Posted in गौ माता - Gau maata

सुबोध कुमार

असहाय गौ ?
AV 3-28-1
1. एकैकयैषा सृष्टया संबभूव यत्रा गा असृजन्त भूतकृतो विश्वरूपा: | यत्रा विजायते यमिन्यपर्तु: स पशून् क्षिणाति रिफती रूशती।।
अथर्व3.28.1
जिन गौओं की ठीक से देख भाल होती है वे एक के बाद एक नियम से संतान उत्पन्न कर के हमारा कल्याण करती हैं। जिन गौओं का ठीक से ध्यान नहीं हो पाता वे बिखर जाती है,समाज को कलंक लगाती हैं और स्वयं नष्ट हो कर समाज को भी नष्ट कर देती हैं।
गौशाला क्यों ?
2.एषा पशून्त्सं क्षिणाति क्रव्याद भूत्वा व्यदवरी।
उतैना ब्रह्मणे दद्यात तथा स्योना शिवा स्याता ।। अथर्व वेद 3।28।2
असहाय गौ जो घूमती फिरती अभक्षणीय पदार्थों को खा कर अपनी भूख मिटाती हैं , संक्रामक संघातक गुप्त रोगों से ग्रसित हो जा़ती हैं। (ये रोग उपचार द्वारा भी असाध्य पाए जाते हैं, और ऐसी गौ के संपर्क से यह रोग मनुष्यों में भी आने की संभावना रहती है)
ऐसी असहाय गौओं को अच्छी भावनाओं से प्रेरित, निस्वार्थ जनों के संरक्षण मे पहुंचाने के लिए गोशालाओं/ गोसदनों की व्यवस्था करनी चाहिए,जिस से उन की ठीक से देख भाल हो सके।
3.शि॒वा भ॑व॒ पुरु॑षेभ्यो॒ गोभ्यो॒ अश्वे॑भ्यः शि॒वा । शि॒वास्मै सर्व॑स्मै॒ क्षेत्रा॑य शि॒वा न॑ इ॒हैधि॑ ॥ AV 3-28-3
इन गोशालाओं /गोसदनों में सब गौएं और घोड़े भी भूमि पर कल्याण करने वले सिद्ध हों ।
4. इ॒ह पुष्टि॑रि॒ह रस॑ इ॒ह स॑हस्र॒सात॑मा भव । प॒शून्य॑मिनि पोषय ॥ AV 3-28-4
इन गोशालाओं //गोसदनों के संचालन करने वाले सदस्य यम नियम का पालन करने वाले जितेंद्रिय उत्तम आचरण वाले हों । जिससे यहां रखे सब पशु स्वस्थ हों और समाज के लिए कल्याणकारी साधन उपलब्ध कराएं ।
5. यत्रा॑ सु॒हार्दः॑ सु॒कृतो॒ मद॑न्ति वि॒हाय॒ रोगं॑ त॒न्व॑१ स्वाया॑ह् । तं लो॒कं य॒मिन्य॑भि॒संब॑भूव॒ सा नो॒ मा हिं॑सी॒त्पुरु॑षान्प॒शूंश्च॑ ॥ AV 3.28.5
इन स्थानों पर पुण्यकर्मा यम नियम का पालन करने वाले लोग स्वस्थ और निरोग हो कर गोसेवा करते हुए आनंद से निवास करते हैं । (ऐसे वातावरण में स्वास्थ लाभ के लिए और निस्वार्थ गोसेवा करने के लिए स्वयंस एवकों का भी स्वागत हो।)
6. यत्रा॑ सु॒हार्दां॑ सु॒कृता॑मग्निहोत्र॒हुता॒म्यत्र॑ लो॒कः । तं लो॒कं य॒मिन्य॑भि॒संब॑भूव॒ सा नो॒ मा हिं॑सी॒त्पुरु॑षान्प॒शूंश्च॑ ॥ AV 3.28.6
इन स्थानों पर पुण्यकर्मा यम नियम का पालन करने वाले लोग स्वस्थ और निरोग हो कर आनंद से अग्निहोत्रादि गोसेवा पुण्य कर्म करते हुए निवास करते हैं । (ऐसे वातावरण में स्वास्थ लाभ के लिए और निस्वार्थ गोसेवा करने के लिए स्वयं सेवकों का भी स्वागत हो।)