधकर 108 बार श्रीं लक्ष्मी-नारायणाय नमः का जाप कर धन रखने के स्थान पर रखने से व्यवसाय में प्रगतिशीलता आ जाती है।
  • यदि कोई व्यक्ति मिर्गी या पागलपन से पीड़ित हो तो आज रात में काली हल्दी को कटोरी में रखकर लोबान की धूप दिखाकर शुद्ध करें तत्पश्चात एक टुकड़ें में छेद कर काले धागे में पिरोकर उसके गले में पहना दें और नियमित रूप से कटोरी की थोड़ी सी हल्दी का चूर्ण ताजे पानी से सेवन कराते रहें। अवश्य लाभ मिलेगा।

  • काली मिर्च के पांच दाने सिर पर से 7 बार वारकर किसी सुनसान चौराहे पर जाकर चारों दिशाओं में एक-एक दाना फेंक दे व पांचवे बचे काली मिर्च के दाने को आसमान की तरफ फेंक दें व बिना पीछे देखे या किसी से बात घर वापिस आ जाए। जल्दी ही पैसा मिलेगा।

  • निरन्तर अस्वस्थ्य रहने पर आटे के दो पेड़े बनाकर उसमें गीली चीने की दाल के साथ गुड़ व पिसी काली हल्दी को दबाकर खुद पर से 7 बार उतार कर गाय को खिला दें।

  • आज रात के समय काली मिर्च के 7-8 दाने लेकर उसे घर के किसी कोने में दिए में रखकर जला दें। घर की समस्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाएगी।

  • अगर आपके बच्चे को नजर लग गयी है, तो काले कपड़े में हल्दी को बांधकर 7 बार ऊपर से उतार कर बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें।

नरक चतुर्दशी आपके जीवन में खुशियां लेकर आए,उन्नती और तरक्की के दरवाजे आप के लिए खुल जाएं,ईश्वर से हमारी यही प्रार्थना है।नरक चतुर्दशी की आप सभी स्नेही मित्रों को कोटि-कोटि बधाई।।

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जैसी दृष्टि-वैसी सृष्टि

एक युगल को शादी के 11 साल बाद एक लड़का पैदा हुआ. पति पत्नी में आपस मे बहुत ही प्रेम/स्नेह था और उनका लड़का उनकी आखो का तारा था.

एक सुबह, जब वह लड़का तक़रीबन 2 साल का रहा होगा पति ने (लड़के के पिता) एक दवाई की बोतल खुली देखी. उसे काम पर जाने के लिए देरी हो रही थी इसलिए उसने अपनी पत्नी से उस बोतल को ढक्कन लगाने और अलमारी में रखने को कहा.

लड़के की मम्मी रसोईघर में काम मे व्यस्त थी, वो ये बात पूरी तरह से भूल गयी.
लड़के ने वो बोतल देखी और खेलने के इरादे से उस बोतल की ओर गया, बोतल के कलर ने उसे मोह लिया इसलिए उसने उसमे की दवाई पूरी पी ली ,उस दवाई की छोटे बच्चो को छोटी सी मात्रा भी जहरीली हो सकती थी.

जब वह लड़का नीचे गिरा, तब उसकी मां ने उसे देखा और जल्द से जल्द चिकित्सालय ले गयी जहा उसकी मौत हो गयी. उसकी माँ पूरी तरह से हैरान/परेशान हो गई, वह भयभीत हो गयी, कि कैसे वो अब अपने पति का सामना करेंगी, क्या कहेगी?

जब लड़के के परेशान पिता चिकित्सालय में आये तो उन्होंने अपने बेटे को मृत पाया और अपनी पत्नी और देखते हुए सिर्फ चार शब्द कहे……..

आपको क्या लगता है कौन से होंगे वो चार शब्द?

पति ने सिर्फ इतना ही कहा- “ I Love You Darling”.

उसके पति का अनअपेक्षित व्यवहार उसे आश्चर्यचकित करने वाला था. उनका लड़का मर चुका था. वो उसे कभी वापिस नहीं ला सकता था और वो अपनी पत्नी में भी कोई कसूर नहीं ढूंड सकता था. इसके अलावा, अगर उसने खुद ने वह बोतल उठाके बाजू में रख दी होती तो आज उनके साथ यह सब न होता.

वो किसी पर भी आरोप नहीं लगा सकता था. उसकी पत्नी ने भी उनका एकलौता बेटा खो दिया था. उस समय उसे सिर्फ अपने पति से सहानुभूति और दिलासा चाहिये था और यही उसके पति ने उस समय उसे दिया.

कभी-कभी हम इसी में समय व्यर्थ कर देते है की परिस्थिती के लिए कोन जिम्मेदार है या कोन आरोपी है, ये सब हमारे आपसी रिश्तो में होता है, जहा जॉब करते है वहाँ या जिन लोगो को हम जानते है उन सभी के साथ होता है, और परिस्थिती के आवेश में आकर हम अपने रिश्तो को भूल जाते है और एक दुसरे का सहारा बनने के बजाय एक दुसरे पर आरोप लगाते है.
कुछ भी हो जाये, हम उस व्यक्ति को कभी भी नहीं भूल सकते जिससे हम प्रेम करते है, इसीलिए जीवन में जो आसान है उसे प्रेम करो. आपके पास अभी जो बचा है उसे जमा करो और अपनी तकलीफों को विचार कर-कर के बढ़ाने के बजाय उन्हें भूल जाओ. उन सभी चीजो का सामना करो जो आपको अभी मुश्किल लगती है या जिनसे आपको डर लगता है सामना करने के बाद आप देखोगे के वो चीजे उतनी मुश्किल नहीं है जितना की आप पहले उन्हें सोच रहे थे.
जैसा आप देखते है वैसा ही दिखता है,जीवन हो ,समय हो,परिस्थिति हो या फिर व्यक्ति। इसलिए कहता हूं “जैसी दृष्टि-वैसी सृष्टि”

Posted in महाभारत - Mahabharat

ભગવાન શ્રીકૃષ્ણની સ્તુતિ

સૂર્ય ઉત્તરાયણના થતાં ભીષ્મ પિતામહે સાવધાન બનીને મનને આત્મામાં સ્થિર કર્યું. તે વખતે એ પરમપ્રકાશિત પ્રભાકરની પેઠે પ્રકાશમય દેખાયા. એમની પાસે અનેક પ્રાતઃસ્મરણીય પરમાત્માના પરમ કૃપાપાત્ર ઋષિઓ આવી પહોંચ્યા. એ સૌની સમુપસ્થિતિમાં એમણે શરશય્યા પર સૂતાંસૂતાં બે હાથ જોડીને વિશુદ્ધ અંતઃકરણથી ભગવાન કૃષ્ણનું ધ્યાન કર્યું અને એમની સ્તુતિ કરવા માંડી. ભીષ્મ પિતામહની ભક્તિભાવનાને યોગબળ દ્વારા જાણી લઇને ભગવાન કૃષ્ણે એમની પાસે પહોંચીને એમને અલૌકિક આત્મજ્ઞાન પ્રદાન કર્યું. પોતાની અસાધારણ આત્મશક્તિથી અનુગ્રહની એવી સૂક્ષ્મ વર્ષા વરસાવ્યા પછી શ્રીકૃષ્ણ યુધિષ્ઠિરાદિ સત્પુરુષો સાથે સ્થૂળરૂપે એમની સમક્ષ ઉપસ્થિત થયા. ભીષ્મ પિતામહે શરશય્યા પરથી ધ્યાનમગ્ન બનીને કરેલી શ્રીકૃષ્ણના સ્તુતિ અતિશય આહલાદક અને રોચક છે. એ સ્તુતિ પુરવાર કરે છે કે ભીષ્મ પિતામહ શ્રીકૃષ્ણને કેવળ માનવ નહોતા માનતા પરંતુ પરમાત્મા સમજતા હતા. એમની પ્રેમપ્રશસ્તિમાં એમની એ ભાવનાના પ્રતિધ્વનિ પડેલા છે. એ સ્તુતિ અથવા પ્રેમપ્રશસ્તિનો આંશિક પરિચય પ્રાપ્ત કરીએ તો એ અસ્થાને નહિ લેખાય. એ આંશિક પરિચય આ રહ્યોઃ

आरिराधयिषुः कृष्णं वाचं जिगदिषामि याम् ।
तया व्याससमासिन्या प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥
शुचिं शुचिपदं हंसं तत्पदं परमेष्ठिनम् ।
मुकत्वा सर्वात्मनात्मनं तं प्रपद्य प्रजापतिम् ॥
अनाद्यत् परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः ।
एकोङयं वेद भगवान् धाता नारायणो हरिः ॥ (અધ્યાય ૪૭, શ્લોક ૧૬ થી ૧૮)

य़स्मिन् विश्वानि भूतानि तिष्ठंतिच विशंतिच ।
गुणभूतानि भूतेशे सूत्रे मणिगणा इव ॥ (શ્લોક ર૧)

अतिवाप्निन्द्रकर्माणमणिसूर्यातितेजसम् ।
अतिबुद्धीन्द्रियात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥
पुराणे पुरुषं प्रोक्तं ब्रह्म प्रोक्तं युगादिषि ।
क्षये संकर्षणं प्रोक्तं तमुपास्यमुपास्मोह ॥ (શ્લોક 3૧-3ર)

ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म यत्तत् सदसतोः परम् ।
अनादिमध्यपर्यन्तं न देवा नर्षयो विदु ॥
यं सुरासुरगंधर्वाः सिद्धा ऋषिमहोरगाः ।
प्रयता नित्यमर्चन्ति परमं दुखभेषजम् ॥
अनादिनिधनं देवमात्मयोनिं सनातनम् ॥ (શ્લોક 3પ-3૬)

यः शेते योगमास्याय पर्यके नागभूषिते ।
फणासहस्त्ररचिते तस्मै निद्रात्मने नमः ॥ (શ્લોક ૪૮)

अपुण्यपुण्योपरमे यं पुनर्भवनिर्भया ।
शांताः संन्यासिनेः यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः ॥ (શ્લોક પપ)

यं न देवा न गंधर्वा न दैत्या न च दानवाः ।
तत्वतो हि विजानंति तस्मै मोक्षात्मने नमः ॥ (શ્લોક ૭૪)

यस्मिन्सर्वं यतः सर्व यः सर्वं सर्वतश्च यः ।
यश्च सर्वमयो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः ॥
विश्वकर्मन् नमस्तेङस्तु विश्वात्मन् विश्वसंभव ।
अपवर्गस्थ भूतानां पंचानां परतः स्थित ॥ (શ્લોક ૮૩-૮૪)

नमो ब्रह्मण्देवाय गोब्राह्मणहिताय च ।
जगद्विताय कृष्णाय गोविंदाय नमोनमः ॥ (શ્લોક ૯૪)

त्वां प्रपन्नाय भक्ताय गतिमिष्टां जिगीषवे ।
य च्छ्रेयः पुंडरीकाक्षः तदधयायस्व सुरोत्तम ॥
इति विद्यातपोयोनिरयोनिर्विष्णुरीडितः ।
वाग्यज्ञेनर्चितो देवः प्रीयतां मे जनार्दनः ॥
नारायणः परं ब्रह्म नारायणः परं तपः ।
नारायणः परा देवः सर्वं नारायणः सदा ॥ (શ્લોક ૯૭ થી ૯૯)

એ શ્લોકોનો ભાવાર્થ આ પ્રમાણેઃ શ્રીકૃષ્ણની આરાધના કરવાની ઇચ્છાથી હું જે વાણીનો ઉચ્ચાર કરું છું તે વિસ્તૃત અથવા સંક્ષિપ્ત વાણીથી પુરુષોત્તમ શ્રીકૃષ્ણ મારા પર પ્રસન્ન થાવ. સ્વ-પર દોષથી રહિત, દોષશૂન્ય માર્ગ દ્વારા પ્રાપ્ત કરવા યોગ્ય, સર્વના કરતાં અધિક શક્તિમાન, તત્વમસિ એ મહાવાક્યના તત્ પદના અર્થભૂત-ઇશ્વર, સર્વના આત્મારૂપ તથા હિરણ્યગર્ભ સ્વરૂપ શ્રીકૃષ્ણને સ્થૂલ, સૂક્ષ્મ અને કારણ શરીરના અહંભાવનો ત્યાગ કરીને હું શરણે જઉં છું. આદિ તથા અંતરહિત જે પરબ્રહ્મને દેવો કે ઋષિઓ જાણતા નથી તે પરબ્રહ્મને સર્વના ઉત્પાદક તથા સંહારક ભગવાન નારાયણ જાણે છે. સર્વ ભૂતોના નિયંતા એવા જે પરમાત્મામાં માળાના મણકાઓ જેમ સૂત્રમાં ગૂંથાઇને રહે છે તેમ સત્વાદિ ગુણવાળા આ સર્વ સ્થાવર જંગમ ભૂતસમુદાયો રહેલા છે, તથા અંતે-સૃષ્ટિના પ્રલય સમયે, તે પરમાત્મામાં લીન થઇ જાય છે. વાયુ તથા ઇન્દ્રના કરતાં પણ અધિક પરાક્રમી, સૂર્યના કરતાં પણ અધિક તેજસ્વી અને બુદ્ધિ, ઇન્દ્રિય તથા મનથી અગોચર એવા પ્રજાપતિ શ્રીકૃષ્ણને હું શરણે જાઉં છું. જેને સૃષ્ટિના આરંભમાં ‘પુરુષ’ નામથી તથા બ્રહ્મ નામથી કહ્યા છે, તથા સૃષ્ટિના પ્રલય સમયે સંકર્ષણ નામથી વર્ણવ્યા છે તે ઉપાસના કરવા યોગ્ય શ્રીકૃષ્ણ ભગવાનની અમે ઉપાસના કરીએ છીએ. સત્યસ્વરૂપ, કાર્યકારણથી પર, આદિ, મધ્ય અને અંતથી રહિત તથા એકાક્ષર બ્રહ્મ સ્વરૂપ જે ભગવાનને દેવો તથા ઋષિઓ પણ જાણી શકતા નથી તેને શરણે જાઉં છું. દુઃખના પરમ ઔષધરૂપ, આદિ અને અંતરહિત, સ્વયંભૂ તથા સનાતન એવા જે દેવની દેવો અસુરો, ગંધર્વો, સિદ્ધો ઋષિઓ અને નાગરાજાઓ પ્રયત્નશીલ થઇને નિત્ય પૂજા કર્યા કરે છે, તે દેવને હું શરણે જઉં છું. જે યોગની ધારણા કરીને હજારો ફણાઓથી યુક્ત શેષનાગરૂપી ભવ્ય પલંગ પર શયન કરે છે તે નિદ્રાત્મા ભગવાનને હું નમસ્કાર કરું છું.

પુણ્યપાપની નિવૃત્તિ થઇ ગયા પછી પુનર્જન્મના ભયથી મુક્ત થયેલા શાંત સંન્યાસીઓ જેને પામે છે તે મોક્ષરૂપ પરમાત્માને હું નમસ્કાર કરું છું. દેવો, ગંધર્વો, દૈત્યો કે દાનવો જેને યથાર્થ રીતે જાણી શક્તા નથી તે સૂક્ષ્મમૂર્તિ પરમાત્માને હું નમન કરું છું. જેનામાં આ સર્વ જગત નિવાસ કરી રહ્યું છે, જેનાથી સર્વ જગતની ઉત્પત્તિ થાય છે, જે સર્વસ્વરૂપ છે, જે સર્વત્ર વ્યાપક છે, જે નિત્ય સર્વમય છે, તે સર્વસ્વરૂપ પરમાત્માને નમસ્કાર કરું છું. હે વિશ્વસૃષ્ટા ! હું તમને નમસ્કાર કરું છું. હે વિશ્વાત્મન્ ! હે વિશ્વોત્પાદક ! હે મોક્ષસ્વરૂપ ! હે પાંચેય ભૂતોથી પર રહેલા ! તમને હું નમસ્કાર કરું છું. હે કમળ સમાન નેત્રવાળા ઉત્તમદેવ ! હું આપનો ભક્ત છું. ઇષ્ટગતિ મેળવવા ઇચ્છું છું અને આપને શરણે આવેલો છું. માટે મારા શ્રેયસ્કર માર્ગનું તમે ચિંતન કરો. આ રીતે વિદ્યા અને તપના કારણભૂત શ્રી વિષ્ણુનું મેં સ્તવન કર્યું છે, તથા વાણીરૂપી યજ્ઞ દ્વારા પૂજન કર્યું છે. તેથી જનાર્દન શ્રી વિષ્ણુદેવ મારા પર પ્રસન્ન બનો. નારાયણ પરબ્રહ્મસ્વરૂપ છે. નારાયણ જ પરમદેવ છે, તથા સર્વદા સર્વવસ્તુ નારાયણસ્વરૂપ જ છે. ગાયો, બ્રાહ્મણો તથા સર્વજગતનું હિત કરનાર, વેદવાણીનું રક્ષણ કરનાર તથા બ્રહ્મનિષ્ઠ જ્ઞાની પુરુષોના પરમ ઇષ્ટદેવ શ્રીકૃષ્ણને મારા અનેકવાર નમસ્કાર હો.

Posted in लक्ष्मी प्राप्ति - Laxmi prapti

दिवाली की रात में कहां-कहां दीपक लगाने चाहिए।

1- पीपल के पेड़ के नीचे दीपावली की रात एक दीपक लगाकर घर लौट आएं। दीपक लगाने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। ऐसा करने पर आपकी धन से जुड़ी समस्याएं दूर हो सकती हैं।
2- यदि संभव हो सके तो दिवाली की रात के समय किसी श्मशान में दीपक लगाएं। यदि यह संभव ना हो तो किसी सुनसान इलाके में स्थित मंदिर में दीपक लगा सकते हैं।
3- धन प्राप्ति की कामना करने वाले व्यक्ति को दीपावली की रात मुख्य दरवाजे की चौखट के दोनों ओर दीपक अवश्य लगाना चाहिए।
4- हमारे घर के आसपास वाले चौराहे पर रात के समय दीपक लगाना चाहिए। ऐसा करने पर पैसों से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।
5- घर के पूजन स्थल में दीपक लगाएं, जो पूरी रात बुझना नहीं चाहिए। ऐसा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
6- किसी बिल्व पत्र के पेड़ के नीचे दीपावली की शाम दीपक लगाएं। बिल्व पत्र भगवान शिव का प्रिय वृक्ष है। अत: यहां दीपक लगाने पर उनकी कृपा प्राप्त होती है।
7- घर के आसपास जो भी मंदिर हो वहां रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। इससे सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
8- घर के आंगन में भी दीपक लगाना चाहिए। ध्यान रखें यह दीपक भी रातभर बुझना नहीं चाहिए।
9- घर के पास कोई नदी या तालब हो तो बहा पर रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। इस से दोषो से मुक्ति मिलती है !
10- तुलसी जी और के पेड़ और सालिगराम के पास रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। ऐसा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
11- पित्रो का दीपक गया तीर्थ के नाम से घर के दक्षिण में लगाये ! इस से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है

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Posted in स्वाध्याय

“હું માણસ છું ”
તેનું ગૌરવ રાખું.
સૃષ્ટિ નિર્માતા- ભગવાન
મારી અંદર
આવીને વસ્યા છે
તેથી
આ શરીરને કિંમત છે.
સમર્થ શક્તિ એવા
ભગવાન મારી અંદર છે
તો હું
દીન-હીન-લાચાર- દૂબળો- બિચારો- બાપડો
કેવી રીતે હોઈ શકું?
હું પણ ધારું તે
કરી શકું છું
થઇ શકું છું
બની શકું છું.
ભગવાનનું શ્રેષ્ઠ સર્જન
એવો
“હું માણસ છું ”
તેનું મને ગૌરવ હોવું જોઈએ.
આજે પૈસો, સત્તા,વિધ્વત્તા હોય તેને જ કિંમત છે.
તે જેની પાસે નથી તેને કિંમત નથી.
પણ
ભારતીય સંસ્કૃતિ કહે છે કે
“માણસ “તરીકે
માણસની કિંમત થવી જોઈએ.
જેમ દૂધ હોય તો તેને પોતાની મિઠાશ હોય છે જ.
તેમાં ખાંડ, કેસર નાખીએ તો તેની મિઠાશ વધે છે
પણ
એનો અર્થ એ નથી કે
દૂધની પોતાની મિઠાશ નથી.!!
ખાંડ, કેસર વ.એ
દૂધનું ડેકોરેશન છે.
તેમ
પૈસો, સત્તા હોવી એ માણસનું ડેકોરેશન છે.
તેનાથી માણસની કિંમત વધતી હશે
પણ
તે બધું ન હોય તો પણ માણસને કિંમત છે
કારણ અંદર ચૈતન્ય શક્તિ બિરાજમાન છે.
સૌ પહેલાં,
” હું માણસ છું ”
તેનું ગૌરવ રાખીને જીવું. (પછી ડોક્ટર, વકીલ વ. છું. )
આજે સમાજમાં જે
નાત-જાત,
ધર્મ-ધર્મ
ઉંચ-નીચ,
ગરીબ-તવંગર વ. ના
ભેદભાવ છે
તેનો આ એક જ ઉકેલ છે
કે
માણસને માણસ તરીકે જોવામાં આવે.
“હું માણસ છું ”
તેનું ગૌરવ રાખું
અને
આત્મસન્માન થી જીવું.
તેમ
બીજો પણ
“માણસ છે”
તેનું પણ ગૌરવ જાળવું
અને
“પર સન્માન “રાખું.
સ્વાધ્યાય પ્રવૃત્તિના પ્રણેતા, અર્વાચીન ૠષિ એવા પ.પૂ. પાંડુરંગ શાસ્ત્રી આઠવલેજીએ
ગીતાના વિચારો દ્વારા,
ત્રિકાળ સંધ્યાના માધ્યમથી
“ભગવાન મારી જોડે છે”
વાત દ્રઢ કરાવી
સમાજમાં આ પ્રકારની
ક્રાંતિ નિર્માણ કરી છે
અને “હું માણસ છું ”
તેનું ગૌરવ ઉભું કર્યું છે.
પરિણામે સમાજમાંથી
તમામ ભેદો દૂર થયા છે.
અને વિવિધ ધર્મ, જાતિ,અમીર- ગરીબ ભેદોથી પર થઇને
ઐક્યથી,
ગૌરવપૂર્ણ જીવન જીવી રહ્યા છે.
તેથી જ પ.પૂ .દાદાનો જન્મદિન 19 ઓક્ટોબર “મનુષ્ય ગૌરવદિન” તરીકે સ્વાધ્યાય પરિવાર ભાવથી ઉજવે છે.
કરોડો લોકોના જીવનમાં “સદા દિવાળી ” લાવનાર પૂ.દાદાજીને તેમના જન્મદિને કોટી કોટી વંદન.

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मनुष्य गौरव दिन


समस्त विश्व के सभी मानवों को “मनुष्य गौरव दिन” की हार्दिक शुभेच्छाए । 💐💐💐

स्वाध्याय विचार के प्रणेता, तत्त्वचिंतक ओर आर्षद्रष्टा परम पूजनीय पांडुरंग शास्त्रीजी आठवले – पूजनीय दादाजीको उनके १०० वे जन्मदिवस पर भावपूर्ण शत शत नमन । 🙏🏻🙏🏻🙏🏻

💐💐 HUMAN DIGNITY DAY 💐💐

श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान कहते है “सर्वस्व चाहं ह्रदि सन्निविष्टो” ( मै सभी के ह्रदय में बिराजमान हुं ) इस गीता कथन से पू. दादाजी ने मनुष्य के गौरवभाव को जगाया है।

मुझमे राम – मेरा गौरव ( आत्मसम्मान- Self Respect )
तुझमे राम – तेरा गौरव ( परसम्मान – Respect for Others )
सबमे राम – सबका गौरव ( Reverence for Mankind – मनुष्य गौरव ) निर्माण किया ।

“भगवान मेरे साथ है – GOD is with ME “ यह विचारधारा स्वाध्याय प्रवचनसे स्थिर की । दादाजीने बताया की विश्व का कोइ भी मनुष्य दीन, हीन, लाचार, तुच्छ, तिरस्करणीय या पराया नहीं हो सकता ।वह भगवान का अंश है – * ममैवांशो जीवलोके जीवभूत सनातन । *

“Other is not Other but he is my Divine Brother” ( दूसरा दूसरा नहीं है, वह मेरा दैवी भाई ही है ।)

“Divine Brotherhood of Man under the fatherhood of GOD” (दैवी भ्रातृभाव )


रक्त के सम्बंध से भी आगे जाकर, हम सभी मनुष्यों का रक्त बनानेवाला भगवान एक ही है । यही विचार से दादाजीने * “वैश्विक दैवी भ्रातृभाव” – Divine Brotherhood * समजाकर चरितार्थ किया * “मनुष्य गौरव “* ।

पू. दादाजीने यह “ह्रदयस्थ भगवान” * के क्रांतिकारी विचारसे मानव की *अस्मिताजागृति करके भोगों के पीछे न भागते हुए, भगवान के प्रति कृतज्ञ भाव खडा किया व पुष्ट कीया जिससे आपने मानव मे भावजागृति खडी की ।

सनातन वैदिक आर्षग्रन्थ- वेद, उपनिषद्, श्रीमद् भगवद् गीता आदि की तेजस्वि विचारधारा का “स्वाध्याय” से मानव मे कृतज्ञता, अस्मिता ओर भावजागृति करके कृतिप्रवणता खडी की ।
इस साल दादाजी का सोवां ( १०० वा ) जन्मदिवस मना रहे है। यही विचार यही संदेश लेकर हम स्वाध्यायी घर घर मे जायेंगे । दैवी सम्बंध स्थापित करके मानव मानव को जोडने का दिव्य कार्य, भावफेरी और भक्तिफेरी के माध्यम से करेंगे । जीवन में नि:स्वार्थ कृति करने का एक अभ्यास है । तेजस्वी वैदिक विचारों को आचार मे लाने का प्रामाणिक प्रयत्न कर रहे है ।

इस तरह प्रभु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते है और पू. दादाजी के पुनित चरणों मे भाववंदना करते हैं।

💐🙏🏻 ॥ कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ 🙏🏻💐

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एक बार एक बंदर को उदासी के कारण मरने की इच्छा हुई, तो उसने एक सोते हुए शेर के कान खींच लिये।

शेर उठा और
गुस्से से दहाड़ा-
“किसने किया ये..? किसने अपनी मौत बुलायी है..?”

बंदर: “मैं हूँ महाराज। दोस्तो के अभाव में अत्याधिक उदास हूँ,
मरना चाहता हूँ,
आप मुझे खा लीजिये।”

शेर ने हँसते हुए पूछा-
“ मेरे कान खीँचते हुए तुम्हें किसी ने देखा क्या..?”
🤔

बंदर: “नहीं महाराज…”

शेर: “ठीक है, एक दो बार और खीँचो, बहुत ही अच्छा लगता है…. !!”

सार :

अकेले रह-रह कर जंगल का राजा भी बोर हो जाता है।

इसलिए अपने दोस्तों के संपर्क में रहें, कान खीँचते- खिचाते रहे, पंगा लेते रहे…।

सुस्त न रहे,
मस्ती 👇👆🤪करते रहें..!

दोस्तो से रिश्ता रखा करो जनाब..!!
तबियत मस्त रहेगी।
😊😊😊😊😊
ये वो हक़ीम हैं
जो अल्फ़ाज़ से ही इलाज कर दिया करते हैं। 🥰🥰

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परमात्मा की लाठी

बहुत सुंदर भाव अवश्य पढे….📖

एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था, कि उसने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबाला जा रहा था तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थीं। साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया, शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था। साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते, साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकनें के बाद चला ही जाना चाहता था कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दे दीं। मलंग ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिए प्रार्थना की, फिर आगे चल दिया। साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह, वो फिर एक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था।
वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहा है। एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी। बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये। उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई।

इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो को पकड़ कर खींच कर कहने लगा -“अंधा है?तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं?”
साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुज़र रहा था।
महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा, लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई।

राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने, एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया। बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ लड़खड़ाता हुआ कीचड़ में जा गिरा।
युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया।
बूढ़े साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़!!!
लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है।
यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया।
दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया। थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुका। वह अपने घर पहुंच गए थे।
वो युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था। बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी। अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा।
महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपक, लेकिन देर हो चुकी थी।
युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर में ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी। कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफूसी होने लगी कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है। कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया।
एक युवा कहने लगा कि
– “आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे। भगवान के भक्त में रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता। आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें।” साधु बाबा कहने लगा -“भगवान की क़सम! मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया।” -“अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया?”
तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि
-“आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है?”
एक युवक ने आगे बढ़कर कहा -“हाँ! मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ।”
साधु ने अगला सवाल किया-“मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़ों को दागी किया था?”
युवा बोला- “नहीं। लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे।”
मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा- “फिर युवक ने मुझे क्यों मारा?” युवा कहने लगा
– “क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे। इसलिए उस युवक ने आपको मारा।”
युवा की बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया…..
तो! भगवान की क़सम! मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझसे प्रेम रखता है।अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे? और वो मेरा यार इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है।
सच है। उस परमात्मा की लाठी दीख़ती नहीं और आवाज भी नहीं करती लेकिन पड़ती है तो बहुत दर्द देती है। हमारे कर्म ही हमें उसकी लाठी से बचाते हैं, बस कर्म अच्छे होने चाहियें।

ना जाने कितनी अनकही बातें साथ ले जाएंगे.. .

लोग झूठ कहते हैं कीं., खाली हाथ आए थे., खाली हाथ जाएंगे.. . ..l

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💥🌳सुप्रभात🌳💥

💐खुद को बदल दो समाज खुदबखुद बदल जायेगा💐

*एक सन्यासी ने देखा एक छोटा बच्चा घुटने टेक कर चलता था, धूप निकली थी, बच्चे की छाया आगे पड़ रही थी, बच्चा छाया में अपने सिर को पकड़ने के लिए हाथ ले जाता लेकिन जब हाथ पहुँचता तो छाया आगे बढ़ जाती।

बच्चा रोने लगा, माँ उसे समझाने लगी पर बच्चे कब समझ सकते हैं।

सन्यासी ने कहा, बेटे रो मत, छाया पकड़नी है?

सन्यासी ने बच्चे का हाथ पकड़ा और उसके सिर पर रख दिया, हाथ सिर पर गया, उधर छाया के ऊपर भी सिर पर हाथ गया।

सन्यासी ने कहा, देख, पकड़ ली तूने छाया। छाया कोई सीधा पकड़ेगा तो नहीं पकड़ सकेगा लेकिन अपने को पकड़ लेगा तो छाया पकड़ में आ जाती है।*

ऐसे ही जो काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार को पकड़ने को लिए दौड़ता है वह इनको कभी नहीं पकड़ पाता, यह मात्र छाया हैं लेकिन जो आत्मा को पकड़ लेता है, विकार उसकी पकड़ में आ जाते हैं।

खुद को बदल दो समाज खुदबखुद बदल जायेगा

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Gyanu Basnyat ” शर्तों से परे होता है प्रेम “

एक दिन फकीर के घर रात चोर घुसे। घर में कुछ भी न था।
सिर्फ एक कंबल था, जो फकीर ओढ़े लेटा हुआ था।
सर्द रात, फकीर रोने लगा, क्योंकि घर में चोर आएं और चुराने को कुछ नहीं है, इस पीड़ा से रोने लगा।

उसकी सिसकियां सुन कर चोरों ने पूछा कि भई क्यों रोते हो?
फकीर बोला कि आप आए थे – जीवन में पहली दफा,
यह सौभाग्य तुमने दिया! मुझ फकीर को भी यह मौका दिया!
लोग फकीरों के यहां चोरी करने नहीं जाते, सम्राटों के यहां जाते हैं।
तुम चोरी करने क्या आए, तुमने मुझे सम्राट बना दिया।

ऐसा सौभाग्य! लेकिन फिर मेरी आंखें आंसुओ से भर गई हैं,
सिसकियां निकल गईं,
क्योंकि घर में कुछ है नहीं।
तुम अगर जरा दो दिन पहले खबर कर देते तो मैं इंतजाम कर रखता
दो—चार दिन का समय होता तो कुछ न कुछ मांग—तूंग कर इकट्ठा कर लेता।
अभी तो यह कंबल भर है मेरे पास, यह तुम ले जाओ। और देखो इनकार मत करना। इनकार करोगे तो मेरे हृदय को बड़ी चोट पहुंचेगी।

चोर घबरा गए, उनकी कुछ समझ में नहीं आया। ऐसा आदमी उन्हें कभी मिला नहीं था।
चोरी तो जिंदगी भर की थी,
मगर ऐसे आदमी से पहली बार मिलना हुआ था।

भीड़— भाड़ बहुत है, आदमी कहां?
शक्लें हैं आदमी की, आदमी कहां?

पहली बार उनकी आंखों में शर्म आई, और पहली बार किसी के सामने नतमस्तक हुए।

मना करके इसे क्या दुख देना, कंबल तो ले लिया। लेना भी मुश्किल! क्योंकि इस के पास कुछ और है भी नहीं,
कंबल लिया तो पता चला कि फकीर नंगा है। कंबल ही ओढ़े हुए था, वही एकमात्र वस्त्र था— वही ओढ़नी, वही बिछौना।

लेकिन फकीर ने कहा. तुम मेरी फिकर मत करो, मुझे नंगे रहने की आदत है। फिर तुम आए, सर्द रात, कौन घर से निकलता है। कुत्ते भी दुबके पड़े हैं।
तुम चुपचाप ले जाओ और दुबारा जब आओ मुझे खबर कर देना।

चोर तो ऐसे घबरा गए और एकदम निकल कर झोपड़ी से बाहर हो गए।
जब बाहर हो रहे थे तब फकीर चिल्लाया कि सुनो, कम से कम दरवाजा बंद करो और मुझे धन्यवाद दो।
आदमी अजीब है, चोरों ने सोचा।

कुछ ऐसी कड़कदार उसकी आवाज थी कि उन्होंने उसे धन्यवाद दिया, दरवाजा बंद किया और भागे।
फकीर खिड़की पर खड़े होकर दूर जाते उन चोरों को देखता रहा।
कोई व्यक्ति नहीं है ईश्वर जैसा, लेकिन सभी व्यक्तियों के भीतर जो धड़क रहा है, जो प्राणों का मंदिर बनाए हुए विराजमान है, जो श्वासें ले रहा है, वही तो ईश्वर है।

कुछ समय बाद वो चोर पकड़े गए। अदालत में मुकदमा चला,
वह कंबल भी पकड़ा गया। और वह कंबल तो जाना—माना कंबल था।
वह उस प्रसिद्ध फकीर का कंबल था।

जज तत्‍क्षण पहचान गया कि यह उस फकीर का कंबल है।
तो तुमने उस फकीर के यहां से भी चोरी की है?
फकीर को बुलाया गया। और जज ने कहा कि अगर फकीर ने कह दिया कि यह कंबल मेरा है और तुमने चुराया है,
तो फिर हमें और किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है।
उस आदमी का एक वक्तव्य, हजार आदमियों के वक्तव्यों से बड़ा है।
फिर जितनी सख्त सजा मैं तुम्हें दे सकता हूं दूंगा।

चोर तो घबरा रहे थे, काँप रहे थे
जब फकीर अदालत में आया।
और फकीर ने आकर जज से कहा कि नहीं, ये लोग चोर नहीं हैं, ये बड़े भले लोग हैं।
मैंने कंबल भेंट किया था और इन्होंने मुझे धन्यवाद दिया था।
और जब धन्यवाद दे दिया,
बात खत्म हो गई।

मैंने कंबल दिया, इन्होंने धन्यवाद दिया। इतना ही नहीं,
ये इतने भले लोग हैं कि जब बाहर निकले तो दरवाजा भी बंद कर गए थे।
जज ने तो चोरों को छोड़ दिया, क्योंकि फकीर ने कहा. इन्हें मत सताओ, ये प्यारे लोग हैं, अच्छे लोग हैं, भले लोग हैं।

चोर फकीर के पैरों पर गिर पड़े और उन्होंने कहा हमें दीक्षित करो।
वे संन्यस्त हुए।
और फकीर बाद में खूब हंसा।
और उसने कहा कि तुम संन्यास में प्रवेश कर सको इसलिए तो कंबल भेंट दिया था।
इसे तुम पचा थोड़े ही सकते थे। इस कंबल में मेरी सारी प्रार्थनाएं बुनी थी।

झीनी—झीनी बीनी रे चदरिया
उस फकीर ने कहा प्रार्थनाओं से बुना था इसे।
इसी को ओढ़ कर ध्यान किया था। इसमें मेरी समाधि का रंग था,
गंध थी। तुम इससे बच नहीं सकते थे।
यह मुझे पक्का भरोसा था, कंबल ले ही आएगा तुमको
उस दिन चोर की तरह आए थे
आज शिष्य की तरह आए।
मुझे भरोसा था।
क्योंकि बुरा कोई आदमी है ही नहीं।।।